संध्या तिवारी की लघुकथाऐं

- संध्या तिवारी

बाबू

रेल की पटरी पर भीड इकट्ठी हो गयी थी।
पन्द्रह सोलह साल की किशोरी दो हिस्सों में कटी पड़ी थी। भीड़ में पीर से सने तरह तरह के स्वर उभर रहे थे। मम्मी की अंगुली थामे पाँचेक साल की पिंकी भी पटरी किनारे बने अपने घर की खिड़की से ही यह नजारा देख सुन रही थी। 
उसने सुना कि मम्मी मुँह बिचकाते हुए पड़ोसवाली आंटी से कह रही थीं
- प्यार मोहब्बत का चक्कर लगता है शायद इसीलिये वह ट्रेन के नीचे कट मरी। 

अचानक पिंकी को जाने क्या हुआ उसने मम्मी की मुट्ठी से अपनी अंगुली छुड़ाई और घर से बाहर की तरफ चल दी। 
- कहाँ जा रही हो पिंकी? इधर आओ। 
मम्मी ने पीछे से पुकारा।
- कटने..... 
पिंकी ने संक्षिप्त उत्तर दिया। 
पहले तो मम्मी और पड़ोसन आंटी इसे मजाक समझकर खिलखिला दीं, लेकिन जब पिंकी सच में बाहर की ओर चल दी तो भाग कर उसे पकड़ा, बाहों में भर लिया
- क्या हुआ बोलो, किस बात पर कटने जा रही थी?
मम्मी ने उसे हँसते और बहलाते हुए पूछा। 

- आप सब भइया को प्यार करते हैं, सेरेलक दूध शहद सब भइया को खिलाते हैं। गोदी भी सब उसे ही लेते है, और तो और मेरा बाबू नाम भी भइया को दे दिया। पहले जब यह नही था तब सब हमें ही बाबू कहते थे प्यार भी करते थे अब कोई मुझे प्यार नही करता न आप न पापा न ताऊ और ना दादी। जहाँ प्यार मोहब्बत का चक्कर होता है वहाँ ट्रेन से कट जाना चाहिये, अभी यह बात आप आंटी को बता रहीं थी, मैने खुद सुना। 
कहते कहते पिंकी का चेहरा लाल हो गया था और आँखों के आँसू गाल पर ठहर गए। उसके छोटे मुँह से ऐसी बातें सुनकर मम्मी की आँखें फटी रह गईं।  
'उफ्फ इतना दर्द है इस नन्हे से मन में।'
- अले मेला बाबू!
कहकर मम्मी ने उसे अपने आलिंगन में ऐसे समेट लिया जैसे चिड़िया ने अपना अंडा अपने डैनो में समेट लिया हो।

कठिना

- अरे वाह! कितना विहंगम दृश्य है! चारों ओर घना जंगल, जंगल के बीच अपने तेज़ बहाव से संगीत रचती नदी। जी करता है, यहीं बस जाऊँ। उस कंक्रीट के जंगल में ऐसा नजारा कहाँ!
खुशी और मायूसी के मिश्रित मनोभावो से घिरी चांदनी बस की खिड़की से बाहर झांक रही थी। बस धीरे धीरे कठिना नदी पर बना लकड़ी का जर्जर पुल पार कर रही थी।
उसने साथ बैठी अपनी मामी से पूछा
- यह कौन सी नदी है?
- कठिना
मामी ने सन्क्षिप्त सा उत्तर दिया 
- क्या हुआ मामी आप अचानक बीतराग हो गईं? 
चुहुल करती हुयी चांदनी ने उनसे कहा, मगर उत्तर की जगह सन्नाटा था ।
चांदनी ने शायद उत्तर की अपेक्षा भी नहीं की थी , इसलिये वह बाहर के दृश्य में उलझ गयी और मामी अन्दर के।
उसके भी चारो तरफ जंगल था बियाबान जंगल।
सियार, गीदड़, लकड़बग्घे, लोमड़ी सब वर्चस्व की लड़ाई में भितरघात करने का कोई मौका चूकना नहीं चाहते थे।
कब किसका दाँव लगे कि वह दूसरे को ऐसी चोट दे कि अगला कह भी न सके और सह भी न सके। दाँव लगा था चचिया ससुर के बेटे का, दाँव पर लगी थी उसकी पन्द्रह वर्षीय बेटी खानदानी भाई का बीज पेट में लिये घूम रही थी नादान। पूरा परिवार सकते में था। बेटी भी जा रही और इज्जत भी।
'जे जांघ खोले तो लाज वो जांघ खोले तो लाज।'
क्या दिन थे? समझ नही आ रहा क्या किया जाय ,इस मुसीबत से छुटकारा पाने को।
बड़ा कठिन फैसला लिया था उसके ससुर ने, बच्ची को जंगल दिखाने का, कठिना नदी की सैर कराने का।
कठिना की सैर करके सब लौट आये बस बच्ची नहीं आई।
तब से वह अपने भीतर उफनती कठिना पर रिश्ते-नातों का जर्जर पुल बाँधे कठिनाई से आवागमन करती है।

क्षेपक

रात्रिभोज के लिये खाने की मेज पर बैठे बैंक मैनेजर मिस्टर एस लाल पचास साल पीछे की सीढ़ियाँ उतर गए, जब वह सुखिया हुआ करते था। बस जब गाँव की पाठशाला में हाजिरी होती थी तब सुखलाल नाम सुनाई पड़ता था। नही तो ऐ सुख्खी! ऐ सुखिया!! जैसे सम्बोधन ही उसे मिलते। उसके गाँव का नाम तो सौंखिया था लेकिन गाँव में जाति के आधार पर टोले बँटे हुए थे जैसे बामनटोला, लोधीटोला, पसियाटोला, कुम्हारनटोला और उसका बाला था चमारनटोला।
उफ्फ! झुरझुरी आ गई एस लाल को। पूरी खाल में चमरौधे की सड़ांध भिंद गई।
- खाना लगा दिया है। 
पत्नी मायावती की आवाज से वह वर्तमान में लौटे
- कुसुम कहाँ है? खाना नहीं खायेगी क्या?
एस लाल ने पूछा। 
- अपने कमरे में है आती होगी। आज ऑफिस से देर से आयी थी। कह रही थी कि ऑडिट है, थोड़ा काम करना है।
- हूंऽऽऊं। अरे वाह! आज तो पनीर और खीर दोनो मेरी मनपसन्द चीजें बनाई हैं क्या बात है, कुछ कहना है क्या?
- जी। 
मायावती कुछ सकुचाते हुये बोली 
- कुसुम के साथ एक लड़का काम करता है... अच्छी पोस्ट पर है... और दोनों एक दूसरे को पसन्द भी करते है, आप कहें तो..."
- ठीक है, ठीक है, भाई। हमें क्या आपत्ति हो सकती है। 
खीर गटकते हुये उन्होने पत्नी को प्यार से देखा ।
- लेकिन वह.............
पत्नी हकलायी
- लेकिन क्या?
एस लाल विराम चिह्न से प्रश्नवाचक बन गये थे।
- जी वह..... मु......स......ह....र
अचानक खीर के बर्तन में सुअरों को अपनी थूथन घुसाते देख सुखिया से एस लाल बने सुखलाल अगिया बेताल बन गये।