लघुकथा: लघुता में प्रभुता


लघुकथा, कथा-परिवार की सबसे छोटी इकाई है। लघुकथा का आकार कहानी की तुलना में छोटा होता है, ऐसे ही जैसे उपन्यास की तुलना में कहानी छोटी होती है। एक कहानी सामान्यतः तीन-चार से लेकर बीस-तीस पृष्ठों तक जाती है। इसी तरह एक लघुकथा आमतौर से पाँच-छह पंक्तियों से लेकर दो-ढाई पृष्ठों तक या पचास-साठ शब्दों से लेकर तीन-चार सौ शब्दों तक की होती है। वैसे आकार बाहरी चीज है। लघुकथा का आकार उसके विषय की जरूरत के हिसाब से तय होता है।


लघुकथा में आमतौर पर यथार्थ के किसी एक पल, एक स्थिति, एक सूक्ष्म पहलू को लेकर रचना में ढाला जाता है। इसलिए उसका स्वरूप, संरचना भी उसी प्रकार बनती है। घटनाओं, स्थितियों, पात्रों की संख्या लघुकथा में आमतौर पर अधिक नहीं हो सकती।


साहित्य की अन्य विधाओं की तरह लघुकथा भी मनुष्य और समाज की बेहतरी के लिए होती है। लघुकथा में पशु-पक्षी, सूरज-चांद भी पात्र हो सकते हैं, लेकिन मकसद मानव जीवन की वास्तविकता का ही कोई पहलू सामने लाने का होता है। बचपन में लालची कुत्ता, प्यासा कौआ जैसी लोकप्रिय बोध-कथाएं हमें कोई शिक्षा देने के उद्देश्य से ही पढ़ाई सुनाई गई थीं। इसी तरह इतिहास के प्रसिद्व पात्रों को भी आज से जोड़ कर लघुकथा की रचना की जा सकती है।


लघुकथा में कोई कथा, कहानी या किस्सा होना चाहिए, तभी वह लघुकथा कही जाएगी। कई बार लघुकथा में विचार तत्व या कविता का तत्व आदि हावी हो जाते हैं, तब भी कथा का तत्व उसमें रहना चाहिए। इन चार बातों को मिलाकर हम कह सकते है कि-


“लघुकथा, मानव-जीवन के यथार्थ के किसी पक्ष की, छोटे आकार में कही गई कथा-रचना है।”
लघुकथा का आकार छोटा होने का यह अर्थ नहीं कि लघुकथा में किसी कहानी का सार प्रस्तुत कर दिया जाए। तब वह न कहानी होगी, न ही लघुकथा। लघुकथा न सार है, न संक्षेप है, न भूमिका है, न अखबार की कटिंग या रिपोर्टिंग है। लघुकथा लघु यथार्थ-बोध की रचना भी नहीं है। लघुकथा स्वयं में पूर्ण साहित्यिक रचना है, जिस प्रकार कहानी या और कोई भी विधा। लघुकथा के बारे में रमेश बतरा ने ठीक ही लिखा है कि इसमें शब्द सीमित होते हैं, चिंतन नहीं।

लघुकथा का लोककथा, बोधकथा, नीतिकथा आदि से अन्तर
लोककथाएँ सामान्य लोक-जीवन पर आधारित होती हैं। ये लम्बे समय में, कई पीढ़ियों से गुज़रते हुए लोक के अनुभवों, संवेदनाओं और भाव-सारणियों से गुज़रकर अपने सर्वस्वीकृत रूप में हमारे सामने आती हैं। लोककथाएँ समाज में सुनी-सुनाई परम्परा यानी मौखिक रूप में प्रचलित होती हैं। अनेक पीढ़ियों के हाथों सँवरने के कारण लोककथाओं का कोई एक लेखक नहीं होता। हरियाणा में ‘दो बटेऊ’, ‘खींच’ ‘मेल बाजा’ आदि लोककथाएँ इसका प्रमाण हैं। लोककथाओं से हमारे लोक-विश्वासों और लोक-संस्कृति का पता-चलता है। इसी प्रकार दन्तकथाएँ भी जनश्रुति के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती जाती हैं। ये कल्पना से बनाई गई कथाएं हैं, जो बाद में किंवदंतियों के रूप में प्रचलित हो जाती हैं। लोककथाओं और दंतकथाओं के निर्माण में कई पीढ़ियों तक संशोधन होते रहते हैं। समय के जल में पत्थरों की तरह रगड़ खाती-खाती लोककथाएं और दंतकथाएं सर्वप्रिय रूप धारण कर स्थिर हो जाती हैं।

