सुभाष नीरव की लघुकथाएँ

सुभाष नीरव
१- बर्फी 

वह दिल्ली एअरपोर्ट पर उतरा। बाहर निकलकर पहले मोबाइल पर किसी से बात की और फिर नज़दीक के ही एक होटल के लिए टैक्सी पकड़ ली।
वह अक्सर ऐसा ही करता है। जब भी इंडिया दस-पंद्रह दिन के लिए आता है, न्यूयार्क से दिल्ली की फ्लाइट लेता है। दिल्ली एक रात स्टे करके अगले दिन मुंबई के लिए दूसरी फ्लाइट पकड़ता है। मुंबई में उसका घर है। माता-पिता है, पत्नी है, छोटी बहन है जो अलग रहती है।
होटल के अपने कमरे में जब पहुँचा, रात के आठ बज रहे थे। वह नहा -धोकर फ्रैश हो लेना चाहता था कि तभी बेल हुई। दरवाज़ा खोला। सामने नज़र पड़ते ही उसके माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा आईं। आगंतुक लड़की ने भी अपनी घबराहट को तुरन्त झटका।
''देखा पकड़ लिया न। मैंने आपको होटल में घुसते और इस कमरे में आते देख लिया था। सोचा पीछा करती हूँ।''
''शिखा ! तुम यहाँ ?''
''हूँ... चौंकते क्यों हैं ? कल मुंबई-दिल्ली की चार बजे वाली फ्लाइट से उतरी थी। आज रात की फ्लाइट से वापस मुंबई। अक्सर इसी होटल में रुकना होता है, अगली डयूटी पर जाने तक।''
''अरे मैं तो भूल ही गया कि तुम दो साल से एअर लाइन्स में जॉब कर रही हो।'' उसने अपने आप को सामान्य करते हुए कहा।
''पर आप कभी बता कर इंडिया नहीं आते। कोई फोन ही कर दिया करो।''
''मुझे सरप्राइज़ देने की आदत है न। चल छोड़, घर पर सब ठीक हैं न ? जाती रहती हो न मम्मी-पापा से मिलने ?''
''महीने-दो महीने में एक-दो बार तो चली ही जाती हूँ। आप बताओ, कैसा चल रहा है यूएसए में। और कब बुला रहे हो भाभी को अपने पास ?''
''ठीक है, ग्रीन कार्ड मिल जाए तो बुला लूँगा उसे भी।''
''मम्मी-पापा के पास कब पहुँच रहे हो ?''
''कल दिन में यहाँ कुछ काम है, इसलिए यहाँ रुकना पड़ा। कल शाम की फ्लाइट से मैं मुंबई पहुँच रहा हूँ।"
''अच्छा भैया चलती हूँ... रात दस बजे की मेरी फ्लाइट है।''
''ओ.के. बाय...।''
''बाय!'' शिखा के जाते ही उसने मोबाइल पर फोन मिलाया।
''सर! क्या बर्फी पहुँची नहीं अभी तक।'' उधर से आवाज़ आई।
''ये तुमने ... ?'' वह भन्नाया।
''क्या हुआ सर! पसंद नहीं आई? दूसरी भेजता हूँ।''
''नहीं रहने दो अब।... इंडिया से लौटते समय देखूँगा।'' उसने झटके से फोन बंद किया और फ्रैश होने के लिए बाथरूम में घुस गया।


२- नेक काम 

मैं जिस कालोनी में रहता हूँ, वह अभी नई-नई आबाद हुई है। यहाँ अधिकांश घर गरीब, मजदूर और नौकरीपेशा लोगों के हैं। कुछ लोगों ने मिलकर कालोनी के उत्थान के लिए एक कल्याण समिति बनाई। मैं भी उसका सदस्य हूँ। सबसे पहले लोगों का विचार था कि कालोनी में एक मंदिर बनाया जाए। फिर आपसी विचार-विमर्श से यह तय हुआ कि मंदिर नहीं, एक विद्या-मंदिर की ज़रूरत है इस कालोनी को, जहाँ गरीब परिवारों के बच्चों को ज्ञान और शिक्षा सहज सुलभ करवाई जा सके।
आपसी सहयोग से एक छोटे-से विद्या-मंदिर की इमारत तैयार की गई। फिर सुझाव आया कि क्यों न इसका उद्घाटन किसी नेता या मंत्री से करवाया जाए। इस पर भी खूब सोच-विचार किया गया और सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि इसका उद्घाटन किसी नेता या मंत्री के हाथों नहीं, किसी शिक्षाशास्त्री, समाजसेवी अथवा किसी वरिष्ठ लेखक के हाथों करवाया जाए। अत: देश के जाने-माने प्रगतिशील विचारों वाले वरिष्ठ लेखक शास्त्री जी से सम्पर्क किया गया जो इसी शहर में रहते हैं। वह सहर्ष तैयार हो गए।
उद्घाटन कार्यक्रम के दिन शास्त्री जी कार्यक्रम से दो घंटे पूर्व ही पहुँच गए। मैं उन्हें बस-स्टॉप पर लेने गया।
''चलिए, पहले मैं आपको अपने घर लिए चलता हूँ। कार्यक्रम शुरू होने में अभी काफी समय है।'' नमस्कार करने के बाद मैंने उनसे कहा तो वह मान गए।
बस स्टाप से मेरा घर समीप ही था। हम पैदल ही चल दिए। अभी आधे रास्ते में ही पहुँचे थे कि शास्त्री जी ठिठक कर खड़े हो गए।
''क्या हुआ शास्त्री जी ?''
''देखा नहीं भाई, अभी-अभी काली बिल्ली रास्ता काटकर गई है। अपशकुन होता है। थोड़ा रुको अब...।'' मैं हैरान था कि इतना विद्वान और प्रगतिशील विचारों वाला लेखक...
तभी मैंने कुछ सोचते हुए उनसे कहा, ''चलिए, आपको विद्या-मंदिर ही लिए चलता हूँ। समीप ही है।''
''क्यों भाई ? आप तो मुझे अपने घर ले जा रहे थे?'' मैंने सच्चाई बयान कर देना ही उचित समझा,
''आदरणीय, बात दरअसल यह है कि मेरे घर में कई बिल्लियाँ हैं। रोज न जाने कितनी बार आते-जाते हमारा रास्ता काटती हैं। आपको परेशानी होगी, बिल्लियों वाले घर में।'' मेरा उत्तर सुनकर वे गहन सोच में पड़ गए।
''चलिए, विद्या-मंदिर का रास्ता उधर से है...'' मैंने उनकी मौन तंद्रा को तोड़ते हुए अनुरोध किया।
उन्होंने एक पल मेरी ओर देखा। फिर मुस्कराते हुए बोले,
''नहीं, अब तो मैं पहले आपके घर ही चलूँगा।'' 


