ओमप्रकाश पाण्डेय 'नमन' की कविताएँ

ओमप्रकाश पाण्डेय 'नमन'

-- अच्छी औरतें --

अच्छी औरतें
घर में रहती हैं
कभी घूँघट
कभी परदे
तो कभी बुरके में
छिपी होती हैं ...
बुरी औरतें
खुले आम
पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर
नौकरियाँ करती हैं
सीमा पर लड़ती हैं
ऑटो, टैक्सी और ट्रेन
चलाती हैं
हवाई जहाज़ उडाती हैं
कंपनिया और बैंक चलाती हैं...
सबसे बुरी औरते
वे होती हैं
जो राजनीति में जाती हैं
आवाम के लिए लड़ती हैं
अन्याय के खिलाफ
आवाज़ उठाती हैं
वे कुलटा और छिनाल कहलाती हैं....
मित्रों
औरतें बुरी नहीं हैं
बुरी है हमारी दृष्टि
जब हम अपनी दृष्टि बदल लेंगे
तब औरतों को
घूँघट, परदे या बुरके की
ज़रूरत नहीं होगी
ज़रूरत नहीं होगी ...

--  खिलाफत  --

मैं धार्मिक हूँ
इसीलिए संगठित धर्म के खिलाफ हूँ ...
मैं हिन्दू हूँ
इसलिए उनके खिलाफ हूँ
जो चला रहे हैं हिंदुत्व की दुकानें ...
मैं ब्राह्मण हूँ
पर ब्राह्मणवाद के खिलाफ हूँ
जातिवाद के खिलाफ हूँ
खुद अपने खिलाफ हूँ ...
मैं भारतीय हूँ
भारतीय होने का सार्थक अभिमान भी है मुझे
पर मैं उनके खिलाफ हूँ
जो राष्ट्रवाद के नाम पर
खुद अपने खिलाफ रच रहे हैं षड्यंत्र ...