डॉ. उमेश महादोषी की क्षणिकाएँ

उमेश महादोषी

01.
एक-एक कर
तमाम रिश्तो की देहों पर
अपनत्व के फाहे रखता रहा
आज देखा/तो
मेरी उँगलियाँ
बुरी तरह जल चुकी हैं!

02.
बाँह पकड़कर/मन
पहाड़ों पर खींच लाता है
कैसा नासमझ है कवि!
कलम पकड़कर
मैदानों में उतर जाता है

03.
रात को
स्वप्न में मुझे
मां रोज दिखाई देती है
सुबह उठता हूँ तो जैसे
मेरी आँखों की रौशनी
गायब होती है।

04.
कमी
मेरे समर्पण में है
या तुम्हारे स्वीकार में
कि हर बार
मैं रह जाता हूँ
एक पुरुष का अहं बनकर
और तुम
एक आहत मन-भर!

05.
जवाब सुने बिना ही
बेताल
उड़ गया
जाने कहाँ
और विक्रमादित्य
धमाके में
शहीद हो गया
पर किस्सा है
कि अभी खत्म नहीं हुआ!

06.
पहचान का क्या...
और अर्थ का भी
क्या करुंगा...!
शब्द होना ही
मेरे लिए
समुन्दर होना है!

07.
रिश्तों की झाड़ी में
सूखी पड़ी हैं
प्रेम की हड्डियाँ
अब धागे से
केवल
पतंग उड़ाई जाती है!

08.
काल को घोड़ा मानकर
सवारी करता है ’पवन’
न लगाम खींचनी आती है
न चुप बैठकर चलते जाना
काल जानता है
ऐसे सवार को लेकर
कहाँ है जाना!

09.
हमीं बनाते हैं
पालकियाँ
हमीं बनाते हैं
मुकुट
क्यों नहीं बना पाते
कुछ अतिरिक्त
कान, नाक और आँखें?
इतना तय है
जब हम अपना कौशल बढ़ायेंगे
तभी अच्छे दिन आयेंगे!

10.
कल सुबह
हवा को रोककर
तुम पूछना-
पहाड़ कैसे हैं
नदियाँ कैसी हैं
पेड़ कैसे हैं
चिड़ियाँ कैसी हैं
तुम देखना
गले में रस्सी डालकर
हवा को अपनी ओर खींचते लोग
कैसे दांत निपोरते हैं!

11.
नए साल के बारे में
क्या सोचूं?
पुरानी उम्मीदों और सपनों को
आगे लाने भर से
खाते का
पूरा पन्ना भर जाता है!

12.
एक मंहगाई बढ़ाता है
दूसरा आन्दोलन करवाता है
इन दोनों की मार झेलने वालों को
जिस तीसरे से उम्मीद है
वह/ हर बार
दुम समेटकर/बिल में छुप जाता है.

13.
उस पार था खेत
बीच में नदी
बह गया हरिया
धार कुछ ऐसी थी
आँखों में उगती रही
फसल हरी-भरी!

14.
कहते हैं
वे
गुलेलों से
कौए उड़ा रहे हैं
और तोपों के
खुले मुँह
हँसे जा रहे हैं

15.
नदी का नारा
बम भी फूटे कहीं
तो बहे
जल की धारा!