विलगाव - कहानी

- आरती स्मित

आरती स्मित
"क्यों भई, खेलगाँव चलोगे?"

"चलूँगा ... चालीस लगेंगे''

"ये तो बहुत है भई! सही बोलो!"

"और कोई रिक्शा देख लो बाबू!" कहता हुआ रिक्शावाला आगे बढ़ गया।

"क्यों मनोज बाबू, रिक्शेवाले ने छुट्टी कर दी" स्मिता ने चुटकी ली।

"उसकी तो ..." मनोज खिसियाता हुआ दूसरे रिक्शे की तरफ बढ़ा। अगस्त की धूप और बारिश दोनों ने उन्हें परेशान कर रखा था, ऐसे में  रिक्शे का किराया दोगुना हो जाता।

"तुम रुको, मैं देखती हूँ" कहकर  ज़रा तेज़ क़दमों से आगे बढ़ती हुई स्मिता ने आवाज़ लगाई, "भैया, खेलगाँव ले चलोगे?"

"चलेंगे न मैडम, लेकिन चालीस  रुपया लगेगा।"

"आज कोई त्योहार तो है नहीं भैया, फिर भाड़ा दोगुना क्यों कर रहे हो?"

''ई धूप में रिक्शा खींचने में हालत खराब हो जाता है, कोई बहुत ज्यादा नहीं मांग रहे"

"तीस में चलना हो तो बोलो, नहीं तो ..." उसने क़दम बढ़ाया, ...'चलिए'।   स्मिता मुसकुराती हुई बैठ गई,फिर मनोज को बैठने का इशारा किया। रिक्शावाला पसीने से भीगा, मगर अपनी धुन में गुनगुनाता हुआ पैडल पर पैर मारता गंतव्य की ओर बढ़ने लगा। मनोज नौकरी के आवेदन भर-भर कर परेशान तो था ही, आज कॉलेज के ऑफिस में क्लर्क से तू-तू मैं-मैं हो गई, तो बुरी तरह खीझ उठा। स्मिता उसका अवसाद समझ रही थी, मगर करती भी क्या? वह भी तो कॉलेज की राजनीति के कारण अबतक ख़ाक छान रही थी, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी और पार्ट टाइम जॉब कर जैसे-तैसे अपना ख़र्च निकालने लगी। खूबसूरत  लिबास से सजे -धजे ये दोनों रिक्शे वाले से कह भी नहीं सकते थे कि इस महानगर में वे कैसे एक-एक रुपया बचाकर आवेदन पत्र भर रहे हैं!  मनोज का मूड अबतक ऑफ था। खामोश बैठी स्मिता का ध्यान रिक्शेवाले के गीत पर गया, एकाएक पूछ बैठी, "भैया! आप बिहार से हैं?" रिक्शेवाले ने एकबार पलटकर देखा, मगर कुछ बोला नहीं, हाँ, गुनगुनाना बंद कर दिया।

"क्यों भई! कहते क्यों नहीं?" मनोज ने टोका।

"मैं बिहार से हूँ। आपके गीत में बिहार की माटी की खुशबू बसी नज़र आई ,सो पूछ लिया, न बताना चाहो तो कोई बात नहीं!" स्मिता की बात सुनकर रिक्शेवाले के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान खिल उठी।

"मैडम, हम पूर्णिया जिला के है। वैसे हमरा घर कटिहारो में है, नहर के पास। वही डी एस कॉलेज भी है। आप?"

"मैं फारबिसगंज की। कटिहार गई हूँ कई बार।"

"फिर तो आप हमरी पड़ोसन निकली।"

रिक्शेवाले ने खीसें निपोरी। उसकी बात सुनकर वह मुस्कुरा भर दी। छोटे शहरों , गाँवों और कस्बों से बड़े सपने सँजोए, हम जैसे  पढ़े लिखे युवा अपनी बेहतरी के लिए महानगर आते हैं, मगर यह रिक्शावाला?"  आगे वह कुछ सोच न सकी।

"जानते हैं मैडम, पूर्णिया जिला से तनि भीतर एक बस्ती है ... जहाँ पूरनदेवी माता का मंदिर है, वही पासे में हमरे दादा का बनाया घर है ... नीचे पक्का है, ऊपर छप्पर डलवाए हैं।"

"अरे वाह!" मनोज से प्रशंसा पाकर वह गर्वित हो उठा। चेहरे पर मुस्कान फैल गई। "बाबू, कटिहार वाला जमीन हमीं खरीदे हैं। हमीं मकान बनाए हैं। वहाँ हमरा परिवार रहता है।"

"कौन-कौन हैं परिवार में?"

