नदी जो झील बन गई - कहानी

- सौरभ शर्मा
सौरभ शर्मा
स्मृति जोशी
2-53 संगम रोड, टिहरी
उत्तराखंड

आशा है सब वहाँ बहुत कुशल होंगे। यहाँ लंदन पहुँचे मुझे दो महीने हो गए, दिल्ली में मुझे विदा करते वक्त तुमने कहा था कि पहुँचते ही लैटर लिख देना लेकिन यह हो न सका। आज बहुत फुरसत में हूँ। लंदन के नीले आकाश के नीचे लेटा हुआ, चाँदनी में सारे तारे सजे हुए हैं जिस इलाके में हूँ वो चकाचौंध का इलाका नहीं है। उसे वैसे ही रहने दिया गया है सोलहवीं सदी का। बगैर ज्यादा रोशनियों का।

हाँ जिस हरी घास में लेटा हूँ उसके ठीक सामने टेम्स बह रही है। इसमें बहुत सी नावें तिर रही हैं। प्रेमी-प्रेमिका इनमें सवार हैं हर उम्र के (वे पति-पत्नी भी हो सकते हैं अगर वे सचमुच अब आपस में प्रेम करते हों)। कभी गंगा तट में मैंने कितनी ही ऐसी शामें गुजारी थीं। आज टेम्स में गुजारने का सौभाग्य मिल रहा है। राहुल सांकृत्यायन ने गंगा से वोल्गा तक यात्रा वृत्तांत लिखा था, मैं लिखूँगा गंगा से टेम्स तक।

अभी पहले महीने तो लंदन मेट्रो का ही आनंद लिया, वहाँ ब्रिटिश अखबार टेलीग्राफ, टाइम्स पढ़ते हुए लंदन शहर का नजारा लेने का अलग ही लुत्फ है। और लंदन के लैंड मार्क देखे। ट्राफल्गर स्क्वायर के कुछ फोटोग्राफ्स मैंने तुम्हें भेजे हैं, कुछ पुरानी यादें ताजा होंगी।

हाँ टेलीग्राफ में टिहरी का एक समाचार भी देखा था, बांध का विरोध बढ़ गया है। क्या अपडेट हैं इंतजार करूँगा। अपनी रिसर्च के बारे में जल्दी ही लिखूँगा, अभी तो बस शुरूआत की है।

हर्षित
स्कूल आफ अफ्रो एंड एशियन स्टडीज लंदन
23 मार्च 2003
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हर्षित
स्कूल आफ अफ्रो एंड एशियन स्टडीज

तुम्हारी चिंता थी। खत मिला तो बहुत अच्छा लगा। मैंने टेम्स में गुजारी हुई तुम्हारी शामों का खाका अपने मन में खींच लिया, फोटोग्राफ्स बहुत अच्छे हैं और सबसे अच्छा यह है कि इस समय तक कोई गोरी मेम तुम्हारे बगल में खड़ी नहीं हुई है। नहीं तो उत्तराखंड के अखबारों के लिए यह अच्छी फोटो बन जाती, कैप्शन होता- ट्राफल्गर स्क्वायर में एडमिरल नेल्सन के साथ लेडी हैमिल्टन। तुमने कहा था कि फोटोग्राफ से जरूर कुछ याद आएगा- हाँ याद आया। शिमला में हम लोग स्कूल ट्रिप में गए थे। वहाँ म्यूजियम में इंस्ट्रक्टर ने एडमिरल नेल्सन का किस्सा बताया था, ट्राफल्गर की बड़ी लड़ाई जीतने वाले नेल्सन के बारे में जिसने नेपोलियन के वर्चस्व का दौर समाप्त कर दिया था। उनकी प्रेमिका के साथ तस्वीर पर कमेंट करते हुए इंस्ट्रक्टर की शरारती आँखें मुझे अब भी याद हैं। लुक आन हर, द इनफेमस साइड आफ ग्रेट एडमिरल नेल्सन।

हमारे इस छोटे से शहर की खबरें टेलीग्राफ में भी लग रही हैं यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। लेकिन बाँध को लेकर हम हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। तुम जैसे लोग जो हमारे नेल्सन हो सकते थे, इतिहास की गलियों को छानने यूके में हैं जबकि यहाँ उनका अपना जीवन इतिहास की गर्त में समाने जा रहा है।

