मीरा का स्त्री विमर्श (शोध-सारांश)

 - डॉ हरदीप सिंह
डॉ हरदीप सिंह
प्रस्तुत शोध लेख में यह स्थापित किया गया है कि अपने बारे में निर्णय लेने के अधिकार का व्यावहारिक प्रयोग जिस साहस के साथ भक्त कवयित्री मीरा ने किया था उसने नारी विमर्श के बीज बोने का काम शताब्दियों पूर्व कर दिया था। पति कहे जाने वाले पुरुष के आगे काम संबंधों के लिए नारी ने समर्पण करना है अथवा नहीं इसका निर्णय लेने की आज़ादी नारी की है। पुरुष उसके साथ जोर जबरदस्ती नहीं कर सकता। अब तो कानून में भी इस बात का प्रावधान है कि पत्नी की इच्छा के विरुद्ध पति सेक्स करने के लिए यदि उसे बाध्य करता है तो उसे बलात्कार माना जाएगा। मीरा का विवाह उसकी मर्ज़ी के बगैर राणा जी के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध कर दिया गया था क्योंकि मीरा तो कृष्ण के प्रेम की दीवानी थी। नारी जब एक बार किसी को दिल दे देती है फिर उस दिल में किसी दूसरे को स्थान देना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन मीरा का श्री कृष्ण के प्रति यह प्रेम आध्यात्मिक है, विदेही है, अशरीरी है। इसी लिए वह अपने तन और मन को श्री कृष्ण के प्रति ही समर्पित करना चाहती है। मीरा अपने स्वतन्त्र चुनाव के अधिकार की रक्षा करती है। इसकी अभिव्यक्ति उनके काव्य में सर्वत्र दिखाई देती है। 

बीज शब्द – स्त्री-विमर्श, काम संबंध, पितृसत्ता, विद्रोह, कृष्ण प्रेम

भक्तिकाल की प्रखर कवयित्री मीरा बाई श्री कृष्ण के प्रेम में दीवानी स्त्री विमर्श में सम्भवतया पहली नारी हैं जो पुरुष वर्चस्ववादी पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के विरोध में स्वतंत्रता का परचम फहरा रही हैं। नारी स्वतन्त्रता के विषय में साहित्य और समाज विज्ञान के क्षेत्र में काफी चर्चा और विचार विमर्श हो चुका है। स्त्री-विमर्श के विषय में रोहिणी अग्रवाल के इस कथन से यह लेखक सहमत है कि “स्त्री विमर्श अस्मिता आन्दोलन है। यह हाशिए पर धकेल दी गई अस्मिताओं को पुनः केंद्र में लाने और उनकी मानवीय गरिमा को पुनर्प्रतिष्ठित करने का महाभियान है। स्त्री विमर्श अपनी मूल चेतना में स्त्री को पराधीन बनाने वाली पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था का विश्लेषण करता है। यह स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी मानने का विरोध करता है और स्त्री को एक जीवंत मानवीय इकाई समझने का संस्कार देता है। स्त्री विमर्श पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पड़ताल करने के उपक्रम में विवाह संस्था, धर्म, न्याय और मीडिया की स्त्री विरोधी भूमिका को प्रकाश में लाता है। रोहिणी अग्रवाल आगे लिखती हैं, पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री को शक्तिहीन करके पुरुष को बलशाली बनाने का महान उपक्रम है। स्त्री को शक्तिहीन और रिक्त करने की यह प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म, जटिल एवं संश्लिष्ट है। एक और उसकी महत्ता के डंके पीट कर उसे शील, शक्ति और सौन्दर्य की अधिष्ठात्री कहा जाता है तो दूसरी और कर्तव्यपरायणता, एकनिष्ठा, सहिष्णुता त्याग और क्षमा जैसे उच्चादर्शों में बाँध उसकी परिधि को बेहद संकुचित कर दिया जाता है। स्त्री अपने लिए नहीं जीती। उसे दूसरों के लिए जीना सिखया जाता है – पुरुष के लिए, पुरुष के परिवार के लिए, पुरुष-निर्मित व्यवस्था के लिए। इसी लिए परिभाशाओं और वर्जनाओं में मात्र उसी को बाँधा जाता है, पुरुष को नहीं। जन्म से स्त्री और पुरुष दोनों संस्कार रूप में इन परिभाषाओं और वर्जनाओं को मूक भाव से स्वीकार करते हैं और उन्हीं के अनुरूप अपनी जीवन शैली विकसित करते हैं। सामान्यतया कहीं विवाद या संवाद की कोई गुंजाइश नहीं।” (रोहिणी अग्रवाल,2011, पृष्ठ 12) यह ठीक वही भावोच्छ्वास है जो मीरा काव्य में सर्वत्र बिखरा मिलता है।