"सब्भै। माय बाबू गाँव में रहता है, कटिहार में हमरी बीबी और दोनों बच्चा ... और छोटकी बहिन भी। पढ़ती है वहीं।"

"कुछ पढ़े- लिखे भी हो?"

"हाँ ,बारहवीं तक! आगे प्राइवेट से सोचे थे, लेकिन ..." उसके चेहरे पर अनायास विषाद की रेखा उभर आई, "फिर वहीं घर पर कोई छोटा-मोटा धंधा क्यों नहीं कर लेते? इतनी दूर क्यों आए?" वह चुप रहा

"मेरा मतलब है कि, रिक्शा तो वहाँ भी चला सकते हो ना! यहाँ इतने महँगे शहर में परिवार से दूर रहने का फ़ायदा?"

"यहाँ कोई ध्यान  नहीं देता  कि हम क्या कर रहे हैं! सब अपने काम में मगन है, लेकिन वहाँ तो ..." वह खामोश हो गया और पैरों ने पैडल पर अपना दबाव बढ़ा दिया।
                            
"बड़ा बनने और ऊँचा उठने का सपना सँजोए अपने परिवेश से बाहर निकलना बुरा नहीं पर सिर्फ़ इसलिए अपनी ज़मीन से कटना कि लोग क्या कहेंगे ... बिरादरी हँसेगी ... कहाँ तक संगत है?" उसे याद आया ट्रेन के  स्लीपर डिब्बों में अजीबोगरीब वेशभूषा बनाकर ठूँसे पड़े मज़दूर! रात को भी काला चश्मा लगाए, कलाई पर मोटा ब्रासलेट, चाँदनी चौक के चोर बाज़ार से ख़रीदी गई घड़ी और अन्य कई सामान, जो उनकी या उनके परिवार की ज़रूरत के मुताबिक़ कम और दिखावे के लिए अधिक ख़रीदी गई होंगी। ये अपने घर या पास पड़ोस में कभी नहीं बताते कि उनका काम क्या है, बस रोब जमाने की निरर्थक कोशिश! उसके जी में आया कि उस रिक्शे वाले से  कुछ कहे, फिर कुछ सोचकर चुप ही रही।

"खेलगाँव आ गया" मनोज ने टोका, वह चुपचाप उतरी,  रिक्शेवाले को पैसे दिए और बिना कुछ कहे बढ़ने लगी।

"क्या हुआ? कहाँ गुम हो?" मनोज ने फिर टोका, "तुम इस तरह खामोश तो नहीं रहती, ये अचानक किस गहरी सोच में डूब गई?"

"नहीं, कुछ खास नहीं। मैं छोटे शहरों से आए श्रमिक वर्ग  की मानसिकता पर विचारने लगी थी।"
'क्या?"

"यही कि अपने स्तर से ऊपर उठने की कोशिश अच्छी बात है,मगर अपने स्तर को छुपाना और धनी होने का ढोंग रचना .... इस भागमभाग की ज़िंदगी को स्वीकारना और परिवार से दूर होना कहाँ तक उचित है?"