इस बार हम लोगों ने घर में पुताई भी नहीं कराई। जाने कब वो बांध का गेट बंद कर दें और हमारा घर जलसमाधि ले ले। घर में सब तरफ झाड़-झंखाड़ उग रहे हैं अजीब सा सूनापन घर में पसर गया है। ऐसे ही हालात जैसे गदर के समय दिल्ली में रहे होंगे, जिस पर गालिब ने अपनी हवेली में बैठे-बैठे उदासी में लिख दिया होगा।

उग रहा है दरोदीवार पर सब्ज गालिब। हम बियाबाँ में हैं और घर में बहार आई है।

- स्मृति, 12 सितंबर 2003

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स्मृति,

गोरी मेम अब तक नहीं मिली है लेकिन तलाश जारी है। वीकेंड्स में मैं गांधी जी की आटोबायोग्राफी में वर्णित की हुई लंदन की तमाम जगह देखने चला जाता हूँ। एक अच्छी शाम मैंने वेंटनर में भी गुजारी। वहीं जहाँ गांधी जी भी वीकेंड्स पर जाते थे और ऐसे ही एक शाम मेजबान लड़की उन्हें पहाड़ पर ले गई थी जहाँ बड़ी शर्मिंदगी के साथ उन्हें लड़की के हाथों का सहारा लेकर उतरना पड़ा था। अब शायद कोई भी न बता पाए कि वो कौन सी चट्टान थी। वैसे गांधी भाग्यशाली थे, मैं उनके जैसा शर्मीला न होकर भी अकेले ही घूमने मजबूर हूँ। लिंकन इन में पढ़ने के दौरान गांधी जी जिस घर में रहे थे, वो फ्लैट अब तक केंसिग्टन स्ट्रीट में है। मैंने फेरिंग्टन स्ट्रीट के चक्कर भी खूब काटे हैं जहाँ गांधी जी ने नये नये इंडियन वेज रेस्टोरेंट खोजे थे। गांधी की कोई स्मृति अब इन रेस्टोरेंट में नहीं है। हाँ फेरिंग्टन स्ट्रीट में एक जगह जरूर लिखा मिला- अगर महात्मा गांधी की तरह ही वेज खाने की तलाश में है तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं। हाँ, मैं बेडफोर्ड स्क्वायर भी गया। जहाँ राजा राममोहन राय रहे थे। अब उनके घर में ब्लूमसबरी पब्लिकेशन का हेडआफिस है। कहते हैं कि हैरी पॉटर को छपाने के लिए मैडम रोलिंग ने इससे पहले 11 पब्लिशर के चक्कर काटे थे।

अब अपने रिसर्च के टापिक पर, मुझे यूरोप में जिप्सियों पर काम करना है। वे हजार साल पहले भारत से आए थे, बताते हैं कि ये भारत के नट हैं जिन्होंने महमूद गजनवी के आक्रमण के दौरान भारत छोड़ा होगा। उनकी भाषा पर काम, उनकी वेषभूषा पर काम और डांस में भारतीय परंपरा की निशानियाँ देखना मेरी रिसर्च का हिस्सा है। इसी सिलसिले में बल्गारिया भी गया, यहाँ जिप्सियों की एक ऐसी बस्ती देखी जो हूबहू राजस्थान के बंजारों से मिलती-जुलती है।

यहाँ टिहरी से आने वाली खबरों की बाढ़ सी लग गई है। अच्छा हुआ, इस समय मैं वहाँ नहीं हूँ नहीं तो अपनी आँखों से तबाही का मंजर देखना बहुत कठिन होता है।

और तुम एक इतिहासकार से क्यों आशा करने लगी हो कि वो आए तुम्हारी धरोहर बचाए। वो नेताओं की जिम्मेदारी है तुम्हें उनकी ओर मुखातिब होना चाहिए। इतिहास लिखना कोई छोटा दायित्व नहीं है। नीरद बाबू ने अपनी पुस्तक आटोबायोग्राफी आफ अननोन इंडियन की शुरूआत इस टैग लाइन से की थी- इतिहास बहुतेरे बना सकते हैं लेकिन बहुत कम ही इसे करीने से लिख पाने में सक्षम होते हैं।

