पंजाबी लघुकथा नये क्षितिज

निरंजन बोहा 


देवेन्द्र साथी के साथ निर्मला देवी के विवाह की चर्चा कई दिन चलती रही। निर्मला के आसपास के समाज और नजदीकी रिश्तेदारों के लिए यह विवाह एक गंभीर चुनौती की तरह था। पिछले दस वर्षों से विधवा का जीवन जी रही निर्मला बारह साल की बेटी की माँ भी थी। अपनी उम्र के चालीस पार कर उसने अपने ही हम-उम्र एक लेखक व यूनियन कार्यकर्ता से अंतर्जातीय विवाह करवाकर निश्चय ही उस लक्ष्मण-रेखा को पार कर लिया था जो उसकी परवरिश के माहौल ने खींची थी।

इस विवाह की खुशी में निर्मला ने अपने स्कूल-स्टाफ को चाय-पार्टी दी थी। एक ही स्कूल में पढ़ाने के कारण व आपसी मेल-मिलाप का सहारा लेकर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी, बहन जी, आपकी बेटी मीना की उम्र अभी बारह साल है, सात-आठ साल में उसका विवाह भी करना होगा। आपका इस उम्र में किया अंतर्जातीय विवाह उसके लिए योग्य वर ढूँढने में रुकावट नहीं बनेगा क्या?”

क्या इतनी बड़ी दुनिया में एक ही देवेन्द्र साथी है?” गंभीर आवाज में बोलते हुए उसने निगाह ऊपर उठाई जैसे किसी नये क्षितिज की ओर इशारा कर रही हो।

(अनुवाद: श्याम सुंदर अग्रवाल)

                                  _________________