● मैं हिन्दी हूँ ● यतीन्द्रनाथ चतुर्वेदी

यतींद्र नाथ चतुर्वेदी
मैं हिन्दी हूँ!
आवाम की जिन्दगी हूँ,
भारत का कतरा-कतरा खून हूँ,
यहीं की धूल,
यहीं की माटी हूँ,
हर माथे के पसीने की चमक हूँ,
दुनिया की पूरी आबादी के,
छठवें हिस्से का वजूद हूँ,
हर भूख की गवाह हूँ,
हर ईमान की जमानत हूँ,
तरक्की की आधारशिला हूँ!!

 मैं हिन्दी हूँ!
भारत की नदियों का जल हूँ,
सदियों से हरा-भरा वट-वृक्ष हूँ,
जमीन पर उकेरा गया शब्द हूँ,
इंसानों की सरहदों के पार,
आसमानों पर इंद्रधनुष हूँ,
विद्वानों के अल्फाज और अनपढ़ों की मीठी आवाज
मैं हिन्दी हूँ!!

 मैं हिन्दी हूँ!
सरहपाद, चन्दवरदायी,
अमीरखुसरो, जयदेव,
रविदास, कबीर की वाणी हूँ,
मीराबाई, रहीम,
केशव, तुलसी की रामायण हूँ,
घनानंद, भूषण, रसखान,
भीखा, सुन्दर, गुलाल की बानी हूँ,
महावीर, हरिऔध, मैथिली,
प्रसाद, हजारी, यशपाल,
अश्क, नागर, नागार्जुन,
रांगेय, ‘सुमन’, शरत, प्रेमचंद की स्याही हूँ,
आचार्य चतुरसेन, रामचन्द्र शुक्ल,
देवकी नंदन खत्री, दिनकर,
बच्चन, अमृता प्रीतम, शिवानी की मैं हिन्दी हूँ!!

 मैं हिन्दी हूँ!
पुरुखों की वसीयत हूँ,
भारत की बुनियाद हूँ,
पवित्र गीता हूँ मैं,
कुरआन-ए-पाक हूँ मैं,
पवित्र बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब हूँ मैं,
चाणक्य का अर्थशास्त्र हूँ मैं,
आचार्य शंकर का महाभाष्य हूँ मैं,
बुद्ध की जातक हूँ मैं,
अकबर की दीन-ए-इलाही हूँ मैं,
गुरुदेव की गीतांजलि,
गांधी की अहिंसा,
भारत की एक खोज हूँ,
भारत की आजादी हूँ,
भारत का निर्माण मैं हिन्दी हूँ!!

 मैं हिन्दी हूँ!
पुस्तकालयों में संरक्षित,
पन्नों पर लिपटी हूँ मैं,
शिक्षा की चहार-दिवारी में,
विभागों की दहलीजों पर
ठिठकी सी भाषा की मैं हिन्दी हूँ।

भारत की जनभाषा मैं,
भारत की हूँ राजभाषा,
इंटरनेट के संवादों में,
कंप्यूटर पर दौड़ रही,
विश्वगाँव की मैं हिन्दी हूँ।

 जीवन की उहा-पोह में,
हर ठेले हर रेहड़ में,
फुटपाथों संग गलियों में,
दुकानों और मालों में,
भाषाओँ के मेले में,
दुनिया की बाजारों में,
सडकों पर जूझ रही मैं हिन्दी हूँ!!

 आम आदमी से चलकर,
अंतिम आदमी को लेकर,
अगड़े पिछड़े समाजों से,
छूट चुके आवामों में,
बिछड़े जज्बातों की खातिर,
भारत की सवा अरब,
आवाजों में मिलकर,
इन्कलाब की मैं हिन्दी हूँ।

रुपये-डालर के महायुद्ध में,
आतंक-शांति के महासमर में,
प्रभुता की छीना-झपटी में,
अंग्रेजी के महंगे उत्पादों में,
मेहनतकश सस्ती हिन्दी हूँ मैं।

सरकारों की आधी आवाज हूँ,
संविधान में प्रतीक्षारत मैं,
शोषण-पोषण की पतली रेखा पर,
भूखी-प्यासी मैं हिन्दी हूँ।

रिश्तों के महाजाल में,
भरी भीड़ में एकाकी,
जनपथ से अब राजपथ,
कदमों के पदचिन्हों से आगे,
मोटरगाड़ी वाली मैं हिन्दी हूँ!