शहतूत पक गये हैं! - कहानी

संतोष श्रीवास्तव

समुद्री तूफ़ान था। रातभर तेज हवाएँ चलती रहीं। हवा की सांय-सांय के साथ पानी की बौछारें भी बंद खिड़की, दरवाज़ों से टकराती रहीं। मुँह अँधेरे दूध वाले की घंटी से मेरी आँख खुली। दिदिया नहीं उठीं क्या? रोज़ तो वही दूध लेती हैं। दूध की थैली चौके में रखते हुए उनके कमरे की तरफ निग़ाह गयी। बत्ती जल रही थी। उठ तो गयी हैं वे... फिर दूध लेने क्यों नहीं आयीं? उनके कमरे के दरवाज़े को हल्के से ठेलकर मैंने अंदर झाँका। वे पलंग पर बेसुध गहरी नींद में थीं। खिड़की के पल्ले भी खुले थे। बौछारों से उनका कमरा भीग गया था। बिस्तर भी, दिदिया भी। रात भर चली तेज हवाओं के संग गुलमोहर भी मानो बरसता रहा था और उसके फूल पंखुड़ी-पंखुड़ी दिदिया के बदन पर बिछ से गये थे। मैं भय से कांप उठी थी, “दिदिया उठिए... पूरी भीग गयी हैं आप।”

मैंने उनके बर्फ से ठंडे हाथ पकड़कर उन्हें झँझोड़ डाला था लेकिन उनकी देह निश्चल थी, आँखें अस्वाभाविक रूप से बंद। मैं चीख़ पड़ी थी, “माँ... जल्दी आओ... दिदिया कुछ बोलती नहीं।”

मेरी चीख़ एकबारगी पूरी घर को हिला गयी। आधे घंटे बाद डॉक्टर ने आकर उनकी जाँच की और धीरे से जता दिया, “शी इज़ नो मोर... हार्ट फैल्योर... डेथ तीन चार घंटे पहले हो गयी थी।”

एक सन्नाटा सा खिंच गया पूरे घर में।

दिदिया की ज़िंदगी ही सन्नाटे से भरी थी। अपनी बियाबान ज़िंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पै चलते हुए उन्होंने उम्र के बांसठ साल गुज़ारे थे। पिछले पंद्रह सालों से तो वे यहाँ हमारे पास ही रहती थीं। दादी-बाबा अब नहीं रहे थे और उन्हें अपने सबसे छोटे भाई यानी मेरे पापा से बेहद लगाव था। दादी बताती थीं कि पापा जब छोटे थे तो उन्हें दीदी की ज़गह दिदिया बुलाते थे। तब से वे सबकी दिदिया हो गयी थीं। उनका सुंदर सा नाम दमयंती स्कूल-कॉलेज के प्रमाणपत्रों तक ही सीमित रहा। हम लोग भी उन्हें बुआ न कहकर दिदिया ही कहते। दिदिया ने शादी नहीं की थी। जबकि सभी चाचा, बुआओं की शादी हो गयी थीं। बुआएँ स्कूल की पढाई पूरी कर अपने-अपने ससुराल विदा हो गयी थीं पर दिदिया पढ़ती रहीं। एम. ए. करके वे नौकरी करना चाहती थीं पर बाबा को लड़कियों की नौकरी से सख़्त ऐतराज़ था। धीरे-धीरे न नौकरी की उम्र रही, न शादी की... पर ये रहस्य बना रहा कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की? वह तो बहुत बाद में उन्होंने मुझे बताया कि... तेज धूप छिटक आयी थी। रात के तूफ़ान का कहीं नामोनिशान न था। सब कुछ शांत, स्थिर सा... नीचे सड़क पर ओर-छोर गुलमोहर के फूलों की पंखुड़ियां, टूटे पत्ते फैले थे। कई पेड़ों की टहनियाँ टूटकर पेड़ों में ही झूल रही थीं। शहर जाग चुका था। माँ ने दिदिया का भीगा गद्दा, चादर बाल्कनी की मुंडेर पर धूप में सूखने के लिए डाल दिया था। दिदिया फ़र्श पर चटाई के ऊपर सफ़ेद चादर ओढ़े अंतिम यात्रा के लिए तैयार लेटी थीं। उनका गोरा खूबसूरत चेहरा अभी भी जीवंत लग रहा था। बड़ी-बड़ी पलकें मानो असीम सुख से मुंदी थीं। यह मुट्ठी भर सुख मिला होगा उन्हें खिड़की से आती बौछारों से, बदन पर सजते गुलमोहर के फूलों से...प्रकृति के बहुत अधिक निकट थीं वे। पानी से उन्हें गहरा लगाव था।

बौछारों के जल में भीगते हुए उन्होंने मौत को बहुत संतुष्टि से गले लगाया होगा। कैसी शांति से मरी वे... न अस्पताल की भागदौड़... न सेवा टहल... खिड़की से आता पानी उन्हें तृप्त करता रहा। ज़िंदगी से ही मुँह मोड़ लिया।

बाबा के घर में आँगन में बीचों-बीच कुआँ था। दिदिया कुएँ से पानी खींच-खींच कर अपने हाथों लगायी फूलों और सब्ज़ियों की क्यारियों को लबालब सींच डालती। एक भी पौधा सूखता या मुरझाता दिदिया उदास हो जातीं। वे पौधों को हाथों से सहलाकर उनसे बातें करतीं। आकाश में घुमड़ते बादलों को देख कहतीं, “बिन बरसे मत लौट जाना... मेरे सारे पौधे बहुत आस से तुम्हें देख रहे हैं।” कई-कई दिन के लिए जब बादलों की झड़ी लगती तो वे झुँझला जातीं, “अब कितना बर्सोगे? मुँह उठाये बरसते ही चले जा रहे हो?”
लेकिन उस बरसते पानी को वे व्यर्थ नहीं जाने देतीं। आँगन में खंभों के सहारे चादर बाँध कर उसके नीचे घड़ा रख देतीं। चादर में बीचो-बीच लुढ़िया। सारा पानी धार बनकर घड़े में गिरता जाता। बरसात भर वही पानी पिया जाता। उसी से खाना बनता और उसी पानी से दिदिया अपने बाल धोतीं। उनके लंबे-लंबे बाल रेशम से मुलायम हो जाते। दादी कहतीं- “मँगली है न... इसीलिए शादी नहीं हो पा रही है।”

ऐसा नहीं था कि उनके लिए लड़के देखे नहीं गये, पर वे ही नाक-भौं सिकोड़ती रहीं। उनका मन लगता पढ़ाई में। ढेरों किताबें पढ़ डाली थीं उन्होंने। एक बड़े से रजिस्टर में हर किताब की समीक्षा लिखी थी उन्होंने, पर कभी छपवायी नहीं। जो भी किताब पढ़ चुकी होतीं उसमें एक पीला गुलाब दबा देतीं। अक्षरों की रोशनाई में एक पीली उजास लरज कर थम जाती, दब जाती। फिर वे हफ़्तों गुनगुनाती रहतीं। उन्हीं ने मुझे सिखाया-

“देख रूना... अपनी ज़िंदगी फालतू के शौकों में मत बरबाद कर डालना। गहनें, कपड़े, साजसिंगार तो हर आम औरत करती है। तू ख़ास बनना।”

फिर चमड़े की छोटी अटैची खोलकर डाक टिकटें दिखतीं। ढेरों टिकटें, देश विदेश की। उनमें से एक टिकट छांटकर दिखातीं, “ये बड़ी रेयर टिकट है। इसे प्रथम चंद्रयात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा की सतह पर बनाया था। यह नीली गोल गेंद हमारी धरती है।”

मैं आश्चर्य से उनकी चमकती आँखें और उंगलियों में फँसी टिकट देखती रह जाती। वे मखमल का उन्नावी रंग का बटुआ खोलतीं, “और ये दुनिया भर के सिक्के... ये ऑस्ट्रेलिया का ताँबे का सिक्का और उस पर दौड़ता कंगारू... रुना, इनकी देखभाल साज-संवार में मुझे तो कभी अकेलापन नहीं सालता।”

जानवरों से दिदिया को बहुत प्यार था। कुत्ता, बिल्ली उन्होंने खुद पाले थे। आँगन में फुदकती गौरैया चिड़ियाएँ भी उनके हाथ से दाना चुगतीं और सेम, तोरई के मंडप के नीचे रखी पत्थर की कुंडी में से पानी पीतीं। दिदिया सुबह कुंडी धोकर उसमें पानी भर देती थीं। बगीचे में अगर गाय-भैंस घुस गयी और पानी से भरी बाल्टी में उन्होंने मुँह डाल दिया तो वे कभी भागती नहीं थीं। पानी भरपेट पीने देतीं उन्हें। दादी कहतीं, “ये तो पानी की जीव है... ग़लती से मनुष्य योनि में जन्म ले लिया।”

सचमुच नर्मदा नदी में घंटों तैरकर भी वे कभी नहीं थकती थीं। मैं किनारे बैठी रहती तो कहतीं, “देख रुना...मैं डूबी।” और जो डुबकी मारतीं तो मेरी तो साँस ही रुक जाती। लगता उन्हें डूबे घंटों बीत गये... कुछ पल भारी पड़ जाते मेरे लिए। जब वे छ: बरस की थीं तो बाबा ने उन्हें तैरना सिखाया था। वे लहरों पर बतख की तरह तैरतीं। बाबा उन्हें बतख ही तो कहते थे, पर वहाँ नदी थी, कुआँ था, भरपूर पानी... पानी ही पानी। लेकिन ये ठहरा महानगर। पानी टैंकर से आता है। सात मंजिल की इस इमारत में अभी तक नगर निगम का पानी नहीं आया। टैंकर से छत की टंकी भर कर फिर पानी छोड़ा जाता है। हर फ्लैट के अलग-अलग मीटर हैं। जितना पानी खर्च करो उतना पैसा भरो। दिदिया का हाथ पानी के मामले में खुला है। अब बिल दुगना आता है। पापा झल्लाते, “दिदिया, काहे को इतना पानी ढुलकाती हो। ये महानगर है। यहाँ बूँद-बूँद पानी की कीमत है। थोड़ा कम पानी इस्तेमाल किया करो।”

दिदिया हँस पड़ती, “लो, पानी न हुआ घी, दूध हो गया।”

“घी दूध ही समझो जीजी... इतना पानी खर्च करोगी तो एक दिन नहाने को भी तरस जाओगी। माँ ताना मारती।”

अब इस समय बड़े-बड़े दो ड्रम लाकर बाल्कनी में रख दिये गये हैं। सोसायटी ने दो घंटे ज्यादा पानी छोड़ा है। नाते-रिश्तेदारों से घर भर गया है। जो जितना चाह रहा है पानी इस्तेमाल कर रहा है। अब कौन रोके टोके उन्हें? मातम का माहौल है पर मेरा मन मसोस उठा है... दिदिया कबूतरों तक को पानी पिलातीं तो माँ टोक देतीं। बाल्कनी में सुबह शाम झुँड के झुँड कबूतर आते। दिदिया का नियम था किलो भर ज्वार बाल्कनी में बिखेरतीं और तसला भर पानी रखतीं। सड़क के कुत्ते भी उनसे लहट गये थे। वे उन्हें बिस्किट, दूध पानी देतीं। इस बढ़े हुए खर्च को वे ट्युशन करके पूरा करतीं। रोज़ शाम चार-पाँच लड़कियाँ उनसे हिंदी संस्कृत पढ़ने आतीं... उनका मन बड़ा रमता लड़कियों के बीच।

दिदिया ने आगे-पीछे दोनों तरफ की बाल्कनियों में फूलों के पौधे लगाये थे। सुबह-शाम गमलों में पाइप से पानी सींचती वे। फिर गमलों से बहे पानी, मिट्टी, सूखे फूल-पत्तों को वे धोकर बाल्कनी साफ कर डालतीं। कितना पानी बरबाद होता, रोज़ ही इसका हिसाब सुनाया जाता उन्हें।

“यह फ़िजूल का खर्चा है पानी का। थोड़े से फूलों के लिए इतना पानी!!! दिदिया, महानगर में महानगर की तरह रहना सीखो।”

एक दिन झल्ला पड़ीं वे, “हम तो जैसे रहते आये हैं रहेंगे... हमारे मरने के बाद तुम हमारी अस्थियाँ सूखे कुएँ में झोंक देना।”

हमेशा मुस्कुराने वाली बेहद नरम दिल दिदिया के मुँह से ऐसी कठोर बात मैंने पहली और आख़िरी बार सुनी। हालाँकि इसके बाद पापा ने उन्हें हुलसकर सीने से लगा लिया था और वे रो पड़ी थीं।
उस दिन भी बहुत रोयी थीं वे जब उनकी किताब पढ़ते हुए अचानक हाथ आयी एक तस्वीर मैंने उन्हें दिखाते हुए पूछा था, “दिदिया, ये कौन हैं?”

वे झपट कर उठीं और तस्वीर मेरे हाथ से छीन ली, “ये कहाँ मिली तुझे?”

मैं घबरा गयी। अपराधी मुद्रा में मैंने सिर झुका लिया, “सॉरी दिदिया।”

उन्होंने प्यार से मुझे चूम लिया, “पगली...मेरे जैसा भावुक दिल लेकर कैसे रहेगी तू... यह दुनिया हम जैसों की नहीं रुना...”

देर तक वे मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भरे रहीं। हिम्मत कर मैंने उनके चेहरे की ओर देखा... बड़ी-बड़ी काली आँखों में आँसू भरे थे जो, अब ढुलकना ही चाहते थे। “ये जगदीश है रुना...”
उनकी आवाज जैसे किसी सुरंग से आ रही हो... उनका चेहरा रक्तिम हो उठा जैसे रात के आगोश में जाने से पहले सूरज का हो जाता है। वे पलंग से टिककर बैठ गयीं। आँखों में दबे सपने पलकें उघाड़कर बाहर छिटक आये।

“हम दोनों जैसे एक दूसरे के लिए ही बने थे। बरसों बरस एक दूसरे के लिए गुज़ारे हमने। अपने पूरे जीवन को खंगाल, छान कर हमने एक दूसरे के लिए साझा सपना रच लिया था। वह सपना हर वक़्त हमारी आँखों में मुस्कुराता रहता। उसी सपने को हम ओढ़ते, उसी को बिछाते थे। उसी से तृप्त होते, उसी की आस में जीते थे कि कभी हमारा घर होगा... प्यार ही प्यार होगा जहाँ और हमारे बच्चों की किलकारियाँ होंगी पर... वह फौज़ में था। चीन के साथ युद्ध में उसे फ्रंट पर जाना था। मैं ज़िद पर अड़ गयी कि वहाँ जाने से पहले हम शादी कर लें, पर इनकारी मिली दोनों परिवारों की ओर से। एक तो जाति दूसरी थी फिर मैं मंगली...उसके घर से संदेशा आया कि हम क्या जवानी में ही अपने बेटे को मौत का रास्ता दिखा दें? बाबू ने भी उत्तर भिजवा दिया कि हमें भी कोई शौक नहीं है बेटी को विधवा करने का। वह जिद्द ही जिद्द में फ्रंट पे चला गया कि, “तुम सबके लिए ज़िंदगी शहीद करने से तो अच्छा है देश के लिए शहीद हो जाऊँ।”

वह चला गया। मेरा मन तड़प उठा... फिर भी मैं उसका इंतज़ार करती रही। युद्ध समाप्त होने के बाद जब वह लौटा तो उसका दायाँ पैर कटा हुआ था। बैसाखियों के सहारे चलकर मुझसे मिलने आया कहने लगा, “तुम शादी कर लो दमयंती। मेरी ज़िंदगी तो बोझ बन गयी है। मैं तुम्हें कोई सुख नहीं दे पाऊँगा।”

“मैं जानती थी, तुम यही कहोगे। लेकिन मेरी कई-कई रातों की प्रतीक्षा का क्या जवाब है तुम्हारे पास? जब हर साँस मैंने तुम्हारे लिए जी है। तुम कहा करते थे कि कोई भी सपना ज़िंदगी से बढ़कर नहीं होना चाहिए। और विश्वास? विश्वास का महत्व तो तभी है न जगदीश जब वह स्वयं ज़िंदगी से ऊपर हो। तुम मेरा विश्वास हो जगदीश।”

उसके होंठ काँपने लगे पर वह रोया नहीं। हम देर तक ख़ामोश एक दूसरे की ओर देखते रहे। चांदनी की किरणें हमारे पैरों से लिपटती रहीं।

बाबू ने एक सामंती घराने में मेरे रिश्ते की बात चलायी।

उन्हें वारिस चाहिए था और मैं इस शर्त के लिए तैयार नहीं थी... यह शर्त मेरी इनकारी की वज़ह बन गयी। बाबू कठोरता से बोले, “क्यों उस लंगड़े के लिए अपनी ज़िंदगी बरबाद करने पर तुली है?”

मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। लंगड़ा वह नहीं है बाबू... “लंगड़ी तो आपकी बेटी हो गयी है”, मैंने कहना चाहा था। मैंने अपने आपको जगदीश के बिना अगरबत्ती की तरह आहिस्ता-आहिस्ता जलने को तैयार कर लिया था। कोई नहीं जानता रुना कि बाबू की मृत्यु के बाद जगदीश ने मेरा कितना साथ दिया। उस विशाल घर में मैं अकेली और छ: बरस तक अपनी जानलेवा बीमारी से खटिया भोगती अम्मा। उनके इलाज में वे सारे ज़ेवर एक-एक कर बिकते गये जो अम्मा ने मेरी शादी के लिए गढ़वाये थे। ऐसा नहीं कि भाई मदद नहीं करते थे पर कितना करता! उनके अपने परिवार, अपने ख़र्चे... पर जगदीश। वह तो किसी और ही मिट्टी का बना था। बैसाखियों के सहारे अस्पताल के चक्कर लगाता। दवा, फल...एक दिन भी मुझे कहना नहीं पड़ा कि फल, दवा खत्म हो गयी है।

अब हमने अपने लिए सोचना छोड़ दिया था। मान लिया था कि हम मिलने के लिए नहीं बने हैं। जब तक साँस है जीना है, वरना ज़िंदगी के कोई मायने नहीं रह गये। जगदीश नौकरी पाने के लिए तड़पता रहा पर अब वह न फौज़ के लायक था, न नौकरी के। माँ-बाप भी कितने दिन खिलाते? कभी-कभी मन होता हम साथ-साथ रहें पर जो काम बाबू के सामने नहीं हो सका उसे उनकी मृत्यु के बाद अंजाम देना! नहीं, यह ज़िंदगी अब हमारी नहीं रही...बस शाप ढोना है... अंतिम साँस तक।

उस दिन जगदीश मिठाई का डिब्बा लिये आया, “लो, मुँह मीठा करो। लग गयी नौकरी।”

“अरे! कहाँ?” मुझे लगा ज़िंदगी किसी मोड़ पर तो ठिठकी। पैरों के नीचे मानो मखमली पंखुड़ियाँ बिछ गयीं।

“उत्तरांचल के एक फौजी स्कूल में मेस इंचार्ज की। कुर्सी पर बैठे-बैठे बस हुकुम चलाना है।”

मैं उदास हो गयी, “तो तुम चले जाओगे यहाँ से? फिर मैं किसके सहारे जिऊँगी?”

“मैं कहाँ जा रहा हूँ? ये लंगड़ा शरीर जा रहा है। मैं तो तुम्हारे संग हूँ-हमेशा।”

जगदीश ने नौकरी का अपॉइन्टमेंट लेटर निकालकर दिखाया। मैंने कागज़ हाथ में लिया पर पढ़ा नहीं। जानती थी वह कागज़ नहीं एक संधिपत्र है जिसमें हम दोनों की बरबादी का इकरारनामा लिखा गया है और हम दोनों की ज़िंदगियों ने जिस पर बरसों पहले हस्ताक्षर कर दिये थे।

उसी रात अम्मा चल बसीं बैसाखियों को फ़र्श पर टिकाये वह रात भर अम्मा की लाश के सिरहाने दीपक की बत्ती उकेसाता बैठा रहा जब तक कि सुबह सब आ नहीं गए। और फिर सब कुछ छूट गया। वह घर, उस घर से जुडी तमाम यादें, वह बगीचा... वे मेरे पक्षी, जानवर, नदी, कुआँ और जगदीश... जगदीश अक्सर एक पठानी गीत गाता था... फौज़ से सीखकर आया था। गीत के अर्थ तो मुझे समझ में नहीं आते थे पर वह हर पंक्ति के बाद उसका अर्थ समझाता... “घने जंगल में मजनूं रो पड़ा है क्योंकि शहतूत पक गये हैं और लैला मर गयी है।”
उत्तरांचल में जाने से पहले जगदीश ने भी शहतूतों का पकना ज़रूर देखा होगा।

और दिदिया फूट-फूट कर रो पड़ी थीं। उन्होंने उड़ना चाहा था पर अपना आसमान तय नहीं कर पायीं वे।

दिदिया का अस्थि कलश लाल कपड़े में लिपटा रखा है। मैंने पापा से ज़िद्द की, “मैं भी हरिद्वार जाऊँगी।”