भारत में पौराणिक प्रसंगों, मिथकों, पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों को लेकर लम्बे समय से नीतिकथाएँ और बोधकथाएँ लिखी लिखी जाती रही हैं। इनका स्वरूप उपदेशात्मक होता था और लक्ष्य था नैतिक शिक्षा प्रदान करना। सुप्रसिद्ध श्रेष्ठ पुस्तक ‘पंचतंत्र’ की रचना एक राजा के तीन मूर्ख पुत्रों को समझदार बनाने के लिए की गई थी। संस्कृत में ‘हितोपदेश’ और ‘कथासरित्सागर’ भी ऐसे ही ग्रंथ हैं। इन सबमें शिक्षाप्रद कथाएँ मिलती हैं। आधुनिक लघुकथा इन सबसे भिन्न धरातल पर स्थित है। लघुकथा अपने समय के यथार्थ को लेकर चलती है। इस संबंध में प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का कथन है -

“विकास की इस यात्रा में लघुकथा ने दृष्टांत, रूपक, लोककथा, बोधकथा, नीतिकथा, व्यंग्य, चुटकुले, संस्मरण ऐसी अनेक मंजिलें पार करते हुए वर्तमान रूप पाया है और अपनी सामर्थ्य को गहरे अंकित किया है। वह अब किसी गहन तत्व को समझने, उपदेश देने, स्तब्ध करने, गुदगुदाने और चौंकाने का काम नहीं करती, बल्कि आज के यथार्थ से जुड़कर हमारे चिंतन को धार देती है।”
कल्पना का प्रयोग

कल्पना का प्रयोग लघुकथा को बेहतर और सुंदर बनाता है। यह कल्पना भी मानव-जीवन की वास्तविकता पर टिकी होती है। कथाकार प्रेमचंद ने लिखा है कि काल्पनिक यथार्थ भी होता है। प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ काल्पनिक यथार्थ का सुंदर उदाहरण है। बहू के कफ़न के लिए बाप-बेटे द्वारा इकट्ठे किए गए रूपयों से शराब पी जाना - यह कहीं घटित हुआ नहीं लगता, फिर भी कहानी सच लगती है। कल्पना रचनात्मक होनी चाहिए, रचना की आवश्यकता के अनुसार उसे गति देने, समृद्ध करने वाली, कड़ियां जोड़ने वाली होनी चाहिए। इस तरह कल्पना रचना का ही अंग होती है। श्रेष्ठ रचनाकार कल्पना का प्रयोग यथार्थ के पुननिर्माण के लिए करते हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की लघुकथाओं में कल्पना का काफी प्रयोग मिलता है। उसी के आधार पर वे जीवन-मूल्यों की स्थापना करते हैं। उनकी ‘पत्थर की पुकार’ ऐसी ही श्रेष्ठ लघुकथा है।

फैंटेसी भी एक प्रकार की कल्पना है, जो विशेष अर्थ (प्रतीक) को साथ लेकर चलती है। इसके द्वारा रचना में ऐसी घटनाओं को घटित होते दिखाया जाता हैं, जो वास्तव में घटती नहीं, किन्तु रचना के उद्देश्य के साथ उनका आवश्यक सम्बंध होता है। कविता में प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ फैंटेसी की प्रतिनिधि रचना है। हिन्दी लघुकथा में असगर वज़ाहत और विष्णु नागर ने फैंटेसी का अच्छा प्रयोग किया है। सुकेश साहनी की ‘गोश्त की गंध’ लघुकथा फैंटेसी के ज़रिए समाज के बिगड़ैल, परंपरागत दामादों की सोई चेतना को झकझोरने का काम करती है। अत्यन्त निर्धन ससुराल में दामाद दावत उड़ा रहा है। उसकी बदलती सोच से जुड़ी एक पंक्ति देखें - “खून के बीच आदमी के गोश्त के बिल्कुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे।”

लघुकथा लिखने से पहले
लिखने से पहले लेखक को अपने विषय में अवश्य विचार करना चाहिए। विख्यात कथाकार लियो टॉलस्टॉय का कथन है - “लेखक को अपनी रचना से कहीं अधिक बड़ा होना चाहिए।” यानी जिस ईमानदारी, आदर्श स्थिति, नैतिकता, परोपकार, सम्वेदनशीलता आदि का उल्लेख एक लेखक की रचनाओं में आता है, वे सब गुण लेखक के अन्तरतम से निकले होने चाहिए, तभी वह रचना प्रभावशाली बन सकेगी। यदि वे गुण उसके जीवन और व्यवहार में नहीं, तो उसे लेखक बनने का विचार त्याग देना चाहिए।

लिखने के लिए समाज की जानकारी होना जरूरी है। जैसे, आपमें वर्ग चेतना की समझ होनी चाहिए। निम्न, मध्य और उच्चवर्ग की सोच, मानसिकता और प्रवृत्तियों की जानकारी होना लिखने में बड़ी मदद करता है। हर धर्म और जाति में किसी एक वर्ग के लोगों की सोच, संवेदना और व्यवहार कमोबेश एक-सा होगा।