"स्मिता, महानगर सबको रोटी देता है। यहाँ बीस रुपए का टीशर्ट भी मिलता है, दो हज़ार या अधिक का भी। महानगर सबको उनके अनुकूल समाज दे ही देता है। यहाँ कोई किसी भी काम को करने में झिझकता नहीं, तुम देखती हो न, डोमिनोज़ और म'क्डोनल में शिक्षित युवा केटेरर, वेटर और डिलिवरी बॉय के रूप में काम करते हैं। वे बैठकर समय गुज़ारना नहीं चाहते। कॉल सेंटर हो या ब्यूटी एसेसरीज़ शॉप , हर जगह युवा सहायक के रूप में काम कर रहे हैं। ये वो अपने गाँव या कस्बे में नहीं कर सकते, उन्हें शर्म आए ना आए, घरवालों को अधिक अपमान महसूस होगा। ... दरअसल  ग्रामीण और कस्बाई समाज की मानसिकता आज भी लीक पर चलनेवाली है। मज़दूर र्क्ग की बात न भी करूँ तो तुम अपने चारों तरफ ही नज़र उठाकर देखो ना! डिग्रियाँ किस तरह हमारे अंदर झूठे अहं पालती हैं। हम अपनी डिग्री के अनुरूप जॉब से नीचे की बात सोच भी लें तो हमारा अपना समाज हमारा ही नहीं हमारे बुजुर्गों का मज़ाक उड़ाता रहेगा, ... यही कारण है कि यहाँ के प्रवाह में बह जाने के बाद लोग अपने समाज से कटने लगते हैं, वे चाहकर भी समझा नहीं सकते कि कोई काम छोटा नहीं होता। ... एक बात और। यहाँ जातिवाद की जड़ें उतनी गहरी नहीं फैलतीं, जितनी गाँवों, कस्बों या छोटे शहरों में। सुनील  वाल्मिकी है, तो निक्की मल्लाह, साथ में उतने ही गरीब! मगर क्या  हमने कभी इन बातों की परवाह की? बस्ती के बच्चे जिस तरह तुमसे लिपटे रहते हैं, हम उनके हाथ का खाते हैं,हमारे घरों में यह संभव था या है? घरवाले जान भी जाएँ तो हमें ही बाहर निकाल देंगे। महानगरों में दो ही जाति होती है स्त्री और पुरुष! दो ही वर्ग, अमीर और गरीब। सच तो यह है कि अमीरों, ख़ासकर शिक्षित अमीरों से कोई जाति नहीं पूछता। सारे चोचले खाली पॉकेट वालों के लिए ही  समाज ने बनाए हैं। "

मनोज चुप हो गया। उसने धूप में जलती धरती निहारी ,लंबी साँस ली और तपिश से बेखबर आसमान की तरफ सिर उठाया, भरपूर नज़र से देखा। आँखें  कहीं शून्य में डूब गईं।

घर में कोलाहल! माँ की खुशी का ठिकाना नहीं।  बाबूजी की गर्वीली आवाज़, 'मनोज अपने खानदान का पहला पीएच. डी है, भई अब इसे डॉक्टर साहब बुलाओ, मेडिकल न सही, लिटेरेचर ही सही। अब तो मेरा बेटा प्रोफेसर बनेगा हाहाहहह!' झलारी गाँव का नाम रोशन करेगा। ... ' माँ की डूबती-सी आवाज़ 'तुम दिल्ली जाना चाहते हो, यहाँ तैयारी नहीं होगी? ..... 'माँ! समझा करो, कॉलेज में जॉब इतना भी आसान नहीं, यहाँ तो रिश्वत के बिना नौकरी सोचना भी गुनाह है। राजा भैया प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाते हैं, बिना सैलरी के, उसपर से घूस भी दिए, इसी भरोसे कि कभी सरकारी होगा तो उनको भी चांस मिलेगा। हम भी इसी भरोसे बैठे रहें, बोलो!''

   कितना कठिन था, पहली बार माँ- बाबूजी से अलग होकर यहाँ आना! माँ की बरसती आँखें और जबरन खुद को कठोर बनाए रहे बाबूजी के आशीर्वाद और आश्वासन भरे शब्द ,'यहाँ की चिंता मत करो, जाओ, सफल हो। जैसे भी होगा, हम पैसा भेजते रहेंगे, तुम सेटल हो जाओ, बस हमारे लिए यही बहुत है।' वह एक क्षण भी भूल नहीं पाता। घर से पैसे लेने बंद कर दिए, फ्री लांस काम करता है ताकि किसी तरह गुज़ारा करते हुए आवेदन के लिए पैसे बचा सके, मेट्रो का किराया निकाल सके॥ इंटरव्यू के लिए जा सके। चाहकर भी माँ- बाबूजी से फोन पर लंबी बात नहीं कर सकता। अब तो जी भी नहीं करता हमेशा बात करने का। माँ समझती नहीं, हर बार एक ही सवाल, कॉलेज में नौकरी कब पक्की होगी, कैसे समझाए वह कि ऑल ओवर फ़र्स्ट डिविजनर उसका बेटा यहाँ भीड़ का एक हिस्सा-मात्र है और कुछ नहीं, जिसपर ऑफिस-क्लर्क भी चिल्ला सकता है।
 
''मनोज! अब तुम किस दुनिया में चले गए?' ऑफिस किस तरफ है?''

