काव्यांश 'स्पार्टकस' की कथा - शरद कोकास

कवि शरद कोकास की लंबी कविता 'पुरातत्ववेत्ता' से यह अंश 'स्पार्टकस' की कथा
शरद कोकास

पहली सहस्त्राब्दि की नीचे उतरती सीढ़ी पर
जहाँ आकाश अटलांटिस की पीठ पर टिका है
सोने के सेब की खोज में भटक रहा है हर्क्यूलिस
मैराथन से दौड़कर आते एथेनी योद्धा के पाँव
स्पार्टकस* की देह से टपके लहू में सने हैं 
दासों की मन्डी से आती है स्त्रियों के रोने की आवाज़
इतिहासकारों की निरक्षरता पर 
हँस रहे हैं सिन्धु घाटी के नगरजन

*'स्पार्टकस' की कथा : पहली शताब्दी ईसा पूर्व की बात है। रोम के सम्राटो और संपन्न वर्ग के लोगों द्वारा युद्धों के दौरान दुश्मनो के राज्य के अनेक स्त्री पुरुषों को युद्धबंदी बना लिया जाता था और फिर उनसे उनकी आख़िरी साँस तक गुलामों की तरह काम लिया जाता था। उन्हें सिर्फ इतना खाना दिया जाता कि वे ज़िंदा रह सकें। न उन्हें प्रेम की इज़ाज़त थी न विवाह की।

इन दासों की मंडियाँ होती थी जहाँ जानवरों की तरह इन्हें बेचा ख़रीदा जाता था। सभ्रांत लोगों द्वारा इन दासों से 20-20 घंटे खेतों, खदानों और महलों में मजदूरी करवाने  के अलावा मनोरंजन के लिए इन्हें आपस में लड़ाया जाता था। शेर जैसे  खूंख्वार जानवरों से भी लड़ाया भी जाता था जिसमे उनकी जान जाना तय रहता था। खेल का अर्थ होता था लहूलुहान होकर एक दास की मौत। जितना उनका खून बहता था उतने अमीर ख़ुश होते थे।

इस खूनी खेल के लिए हमारे आज के स्टेडियम की तरह रोम में कोलोसियम बनाये गए थे जहाँ हज़ारों अमीर स्त्री पुरुष  मनोरंजन के लिए मनुष्य की हत्या का यह घिनौना खेल देखते थे। तड़प तड़प कर अपनी जान दे देने वाले यह दास ग्लेडिएटर कहलाते  थे।

इस अमानवीयता के खिलाफ सबसे पहले आवाज़ उठाई स्पार्टकस ने। *स्पार्टकस उस प्रसिद्ध दास विद्रोही ग्लेडिएटर का नाम है जिसने 71 ईसापूर्व में रोम के शासकों द्वारा दासों के शोषण और उनके इस खूनी खेल के विरुद्ध एक संगठित विद्रोह किया था।

लेकिन जीत अमीरों की हुई। स्पार्टकस के इस विद्रोह को तत्कालीन शासकों द्वारा  कुचल दिया गया और उसे मार डाला गया। विद्रोह में शामिल होने वाले उसके छह हज़ार से भी अधिक साथियों को प्राणदंड देकर रोम से कापुआ के रास्ते में सलीबों पर लटका दिया गया। कालान्तर में यह खेल समाप्त हो गया लेकिन क्रांतिकारी स्पार्टकस का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया।