एक वैज्ञानिक का राजनीतिक पत्र

अनुवाद: मेहेर वान 

मेहेर वान
(राजनीति को आज हम जिस प्रकार 21 वीं सदी के उत्तर-आधुनिक काल में मात्र बाहुबल और विज्ञापन के द्वितीयक उत्पाद के रूप में देख रहे हैं, तत्कालीन राजनीति को ठीक इसी रूप में एक समर्पित वैज्ञानिक लगभग 80 वर्ष पूर्व देख रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध के एक लगभग एक दशक पहले अब तक के सबसे प्रतिभावान और समर्पित वैज्ञानिकों में से एक माने जाने वाले अल्बर्ट आइन्स्टाइन को विश्व में शान्ति की स्थापना की चिंता सता रही थी। यह वह समय था, जब दुनियाँ एक विश्वयुद्ध देख चुकी थी और उसके बाद दुनियाँ भर के शक्तिशाली देशों में प्रभावशाली हथियार बनाने की होड़ की शुरुआत हो रही थी। जर्मनी के राजनैतिक परिदृश्य में तब हिटलर सत्ता में नहीं आया था और आइन्स्टाइन जर्मनी में ही रह रहे थे। रूस में स्टालिन को सत्तासीन हुये लगभग दस वर्ष होने को थे और भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी का गठन हो चुका था। अमेरिका, इंग्लैण्ड, जर्मनी और जापान जैसे तमाम देशों की राजनैतिक हलचलें आइन्स्टाइन को परेशान कर रहीं थीं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान देने वाले प्रोफ़ेसर सिगमंड फ़्रायड को लिखे गये इस पत्र में, अल्बर्ट आइंसटीन की वैश्विक परिपेक्ष में राजनीतिक स्थिति और उसके भविष्य के संबंध में गहरी चेतना सुस्पष्ट है। आइन्स्टाइन उस समय बुद्धिजीवियों और वैश्विक शान्ति के लिये समर्पित लोगों के एक संगठन के गठन को प्रस्तावित करते हुये सिगमंड फ़्रायड और अन्य बुद्धिजीवियों से सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा कर रहे थे ताकि विश्व में बेहतर राजनैतिक परिदृश्य की स्थापना हो सके। आइंस्टाइन की चिंता के 8० वर्ष बाद फिलिस्तीन और ईराक के समय में जब युद्ध और हिंसा हमारी रोज़मर्रा की खबरों का हिस्सा हो गये हैं और दुनियाँ में हथियारों के निर्माण सम्बन्धी बजट में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, बुद्धिजीवियों के एक समर्पित वैश्विक संगठन की आवश्यक्ता अधिक महसूस होती है। यह पत्र इस ओर भी इंगित करता है कि इस बीच के समय में बुद्धिजीवियों ने एकजुट होने की दिशा में पर्याप्त गम्भीरता से काम नहीं किया। आज भी बुद्धिजीवियों का वैश्विक स्तर पर कोई प्रभावशाली समर्पित संगठन नहीं बन सका है, जिसके ज़रिये युद्धों और हिंसा का वैश्विक स्तर पर व्यापक विरोध किया जा सके। यह व्यक्तिगत पत्र ’अल्बर्ट आइन्स्टीन’ द्वारा सन 1931 के अंत में या 1932 की शुरुआत में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक “सिगमंड फ़्रायड” को लिखा गया था, जो कि जर्मनी के “Mein Wettbild, Amsterdam: Quarido Verlag” में सन 1934 में प्रकाशित हुआ था।) - 

 प्रिय प्रोफ़ेसर फ़्रायड, 
 आपमें सत्य को जानने और समझने की इच्छा, जिस प्रकार अन्य इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर चुकी है, प्रशंसनीय है। आपने अत्यन्त प्रभावी सरलता से दर्शाया है, कि मानव मस्तिष्क में प्रेम और जीवटता के साथ युद्धों को पसन्द करने वाली विनाशकारी मूलप्रवृत्तियाँ कितने अविलग ढंग से गुँथी हुई हैं। लेकिन, ठीक उसी क्षण वाद-विवाद से परिपूर्ण आपके अकाट्य तर्कों में, युद्ध से मानवता की बाह्य और आन्तरिक मुक्ति के महान लक्ष्य से सम्बन्धित गहरी अभिलाषा भी दिखाई देती है। जीसस क्राइट्स से लेकर गोथे और कान्ट तक सभी नैतिक और आध्यात्मिक नेताओं के द्वारा, इस महान लक्ष्य की घोषणा किसी भी प्रकार के अपवादों के बिना और देश काल से परे होकर की गयी थी। क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इन लोगों को वैश्विक स्तर पर पथप्रदर्शकों के रूप में स्वीकार किया गया? यद्यपि यह भी सत्य है, कि तमाम मानवीय मुद्दों की विषय-वस्तु को एक साँचे में ढालने के उनके प्रयासों में अत्यंत अपर्याप्त सफलता के साथ (जनता की) भागीदारी हुयी। 

