“आज लिखा जाने वाला दलित साहित्य एक तूफान है" साक्षात्कार - डॉ उमेश कुमार सिंह

जिस देश में दलित होना ही अभिशाप माना जाता है उसी देश के उत्तर प्रदेश राज्य में अलीगढ़ जिले के एक गांव नगौला से तमाम विषम परिस्थितियों का सामना करते हुये अज़रबैजान यूनिवर्सिटी ऑफ फ़ॉरेन लेंगुएजिज बाकू अजरबैजान तक का सफर पूरा करने वाले प्रसिद्ध दलित चिंतक एवं साहित्यकार डॉ उमेश कुमार सिंह आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आपकी अनेक कहानियां कविताएं एवं आलोचना राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। पिछले दिनों आपकी आत्मकथा “दुख-सुख के सफर में” का विमोचन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलाधिपति प्रो. कपिल कपूर के कर कमलों द्वारा माननीय कुलपति प्रो॰ गिरीश्वर मिश्र, प्रति कुलपति प्रो॰ चितरंजन मिश्र की गरिमामय उपस्थिती में सम्पन्न हुआ।विमोचन के तुरंत बाद डॉ. उमेश कुमार सिंह से प्रदर्शंकारी कला (फिल्म एवं रंगमंच) विभाग के शोधार्थी आशीष कुमार ने लंबी बातचीत की। बातचीत का एक अंश पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। 


विमोचन समारोह के दौरान माननीय कुलाधिपति प्रो.कपिल कपूर, डॉ.उमेश कुमार सिंह एवं माननीय कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र (बाएँ से दाएँ)
आशीष -सर आपको बहुत-बहुत बधाई।
डॉ. उमेश कुमार सिंह – धन्यवाद।

प्रश्न: आपने आत्मकथा क्यों लिखी?
उत्तर: मैंने अपनी दलित आत्मकथा इसलिए लिखी क्योंकि हमारे देश के बहुत से छात्र, अपने छात्र जीवन में थोड़ी सी मुश्किलें आने पर अपनी राह से भटक जाते हैं और वे सोचने लगते हैं अब उनके लिए आगे बढ़ना बहुत कठिन काम हैं, वे जीवन से परिस्थिवश हार मान लेते हैं इतना ही नहीं कारण और भी गिनाए जा सकते हैं परंतु इन सब कारणों का निचोड़ यह है कि वे आगे नहीं बड़ पाते हैं, कोई दूसरा काम करने लगते हैं अथवा गलत राह पर चल पढ़ते हैं। मेरी आत्मकथा उन भटके हुये छात्रों और लोगों के लिए एक उदाहरण साबित हो सकती है। मेरे कहने का भावार्थ यह है कि मैं एक छोटे से गाँव की प्राथमिक पाठशाला से जहां जाति, धर्म, छुआ-छूत, ऊंच-नीच, पढे लिखे होकर भेदभाव पूर्ण कुटिल चाल की तरह अनेक असाध्य रोगों जैसी अनगिनत मुश्किलों के बावजूद जिस तरह आगे बढ़ाने में कामयाब रहा हूँ उसी तरह इस आत्मकथा “दुख-सुख के सफर में” को पढ़कर लोग अपने जीवन में एक कामयाब छात्र, कामयाब इनसान तथा देश के सभ्य शहरी बनकर अपने देश की सेवा कर सकते हैं।

प्रश्न: अलीगढ़ के बेहद पिछड़े और गरीब परिवार से संबन्धित होने के बावजूद आपने लेखक बनने का निर्णय क्यों लिया?
उत्तर: असल में मैं प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता था। इसलिए मैंने आईएएस की तैयारी भी की, लेकिन अच्छी तैयारी के लिए मेरे पास न तो पैसा था न ही अन्य संसाधन। चाह कर भी किताबें नहीं खरीद पाता था। यही वजह थी कि मैं इस दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया। मैं जब आठवीं कक्षा में था और तुरंत-तुरंत मेरी शादी हुई थी। उस समय मैंने एक कहानी लिखी थी। जिसमें एक लड़का होता है जो आईएएस बनने का सपना देखता है और अपनी तमाम मजबूरियों के बावजूद वह आईएएस बनने में कामयाब हो जाता है। दरअसल, यह पहली बार था जब मैंने अपनी सोच और सपने को कहानी की शक्ल दी थी। लेकिन अभी तक यह तय नहीं कर पाया था कि लेखक ही बनना है। बाद में जब अलीगढ़ विशविद्यालय गया तब वहां के परिवेश और संगत ने लेखक बनने की तरफ आकर्षित किया। यदि मैं वहां नहीं जाता तो शायद यह नहीं कर पाता। इसके अलावा मेरे एक गुरु जी अक्सर कहा करते थे कि तुम्हें लिखना है, तुम लिखो। उनकी प्रेरणा ने ही मुझे लेखक और शिक्षक दोनों बनने के लिए प्रेरित किया। यही वजह है कि गोवा में 12वर्षों तक अधिकारी के पद पर कार्य करने के बाद भी मैंने विश्वविद्यालय में शिक्षक बनना पसंद किया और लगातार लेखन कर रहा हूं।