हर्षित, 21 मार्च 2004
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हर्षित,

इतिहास लिखना बहुत बड़ा दायित्व है लेकिन ऐसे समय में जब आपको इतिहास बनाने की जिम्मेदारी हो, इतिहास लिखना बड़ा अजीब लगता है यह अपराध जैसा ही है। मैं तुमसे आशा नहीं कर रही कि तुम हमारी धरोहर बचाने आओ, मैंने तो केवल तुम्हारे अपराध की ओर इंगित किया।

वैसे ब्रिटिशर्स इस मामले में हमसे ज्यादा अच्छे हैं अभी अमर उजाला में एक स्टोरी पढ़ी। 1857 के विद्रोह के दौरान कानपुर और बनारस में खूब नरसंहार करने वाले कर्नल नील का पड़पोता अभी यूपी में है। उसने एक घोड़ा लिया है और गाँव-गाँव घूमकर लोगों से हाथ जोड़कर अंग्रेजों द्वारा गदर के समय किए गए अत्याचार की माफी माँग रहा है।

टिहरी के ताजा अपडेट यह हैं कि यहाँ फिजा में जहर घुल रहा है। नये-नये चेहरे दिख रहे हैं। बरसों से टिहरी छोड़ चुके लोग मुआवजे के लालच में फिर पहुँच गए हैं और परिवारों में आपस में क्लेश का अजीब सा वातावरण बन गया है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति उन गरीबों की हैं जिन्होंने ऐसे ही कहीं झोपड़ी तान दी थी, नई टिहरी में उनके लिए किस तरह का पुनर्वास होगा। कोई भी नहीं जानता।

और जब कोर्ट ने ही हाथ खड़े कर दिए हैं तो कोई क्या कर सकता है। और क्या कोई न्यायाधीश भी अपने समय बहुमत द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे विचारों से अलग राय रख सकता है प्रायः ऐसा नहीं होता। एक उदाहरण से अपनी बात समझाती हूँ- हिटलर के उत्कर्ष के दौर में शायद ही कोई ऐसा जर्मन हो जो ये सोचता हो कि नाजीवादी विचारधारा देश के लिए खतरनाक है या स्टालिन के दौर में यकीन कर पाना मुश्किल होता होगा कि कम्युनिज्म में भी दोष होते होंगे। तो हमारे समय का कथित सच यह है कि बड़े बांध, बड़ी फैक्ट्रियाँ इन्हीं से विकास आएगा और हम बहुत खुश हो जाएंगे। हाल ही में हाईकोर्ट में एक पीआईएल लगी थी, उसमें मध्यप्रदेश के एक टाइगर रिजर्व से फोर लेन सड़क गुजरनी थी। जाहिर है शेरों के पक्ष में केवल एक याचिकाकर्ता था लेकिन सड़क के पक्ष में कई उद्योगपति और व्यवसायी। कोर्ट ने जंगल के राजा की अपील की तुलना में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति मनुष्य के पक्ष में जाना उचित समझा। अब टाइगर रिजर्व को चीरती सड़क बन रही है। ऐसे में अमेरिका के पेंसिलवेनिया प्रांत का किस्सा भी याद आता है। यहाँ एक बड़ी नदी में नौपरिवहन की योजना थी। एक याचिकाकर्ता ने इसके विरोध में याचिका लगाते हुए दलील दी कि नौपरिवहन के चलते एक खास किस्म की मछली की प्रजाति हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी। कोर्ट ने फैसला मछली के पक्ष में दिया। हम अमेरिकन संस्कृति को घटिया मानते हैं इस घटना को नजीर के रूप में देखना चाहिए।

- स्मृति, 10 सितंबर, 2004
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स्मृति,