समाज के बारे आपका अनुभव ही लिखने की चाबी है। इस अनुभव के कई स्रोत हैं। एक तो समाज से आपका सक्रिय सम्पर्क रहे, ताकि राजनीति, प्रशासन, समाज और परिवारों में समय के साथ हो रहे बदलावों से आप परिचित रहें। देश और दुनिया के हालात पर नजर रखें और अपना स्पष्ट दृष्टिकोण बनाएं। अपनी तर्क शक्ति और विवेकशीलता का विकास करें। विश्व के प्रमुख चिंतकों के सिद्धांतों से आपका परिचय रहे, जिनमें भारतीय चिन्तकों के साथ-साथ डार्विन, मार्क्स, सार्त्र भी शामिल हो। इसी कड़ी में आपको अपने लेखन क्षेत्र और विषय से जुड़े इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान की व्यावहारिक जानकारी होनी आवश्यक है। सक्रिय सम्पर्कों, जानकारियों और ज्ञान के न होने पर आपकी लघुकथाएं सड़क, टी.वी., किताब या मित्र संबंधी के यहां देखी-सुनी बातों तक सिमट जाएंगी। आप प्रतिदिन के अनुभव एक नोटबुक पर लिख सकते हैं।

लिखने में एहसास और संवेदना बड़ी मदद करते हैं। ऊपर हमने अनुभव (ज्ञान) की चर्चा की थी। ज्ञान का सीमेंट संवेदना के जल से मिलकर ही लग सकता है। अनुभव का एहसास में बदलना ही संवेदना या अनुभूति कहलाता है। आज समाज में संवेदना कमतर होती जा रही है। आप भी इससे अछूते नहीं होंगे, इसलिए आपको अपनी संवेदन शक्ति को बनाए-बचाए रखने के लिए भी जद्दोजहद करनी होगी, तभी आपकी लघुकथाओं में यह गुण आ सकेगा।

अच्छा साहित्य पढ़ना लिखने की तैयारी में बड़ा सहायक होता है। आप विभिन्न भाषाओं की बेहतरीन कहानियाँ पढ़ जाएं। अच्छी लघुकथाएं लिखनी हैं तो हिंदी ही क्यों, भारत और विश्व की बेहतरीन लघुकथाएं आदि पढ़ने का प्रयास करें। श्रेष्ठ कवियों की कविताएं भी पढ़ें। पढ़ने के बाद उनका अध्ययन करें। पढ़ने और अध्ययन करने में फर्क है। किसी लघुकथा को लेखक ने कैसे लिखा? क्या कहा और क्या छोड़ दिया? जो कहा, वही क्यों कहा? जो छोड़ा, वह क्यों छोड़ दिया। इन सबका उस लघुकथा पर क्या असर पड़ा? उस लघुकथा की भाषा, शिल्प आदि कैसे बन पड़े हैं? इन सब पक्षों पर सोचना ही उस लघुकथा का अध्ययन करता है। फिर अब अवसर मिले, तो किसी अनुभवी लेखक, आलोचक या अध्यापक से उस लघुकथा की चर्चा कर सकते हैं। चर्चा करने, संवाद और विमर्श करने से चीजें स्पष्ट होती हैं, समझ बढ़ती है। जो लेखक ऐसा करने से डरते हैं उनका विकास सीमित होने लगता है। 

रूप बनाम वस्तु
मोटे तौर पर कहें, तो विषय और कला दोनों का सुमेल ही अच्छी रचना को बनाता है। दोनों की अपनी उपयोगिता है। कलाशिल्प (रूप) का काम क्या है? विषय या वस्तु को पाठक तक पहुंचाना। जरूरत पड़ने पर कला से कुछ समझौता किया जा सकता है ताकि आपकी बात पाठक तक पहुंच सके, पर विषय से समझौता नहीं करना चाहिए।

यहाँ विश्व-प्रसिद्ध कथाकार बर्तोल्त ब्रेख्त की लघुकथा ‘रूप और वस्तु’ का उल्लेख करना आवश्यक है। एक व्यक्ति ने अपने माली को जयपत्र की बढ़ी हुई झाड़ी को काटकर ठीक कर देने को कहा। माली उसे अलग-अलग तरफ से काटता गया, अन्त में मालिक को कहा कि उसने उसे सुंदर बना दिया है। मालिक ने कहा,-“ठीक है, मगर वह जयपत्र की झाड़ी कहाँ है?” दरअसल झाड़ी के नाम पर सिर्फ टहनियाँ रह गयी थीं। यानी कथा (वस्तु) का रचना में संतुलित रूप में होना महत्वपूर्ण है। रूप तभी है, जब वस्तु है।