आशीष कुमार
प्रश्न: आपका कहानी संग्रह ‘पहली रात का अंत’ बहुत चर्चा में रही। इसके विषय में बताएं।
उत्तर: यह कहानी एक दलित पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी का मूल आधार गांव की एक परंपरा है जिसके अनुसार शादी होने के बाद पहली रात को गांव के हर दलित औरत को जमींदार पास जाना पड़ता है। कहानी का नायक भी दलित है, जो जमींदार के यहां चाकरी करता है। वह जमींदार का सबसे बड़ा लठैत है। जब नायक की शादी होती है तब अपनी बूढ़ी मां के साथ जमींदार के पास जाता है। जहां जमींदार उसे हवेली की परंपरा के बारे में बताता है। जमींदार के इस व्यवहार से नायक को झटका लगता है। उसका भ्रम टूटता है। रात को अपनी पत्नी को भेजने की बजाय वह खुद जमींदार के पास जाता है और उसका अंत कर देता है। इसके बाद अपनी मां और पत्नी को लेकर गांव छोड़ देता है। और इस तरह एक त्रासदी भरी रात का अंत हो जाता है।

प्रश्न: आप कहानी से कविता की तरफ कैसे चले गए?
उत्तर: कहानी लिखने की प्रक्रिया काफी लंबी है। पर कविता आकस्मिक होती है। इसकी रचना परिवेश और परिस्थिति के अनुसार तुरंत हो जाती है। बचपन में मैंने आल्हा-उदल का प्रभाव देखा था। गायन शैली में विकसित ये रचनाएं आम लोंगो पर गज़ब का असर छोड़ती हैं। शायद इसी वजह से मैं कविता की तरफ झुका।

प्रश्न: साहित्यिक जीवन के अलावा आपका प्रारम्भिक जीवन कैसा था?
उत्तर: मेरी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। वह दौर बड़ी अजीब था। गरीबी इतनी ज्यादा थी कि कभी-कभी पेट भरने के लाले पद जाते थे। फिर पढ़ाई की कौन पूछता है? तपती गर्मी में घर से चार रोटियां मिलती थीं, उन्हें ही पोटली में बांध कर स्कूल जाता था। लू और गर्मी की वजह से रोटियां सूख जाती थीं। जब तक कक्षा खत्म होती तब तक रोटियां सूख कर एकदम कड़ी हो जातीं। हमारा चना-चबेना जो था सब यही था। सर्दियों में मुझे यह भी नहीं पता था कि स्वेटर होता कैसा है। अलीगढ़ विश्विद्यालय में भी मेरे पास कोई स्वेटर नहीं था। सिर्फ एक कुर्ता-पायजामा और एक शेरवानी ही थी। शेरवानी इसलिए क्योंकि विश्विद्यालय के हर छात्र के लिए वह अनिवार्य था। मुझे अब भी याद है गर्मी तो जैसे-तैसे कट जाती थी, पर जाड़े में जीवन जीना बहुत कठिन हो जाता था। इसी वजह से स्कूल जाने में अक्सर देरी हो जाती थी। तब मेरे दो दोस्त थे, एक देवेंद्र कुमार सैनी और दूसरे राजेश कुमार तोमर। देवेन्द्र पंजाबी थे और राजेश जाट। जब देवेंद्र ने देखा कि मैं रोज लेट हो जाता हूं तो उसने मुझे अपनी साईकिल दे दी। जब मैं साईकिल से उनके घर आता तो उसकी मां सर्दी से ठिठुरते मेरे हाथों को आग से सेंकती। यह देख कर एक दिन देवेन्द्र ने मुझे अपने पिता जी के पुराना ग्लब्स दे दिये।

(साक्षात्कार के दौरान शोधार्थी आशीष कुमार एवं डॉ. उमेश कुमार सिंह)