 मैं स्वीकार करता हूँ कि वे महान लोग, जिनकी उपलब्धियाँ येन-केन प्रकारेण, किसी एक क्षेत्र तक प्रतिबन्धित कर दी जातीं हैं, वही उपलब्धियाँ उन्हें अपने आसपास के लोगों से ऊँचा उठा देती हैं। साथ ही उन्हें आदर्शों के अपरिहार्य विस्तार का सहभागी भी बनाती हैं, लेकिन उनका प्रभाव राजनीतिक घटनाओं की विषयवस्तु पर कम होता है। यह करीब-करीब ऐसे प्रतीत होता है, जैसे उन्हीं क्षेत्रों को हिंसा और राजनीतिक सत्ताधारियों की ग़ैरज़िम्मेदारियों पर अपरिहार्य रूप से छोड़ दिया गया हो, जिन कार्यक्षेत्रों पर राष्ट्रों की तकदीरें निर्भर करती हैं। 
 राजनेताओं और सरकारों की वर्तमान स्थिति कुछ बाहुबल और कुछ चर्चित चुनावों के कारण है। वे अपने-अपने राष्ट्रों में नैतिक और बौद्धिक रूप से जनता के सर्वोत्कृष्ट प्रतिनिधि नहीं ठहराये जा सकते। इस वक्त बुद्धिजीवी संभ्रांतों का देशों के इतिहास पर कोई सीधा प्रभाव नहीं है: उनकी सामाजिक सरोकारों में कमी, उन्हें समकालीन समस्याओं के निराकरण में सीधे भागीदारी करने से रोकती है। क्या आप इस बात के समर्थन में नहीं हैं, कि जिन लोगों के क्रियाकलाप और पूर्ववर्ती उपलब्धियाँ उनकी योग्यता और इस महान लक्ष्य की पवित्रता की गारन्टी का निर्माण करतीं हैं, उन संभ्रान्तों के स्वतंत्र संगठन के द्वारा इस दशा में परिवर्तन किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति के इस गठबंधन के सदस्यों को आवश्यक रूप से शक्ति और विचारों के आदान-प्रदान के द्वारा पत्रकारों के समक्ष अपना दृष्टिकोण प्रेषित करते हुये आपस में संपर्क में रहना होगा। महत्वपूर्ण अवसरों पर ज़िम्मेदारी सदैव हस्ताक्षरकर्त्ताऒं पर रही है- और यह राजनीतिक प्रश्नों के निराकरण हेतु सामान्य से काफ़ी अधिक और सलामी देने योग्य नैतिक प्रभाव छोड़ने वाली है। ऐसे संगठन उन सभी बुराइयों (जो कि अक्सर ज्ञानवान समाजों को विखन्डन के रास्ते पर ले जातीं हैं) और खतरों (जो कि अविलग रूप से मानव की मनोवृत्तियों की कमज़ोरियों से जुड़े होते हैं) के लिये निश्चित रूप से शिकारियों की तरह साबित होंगे। मैं इस तरह के प्रयासों को अनिवार्य कर्तव्य से कमतर नहीं देखता हूँ।

 यदि इस प्रकार के पूर्व-वर्णित विचारों वाले वैश्विक संगठन का निर्माण हो पाता है तो यह संगठन युद्ध के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिये आध्यात्मिक संस्थाओं को संगठित करने का ईमानदार प्रयत्न भी कर सकता है। यह उन तमाम लोगों के लिये एक अनुग्रह होगा, जिनके उत्कृष्ट लक्ष्य निराशाजनक निष्कासन के कारण विकलाँग हो चुके हैं। अंततः, मुझे विश्वास है, कि अपने-अपने क्षेत्रों के अत्यन्त सम्मानित लोगों का ऐसा संगठन, राष्ट्र-संघ के उन तमाम देशों को महत्वपूर्ण नैतिक सहयोग प्रदान करने हेतु अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध हो सकता है, जो कि वास्तव में एक महान लक्ष्य की दिशा में कार्यरत हैं और जिस ध्येय के लिये संघ का अस्तित्व है।

 मैंने यह प्रस्ताव विश्व के किसी अन्य के इतर आपके समक्ष इसलिये रखा है, क्योंकि आप अन्य सभी लोगों की अपेक्षा अपनी इच्छाओं के द्वारा सबसे कम ठगे जाते हैं, क्योंकि आपके आलोचनात्मक निर्णय ज़िम्मेदारी के सबसे गहरे एहसासों पर आधारित होते हैं। 
आपका, 
अल्बर्ट आइन्स्टीन