लघुकथा का शीर्षक
लघुकथा का आकार छोटा होने के कारण इसका शीर्षक उपन्यास व कहानी के शीर्षक से भी अधिक महत्व रखता है। पाठक सबसे पहले लघुकथा का नाम पढ़ता है, अतः लघुकथा का शीर्षक ऐसा हो, जो पाठक को लघुकथा में प्रवेश करने में सहयोगी हो। साथ ही लघुकथा पढ़ने के बाद उसका अर्थ सही दिशा में ग्रहण करने में सहायक हो। लघुकथा का शीर्षक कई बार अर्थ का विस्तार करने का कार्य करता है, कई बार वह रचना का हिस्सा ही बन जाता है। ख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की लघुकथाओं के शीर्षक भी व्यंग्य का पुट् लिए होते हैं, जैसे - ‘ऑफ्टर ऑल आदमी।’ ‘दिल्ली में लंगोट’ (रवीन्द्र वर्मा) भी ऐसा ही शीर्षक है। ‘बिन शीशों का चश्मा’ (रामकुमार आत्रेय) प्रतीकात्मक शीर्षक है, ‘अनन्त में अम्मा हँसती है’ (मुकेश वर्मा) काव्यात्मक शीर्षक है। ‘दया’ (पृथ्वीराज अरोड़ा) और ‘ऊँचाई’ (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) लघुकथाएँ रचना की मूल संवेदना को उभारने वाले सटीक शीर्षक हैं। लघुकथा का नाम रचना की मुख्य घटना, स्थान या पात्र के आधार पर भी हो सकता है। बलराम अग्रवाल की ‘गोभाजन कथा’ का शीर्षक लघुकथा की केंद्रीय घटना पर आधारित है। अतः किसी लघुकथा की श्रेष्ठता में उसके नाम (शीर्षक) की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

लघुकथा की रचना-प्रक्रिया
लघुकथा या कोई भी रचना कैसे लिखी जाती है?-इसका कोई एक, सीधा जवाब नहीं दिया जा सकता। यह हर लेखक का निजी मसला है। लिखने की काई नियमावली नहीं बन सकती। कवि राजेश जोशी का कथन है - “रचना-प्रक्रिया को जाना नहीं जा सकता। मेरी क्या किसी की भी। इससे तो रचने का रहस्य ही खत्म हो जाएगा।” फिर भी प्रक्रिया पर मोटे तौर पर विचारश्विमर्श किया जा सकता है।

यह लेखक पर निर्भर करता है कि वह किस घटना या स्थिति या पात्र या विचार से प्रभावित होता है या नहीं होता। उसके किस पक्ष से रचना का बीज ग्रहण करता है, उसे रचना में कैसे रूपांतरित करता है। किसी एक घटना को घटते देखकर एक लेखक उससे जुड़ सकता है, दूसरे को शायद वह घटना छू भी न सके। कोई लेखक एक स्थिति पर तुरंत लिख सकता है, दूसरा शायद लंबे समय बाद उस पर लिखे या न ही लिखे। कई बार कोई खबर पढ़कर या देखकर भी  लेखक के मन में रचना प्रक्रिया चल निकलती है। आपके मन में कुछ उमड़-घुमड़ रहा है, उसके साथ कई बार बाहर की कोई घटना, स्थिति या कोई पात्र जुड़कर एक लघुकथा में ढल सकते हैं। इस तरह रचना की कोई तयशुदा प्रक्रिया नहीं होती। लघुकथा के लिए तो कोई छोटी सी बात, कोई उपेक्षित रह गई स्थिति भी रचना-प्रक्रिया का आधार बन जाती है। वह बात या स्थिति काल्पनिक भी हो सकती है। आप विद्यार्थी हैं तो स्कूल या कालेज के किसी प्रसंग से, बस या रेल या सड़क पर जाते हुए, दुकान या दफ्तर में किसी पड़ोसी या दोस्त या दुश्मन की किसी बात या घटना से या अखबार या रेडियो या टी.वी. पर आई किसी खबर से, किसी दुर्घटना के पहलू से, सांप्रदायिक हिंसा से, शासन-प्रशासन के किसी अन्याय से, कोई इतिहास या कविता-कहानी की किताब या सूक्ति पढ़ते हुए किसी से भी, यहां तक कि अपने किसी सपने, किसी कल्पना से भी लघुकथा लिखने का आधार मिल सकता है। उसे पूर्णता, संतुलन और समृद्धि प्रदान करने में आपका अनुभव और मानवीय सोच अवश्य ही काम आएगी। हां, लघुकथा के केंद्र में कोई घटना, स्थिति, भाव, विचार या कोई प्रश्न अवश्य होता है, जो रचना का रूप धारण करता है। सूर्यकान्त नागर के अनुसार - “कई बार किसी से सुना छोटा-सा संवाद अथवा उसकी मुखमुद्रा या बातचीत के दौरान उसके चेहरे का बदलता रंग ही कथा-बीज बन जाता है।”