''हम्म, इधर बाएँ से सीधे। रिक्शा अंदर एलाव नहीं है, सिर्फ़ अपनी गाड़ी ला सकते हैं, वो भी यहाँ के सदस्य होने पर!''

मनोज स्मिता के थके-थके चेहरे को निहारता हुआ बोला। धूप से उसका रंग कुम्हला गया था, होंठ सूख रहे थे।    ''तुम्हें प्यास लगी है?''

''हूं, लगी तो है, पर कर क्या सकते हैं?'' स्मिता  सूखते होंठों पर जीभ फेरती हुई बोली, ''अब ये मत कहना, अंदर केंटीन से पानी की बोतल खरीद लेंगे।''

''तो जान दोगी?''

''दे ही रही हूँ! .... कभी- कभी लगता है, ज़िंदगी क्या यूँ ही भागमभाग में खत्म हो जाएगी? बाबा मुझे बहुत अधिक समय नहीं देंगे । उन्होंने रिश्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं। मगर मैं हाउस वाइफ़ बनकर जी नहीं पाऊँगी। बड़ी मुश्किल से खुद को पहचाना है मैंने, संघर्ष है, पर साहस भी बढ़ा है। इस लायक तो हूँ कि अपना ख़र्च उठा सकूँ, पर यही बात बाबा को नागवार गुज़र रही है, जब भी बात करती हूँ तो यही कहते हैं  कि तुझे दो रोटी खिलाने की ताक़त है हममें, हम घर में चाकर पालें और तू सड़कों की धूल फाँके, बिरादरी में क्या इज़्ज़त रह जाएगी हमारी! अभी भी लोग मुँह पर ना सहीं ,पीठ पीछे तो हँसते हैं ही। पीएच डी इसलिए नहीं कराया कि टेम्पोररी जॉब के लिए मशक्कत करे। लौट आ।"

"और माँ! माँ क्या कहती हैं?"

" वही, जो बाबा कहते हैं। वैसे भी बाबा की बात काटने की हिम्मत माँ में कभी नहीं रही। कभी- कभी माँ मुझे कमर में चाबी का गुच्छा लटकाई हुई एक कठपुतली लगती है, जिसकी डोर हर पल बाबा के हाथ में रहती है। माँ घर अपने अनुसार ही चलाती है, बाबा दखल नहीं देते, मगर रसोई के बाहर किसी भी मुद्दे पर निर्णय लेने का हक़ सिर्फ़ और सिर्फ़ बाबा या भैया का है। माँ चूँ भी नहीं कर सकती। मैंने उन्हें दिल्ली भेजने के लिए कैसे राज़ी किया, ये तो मैं ही जानती हूँ। यदि दो-चार महीने में सेटल नहीं हुई तो समझो, मेरी कहानी ख़त्म! टोटली फिनिश!!

" शटअप यार! क्या बेकार की बात कहे जा रही हो?

" सच कह रही हूँ,क्योंकि बाबा जो ज़िंदगी देंगे, वो मुझे कुबूल नहीं होगा, मैं माँ की तरह कठपुतली बनकर नहीं जीना चाहती।"

स्मिता की आँखें छलक आईं, उसने आँसू छिपाने की कोशिश की पर छिपा न सकी तो मुँह फेर लिया। मनोज की आँखों के सामने  छोटी  बहन शुभी का चेहरा तैरने लगा।

'भैया, मुझे अभी शादी नहीं करनी , मुझे भी आगे पढ़ना है, आप बाबूजी से कहिए ना, वो आपकी बात नहीं टालेंगे' कहती हुई शुभी सुबक पड़ी थी।