प्रश्न: आपके जीवन में शिक्षकों का कितना योगदान है?
उत्तर: प्राथमिक विद्यालय तक तो मुझे किसी शिक्षक का ज्यादा सहयोग नहीं मिला। हां प्रताड़ना जरूर मिली। स्कूल की सफाई और पानी भरने का काम मुझे करना पड़ता था। बाद में जब मैं जूनियर हाईस्कूल में गया तब आगरा के रहने वाले एक शिक्षक महेंद्र सिंह चाहा ने मेरी बहुत मदद की। वह मुझसे काफी प्रभावित रहते थे और अक्सर मेरी मदद करते थे। कभी-कभी मुझे खाना भी खिलाया करते थे। एक बार उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं काष्ठकला सीख लूं, ताकि लकड़ी का काम करके भविष्य में जी-खा सकूं। उन्हीं की वजह से मैंने काष्ठकला सीखी। इसी तरह इंटरमीडिएट कॉलेज में मेरे एक शिक्षक थे मिश्री लाल। वह जाति-पाति में विश्वास नहीं करते थे। इन्हीं की वजह से पहली बार मैं अपनी कक्षा का मॉनिटर बना। उस समय के लिए यह अपने आप में बहुत बड़ी बात थी। एएमयू में शैलेश जैदी और प्रो. एके सिंह का मेरे ऊपर काफी प्रभाव पड़ा।

प्रश्न: अलीगढ़ विश्विद्यालय में प्रवेश कैसे हुआ?
उत्तर: मैं जिस जूनियर हाईस्कूल में पढ़ता था, उसके बगल में अलीगढ़ विश्विद्यालय का एक मेडिकल रिसर्च सेंटर था। यहां लोगों को मुफ्त दवाएं दी जाती थी। मैं भी वहां दवा लेने जाता था। धीरे-धीरे मेरा परिचय वहां के गार्ड से हुआ। उस ने मेरी मुलाक़ात सेंटर के डाक्टरों से करा दी। उन्होंने ने ही मुझे अलीगढ़ विश्विद्यालय और यहां प्रवेश की प्रक्रिया के बारे में बताया है।

प्रश्न: सहपाठियों का व्यवहार कैसा रहा?
उत्तर: इस मामले में मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे जेएनयू और एएमयू दोनों जगह अच्छे सहपाठी मिले। मुझे लगता है ये दोनों ही विश्विद्यालय अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए सबसे उपयुक्त जगह है। कभी किसी ने मेरे साथ बुरा व्यवहार किया कोई अभद्र टिप्पणी की हो, ऐसा मुझे याद नहीं है। वैसे भी अलीगढ़ की यह परंपरा है कि शेरवानी पहन कर कोई छात्र लड़ाई नहीं करता है। यदि वो लड़ते भी हैं तो लोग उन्हें अलग कर देते हैं। जब एक शेरवानी वाला और एक गैर शेरवानी वाला आदमी आपस में लड़ते हैं तब सब अपने आप ही शेरवानी वाले के पक्ष में हो जाते हैं। यहां की संस्कृति इतनी अच्छी है कि कभी किसी जातिसूचक अपमान का दृश्य देखने को नहीं मिला।

प्रश्न: दलितों की बेहाली का कारण मदिरापान है क्या ?
उत्तर: मदिरापान दलित ही नहीं सवर्ण भी करते हैं फिर सवर्णों की स्थित क्यों बदहाल नहीं है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि दलित मदिरा पान नहीं करते हैं। दलितों की बदहाली का प्रमुख कारण उनका सवर्ण जतियों द्वारा सदियों से उनके श्रम का शोषण किया जाना माना जा सकता है। सदियों से उनको शिक्षा, समाज और जमीन से बेदखल करने के भरपूर लिखित प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं। इस सबके बावजूद दलित बहुत ईमानदार और परिश्रमी होते हैं तथा उनकी आमदनी के स्रोत बहुत कम होते हैं, दलितों की एक बड़ी विशेषता होती है कि वे बिना गलती के किसी से दबते नहीं हैं इसलिए जब वे मदिरा पान करते हैं तब अपने घर पर मदिरा के दम पर कुछ खुल कर अपनी जबान का प्रयोग करते हैं यों कहें कि तब वे खुलकर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते हैं। दलित समाज के लोगों को समझाया जाय। उन्हें अच्छा वातावरण और आगे बढ़ाने के समान अवसर दिलवाए जायें।तब इस देश में दलितों का भी समान विकास होना संभव हो सकेगा।