कुछ लेखक लिखने से पहले अपनी पूरी रचना को मन में घटित होते हुए देख लेते हैं, उसका एक-एक वाक्य तक बना लेते हैं। लेकिन कुछ लेखक सिर्फ एक स्थिति को मन में स्पष्ट करके लिखना शुरू करते हैं। वे भाषा में आने वाली दिक्कतों से बाद में जूझते है। दोनों में से आप किसी भी स्थिति का चुनाव कर लें, पर लिखते समय भी रचना में वही ऊर्जा रहनी चाहिए, जो उसे मन में गुनते समय आप में मौजूद थी।

एक उदाहरण लेकर इस पर चर्चा करते हैं। मान लीजिए, आपने एक गरीब बच्चे को मिट्टी में खेलते देखा है। उसके बिखरे बाल, उसकी सहजता और उमंग आपके मन में बैठ गई है। लेकिन यह तो आम बात है। इसे कथा में ढालने के लिए आपको किसी घटना या स्थिति की कल्पना करनी होगी। संभव है कि आपको कोई ऐसी घटना या प्रसंग याद हो, जिससे यह बच्चा जूझता हो और आपके मन में लघुकथा का एक आधार बन जाए। यह भी संभव है कि आप एक खास दृष्टिकोण से उस बच्चे को देखें। जैसे, वह बच्चा निर्धन वर्ग का है। आप मध्य और उच्च वर्ग के बच्चे की कल्पना कर दोनों-तीनों बच्चों को लेकर कोई लघुकथा का आधार बना सकते हो। संभव है कि आपसे कोई भी रचना न बन पाए। यदि आप में संवेदना है तो उस बच्चे की छवि आपके अर्धचेतन मन में पड़ी रहेगी। बाद में वह किसी रचना का रूप ले सकती है। इस प्रकार लिखने में कभी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, वरना वह विषय वस्तु-दोनों धरातलो पर कमज़ोर रह जाएगी। 

आप जो भी लिखें, उसका प्रमुख पात्र यदि किसी वर्ग का हो तो आपकी रचना का वज़न बढ़ जाएगा। प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ का नायक हल्कू एक गरीब किसान है। इसलिए उसकी कथा सारे गरीब किसानों की व्यथा-कथा है। यानी लिखते समय रचना को किसी वर्ग की रचना बना सकें तो उसकी ताकत और असर बहुत बढ़ जाएंगे। किन्तु यह सब अभ्यास से ही आता है।

यदि आपने लघुकथा लिख ली तो यह लघुकथा का पहला ड्राफ़्ट है। इसे आप एक तरफ रख दें। कुछ दिन या महीने दो महीने के बाद इसे देखेंगे तो रचना के प्रति आपको मोह कम हो चुका होगा, आप उसे तटस्थ भाव से देख-परख सकेंगे। यदि इसमें कमी या दोष हैं तो वे आपको कमोबेश नजर आने लगेंगे। तब आप उसमें बदलाव करना चाहेंगे। कोई भी रचना लिखना एक कला है तो उसमें काट-छांट करना भी उतनी ही बड़ी कला है। इसके बिना रचना बेहतर नहीं बन सकती। इसलिए लिखने के लिए बड़ा धैर्य चाहिए।
प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय की एक पुस्तक है - ‘सीढ़ियों पर धूप में’। इसमे लेखक ने ‘कहानी की कहानी’ शीर्षक से एक स्थिति या घटना को रचना में कैसे बदला जाता है-इसके लिए अभिव्यक्ति की तमाम संभावनाओं की तलाश की है। यह तलाश एक लघुकथा की रचना-प्रक्रिया भी प्रस्तुत करती है ओर नए लेखकों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश भी देती है। इसके कुछ अंश आपके लिए उद्धृत हैं। लेखक ने इस रचना के सात प्रारूप बनाए। आइए, इनका अध्ययन किया जाए।

पहला प्रारूप
“किसी व्यक्ति ने तीसरे दर्जे के एक डिब्बे में घुसकर देखा, कोई लेटा है, कोई अधलेटा पड़ा है, किसी ने बेंच पर सामान फैला रखा है। कहीं भी बैठने की जगह नहीं..........”

लेखक को लगा कि यह प्रारूप ठीक नहीं, वह सोचता है - “उस आदमी के साधारण मानवीय व्यवहार में आपको कोई महत्ता न दिखाई दे, तो उसको थोड़ा असाधारण या हीन या उत्कृष्ट दिखला सकता हूँ, जैसे सुनिए -”