मीरा का काव्य स्त्री-मानस की पीड़ा को शब्द देता है। मीरा के युग में स्त्री आत्माभिव्यक्ति के लिए स्वतन्त्र नहीं थी। (अग्रवाल, रोहिणी 2011) मीरा के काव्य में आत्मबोध और स्वतन्त्र व्यक्तित्व की पहचान पर आधारित संघर्ष उन्हें आधुनिक स्त्री चेतना से जोड़ता है मीरा का कृष्ण प्रेम से प्लावित काव्य सामाजिक दृष्टि से जहाँ एक और नारी के पीड़ित और अपमानित होने की कहानी कहता है, वहीँ दूसरी और पुरुष के अन्याय और संवेदनशून्य आधिपत्य के विरुद्ध विद्रोह है।। रोहिणी अग्रवाल के मतानुसार, “मीरा-काव्य के केंद्र में है मीरा के भीतर की निखालिस स्त्री जो पुरुष-दृष्टि की चौकसी और दबाब से मुक्त हो अपने मनोजगत में दहकती लालसाओं को निर्भीक भाव से व्यक्त कर रही है। वह अपने विरोध की प्रचंडता को भी जानती है, परकीय प्रेम के प्रति दुर्निवार आकर्षण की ‘अनैतिकता’ को भी और अकेले समाज से टकराने के जोखिम को भी।(अग्रवाल, रोहिणी 2011)। जब मीरा के सामने विष का प्याला आया तो निडर होकर आत्मविश्वास के साथ पी लिया।(मालती, के.एस., 2010, 21) आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी(1998, 51) का यह कहना उपयुक्त है “विषपान मीरा का-मध्यकालीन नारी का-स्वाधीनता के लिए संघर्ष है और अमृत उस संघर्ष से प्राप्त तोष है जो भाव सत्य है। मीरा का संघर्ष जागतिक, वास्तविक है, अमृत उनके ह्रदय या भाव जगत में ही रहता है।” मीरा के काव्य का यह पुरुष वर्चस्ववादी विद्रोह वास्तव में सदियों से स्त्रियों पर लादी गई अमानवीय व्यवस्था के प्रति है। निम्नलिखित उदाहरणों में मीरा अपने विरोधियों को सीधी चुनौती देती है :

सीसोद्यो रूठ्यो म्हारो काई करलेसी
म्हें तो गुण गोविन्द का गास्यां, हो माई
राणा जी रूठ्यां बारो देस रखासी
हरी रूठ्या कुम्लाह्स्याँ, हो माई
लोक लाज की काण न मानूं
नरभे नीसाण धुरास्याँ हो माई। (१)

मीरा का उपर्युक्त स्वर निश्चय ही पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के प्रति खुला विद्रोह है। पितृसत्ता के निरंकुश नियंत्रण के विरुद्ध आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रयोग है।
मीरा का काव्य नारी के आत्मनिर्णय के अधिकार और स्वतंत्रता पर लगाए गए इस आरोप का करारा जवाब है कि वह स्वतंत्रता की आड़ में वैवाहिक व्यवस्था से मुक्त खुले यौन सम्बन्धों का जीवन जीना चाहती है। मीरा यह स्वीकार करने का साहस रखती है :
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी
कोई निंदो कोई बिंदो, मैं चलूंगी चाल अपूठी। (2 )
रोहिणी अग्रवाल के शब्दों में “चारित्रिक दृढ़ता एवं ईमानदारी के कारण पारदर्शिता मीरा की पहचान है और उसकी मानवीय रक्षा का प्रमुख घटक भी। मीरा ने छल या विश्वासघात नहीं किया तो लोकापवाद क्यों ? ‘संतन के ढिंग’ बैठने से और हरिभक्ति में भाव विभोर हो नाचने से कुल की मर्यादा का हनन कैसे ?” (अग्रवाल रोहिणी 2011, 14)
उदाहरण
साधुन के संग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी
नित प्रति उठि नीच घर जावो, कुल कूँ लगावो गारी
बड़ा घरां की छोरी कहावो, नांचो दे दे तारी। (3)
मैनेजर पांडेय के शब्दों में, “कबीर, जायसी और सूर के सामने चुनौतियाँ भाव जगत की थीं। मीरा के सामने भाव जगत से अधिक भौतिक जगत की, सीधे पारिवारिक और सामाजिक जीवन की चुनौतियाँ तथा कठिनईआं थीं। उस पुरुष प्रधान सामन्ती समाज में एक स्त्री, वह भी मेढ़ता के राठौर राजपूत कुल की बेटी और मेवाड़ के महाराणा परिवार की बहू, ऊपर से विधवा। यही था मीरा का अपना लोक। उसके धर्म और उसमें स्त्री की स्थिति का अनुमान किया जा सकता है। लेकिन उसके विरुद्ध विद्रोह की कल्पना भी कठिन है। फिर भी मीरा ने उस आतंककारी लोक और उसके भयावह धर्म के विरुद्ध खुला विद्रोह किया। (पांडेय, मैनेजर, 1993, 27)