'दिमाग खराब हो गया है उसका, पढ़-लिख कर उसे कौन अफ़सर बनना है, चूल्हा-चौका संभालना सीखे ,यही उसके लिए अच्छा है।' बाबूजी दहाड़े थे, फिर माँ को आड़े हाथ लिया था, 'तुम्हारे ही लाड़-प्यार का नतीजा है कि वह भाई का बराबरी करना चाहती है, उससे कहो, बेटी है बेटी बनकर रहे। अब उसका शादी ब्याह करके हम मुक्त होंगे.... बड़ी आई आगे पढ़ने वाली। अरे, ब्याह के बाद जो करना हो करे, हम अधिक पढ़ा दें कि फिर उसके लायक दुल्हा ढूँढते रहे। ... मेरे मरने के बाद के करेगा उसके ब्याह का चिंता! "

सन्न रह गई थी शुभी! माँ से इतना कहा,' बाबूजी जो चाहते हैं, वही होगा।' फिर उसकी आँखों ने कभी कुछ नहीं कहा। उसने ज़ुबान सिल ली। ससुराल वाले उसके सेवा- भाव से बड़े खुश रहे और बेटी की तारीफ सुनकर बाबूजी गदगद। कभी समझ ही नहीं पाए कि वह वह रही ही नहीं। उसने भी उसे फिर कभी खिलखिलाते नहीं देखा। बहन की इस हालत को वह समझता मगर कर भी क्या सकता था। वह देख रहा था उसे भरे-पूरे परिवार के बीच अकेले जीते हुए। मायके आती ज़रूर पर मायकेवालों को  दिल से बहुत दूर कर रखा था उसने। वह भी कुछ पूछता तो सिर्फ़ मुस्कुरा देती, कहती, 'भैया बाबूजी अब मरने की बात तो नहीं करेंगे'।  परिवार और समाज की इस बनावट और बुनावट का विरोध ना कर पाने के कारण वह तड़प कर रह जाता। सोचता, कि परिवार  व्यक्ति के जीवन को पुष्पित करने वाला पेड़ की जड़ की तरह होता है, लेकिन उस जड़ का क्या फ़ायदा जो अपनी शाख के हर पत्ते तक जीवन-रस पहुँचने ही न दे। ऐसे ही परिवार में विद्रोह होता है जब किसी को आज़ादी और किसी को बन्दिशें मिलती है ... विद्रोह होना ही चाहिए! ओह! शुभी! काश, तुमने भी विरोध किया होता तो आज तुम यूँ गुमसुम न होती!' उसके गीले गालों ने एहसास कराया कि वह रो रहा है।

ऑफिस में अपना आवेदन पत्र जमा कर स्मिता लौटी तो बाहर मनोज को न पाकर थोड़ी व्यग्र हो उठी, आसपास नज़र दौड़ाई तो ज़रा दूर पेड़ की छांह में उसे खड़ा पाया। उसकी पीठ स्मिता की ओर थी, वह अब भी व्यथित था। गुमसुम, खोया हुआ!

"मनोज!" उसने कोई जवाब नहीं दिया। "मनोज!" स्मिता की आवाज़ कांप उठी, "क्या हुआ तुम्हें?"

"शुभी की याद आ गई। उसकी सूनी आँखें, उसका भावहीन चेहरा! स्मिता, काश मैंने उसका साथ देने की हिम्मत जुटाई होती। बाबूजी से कह पाता कि उसे बेटी होने की सज़ा न दें। ... तुम यही मानती हो न, कि अपने अपने हिस्से का आसमान सबको मिलना चाहिए। यह भी कि हमें अपने परिवार से ही ऑक्सीज़न मिलता है... अपनी शाख से विलग होकर हम निर्जीव हो जाते हैं। हमारी सारी संवेदनाएँ मर जाती है लेकिन एक बात बताओ, क्या कई बार ऐसा नहीं होता कि हम अपनी जड़ों से तभी कटते हैं जब हमें ऊर्जा मिलना बंद हो जाता है! तुमने साहस किया तो तुम यहाँ तक आई, नहीं तो क्या तुम्हारी ज़िंदगी शुभी जैसी नहीं होती? और क्या आज भी तुम्हारा हर क़दम पिता के फैसले पर नहीं टिका है? अपने गाँव- समाज से दूर होनेवाला  हर व्यक्ति सही मायने में पूरा  दोषी है क्या?" स्मिता मनोज में समय और परिवेश के बदलाव को निहारती रही ...