दूसरा प्रारूप
“ किसी शहर में एक सीधा-सादा गरीब आदमी रहता था। उसके एक लड़का और सात लड़कियाँ थीं और लड़का नालायक था। लड़कियाँ सातों बिन ब्याही बैठी थीं। एक दिन अचानक उसे तार मिला कि तुम्हारी माँ बहुत बीमार है और मर रही है। वह बदवहास दौड़ा-दौड़ा स्टेशन गया और जल्दी-जल्दी टिकट खरीद कर प्लेटफॉर्म की तरफ भागा। रास्ते में उसकी जेब कट गई, दो आदमियों से टकराया, चार से गालियाँ खायी और गलत प्लेटफॉर्म पर जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर सब डिब्बे देख डाले मगर कहीं तिल रखने की भी जगह न थी।....
फिर लेखक को लगता है कि जिस बात को वह कहना चाहता है, उसके लिए ये वर्णन व्यर्थ हैं। अतः वह सोचता है-“मैं इस कहानी को इस तरह क्यों कहूँ?..... कहानी तो बहुत सादी है और छोटी भी, यानी यही कि- 

तीसरा प्रारूप
तीसरे दर्जे के किसी डिब्बे में जगह न थी। एक यात्री ने एक बेंच पर दो आदमियों-भर की जगह पर अपना बिस्तर-बंद बँधा-बँधाया रख छोड़ा था और उस पर जमकर बैठा हुआ था। आगन्तुक ने उससे पूछा - “भाई, इसमें आप दो आदमियों की जगह नहीं निकाल सकते क्या?”...
लेखक यहाँ से सोचता है कि पाठक को तो यह गाड़ी के तीसरे दर्जे में घटने वाली दैनिक घटना लगेगी। यह कोई कहानी नहीं है। अतः लेखक चौथा ड्राफ्ट बनाने के लिए सोचता है - “इसे ऐसे रक्खूँ कि जगह घेरकर बैठने वाले यात्री से आप सब सुनने वाले डर जाएं और हमारा निरीह आगन्तुक तो उससे एकाएक जगह मांगने की हिम्मत भी न करें.......
चौथा प्रारूप
“हां, तो एक डिब्बे में एक बहुत भयानक आदमी डटा हुआ था, जो सत्रह खून कर चुका था और जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, न इतनी कम कि उसमें कोई सेक्स अपील हो, न इतनी ज़्यादा कि देखकर श्रद्धा हो....... (आगे लेखक उसकी मूंछों, बन्दूक, बूटों आदि का ऐसे ही वर्णन करता है)। आगन्तुक ने चारों ओर देखा, सभी उस जवान के आतंक से चुप बैठे थे। उसने माथे से पसीना पोंछा, सांस रोक ली और लड़खड़ाते पैरों को सम्हाला तथा उसकी लाल नृशंस आँखों से आँखें बचाकर यह कहने की हिम्मत की, “गरीब परवर ज़रा-सी जगह, बस टिकने-भर की, इनायत फरमाइयेगा.......”
इन चारों प्रारूपों पर विचार करें। दूसरे और चौथे प्रारूप में रचना किसी एक तरफ फैल रही है। लेखक को एहसास होता है, तो उस फैलाव को छोड़ देता है। दूसरे प्रारूप में आगंतुक के घर की स्थिति का ब्यौरा व्यर्थ है, तो चौथे प्रारूप में डिब्बे में लेटे आदमी की भयावहता का ब्यौरा भी व्यर्थ है। लेखक पहले और तीसरे प्रारूप में उल्लिखित तीसरे दर्जे के डब्बे वाली बात भी व्यर्थ जानकर छोड़ देता है।  अतः लेखक पाँचवें प्रारूप में फिर अपने मूल उद्देश्य पर केंद्रित होता है।

पाँचवाँ प्रारूप
“भाई, इसमें आप दो आदमियों की जगह नहीं निकाल सकते क्या?”
“नहीं निकाल सकता। मैं आराम करूँगा।”
जब जवाब आया नहीं, मैं जगह नहीं निकाल सकता, मैं आराम करूँगा, तो आगन्तुक ने कहा-‘अच्छा’ और अपने हाथ के थैले को जमीन पर रखकर वहीं खड़ा हो गया। अगर उसके टखने में एक नासूर होता तो उसके खडे़ रहने से शायद आपको आसानी से दर्द होता, मगर नहीं था, इसलिए वह ऐसे ही खड़ा रहा। गाड़ी चलने में दो घंटे की देर थी। उसने एक बार चारों ओर देखा, कोई उसके अपमान पर हँस तो नहीं रहा है। नहीं, कोई नहीं हँस रहा था, क्योंकि कोई किसी तीसरी परिस्थिति में नहीं था। उसने एक बार फिर चारों ओर देखा कि कोई कहीं जगह दे दे, पर सभी या तो सिकुड़कर बैठे थे या लेटकर, जगह कहां से होती। फिर उसने एक लम्बी सांस ली और सोचा कि खड़ा रहूँगा तो क्या, गाड़ी तो चलती रहेगी....... अपनी माँ के अन्त समय उसके पास पहुँच तो जाऊँगा।”