योर ऑनर, मैं अपने अपराध कबूल करता हूँ लेकिन जज साहब पहले अपने विवेक पर भी नजर डालिए, आपकी अदालत की अवमानना की सजा भुगतने का जोखिम लेकर यह बात कह रहा हूँ। आप एक बहुत छोटे से शहर में रहती हैं और मायोपिक विजन का शिकार हैं। अपनी खोल से बाहर निकलिए और दुनिया देखिये। लंदन, न्यूयार्क, पेरिस जैसे शहर क्यों आगे बढ़े क्योंकि उन्होंने उद्यमशीलता की राह चुनी, जोखिम लिया। अपनी शक्ति से प्रकृति को नियंत्रित किया और आप शक्ति के हर विचार की विरोधी हैं। आपका नारा है न्यूक्लियर बम एवं बिग डैम आर वीपन आफ मास डिस्ट्रक्शन। लेकिन क्या इस शक्ति के बगैर आप दुनिया में कहीं भी पैर टिका सकेंगे। यहाँ इंडियन हाईकमिश्नर आफिस में एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। इसे साझा करना चाहूँगा। जय दुबाशी सत्तर की दशक में लंदन में एक सड़क पार करने वाले थे। नफासत से भरी एक बुजुर्ग महिला ने उनसे सड़क पार करा देने कहा। उन्होंने सड़क पार कराई। महिला ने उन्हें थैंक्यू नहीं कहा। और यह भी पूछा कि बताओ मैंने थैंक्स क्यों नहीं कहा। जब जय ने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- क्योंकि मैं तुम्हारी रानी हूँ। वायसराय वैवेल की पत्नी। तो अभी ब्रिटिशर्स की रस्सी जली भी नहीं है और इसका बल भी नहीं गया है। साफ है इतने अरसे बाद भी हम अपनी हीनता से मुक्त नहीं हो पाए हैं क्योंकि हमारे लिए अब भी गरीबी बड़ा मुद्दा नहीं है। हम अब भी जल-जंगल-जमीन जैसे बेमानी मुद्दों पर चर्चा करने में लगे हैं।

इस बार गार्जियन ने टिहरी विवाद को आधे पेज की जगह दी है और सुंदर लाल बहुगुणा का इंटरव्यू भी छापा है। उन्होंने चिपको आंदोलन पर भी बहुत सी बात की है। जब उनसे पूछा गया कि क्या बांध का बनना उनके आंदोलन की हार है। उन्होंने क्लासिक उत्तर दिया। गार्जियन के रिपोर्ट को बताया कि दरअसल चिपको आंदोलन का जन्म उत्तराखंड में नहीं राजस्थान में हुआ था, वहाँ के स्थानीय राजा ने सत्रहवीं सदी में कई पेड़ों को एक साथ काटने का आदेश दिया था। वहाँ की बिश्नोई महिलाएँ पेड़ों से लिपट गई। राजा ने सबको काटने का आदेश दिया। उन्होंने जान दे दी लेकिन पेड़ नहीं छोड़ा, तब लगा होगा कि आंदोलन विफल हो गया लेकिन जब 300 साल बाद उत्तराखंड में चिपको आंदोलन हुआ तो उसे कोई रोक नहीं पाया। कोई भी प्रयास विफल नहीं होता, उसका परिणाम भले ही हमारे जीवन में न मिले।

मुझे आश्चर्य होता है कि जो उत्तराखंड की महिलाओं ने 20 साल पहले कर दिखाया, आज क्यों नहीं कर पा रही।

- हर्षित, 2 दिसंबर 2004
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हर्षित,

तुम्हारे तो सात खून माफ हैं। तुम्हें मैं यूँ ही दुखी कर देती हूँ। लेकिन यह फ्रस्ट्रेशन कम नहीं हो रहा। किसी मरते हुए आदमी को देखना बहुत अजीब लगता है लेकिन अगर एक पूरा शहर आपके आँखों के सामने दम तोड़ने लगे तो कैसा लगेगा।

उधर ऊपर में नई टिहरी बसाई गई है लेकिन यह किसी भद्दी साम्यवादी कालोनी की तरह लगती है। टिहरी के कुछ लैंडमार्क यहाँ जरूर बनाए गए हैं लेकिन यह भी उनकी भद्दी प्रतिकृतियाँ ही हैं जैसे ताजमहल की भद्दी प्रतिकृति बीवी का मकबरा।