प्रश्न: आज के समय में दलित समाज में परिस्थितियाँ कितनी बदली हैं?
उत्तर: निश्चित तौर पर दलित सामज में चेतना आई है और परिस्थितियां भी बदली हैं। हालांकि मेरा मानना है कि कोई भी बदलाव रातोंरात नहीं होता। सालों से चली आ रही रूढ़िवादी परंपराओं को टूटने में समय लगेगा।

प्रश्न: इस बदलाव को सशक्त बनाने में साहित्य की कितनी भूमिका है?
उत्तर: बहुत बड़ी भूमिका है। असल में साहित्य और इतिहास ही परिवर्तन के वाहक बनते हैं। जैसे बाबा साहब के साहित्य ने न केवल लोगों को जागृत किया बल्कि उनके अंदर नई चेतना भी जागृत की।

प्रश्न: आजकल दलित लेखक क्यों आत्मकथा की ओर झुक रहे हैं ?
उत्तर: दलित लेखक क्या लिखना चाहते हैं और क्या नहीं लिखना चाहते हैं ? यह उनकी अपनी स्वतन्त्रता और स्वीकारोक्ति का प्रश्न है परंतु फिर भी यहाँ पर यह बताना उचित होगा कि दलित लेखकों द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं के प्रकाशन से दलित लेखकों की कीर्ति और प्रशंसा बहुत कम फैलती है। लोग उन्हें अपमानित करने के किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देते हैं परंतु इसके बावजूद दलित लेखक समाज में प्रतिष्ठित और अच्छे पदों पर होते हुये भी अपनी आत्मकथा धड़ल्ले से लिख रहे हैं। इसका कारण यह है कि दलित लेखक अपने जीवन का उदाहरण आत्मकथा के रूप में समाज के सामने रखकर यह बताना चाहते हैं, जिस समाज द्वारा कदम-कदम पर जाति, धर्म, छुआ-छूत, ऊंच-नीच और भेदभाव मार्ग में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए बिछाए थे। इन सभी उत्पन्न मुश्किलों और व्यवधानों के उपरांत भी मनुष्य के जीवन में आने वाली परेशानियाँ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती हैं। अर्थात इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य जो दृद निश्चय कर ले तो उसके मार्ग में आने वाली बाधायें उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती है। आज लिखा जाने वाला दलित साहित्य एक तूफान है और तूफान के मार्ग में आने वाली बाधा उसे किसी भी कीमत पर रोक नहीं सकती हैं।

इस संबंध में एक उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूँ। राजस्थान में पत्थर और मार्वल बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है। राजस्थान के लोग पत्थर और मार्वल को छोड़कर उत्तर प्रदेश से ईटें मंगाकर अपना घर ईंटों से बनवाएँ। क्या यह उनकी बुद्धिमानी होगी ? इसलिए दलित लेखकों के पास अनुभव का जो भी कच्चा माल उपलव्ध है वे जिसमें आसानी से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। लिख सकते हैं उसी माध्यम के द्वारा वे अपने विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं। इस मायने मैं वे भारतीय साहित्य को समृद्ध ही कर रहे हैं।

प्रश्न: अक्सर यह बात चर्चा का विषय बनती है कि गैर दलित दलित विमर्श नहीं कर सकते हैं। आप इससे कितना सहमत हैं?
उत्तर: सबसे पहले इस बात पर विचार करना जरूरी है कि दलित साहित्य की आवश्यकता क्यों पड़ी। जब दलितों को मुख्य धारा में स्थान नहीं मिला तभी तो दलित विमर्श ने आकार लेना शुरू किया। दरअसल, दलित साहित्य भोगा हुआ सत्य है। यह अनुभव कोई और कैसे ले सकता है। यह भूमि में उपजा हुआ एक दर्शन है। जब इसका दायरा बढ़ेगा तब निश्चित रूप से इसके स्वरूप में भी परिवर्तन होगा।

प्रश्न: दलित साहित्य का भविष्य ?
उत्तर: जब तक भारत में जाति, धर्म, के नाम पर भेदभाव पूर्ण कुटिल चालों के साथ-साथ छुआ-छूत, ऊंच-नीच, का वातावरण रहेगा, तब तक दलित साहित्य का लिखा जाता निरंतर जारी रहेगा। दलित साहित्य, शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में उठी एक आवाज ही नहीं बल्कि दलितों पर हुये जुल्मों का एक लिपिबद्ध इतिहास है। दलित साहित्य का अनेक विरोधों के बावजूद निरंतर लिखा जाना इसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत कर रहा है।

आशीष – सर आपने मुझसे बातचीत की, इतने व्यस्त होने के वावजूद भी साक्षात्कार दिया इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
उमेश कुमार सिंह – शुक्रिया आशीष।