सरहद (कहानी)

असित कुमार मिश्र
- असित कुमार मिश्र

कहते हैं कौशिला फुआ जैसी जिंदादिल औरत कुतुबपुर गाँव में क्या पूरे बलिया जिले में नहीं होगी। गाँव के किसी भी शादी बियाह में सबसे आगे आगे ।बियाह के दिन लड़कियों के हाथ पर मेंहदी धरने से लेकर आँखों में काजर लगाने का काम फुआ से बढिया कोई नहीं करता था। यही नहीं तिलकहरुओं को गाली देने वाली और कौन खाया कौन कहाँ सोया इन सबकी चिंता करने वाली वही तो थीं।आवाज तो जैसे एकदम शारदा सिन्हा वाला। कहतीं भी थीं कौशिला फुआ कि- 'हमरा और शारदा बहिनी का जनम एक्के दिन का है'। राग तो ऐसा था कि गीत के गालियों को सुनने वाले तिलकहरु भी वाह वाह कह उठते थे। बस एक ही कमी थी फुआ में कि वो विधवा थीं।

ऐसा नहीं कि फुआ का बियाह आन्हर-लंगड़ से हुआ था। लोग बताते हैं कि परमेसर फूफा जैसा जवान मलेटरी में भी नहीं था। अंगना में मिला एच एम टी घड़ी कलाई में बाँध कर और तीन सेलवा टार्च हाथ में लेकर वो जब चलते थे तो दरोगा जी का भी सर झुक जाता था। लेकिन भगवान की मर्जी ही थी कि वैसा पहलवानी का देह टीबी से लड़ाई हार गया। बियाह के तीन साल बाद ही कौशिला फुआ विधवा हो गईं।बाल बच्चा हुआ नहीं था कि उनका मुंह देखतीं। महीनों तक उनके रोने से गाँव का करेजा फटता रहा और बादल बरसते रहे। भादो का महीना बीतते ही फुआ को उनके गाँव भेज दिया गया, क्योंकि वो रात को अब हँसने भी लगीं थीं। शायद फूफा के मरने का चोट उनके दिमाग पर भी असर कर रहा था।गाँव में आकर तो जैसे पूरे गाँव के घर उनके अपने हो गए थे। गाँव की कनिया - पतुरिया को सलाह देने से लेकर किसी के कथा पूजा का भंडारा देखना सब उनके जिम्मे लग गया।धीरे-धीरे फुआ अपना दुख भूल कर बच्चों के साथ बच्चा और पुरनियों के साथ पुरनियां बनतीं चली गईं।

बैसाख के दुपहिया की धूप सीधे कपार पर लगती है। बचे खुचे महुए भी पक कर चूने लगते हैं कोयल कहीं अमराइयों में लुका कर कूऽ कूऽऽ करती रहती है। हवा भी ठंडक नहीं देती। पसीना पोछते हुए कौशिला फुआ ने बगल में सोई मस्टराईन से पूछा - कमला के बियाह में अभी केतना दिन है दुलहिन?

मस्टराईन ने जोड़ कर बताया कि अभी तीन महीना है।

फुआ ने जैसे बिनती करते हुए कहा - ए दुलहिन कमला का विदाई दिखा देना बस हमको।

मस्टराईन ने खिसिया कर कहा - जीजी, जबसे कमलवा का बियाह तय हुआ है तबसे आप यही जिद पकड़े हुए हैं। केतना बार कहें कि दुलहिन को विदा होते समय विधवा औरत का मुँह नहीं देखना चाहिए। अपशगुन होता है।

फुआ ने आंखों से गंगा जमुना बहाते हुए कहा - कमलवा हमरी गोदी में पली बढ़ी है, बस एक बार विदाई के समय बाँह में भरकर हमहूँ रो लेंगे तो कौन सा अपशगुन हो जाएगा।

मस्टराईन ने कहा - फुआ हम क्या कहें। आप मास्टर साहब से खुदे बतिया लीजिएगा।

लल्लन मिसिर जैसे ही रात का खाना खाकर खटिया उठाकर चलने को हुए कौशिला फुआ ने टोक ही दिया - ए मास्टर कुछ हां-ना तो कहो।

मास्टर साहब ने कहा - दीदी हम जानते हैं कि कमलवा मेरी ही नहीं तुम्हारी भी बेटी है। हम दोनों मरद मेहरारू तो पढाने चले जाते थे सारा दिन कमलवा तुम्हारे पास ही रहती थी। लेकिन बस ई जिद मत करो। आखिर सब रसम रिवाज में तो रहोगी ही बस विदाई के समय हट जाना।

कौशिला फुआ को अपने सगे भाई से बहुत उम्मीद थी। आखिर उम्मीद कोई अपनों से ही तो करता है न। इतने साल के जीवन में उन्हें किसी भी लड़की की विदाई नहीं देखने दी गई। खैर फुआ ने कभी बुरा भी नहीं माना। लेकिन यह तो उनकी अपनी भतीजी कमला का विवाह था। बस दूध पिला देने से मस्टराईन मां हो गईं? फिर उनके विधवा होने में उनका क्या दोष? वो खुशी खुशी विधवा तो हुई नहीं ...।