घरेलू हिंसा की शिकार तिरस्कृत और उत्पीड़ित मीरा राजसत्ता, पितृ सत्ता और लोकलाज और कुलकानि को पानी की तरह बहा देने की शक्ति रखती है :
राणा जी तें जहर दियो मैं जाणी
जैसे कंचन दहत अगिन में, निकसत बाराबाणी।
लोकलाज कुलकाण जगत की, दी बहाय ज्यूँ पाणी।
अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौराणी।।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गयो सरकाणी। (4 )

यहाँ जब मीरा यह कहती है कि ‘अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौराणी’ तो रोहिणी अग्रवाल दो बातों को लक्षित करती हैं,” एक, हताशा के गर्भ से फूटता स्त्री का विद्रोह और स्त्री के ‘मनुष्यत्व’ के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था के स्वरूप की पुनर्संरचना। मीरा का विद्रोह उन स्थितियों की पड़ताल करने की नैतिक जवाबदेही है जो ‘अबला’ कही जाने वाली निरीह पराश्रित स्त्री को ‘बौराने’ और ‘आक्रामक’ होने को विवश करती है ; बार बार उन पूर्वग्रहों और जड़ताओं को चीन्ह लेने की आकांक्षा करता है जो स्त्री की आत्मविकास की नैसर्गिक आकांक्षा को ‘लोकलाज’ और ‘कुलकानि’ के उल्लंघन से जोड़ती है – उस कुत्सित मानसिकता को तुरंत निषिद्ध कर देने की मांग करता है जो पुरुष और व्यवस्था की हर अमानुषिकता को अनुशासन और नियम पालन का पर्याय बना देती है।” (अग्रवाल, रोहिणी 2011, 17)
अपने पति राणा को वह साफ बता देती है कि मेरा प्यारा प्रीतम तो गिरिधर है :
राणा जी म्हारे गिरिधर प्रीतम प्यारो।
....
जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, रानोंजी कौन बिचारो।(5 )
निम्नलिखित पद में भी मीरा की पसंद राणा से अधिक साध-संग है, इस लिए वह अपने हार-श्रृंगार, चूड़ी और सुहाग की निशानियों का भी त्याग कर देती है। यह आध्यात्मिक प्रेम की दीवानगी की मिसाल है :
राणा जी हूँ अब न रहूँगी तोरी हटकी।
साध संग मोहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की।
....
हार सिंगार सभी ल्यौ अपना, चूड़ी कर दी पटकी।
मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जानें घट की।
महल किला राणा मोहि न चाहिए, सारी रेशम पट की।
हुई दीवानी मीरा डोलें, केस लटा सब छिटकी।(6)

‘में जोगी शब्द का जोगी आ जा आ जा’ पद में जोगी का प्रयोग श्री कृष्ण के लिए किया गया है क्योंकि उन्हें योगिराज भी कहा जाता है। शोध लेख का लेखक रोहिणी अग्रवाल के इस कथन से सहमत नहीं है कि मीरा की विकल प्रेयसी का रूप उसकी अध्यात्म की प्रक्रिया को बाधित करता है। अपितु यह प्रेम की शक्ति ही उसमें वह बल भरती है जो उसे पुरुष वर्चस्ववादी संसार के सामने अडोल और अटूट भाव से खड़ा रखती है :
जोगी आ जा आ जा,
जोगी पाई परूँ मैं हौं चेरी तेरी।
प्रेम भक्ति को पेंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा।
अगर चन्दन की चिता बनाऊं, अपने हाथ जला जा।
जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा।(7)