उन्होंने मौन स्वीकृति दे दी। मैंने उनकी किताब में रखी जगदीश की तस्वीर और वे तमाम पन्नों में दबे रखे सूखे फूल उन्हीं के रुमाल में बाँध लिये जो निश्चय ही जगदीश और उनके प्रेम विह्वल क्षणों के साक्षी रहे होंगे। माँ ने पापा के नज़दीक आकर कहा, “दान-दक्षिणा में कमी मत करना। ज़िंदगी भर जीजी कमियों में ही जीती रहीं। ईश्वर ऐसा नसीब किसी का न बनाये।” और वे सुबकने लगीं। पापा ने उनके कंधे थपथपाये और हम सब स्टेशन के लिए रवाना हो गये।

छल-छल बहती गंगा का तीव्र प्रवाह जुहू बीच के सागर के पानी जैसा मटमैला था। तो क्या गंगा मैया जान गयी हैं कि दिदिया को जुहू बीच पर उमड़ी आती सागर की लहरों में चलना अच्छा लगता था? फेनिल लहरें दिदिया को घुटनों तक भिगो देतीं। लेकिन वे तब तक लहरों में खड़ी रहतीं जब तक सूरज का अंगारा सागर की छाती में बुझ नहीं जाता। फिर वे उदास हो जातीं...धीरे-धीरे पांव पसरते अँधेरे को आत्मसात करना उनके लिए कठिन था।

“गोमुख में पहाड़ गिर गया है... उसी की मिट्टी बह रही है गंगा जल में।

हर की पौड़ी में मटमैली गंगा के तीव्र प्रवाह में हिचकोले लेती नौका पर पापा, चाचाओं के संग मैं बैठी हूँ। बीच में अस्थि कलश। गेंदे की माला अस्थिकलश से लिपटी है। पंडित साथ में है। मल्लाह ने नाव गंगा के बीचो बीच रोक दी। पंडितजी मंत्र पढ़ने लगे और सबने मिलकर कलश लहरों पर छोड़ दिया। मैंने सबकी नज़रें बचाकर ऐन तभी रुमाल से बनी पोटली गंगा में छोड़ दी। पोटली में जगदीश की फोटो और सूखे फूल थे। पोटली कलश से चिपक कर बहने लगी। जब कलश का मुँह पानी से भर गया तो वह तिरछा होकर नदी में समाने लगा। उसकी माला में अटकी पोटली भी कलश के संग ही नदी में समाने लगी। दिदिया गहरे डूबती चली गयीं। अपने प्रेम के संग आहिस्ता-आहिस्ता। अब उन्हें पानी की कोई कमी नहीं रहेगी। अब उनके मंगली होने को कोई नहीं कोसेगा। अब चारों ओर गहरा जल ही जल है। दिदिया कहीं नहीं। गंगा की लहरों पर मानो शहतूत उग आये हैं... पके फलों से भरे... “जगदीश! तुम्हारी दमयंती मर गयी”... मुझे लगा जगदीश घने जंगलों में नहीं बल्कि गंगा के अथाह जल में समाता जा रहा है दिदिया से मिलने... मैं पापा से लिपट कर रो पड़ी। सभी खामोश आँसू बहा रहे थे। जब नाव किनारे लगी, अँधेरा हो चला था।

दिदिया को गये महीना गुज़र गया। उनके कमरे का सन्नाटा अक्सर मुझे छील डालता है। हालाँकि सब कुछ वैसा ही चल रहा था जैसा तब होता था जब वे थीं। मुझे लगा था पानी की फिज़ूलखर्ची को लेकर सबने राहत महसूस की होगी। लेकिन पूरे घर को हो क्या गया है आख़िर? सब दिदिया की तरह क्यों जीने लगे हैं? पापा दिदिया के लगाये पौधों को उसी तरह पाइप से बिला नागा सींचते हैं, रगड़-रगड़ कर बाल्कनी धोते हैं। कबूतरों के लिए तसला भर पानी और किलो भर ज्वार बिखेरने की ड्यूटी भी वे बखूबी निभाते हैं, मुझसे कहते हैं, “जा रुना... सड़क के कुत्तों को दूध बिस्किट खिला आ।”

अपनी सफ़ेद कमीज़ माँ को दिखाते हुए कहते हैं, “कैसी धोयी है तुमने... पीलापन लिये है... साबुन की बास भी भरी है। ऐसी भी क्या पानी की कंजूसी? दिदिया जैसी धोया करो।”

मैं सामने दीवार पर टंगी दिदिया की तस्वीर के आगे फुसफुसाती हूँ, “तुम मरी नहीं दिदिया... जल बन ज़िंदा हो हमारे बीच।”