अचानक कमला ने उनके कमरे में आकर टोका - ए फुआ खाना खा लो।

फुआ ने अनमने भाव से कहा - भूख नहीं है।

कमला ने थाली रख दी और फुआ का हाथ पकड़कर कहा - ए फुआ आप चिंता मत कीजिए। हम ई सब फालतू के रीति रिवाज नहीं मानते। हम इस जमाने के हैं बी ए- एम ए पास हैं। बिना आपका पैर छुए घर से कदम बहरा नहीं निकालेंगे।

फुआ की रुलाई फूट पड़ी। दोनों हथेलियों में कमला का चेहरा पकड़ लिया और बोलीं - कमलवा तू पगला गई क्या! कहीं कुछ अशुभ हो गया तो। नहीं! नहीं!! तू रात में ही एक बार मुझसे मिल लेना। और जानती हो औरतों के बीए-एमए पढ लेने से कुछ नहीं होता, रहती वो औरत ही है।

गोद भराई से लेकर सिंदूर दान तक के रस्म रिवाज हो गए। आज कमला के विवाह में भी फुआ के कदम सबसे आगे थे, और फुआ के ही गीत गालियाँ सबसे चटकार। लेकिन पता नहीं क्यों तिलकहरुओं ने तारीफ नहीं की। जब भी फुआ शारदा सिन्हा वाला लय उठातीं तो कहीं न कहीं जरुर गड़बड़ा जाता। फुआ चुपचाप अपने कमरे में आकर खटिया पर लेट गईं।अचानक उन्हें मस्टराईन के पायलों की आवाज सुनाई दी, फिर लगा जैसे बाहर से दरवाजा बंद कर के सिकड़ी चढाई गई हो। पहले तो फुआ की आंखों से थोड़े से आँसू गिरे उसके बाद तो जैसे बांध ही टूट गया। इधर एक के बाद एक रस्म पूरा करते करते भोर का चार बज गया। सुबह की पहली किरन निकलने से पहले ही कमला की विदाई कर देनी थी। चाचा चाची मौसी से गले मिलकर रो लेने के बाद कमला ने जिद पकड़ लिया कि फुआ से भी मिलेंगे।हालांकि मस्टराईन ने खूब समझाया कि हम लोग फुआ के दुश्मन थोड़े हैं। लेकिन जोग टोक मानना चाहिए। वेद पुरान सब झूठ तो है नहीं।

कमला फूलों से सजी डोली में बैठ चुकी थी। पियरी का पीलापन उसकी गोराई में मिलकर उसे और भी सुंदर बना रहा था। गांव भर के औरतों की भीड़ आंखों में आंसू भरे कमला को विदा कर रही थी। कमला ने आखिरी नज़र उठाकर सबको देखा। भीड़ में बस एक चेहरा नहीं था - फुआ का।

कमला के पैर डोली से बाहर निकले धरती पर टिके और दौड़ती हुई कमला फुआ के कमरे तक पहुंच गई। उसके हाथ सिकड़ी तक पहुंचने ही वाले थे कि मस्टराईन ने उसके हाथ पकड़ लिए और रोते हुए कहा - कमलवा हमरे जान की किरिया है जो सिकड़ी खोली तो।

कमला के हाथों की मजबूत पकड़ से सिकड़ी छूट गई और बेबसी में उसने दरवाजे पर अपना कपार पटक दिया और चिल्ला कर बोली - फुआऽऽ ए फुआऽऽऽ। हम जा रहे हैं हो। सुन रही हो?

उधर खटिया के पार पकड़े रो रही बूढ़ी आंखों में जैसे जल धारा समा गई थी। फुआ ने उठकर कमजोर बांहों से दरवाजे को पकड़ लिया और दरवाजे पर सिर पटक दिया। उधर कमला की चींखे गूंज रही थीं इधर एक बूढ़ा सिर दरवाजे से टकरा रहा था। लकड़ी का एक दरवाजा उन दो औरतों के लिए सरहद था। फुआ के माथे से खून बहने लगा। फुआ ने फिर अपने माथे की भरपूर चोट दरवाजे पर मारी। इस बार की चोट से दरवाजे की एक किल्ली थोड़ी सरक गई और दो बूढ़ी आंखों ने दरार में से जमीन पर गिरने से पहले आंख भर देख लिया था एक दुलहिन की विदाई ... अपनी कमलवा की विदाई। और बंद होते हुए दिल की गहराई से आशीर्वाद निकला - सदा सुहागन रहो।

कमलवा की विदाई के साथ साथ फुआ भी विदा हो चुकीं थीं। उन दोनों के चेहरे खून और आंसुओं से भरे हुए थे लेकिन एक जाना पहचाना संतोष दोनों के चेहरे पर था। आखिर एक सरहद जो टूट चुकी थी ...।