गिरिधर स्वामी से तन और मन की तपन बुझाने की कामना की अभिव्यक्ति मीरा जिस स्वच्छन्दता के साथ करती है वह विकारी नहीं है बल्कि कृष्ण के रूप में परमात्म मिलन की उत्कट इच्छा है :

मन हमारा बंध्यो माई।
कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई।
लाग्यो तब जान्यो नहीं, अब न सहयो जाई री माई।
तंत मंत औषध करउ, तऊ पीर न जाई।
है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई।
निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो जाई।
मीरां गिरधर स्वामि दयाल, तन की तपति बुझाई री माई। (8)

प्रस्तुत अध्येता रोहिणी अग्रवाल के इस कथन से सहमत नहीं है कि “मीरा के पदों को यदि आध्यात्मिकता के कुहांसे से मुक्त कर दिया जाए, तो वे जीवन के राग, उल्लास, उत्सव, और ठाट-बाट के साथ एन्द्रिकता के उद्दाम का भी संस्पर्श करते हैं। घोर लौकिकता के बीच घोर शृंगारिक बाना।”(अग्रवाल, रोहिणी 2011, 21 ) वास्तव में मीरा के सामने कोई अध्यात्मिक कुहाँसा नहीं था। वास्तव में राग, उल्लास और उत्सव तो आध्यात्मिकता को सहज बनाते हैं। प्रभु मिलन की इच्छा निम्नलिखित पद में भी अभिव्यक्त हुई है :
ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नाईं।
चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तडपत रेन बिहाई।
मैं सूती पिया अपने म्हेल में, सालूड़ा में आई सरदाई। (9)
राग, उल्लास और उत्सव के साथ जब लौकिक संसार के प्रति वैराग्य वृत्ति होती है तभी अलौकिक प्रेम परिपूर्ण होता है :
मेरा मन को बैरागी कर गयो रे।
हाथ लकुटिया काँधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे।
बारह बरस से सेवा कीन्ही, रमती बिरिया रम गयो रे।
सुण सुण हे मेरी पाद पड़ोसन, जलती में पूलों दे गयो रे।
मीरां के प्रभु हरि अबिनासी, धूकती धूनी धर गयो रे। (10)

मीरा के इस पावन प्रेम के सामने पुरुष वर्चस्ववादी पितृ सत्ता के सारे अंकुश बेमानी हैं वह तो खुले आम गोविन्द का गुणगान करती है :
गोविंद का गुण गास्यां।
राणोंजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुम्लास्याँ।
राम नाम की जहाज चलास्यां, भव सागर तिर जास्यां। (11)

कृष्ण के प्रेम की दीवानी मीरा का यह जोगी ध्रुवतारा है। मीरा का यह प्रेम एक जन्म का नहीं है अपितु जन्म – जन्म है जिसकी घोषणा स्वयं को पूर्व जन्म की गोपिका मान कर मीरा कहती है :

एक बिरिया मुख बोलो रे, धुतारा जोगी।
...
पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलों रे।
जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊं ढोलो रे।
तेरे कारण सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे।(12)

मीरा अगर श्री कृष्ण का वरण करती है तो ठोक-बजा कर करती है। इस सम्बन्ध में रोहिणी अग्रवाल का यह कथन अवलोकनीय है कि “मीरा आरोपित विवाह सम्बन्ध को अस्वीकार कर स्त्री द्वारा स्वयं पति रूप में पुरुष का वरण करने की पक्षधर है। विवाह संस्था स्त्री की देह पर की जाने वाली द्विपक्षीय संधि नहीं, न ही प्रतिशोध और प्रतिकार की अमानुषिकता। विवाह सम्बन्ध देह का कामुक खेल या कुलवृद्धि का शुष्क दायित्व नहीं, जीवन सहचर पाने की अनुराग भरी प्रक्रिया है। फलतः सम्बन्ध न आनन-फानन में तय हों, न बाहरी दबाब से। ठगे जाने की प्रतीति ही न रहे, इस लिए ठोक बजा कर साथी ढूँढने का अवसर और अधिकार पाना चाहती है मीरा।” (अग्रवाल, रोहिणी 2011, 25 )। निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत है :

माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल।
कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगो, मैं तो लियौ है हीरा सूं तौल।
कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़िया तौल।
कोई कहै छाने कोई कहे बोडे, मैं तो लियो री बाजता ढोल।
कोई कहै घटतौ कोई कहै बढतो, मैं तो लियो है बराबर तौल।
कोई कहे कालो कोई कहे गोरो, मैं तो देख्यो है घूँघट पट खोल।(13)