इस प्रारूप में लेखक ने आगन्तुक के दुःख और जरूरत से पाठकों को जोड़ने का प्रयास किया है, जो पहले चार प्रारूपों में गायब था। लेकिन लेखक अभी अपनी रचना से संतुष्ट नहीं है। वह और चिन्तन करता है। वह सोचता है - “निश्चय ही दूसरा यात्री दो आदमियों की जगह घेरकर बैठा हुआ था। एक तो यह अन्याय था, उससे भी पहले असभ्यता थी।”
“कहानी-कला के नियम कहते हैं कि यहाँ पर मुझे सताए हुए मुसाफिर को महान साबित करना चाहिए, उसकी सहिष्णुता, निःस्वार्थता या क्षमा की प्रशंसा करनी चाहिए, पर क्यों करूँ? कहानी तो बहुत सीधी-सी है और छोटी भी और बस इतनी-सी है।”
लेखक छठे प्रारूप में सताए हुए मुसाफिर की प्रशंसा नहीं करता, लेकिन बैठे हुए मुसाफिर के हाव-भाव पर अधिक कलम चलाकर एक नया असंतुलन बना देता है, देखिए -

छठा प्रारूप
“खड़े-खड़े उसे पाँच मिनट बीत गए, दस, पन्द्रह, बीस मिनट बीत गए। आधे घंटे बाद बैठे हुए आदमी में ज़रा सी हरकत हुई, उसने आसन बदला, राल घूंटी। ज़रा देर बाद उसने खड़े हुए आदमी के मुंह की ओर देखा, पर वह दूसरी ओर देख रहा था। इसलिए वह ओंठ काटने लगा। फिर उसने आसन बदला और इस बार जो उसकी आँखें आगंतुक से दो-चार हुईं तो वह डिब्बे के बाहर झांकने लगा। खड़ा हुआ आदमी खड़ा रहा। गरमी बढ़ रही थी। वह पसीने से नहाता गया। पांच मिनट और बीत गए। अचानक बैठे हुए आदमी ने पाँव समेट लिए और गला साफ करके कहा, “अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता, आप यहाँ बैठ जाइए।”

इस छठे प्रारूप में लेखक हम सबको रचना की मूल संवेदना तक ले आया है। लेकिन अभी भी काट-छाँट की ज़रूरत है। सातवें व अंतिम प्रारूप से पहले लेखक की यह टिप्पणी मनन करने योग्य है -

“घटना में दो व्यक्ति हैं। दोनों में एक मानवीय संबंध है यानी एक संबंध है जिसको लेकर दोनों वहाँ एकत्र होते हैं। फिर उस संबंध में एक बाधा आती है, वह विकल होता है, बदलता है, अचानक दूसरा हो जाता है। यह संबंध का बनना ही घटना है, यह घटना कहानी है।”

“क्यों हम बिना किसी अतिरंजित दृष्टि के वह घटना पहचान ही नहीं पाते और उसे पहचानकर चौंकते क्यों हैं? वह तो मानवीय है, स्वाभाविक है और उसमें कौतूहल क्यों पाते हैं, आनन्द क्यों नहीं?”

“कला यह नहीं है कि किसी गुण को प्रदर्षित करने के लिए दुर्गुणों को अतिरंजित कर दिया जाए, न कला यही है कि जब कोई स्वाभाविक घटना घटे तो उसका ऐसे वर्णन कर दिया जाए कि हम चौंक उठें। कला तो यह है कि हम उसमें से मानवों के पारस्परिक संबंध को तुरन्त देख सकें। जहाँ कोई ऐसा नहीं कर पाता, वहाँ उसे तरह-तरह के प्रयोगों का आश्रय लेना पड़ता है। जहाँ कोई ऐसा कर पाता है, अर्थात जीवन की सहज मानवीयता को देख पाता है और उससे कौतूहल नहीं, आनन्द ग्रहण कर पाता है वहाँ सच्ची कला का जन्म होता है। वहाँ अनुभव के स्तर पर ही प्रयोग का आरम्भ हो जाता है।”

सातवाँ व अंतिम प्रारूप
एक यात्री ने दूसरे से कहा, “भाई ज़रा हमको भी बैठने दो।” दूसरे ने कहा, ‘नही’, मैं आराम करूँगा।’ पहला आदमी खड़ा रहा। उसे जगह नहीं मिली पर वह चुपचाप रहा।

दूसरा आदमी बैठा रहा और देखता रहा। बड़ी देर तक वह उसे खड़े हुए देखता रहा। अचानक उसने उठकर जगह कर दी और कहा, “भाई, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आप यहाँ बैठ जाइए।”

मात्र छह पंक्तियों की इस परिपक्व रचना तक पहुँचने से पहले के सोपानों में लेखक के तर्कों का अध्ययन करना ज़रूरी है। लेखक क्या और क्यों छोड़ता गया और क्या और क्यों जोड़ता गया - इसे नए लेखकों को फिर से देखना चाहिए। पहले छह प्रारूपों में लेखक जो कुछ छोड़ता गया, वह सब सच होने के बावजूद रचना की मांग नहीं थी। उन प्रारूपों में रचना अपने उद्देश्य से भटक रही थी। 