तुम्हारा सवाल बिल्कुल लाजिमी है कि उत्तराखंड की महिलाएँ इतनी अशक्त कैसे हो गईं। मेरी मम्मी को चिपको आंदोलन के समय गाये सारे गीत याद हैं लेकिन अब ऐसा कोई आंदोलन करने की हिम्मत उनमें भी नहीं है। रामपुर तिराहे की घटना ने सबको डरा दिया है। आप महिलाओं को लाठी-डंडे से नहीं रोक सकते लेकिन उनके साथ की गई बदसलूकी उन्हें तोड़ देती है। ज्यादा कुछ लिखने को नहीं है, टिहरी के कुछ आखरी फोटोग्राफ्स भेज रही हूँ।

- स्मृति, 2 मार्च 2005
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स्मृति,

पता नहीं तुम्हें यह खत मिले या नहीं, मैंने पढ़ा है वहाँ बांध के गेट बंद करने की तैयारी कर ली गई है। तुम इतना भावुक क्यों होती हो, समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। तुम्हें सोचने पर अमीर खुसरो की नायिका याद आती है जो हमेशा नैहर और बाबुल शब्द की रट लगाती रहती है। लड़कियों को अपना एक माइंटसेट बनाना पड़ता है उन्हें ससुराल जाना है। एक अलग गृहस्थी बसानी है और तुम्हें कौन टिहरी जैसे शहर में रहना है, कम से कम तुम्हारी जैसी अच्छी लड़की के लिए तो सफेद घोड़े में आने वाले राजकुमार का सपना सच होगा ही।
अब चिट्ठियाँ लिखने की मेहनत मुझसे नहीं होती, अपना ईमेल एड्रेस harsh_bedfod@yahoo.co.in दे रहा हूँ। इस पर ईमेल करना। यूँ भी तुम अपनी भावुकता में चिट्ठियों का सारा जखीरा अपने ससुराल तो लेकर जाओगी ही, और पुरानी फिल्मों की तरह यदि यह तुम्हारे जीवनसाथी के हाथ में पड़ जाएं तो बेवजह वो गलतफहमी के शिकार हो जाएंगे। अपने व्यक्तिगत संवाद हम क्यों इतने खुले माध्यम से जाहिर करें, इंटरनेट हमारी प्राइवेसी को बेहतर स्पेस प्रदान करता है। खुश रहो, सब कुछ अच्छा होगा।

हर्षित, 11 अगस्त 2005
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Harsh.bedfod@yahoo.co.in
तुम्हारा पत्र मिला और उसके बाद ही हमारी दुनिया ने जलसमाधि ले ली। हमारी शिवहरी डूब गई जिस पर रोज गंगा जी का जल चढ़ाते थे। गंगा जी जिन्हें शिव जी की जटाएँ भी नहीं रोक पाई थीं। बांध ने रोक लिया। अब वो एक शांत झील में बदल गई है जब वो बहती थीं तो लगता था कि एक शरारती लड़की खूब चहचहाते स्कूल जा रही है लेकिन जैसा कि हर लड़की की नियति में होता है वो बड़ी हो जाती है और उसकी शरारत जाने कहाँ चली जाती है वो शांत थमी झील बन जाती है। जहाँ हमें रिहैबिलेट किया गया है वो बहुत सुंदर जगह है उस टूरिस्ट स्पॉट के बिल्कुल पास जहाँ से टिहरी बांध और थमी हुई झील दिखती है। पर्यटक यहाँ आते हैं और कहते हैं कि यह तो स्वर्ग सा दृश्य है बादल हमारे बिल्कुल करीब से गुजर रहे हैं और नीचे गंगा जी का अथाह पानी। अभी एक कजिन कुछ दिनों की छुट्टी में आई थी वो कह रही थी दीदी आप बहुत भाग्यशाली हो, स्वर्ग में रहती हो। मैंने उससे कहा कि स्वर्ग तो हम लोग छोड़ आए हैं।

मैंने पहले भी लिखा था कि तुम्हारे सात खून माफ है। मैं कभी नहीं चाहती कि तुम किसी ऐसी गिल्ट में रहो जो मैंने तुम्हे दी है। तुमसे किए गए सारे संवाद एक पवित्र क्षण में हुए संवाद थे, मैं इसे किसी को भ्रष्ट नहीं करने दूँगी। मैंने तुम्हारे सारे खत आज गंगा जी की उस थमी झील में अर्पित कर दिए। बार-बार जगजीत की वो गजल मेरे दिलोंदिमाग में कौंध रही है।

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
तेरे खत आज मैं गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

- स्मृति