कुछ कह रहा सम्पादक भी

साथियों,

ज्यादा साल नहीं हुए, दो-ढाई दशक से तनिक ही अधिक बीते होंगे जब मैं गर्मियों की सालाना छुट्टियों के एकमात्र गन्तव्य अपने मामा के गाँव-घर से लौटकर अपने क़स्बे को आता था और हरबार कुछ या बहुत कुछ बदला हुआ महसूस करता था। अक्सर साँझ के वक़्त घर पहुँचा करता था और संयोग ऐसा होता कि वह बारिश या बिना बारिश  बादलों वाला दिन होता। लगता कि जैसे प्रकृति भी मेरे गम में शरीक़ है। उसे भी मेरे जितना ही दुःख है कि मैं पूरे एक साल के लिए अपने ननिहाल और वहाँ के दोस्तों से बिछड़ गया।

गर्मी की छुट्टियों से इतर एक-दो बार सावन में रक्षाबंधन के मौके पर माँ के साथ मामा के घर जाना हुआ था, उस वक़्त पेड़ों पर डाले गए झूलों, और सबसे बड़ी बात लोगों के मनों के उत्साह की तुलना आज के समय से की जाए तो लगता है कि वह दुनिया ही कोई और थी। आज तो स्कूल में दाखिला लेने से पहले ही माता-पिता बच्चों के दिमाग में फीड देते हैं कि उन्हें क्या बनना है, मानो वे कोई मशीन हों। जो बनने के लिए भी प्रेरित करते हैं वह भी पैसा कमाने की मशीन ही है, जहाँ 'पढोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे ख़राब' जैसी कहावतों का सृजन कर बच्चों को खेल से दूर किया जाता हो और पैसे कमाकर नवाब बन जाने को जीवन का उद्देश्य समझाया जाता हो वहाँ हम किस मुँह से ओलम्पिक मैडल या देश के लिए खेल द्वारा सम्मान कमाने के सपने देख सकते हैं भला? सत्य तो यह है कि खेल कभी हमारी परम्परा का हिस्सा रहा ही नहीं और ना ही संस्कृति रहा है। हम भूल रहे हैं कि इस तरह धीरे-धीरे हम अपनी अगली पीढ़ी पर अनावश्यक दबाव बनाते जा रहे हैं, जिसके कि दुष्परिणाम कई तरह से हमारे सामने आ भी रहे हैं, पर हम आँख मूँदे जीने के आदी हो चुके हैं।

मेरा ख्याल है कि आज के भारत से पढ़े-लिखे युवाओं का उच्च शिक्षा या नौकरी के लिए विकसित देशों में जाने और वहीं बस जाने का एक कारण अपने देश में बढ़ते जीवन संघर्ष और ये दबाव भी हैं, जिनसे वो खुद को और अपनी आने वाली पीढ़ी को बचाना चाहते हैं, क्योंकि वहाँ का शिक्षातंत्र और सरकार या माता-पिता अपने देश के भविष्य के कर्णधारों को उतना भी भेड़-बकरियाँ नहीं समझता, उन पर प्रयोग नहीं करता, उन पर अपने सपने, अपनी इच्छाऐं नहीं थोपता।

कुछ दिन पूर्व की एक घटना है कि यहाँ अमेरिका में एक आप्रवासी महिला इस बात को लेकर अपने बच्चे के अध्यापक से शिकायत करने पहुँच गई कि 'जब बच्चे ने टेस्ट में शब्दशः वही लिखा है जो किताब में लिखा था तो उसे पूरे अंक क्यों नहीं दिए गए?' अध्यापक का उत्तर था कि 'महत्वपूर्ण ये नहीं कि आपने किताब में लिखे के कितने करीब लिखा है, बल्कि ये है कि जवाब में आपने अपनी कल्पनाशीलता का कितना प्रयोग किया है।'
आज भी रट्टाफिकेशन के युग में जी रहे हम इस एक घटना से बहुत कुछ सीख सकते हैं। उम्मीद है कि सुबह के भूले हम साँझ ढले तक घर पहुँच जाएँगे और खुद को भूला नहीं रहने देंगे, आगे बचपन को ख्वाहिशों की जंज़ीरों में जकड कर नहीं रखेंगे।

अंत में सेतु परिवार की ओर से बीते माह इस दुनिया से विदा लेने वाले साहित्यकारों श्री नीलाभ अश्क़ और युगल जी को भारी मन से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। आप दोनों अपने साहित्यिक योगदान के रूप में हमेशा हमारे बीच बने रहेंगे।