मीता दास की कविताएँ

मीता दास

१- इक दुआ 

दीया,
लालटेन,
लैन्टर्न, लैम्प, पेट्रोमैक्स
नियॉन, हैलोजन, सीएफ़एल और अब एलईडी
सब तो हैं
नहीं है तो बस
नज़रों की ज्योति
जो देख सके
स्पष्ट दुनिया का हाल
पत्थर
झाड़-झंकाड़, लकड़ी
गोबर कंडे, बुरादा, पत्थर कोयला
लकड़ी कोयला, केरोसीन, इण्डेन, भारत, एचपी गैस
सब तो हैं
नहीं है तो बस
वो आग
जिससे जल सके
टूटे विश्वासों की लड़ी
टूटे घर द्वार
उजड़े गुलशन के ठूंठ
लूटी अस्मत
सूखे पत्तों सी उड़ती
सब के सब ख़ालिस खोखले
नींदें उड़ाती सायरनों के बीच
सिमटता आकाश और उसके नीचे सोते रहवासी
काले घुप्प अंधियारे में टटोलते
रंगीन शामियाने के पीछे
कचरा गाड़ी के निकट
काले-भूरे कुत्तों के बीच
राम-रहीम की संततियों को
छीनते देखा है सलीब में जड़े खुदा के बन्दे ने
भेड़ें चराना आसान लगा होगा
भूख की रेवड़ खदेड़ कर देवालय तक ले जाना
और भी आसान, भूख का बँटवारा जरा मुश्किल
कुत्ते और मनुष्य में
किसकी भूख ज्यादा या कम
सलीब पर लटके खुदा को शायद भान  हो
इसलिए उन्होंने कुत्तों को चुना क्योंकि
मनुष्य से ज्यादा कुत्ता वफादार होता है
मनुष्य मर जाता है भूखा
पर
कुत्ता हर हाल में जिन्दा रहता है
पूछ हिलाते हुए
है सभी कुछ
नहीं है तो बस
एक सच्ची दुआ
जो सीलन भरे
जीवन में लगे
दावानल को बुझा सके।

२- किसी स्वप्न दर्शी की तरह 

किसी स्वप्न दर्शी की तरह
नहीं देखना चाहते हो तुम
संसार का म्लान मुख
नक्षत्रों की जगमगाहट के बीच
क्षितिज की राह में
दरख्तों के पीछे
धुंधलाते हुए
अत्यन्त विष्मय से
व्योम से टकराकर
चकनाचूर हो
संसार का वह अनूठा रंगमंच
जो घिनौने मुखौटे से
सबको डरा रहा है।

३-  कहानी फिर दोहराएगी अपने आपको 

आशाओं के कंदील
हैं मृगमरीचिका
छुओ तो छूटे
पानी में लिखे इबारत सी
दिशाहीन कन्दराओं से निकले
अनबूझ सपनों से
लड़खड़ाते
गुनते अपनी बारी  बार - बार
और हर मोड़ पर छूट जाती
उनसे उनके जीवन का सिरा
फिर शुरू करो और देखो
कहानियां फिर दोहराएंगी
अपने आपको।

४- मंगली 

      मंगली बैठती है
      बाजार में
      हर मंगलवार जमीन पर बोरी बिछा
   
      सौदा सुलुफ भी करती
      करीने से
      हिसाब की पक्की
      छटाक, पाव, किलो, आधा किलो सब
      कांटे का हिसाब
      पट्ट से तौलती, चट्ट से पैसे गिनती और
      बिछे बोरी को जरा सा उठाती
      और गिनकर पैसे रखती या लौटाती
      कभी वह पास रखी अधफटी किताबों पर भी नजर फेर लेती
      उसकी जलती बुझती आँखों की चमक में
      ग्राहकों का इंतजार नहीं अक्षरों को समझ कर
      अपने कोरे पन्ने जैसे जीवन में उतार पाने की ख़ुशी झलकती थी
      मैं भीग गई ...
      लौकी, नींबू बाड़ी के बिके न बिके
      वह भूखी ही सही
      क ख ग पढ़ होना चाहती थी साक्षर
   
      सौदा करते लोग
      उसका भी गाहे - बगाहे मोल लगा ही लेते
      आंखो से तौल भी लेते
      पर मंगली
      जन्म कुंडली में बैठा मंगल!
      मुंह चिढ़ा रहा है
      ब्याह में इस ग्रह का क्या काम ?
      उसे समझ नहीं आता
      मंगल जब उससे जुड़ा है तो
      देह से भी तो जुड़ा है पर ..... प्रभाव ब्याह पर ही क्यों
      देह तौलने वालों ?
      ब्याह क्या देह के बगैर है संभव
      देह लीलते आँखों ही आँखों पर मरा अब तक न कोई
   
      मंगली
      हर मंगलवार
      बैठती तू बाजार में
      मंगली तू नहीं जन्मी मंगलवार
      तेरा जन्म कुंडली में मंगल बैठा है
      हूं ...
      यानि मंगल ग्रह में जा बसना चाहिए
      शायद वहाँ उसे जीवन मिले।

५-  जन्म दहन 

        जन्म में
        धनु लग्न, मूल नक्षत्र
        कुम्भ राशि, राक्षस गण
        रूपवान तो नहीं पर
        यौवन से लदी
        टूटा ह्रदय लिए
        कड़वे अनुभव पिये
        जलती संभावनाओं के दिए।

        कोई नहीं रोता
        साथ उसके ...
 
        कोई नहीं जो
        पास बैठे ...
        पोंछती अकेली भरी आँखें
        काटती अकेली लम्बी रातें।
        और कितना ताप सहेगा
        यह मन ... यह देह
        जलाओ ... दाह!
         ब्रह्मा ...
         क्या तुम नहीं जल रहे
         इस आग में पूरे तन-मन से।

६- कुंवारी लड़कियाँ पत्थर हो रही हैं 

          विवाह की प्रतीक्षा में
          आम लड़कियां न मालूम क्यूँ
          पत्थर सी हो रही हैं
          पत्थर की आँख, पत्थर सा शरीर
          मन भी पत्थर का
          आंसू भी नहीं ढुलकते
          पलकें भी नहीं झपकती
          सिर्फ ... स्थिर रहती है
          उदास मुख पर इक अनकही सी व्यथा।

         चेहरे का लावण्य अस्तगामी है
         वयस पथरीला
         आम लड़की सपने नहीं देखती
         बस प्रतीक्षा करती है
         कल हो हुआ, आज जो हो रहा है आम लड़की के साथ
         काश कल न हो!
         आम लड़की ....
         जिसे काम के वक़्त,
         काम से लौटते वक़्त
         छू, छू कर दूषित किया
         मोटी रकम की खातिर
         बाज़ार में बेच दिया
        कह दिया गया तुम
        खूबसूरत नहीं, तुम्हारी छोटी बहन
​        ​
        विवाह की प्रतीक्षा में
         लड़कियाँ टोह रही हैं ...
         आदि मानव को
         गुफा से निकले और
         हाथों को हाथों में ले
   
         लौट जाए
         पाषाण युग में
         जहाँ लड़कियों की आँखें
         पत्थर की नहीं होती।

७- चाँद  ​

   शाम से ही उतर आई
   गगन के गोद में बैठी थी
   अब तक ...
   चाँद बन कर
   नोच नहीं पाता मैं
   उसके चेहरे के दाग
   भरपूर नज़र डालने से भी डरता
   कैसा दिखता होगा
   चेहरा उसका
   एसिड बम  के बाद।