वीरू सोनकर की छह कविताएँ

वीरू सोनकर

१- बने रहना 

कोई प्रलय अंतिम नहीं,
न ही कोई हार अभिशप्त है जीत में न बदल पाने को

सबसे बड़ी उम्मीद है

कि सबसे निर्मम के उत्थान के बाद भी,

कैसे उदित होता है सहजीवन के लिए दमकता एक सूर्य


हाँ, संकटो में सभी रास्ते धुंधला सकते हैं

और क्षमाभाव विलुप्त प्रायः हो सकता है

हो सकता है कि कविता किसी घिसे हथियार सी 

तुम्हारे हाथो में हो,
मान सकता हूँ कि जीवन के सबसे बुरे दौर में भी तुम किसी तरह टिके हुए हो


तो यह सोच कर तुम बने रहना

समय की चाक पर किसी उम्मीद की तरह हथियार घिसना

और 

पहचानना, मिटटी पर पड़ती धूप का रंग,
सीखना, खुद की परछाइयों से संवाद की कला
समझना, हवाओ के पृथ्वी भर का चक्कर लगाने की प्रवृत्ति


सबसे बड़ी उम्मीद है 

कि बचे रहने की जुगत तुम्हे चीटियाँ बता देंगी

फिर तुम प्रलय पूर्व की आंधियों में यह सोच कर निश्चिन्त होना

और बने रहना,
कि यह किसी नए प्रारम्भ की आहट है!


२- 

जब युद्धरत होने का भ्रम होगा
थकान की पीड़ाएँ चारो दिशाओ से आ आ कर शरीर को कहेंगी 
कि अब विश्राम होना चाहिए

एक सूर्य अपने चिड़चिड़े तापमान के साथ पुनः उदय होगा

इस एक राज के साथ,

कि तुम जिसके खत्म होने की प्रतीक्षा में हो

वह तो अब शुरू होने को है
और दिशाएं सोख रही होगी ठीक उसी समय तुम्हारी पीड़ाएँ
और तुम्हारा भ्रम भी,
कि दिशाओ से चल कर हमेशा लक्ष्य आते है लक्ष्य-भ्रम नहीं


एक नया दिन निकल रहा होगा उसी अनंत आकाश के आलोक में,

और ध्रुवीय छोरो के आर-पार गूंज रहा होगा नाद-स्वर

मनुष्य की सामर्थ्य का!


कुछ प्रार्थनाएँ अपने पैरो में पड़ी गुरुत्व की बेड़ियां चुपके से खोल रही हैं

और आकाश का वह वर्जित द्वार पार कर जाती हैं


एक पृथ्वी फिर गर्भ से है

एक और सभ्यता का अब जन्म होगा


और विश्राम होगा, प्राचीनता के ठहरे रहने की जिद का

नवीनता का एक और नामकरण होगा

मर चुकी सभ्यता क्षमा कर रही है नयी सभ्यता के खुद पर उग आने के समस्त पाप


मनुष्यता फिर तैयार है

अब एक बार और परिभाषित होने को!


३- वे थे 

वे थे,

अपने होने की तमाम आपत्तियों के बाद भी

वे थे राजधानियों के गाल पर उग आये किसी चेचक के दाग से,

मॉल में आ गए किसी अवांछनीय वस्तु की दुर्गन्ध से, 

वे थे, 

अपने घरो में टाट के पर्दो के पीछे खुद को छुपाये हुए

कॉलेज के ज़माने की प्रेमिकाओं के बदल जाने पर

खुद का तालमेल बिठाते हुए

वे थे, 

जबकि उन्हें नहीं होना चाहिए था

यह अधिकांश लोगो की राय थी!


वे थे, 

उनके ड्राइंग रूम में पड़े

अखबार के दूसरे-तीसरे बिना पढ़े छूट गए पन्नों पर,

दरवाजे को ठकठकाते दूधवाले के भेष में,
उनके स्कूल गए बच्चों को समय से घर लाते हुए
वे थे, हर तरह से अपनी अनुपस्थिति को नकारते हुए


और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि वे जो थे,

बहुमत की राय से खुद को सहमत पाते थे


भारी उचाट मन से सर को झुकाये

अपने होने की लज्जा के साथ गले तक जमीन में धँसे,

सड़क पर 

अचानक से सामने आये
उनकी कार के ब्रेक और हार्न के बीच
किसी भद्दी सी गाली के सम्बोधन-परिचय में
वे थे!

४- उनका आना 

उनका आना 
किसी ठन्डे मौसम के आने की आहट नहीं थी

वे आये,

क्योंकि वे कहीं और नहीं जा सकते थे

सड़क पर पड़ी हुई धूल को उड़ाते

असमय आ धमके गर्म मौसम की खबर जैसे

पर वो शहर किसी मछली की चिकनी पीठ में बदल गया था

और टिकने की लाख कोशिशो के बाद भी

वे फिसल गए


वहाँ, 

उस अगले शहर में,

जहाँ उन्हें आना तो नहीं था

और जिस शहर को मछली की पीठ में बदलना भी नहीं था

जबकि उन्होंने चाहा था कहीं टिक कर सुस्ताना 

और ठन्डे मौसम में बदलना

पर वह फिसलते रहे और देखते रहे 

कछुए की पीठ से शहरों को मछली में बदलते

एक चलती हुई सड़क 

किसी अनिवार्य यथार्थ की तरह उनके पैरो में बंधी थी

और जो कभी नहीं बदलती थी!


५- 

भयानक स्मृतियों के जंगल से
बच-बचा कर
उन्होंने,
एक बीच की राह निकाली थी
सांत्वनाओं की एक नदी जहाँ उन्हें छू कर गुजरती थी

वे जीने की जिद से भरे हुए लोग थे

वह नहीं चाहते थे 

कि उनकी आँखों में जमा हुआ नमक पानी में बदले

वह भूलना चाहते थे 
कि कभी उनकी नस्ल जब-तब पैरो के अँगूठे से जमीन कुरेदने लगती थी


उन्होंने अपने लिए आग मांगी थी

और वह चाहते थे

दूर कहीं चीखता हुआ स्मृतियों का वह अमिट जंगल

धीरे-धीरे ही सही,
एक दिन पूरा जल जाये!

६- नमक

किसी एक बिंदु से आरम्भ 
और वहीँ समाप्त,
एक दुखद यात्रा-स्मृति की उदासियों से परे छिटक 
मैं बुन रहा हूँ पुनः वही
सात महासागरों को एक छलांग में पार करता कोई दुस्साहस

कि

अनिर्णीत पहचान की कोई व्यथा मेरी नरम खाल पर नहीं होगी,

और जूतों के तल्लो में छिपा कर 

नमक की वह पुड़िया मैं वापस लाऊँगा
उसी कमरे-कम-लायब्रेरी में
जहाँ दीवारो पर ऊगा है ज्वार भाटा से जूझती 
और लहरो से टकराती 
किसी नाव सा मुँह चिढ़ाता मेरा ही एक चित्र,
कामनाओ के असंख्य सीप जो स्वप्न में दोमुँहा सांपो में बदल जाते है
मेरे बिस्तर पर जहाँ-तहाँ बिखरे है 


मेरी तकिया में सोखा हुआ वह नमक बिखरा है पृथ्वी के सभी छोरो तक

और मैं कह रहा अपने जूतों से 

कि चलना है

वह पूरा नमक वापस लाने