बिस्मिल की आत्मकथा - 1

संक्षिप्त परिचय
  अमर शहीद पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के विषय में जितना भी कहा जाये कम है। वे कवि, लेखक, सुधारक, नेता, और सबसे बढ़कर एक निर्भय स्वाधीनता सेनानी थे। वे एक उद्यमी भी थे और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी के संस्थापक सदस्य भी। ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के लिए जाने गए पंडित जी ने अनेकों कवितायें और गज़लें लिखीं और बहुत सी प्रेरणादायक पुस्तकों का अनुवाद भी किया। भगतसिंह का प्रिय गीत "मेरा रंग दे बसंती चोला" भी बिस्मिल का ही लिखा हुआ है।

पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने यह आत्मकथा सन् 1927 में गोरखपुर जेल में अपनी जेल की कोठरी में लिखनी शुरू की, जो फांसी के केवल तीन दिन पहले समाप्त हुई। इस पुस्तक में उन्होंने अपने स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़े ग्यारह वर्ष के जीवन काल के लेखे के साथ ही उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और विदेशी आक्रान्ताओं के साथ-साथ ही देश का खून चूस रहे भितरघातियों का भी कच्चा-चिट्ठा सामने रखा है। फांसी से एक दिन पहले 18 दिसम्बर 1927 को जब उनकी माँ श्री शिव वर्मा के साथ उनसे अंतिम बार मिलने आयीं तब पंडित जी ने अपनी इस आत्मकथा की हस्तलिखित पांडुलिपि माँ द्वारा लाये गये खाने के डब्बे में छिपाकर जेल के बाहर भिजवा दी।  इस आत्मकथा का पहला प्रकाशन सिंध में भजनलाल बुकसेलर द्वारा सन 1927 में पुस्तक रूप में हुआ। बाद में इसे श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा भी छपवाया गया। पुस्तक छपने की देर थी कि दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत ने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया और इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं गयीं।

पंडित जी 19 दिसम्बर को गोरखपुर जिला जेल में अशफाक उल्लाह खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिडी के साथ हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए।

सेतु के प्रथमांक में हमने बिस्मिल की आत्मकथा से एक पृष्ठ प्रस्तुत किया था। पाठकों की मांग पर सम्पादक मण्डल ने इस अंक से पूरी आत्मकथा को धारावाहिक रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है।
बिस्मिल की आत्मकथा
प्रथम खण्ड

आत्म-चरित

तोमरधार में चम्बल नदी के किनारे पर दो ग्राम आबाद हैं, जो ग्वालियर राज्य में बहुत ही प्रसिद्ध हैं, क्योंकि इन ग्रामों के निवासी बड़े उद्दण्ड हैं। वे राज्य की सत्ता की कोई चिन्ता नहीं करते। जमीदारों का यह हाल है कि जिस साल उनके मन में आता है राज्य को भूमि-कर देते हैं और जिस साल उनकी इच्छा नहीं होती, मालगुजारी देने से साफ इन्कार कर जाते हैं। यदि तहसीलदार या कोई और राज्य का अधिकारी आता है तो ये जमींदार बीहड़ में चले जाते हैं और महीनों बीहड़ों में ही पड़े रहते हैं। उनके पशु भी वहीं रहते हैं और भोजनादि भी बीहड़ों में ही होता है। घर पर कोई ऐसा मूल्यवान पदार्थ नहीं छोड़ते जिसे नीलाम करके मालगुजारी वसूल की जा सके।

एक जमींदार के सम्बंध में कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के कारण ही उनको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल तक भागे रहे। एक बार धोखे से पकड़ लिये गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें बहुत सताया। कई दिन तक बिना खाना-पानी के बँधा रहने दिया। अन्त में जलाने की धमकी दे, पैरों पर सूखी घास डालकर आग लगवा दी। किन्तु उन जमींदार महोदय ने भूमि-कर देना स्वीकार न किया और यही उत्तर दिया कि ग्वालियर महाराज के कोष में मेरे कर न देने से ही घाटा न पड़ जायेगा। संसार क्या जानेगा कि अमुक व्यक्‍ति उद्दंडता के कारण ही अपना समय व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी भूमि उन महाशय को माफी में दे दी गई।

इसी प्रकार एक समय इन ग्रामों के निवासियों को एक अद्‍भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराज के रिसाले के साठ ऊँट चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया; जिस पर राज्य की ओर से आज्ञा हुई कि दोनों ग्राम तोप लगाकर उड़वा दिए जाएँ। न जाने किस प्रकार समझाने-बुझाने से वे ऊँट वापस किए गए और अधिकारियों को समझाया गया कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना ही उचित होगा। तब तोपें लौटाईं गईं और ग्राम उड़ाये जाने से बचे।

ये लोग अब राज्य-निवासियों को तो अधिक नहीं सताते, किन्तु बहुधा अंग्रेजी राज्य में आकर उपद्रव कर जाते हैं और अमीरों के मकानों पर छापा मारकर रात-ही-रात बीहड़ में दाखिल हो जाते हैं। बीहड़ में पहुँच जाने पर पुलिस या फौज कोई भी उनका बाल बाँका नहीं कर सकती। ये दोनों ग्राम अंग्रेजी राज्य की सीमा से लगभग पन्द्रह मील की दूरी पर चम्बल नदी के तट पर हैं। यहीं के एक प्रसिद्ध वंश में मेरे पितामह श्री नारायणलाल जी का जन्म हुआ था। वह कौटुम्बिक कलह और अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण मजबूर हो अपनी जन्मभूमि छोड़ इधर-उधर भटकते रहे। अन्त में अपनी धर्मपत्‍नी और दो पुत्रों के साथ वह शाहजहाँपुर पहुँचे। उनके इन्हीं दो पुत्रों में ज्येष्‍ठ पुत्र श्री मुरलीधर जी मेरे पिता हैं। उस समय इनकी अवस्था आठ वर्ष और उनके छोटे पुत्र, मेरे चाचा श्री कल्याणमल की उम्र छः वर्ष की थी। इस समय यहाँ दुर्भिक्ष का भयंकर प्रकोप था।

[अगले अंक में जारी ...]