दो ग़ज़ल - दिगंबर नासवा

दिगंबर नासवा

ग़ज़ल 1 


हमसे हर वक़्त का हिसाब न मांगे दुनिया
ज़िन्दगी की मेरी किताब न मांगे दुनिया

एक ही दिन तो ज़िन्दगी का मिला है मुझको
क्या हुआ रात भर जवाब न मांगे दुनिया

उम्र भर खेलता रहा हूँ फ़कत काँटों से
मुझसे हर पल नया गुलाब न मांगे दुनिया

वक़्त की कशमकश में देख न पाया खुद को
ढल गयी उम्र अब शबाब न मांगे दुनिया

रोशनी के सभी सुराग छुपा कर रक्खो
सुबह से पहले आफताब न मांगे दुनिया

तुम सरे आम राज खोल न देना इनके
स्याह रातों का इक नकाब न मांगे दुनिया

छत पे जाना जो तुम नकाब पहन कर जाना
फिर नया कोई माहताब न मांगे दुनिया

ग़ज़ल 2 

खुल कर बहस तो ठीक है इल्जाम ना चले
जब तक न फैसला हो कोई नाम ना चले

कोशिश करो की काम में सीधी हों उंगलियाँ
टेढ़ी करो जरूर जहां काम ना चले

कोई तो देश का भी महकमा हुजूर हो
हो काम सिलसिले से मगर दाम ना चले

भाषा बदल रही है ये तस्लीम है मगर
माँ बहन की गाली तो सरे आम ना चले

तुम शाम के ही वक़्त जो आती हो इसलिए
आए कभी न रात तो ये शाम ना चले

बारिश के मौसमों से कभी खेलते नहीं
टूटी हो छत जो घर की तो आराम ना चले