३- दर्द 

कई बरसों से मेरा उसका साथ रहा है। पहले जब भी मैं उसके सामने होता था, वह मेरी तारीफ़ किया करता था। जैसे-जैसे उम्र का शिकंजा मुझ पर बढ़ता चला गया, वह मुझसे मानो असंतुष्ट-सा रहने लगा। घर से निकलने से पहले अथवा घर लौटने पर जब मैं उसको ‘हैलो’ कहकर मुखातिब होता तो वह मुझमें मीनमेख निकालना शुरू कर देता।
प्रारम्भ में वह जो कमियाँ निकालता था, मैं उन कमियों को दूर करने की कोशिश करता था। कोशिश करने पर कुछ कमियाँ दूर हो जाती थीं, पर ज़्यादातर दूर नहीं होती थीं। अलबत्ता, उन्हें उसके सामने छिपा लेने में मैं कामयाब हो जाता था। इसपर वह थोड़ा मुस्कराता तो था, लेकिन जल्द ही फिर से मुझे मेरे वो वो दोष दिखाने-बताने लग पड़ता था जिन्हें मैं देखना-सुनना कतई पसंद नहीं करता। मुझे लगता, यह बूढ़ा हो गया है। या ऐसा भी हो सकता है कि यह सही बताता हो, पर मेरी दृष्टि ही कमजोर हो गई हो। मैंने अपनी नज़र का डॉक्टर से मुआयना करवाया। हालाँकि मेरी उम्र का ग्राफ ऊपर उठ रहा था, पर डॉक्टर के अनुसार मेरी नज़र बिल्कुल सही थी।
उस दिन मैं बेहद खुश था। मैंने उसके सामने ही मूंछों और कनपटी के बालों को डाई किया। वह सारे समय मुझे घूरता रहा। बनठन कर जब मैं घर से बाहर निकलने लगा तो मुझे जैसे कुछ याद आया। मैंने उससे ‘बाय-बाय’ कहते हुए उसकी तरफ एक मुस्कान फेंकी। मेरी मुस्कान का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह मुँह बनाये मुझे घूरता रहा।
जब मैं शाम को घर लौटा तो उससे सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैं लुटा-पिटा घर लौटा था। जिस महिला मित्र से मिलने को मैं सुबह बेसब्रा हुआ पड़ा था और जो मुझे अक्सर ‘हाय हैण्डसम’ या 'यू आर लुकिंग सो स्मार्ट' कहा करती थी, उसने मुझे पहलीबार ‘हाय ओल्डमैन’ कहा था और जब मैं शाम को उससे विदा हुआ तो मेरी हालत ऐसी थी मानो गुब्बारे में से हवा निकल गई हो। जेब में पड़ा ए.टी.एम कार्ड कराह रहा था। मेरी जेब मातम मना रही थी।
मैं सोफ़े पर लुंजपुंज-सा होकर बैठ गया। एकाएक कई बरस पहले दिवंगत हुई पत्नी का कहा वाक्य कानों में गूंजने लगा -‘मैं न रहूंगी तो रोयोगे, देखना …।’ जिन दोनों बेटों के पालन-पोषण में औरतसुख को मैंने बरसों अपने से दूर रखा था, वे एक दिन मुझे नितांत अकेला छोड़कर विदेश में जा बसे थे और पीछे मुड़कर नहीं देखा था। पीछे रह गया था मैं, मेरा अकेलापन और एक वह। सहसा, मुझे लगा, कोई मुझ पर हँसा था, मेरी खिल्ली-सी उड़ाता हुआ। मैंने घर में इधर-उधर देखा। सामने दीवार से पीठ टिकाये वह बड़ी बेहयाई से मुझ पर हँस रहा था। एकाएक मेरी मुट्ठियाँ कसने लगीं और दांत भिंच गए। मैं अपना आपा खो बैठा। क्रोध में आकर मैंने मेज़ पर से पेपरवेट उठाया और जोर से उसके मुँह पर दे मारा। वह किरच-किरच हो गया।
अब वहाँ एक नहीं अनेक चेहरे मेरा मुँह चिढ़ा रहे थे। कमाल यह था कि वह क्षत-विक्षत होकर भी बेहया-सा मुस्करा रहा था। उसकी मुस्कराहट मुझे चीरती चली गई। एक दर्द मेरे सीने में उठा और मेरी गर्दन उसके सामने झुक गई। मैंने दोनों हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लिया और फफक पड़ा।


 -आर ज़ैड एफ़ -30 ए, दूसरी मज़िल,प्राचीन काली मंदिर की पीछे(नाला पार),वेस्ट सागर पुर नई दिल्ली-110046 दूरभाष : 09810534373,ईमेल : subhashneerav@gmail.com