इस तरह मीरा जिस पुरुष का वरण करती है तो यह पहली नज़र का अल्हड़ प्यार नहीं है अपितु वह हीरे जैसे अपने संवारिये को पूरा, बराबर अपने घूँघट के पट खोल कर तोलती है। अपने वरण की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करती है।

हर्ष-शोक, लाभ-हानि से उपराम मीरा अपने मन की स्थिरता और दृढ़ता का परिचय देती है :
हरष शोक म्हारे मन नाहीं, नहीं लाभ नहीं हानि,
कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबनी। (14)


नारी के रूप में मीरा प्रेम को उदात्त की उस भूमि पर प्रतिष्ठित करती है जहाँ उसका ‘अहं’ भाव विगलित होकर समर्पण का महान भाव धारण करता है :

म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखौला सरण हजूरी।
बैल बन्धावो भांवे घोड़ा बन्धावो, चाहे करावो मंजूरी।
खावा पीवा की म्हाँकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भावे कूरी।
ओढ़न कूँ कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी।
जो थे देशी, लो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी। (15)

पूनम कुमारी अपने शोध प्रबंध ‘स्त्री चेतना और मीरा का काव्य’ में लिखती हैं, “मीरा की कविताएँ स्त्री चेतना के इतिहास की एक विलक्षण धरोहर हैं। आज तक जितनी भी स्त्री चेतनापरक कविताएँ लिखी गई हैं उनके बरक्स मीरा की कविताओं को रख दिया जाए तो इनकी विलक्षणता की पहचान ज्यादा आसान हो जाएगी और शायद ज्यादा तीखेपन की भी। स्त्री चेतना के सन्दर्भ में मीरा एक खास अर्थ में प्रासंगिक और आधुनिक हैं। और सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वे आधुनिकता के सारे प्रचलित प्रतिमानों से दूर रहते हुए भी आधुनिक और प्रासंगिक हैं।”(16)

निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हिंदी काव्य जगत में मीरा स्त्री विमर्शकार के रूप में सबसे पहले अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। कई मायनों में वे आज की आधुनिक कही जाने वाली महिला विमर्शकारों से कहीं आगे हैं। एक भक्त के रूप में श्री कृष्ण, एक पूर्ण पुरुष, के प्रेम में तल्लीन होकर पुरुष वर्चस्ववादी पितृ सत्ता के उत्पीड़न, अपमान, घरेलू हिंसा को झेलते हुए भी वे अपने निर्णय में दृढ, अचल और अडोल रहीं। यहाँ उन्हें चुनाव करना था और उन्होंने चुनाव किया श्री कृष्ण के प्रेम का। यह प्रेम की ही शक्ति थी जो उन्हें संसार के भौतिक सुखों से विरक्त करके अति-इन्द्रीय सुख में सराबोर करती है। दुनिया का कोई प्रलोभन, राज्य सत्ता या कुलकानि उन्हें अपने पथ से विचलित नहीं कर सका। उन्होंने जिस स्वतंत्रता से निर्णय लिया उसे जीवन पर्यन्त निभाया। पितृ सत्ता, राज्य सत्ता और संसारिक लोकलाज को ठोकर मारकर अपनी स्वाधीनता की रक्षा करने वाली मीरा इसी लिए आज वन्दनीय हैं।

सन्दर्भ
अग्रवाल, रोहिणी (2011), बरजी मैं काही की नाहिं रहूँ, मीराबाई: हिंदी की पहली स्त्री –विमर्शकार, स्त्री-लेखन स्वप्न और संकल्प, दिल्ली: राजकमल
पांडेय, मैनेजर (1993), भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य, दिल्ली: वाणी
त्रिपाठी, विश्वनाथ,(1998) मीरा का काव्य, दिल्ली:वाणी, प्रथम संस्करण
टिप्पणियां :
त्रिपाठी, विश्वनाथ,(1998) मीरा का काव्य, दिल्ली:वाणी, प्रथम संस्करण, पृष्ठ १०४
वही, पृष्ठ १०४
मालती, के.एस.(2010), स्त्री विमर्श : भारतीय परिप्रेक्ष्य, दिल्ली:वाणी
मीरा बृहत् पदावली भाग 1, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, पद 395
वही, पद 505
वही, पद 509
वही, पद 515
वही, पद 176
वही, पद 368
वही, पद 56
वही, पद 438
वही, पद 129
वही, पद 55
वही, पद 385
वही, पद 153
वही, पद 405
शोध गंगा