लिख चुकने के बाद आप अपनी लघुकथा को आप पाठक से लेकर लेखकों-समीक्षकों तक को सुनाएं। गोष्ठियों में सुनाएं और सबके विचार जानें। फिर अपनी लघुकथा पर दोबारा, गंभीरता से सोचें और जरूरी लगने पर लघुकथा में परिवर्तन करने में संकोच न करें। इस सबसे आपकी रचनात्मक समझ बढे़गी। परिपक्वता आएगी। किसी के मत से सहमत न होने पर भी उनके मत का सम्मान करें।

स्टीरियोटाइप लेखन से बचें। इसका अर्थ है-जो घटित हुआ, उसका हू-ब-हू, अपरिष्कृत, कृत्रिम और संवेदनहीन वर्णन। ऐसा लेखन जितना आसान होता है, उतना ही ऊब से भरा भी होता है। वास्तव में रचना में कुछ अनकहा भी होता है। रचना तभी रचना है, जब उसकी कोई संरचना होगी। इसलिए रचना हू-ब-हू वर्णन नहीं हो सकती। आप रमेश बतरा की एक वाक्य की लघुकथा ‘कहूं कहानी’ देखें-
-ए रफीक भाई। सुनो...... उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं घर पहुंचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही, ‘एक लाजा है, वो बोत गलीब है।’

इसमें बेटी के एक संवाद में बहुत बड़ा संदेश छिपा हैं। कथानायक में उत्पादन और पूंजी का नशा और खुमारी तो है, लेकिन परिवार के प्रति लगाव और जिम्मेवारी नहीं। इसलिए बेटी के छोटे-से संवाद ने पूंजीपति पिता की जीवन-शैली की विडम्बना (आयरनी) को उजागर कर दिया हैं। इसमें कथा है, इसकी एक संरचना है, कलात्मक निर्वाह है, संवेदना तो है ही। इन कारणों से 31 शब्दों की यह लघुकथा पाठक पर बड़ा असर छोड़ती है। इस तरह एक लघुकथा लिखने के लिए पूरी तैयारी और मेहनत की जरूरत होती है।

यदि आप एक लघुकथा लिखने बैठे हैं और वह लघुकथा बढ़ती ही जा रही है, तो उसे अपनी स्वाभाविक यात्रा करने दें। अंत पर पहुंचने के बाद उसकी विधा तय हो जाएगी। लेकिन उसे जबरदस्ती काट-पीटकर, पात्रों की क्रियाओं और संवादों को कम करके लघुकथा के सांचे में फिट करने का असफल प्रयास न करें। वरना उस रचना की हत्या हो जाएगी और वह कहीं की नहीं रहेगी।
लघुकथा की भाषा और शिल्प

एक रचना का जो रूप लेखक ने अपने मन में बनाया है, वह भी भाषा के सहारे ही बनता है। उसे कागज़ पर उतारते समय रचना का ठीक वैसा ही प्रभाव रहे, जैसा कि लेखक चाहता है। यह कार्य सरल नहीं। काव्यशास्त्री क्रोचे तो कहते हैं कि जो रचना मन में बन गई, बाहर उसे वैसा ही व्यक्त नहीं किया जा सकता।’ लेखक की भाषा में इतनी सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह इस लक्ष्य को पा सके। बेहतर भाषा का प्रयोग बड़े अभ्यास और कौशल से आता है। किसी भी बड़े लेखक की आरंभिक और परवर्ती रचनाओं की भाषा का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है।

भाषा लेखक के अभिप्राय को रचना के माध्यम से पाठक तक पहुँचाती है। इसलिए भाषा का पहला गुण है - रचना की ज़रूरत के मुताबिक सटीक शब्दावली का प्रयोग करना। भाषा ऐसी होनी चाहिए कि पाठक को लघुकथा पढ़ने के लिए पास में शब्दकोष न रखना पड़े। भाषा का दूसरा गुण है - पात्रों के संवादों में उन्हीं के अनुकूल शब्द-प्रयोग करना। एक डॉक्टर, इंजीनियर, गृहिणी, किसान, मजदूर, आदिवासी, बैंक अधिकारी, दूकानदार, वकील, जज, सिपाही, अनपढ़ व्यक्ति, प्रशासनिक अधिकारी आदि की भाषा अलग-अलग होगी। लेखक के पास इससे संबंधित अनुभव जितना समृद्ध होगा, उतनी ही उसकी भाषा में समृद्धि आएगी, जिससे रचना की विश्वसनीयता बढ़ेगी।

लघुकथा की भाषा का तीसरा गुण है कम से कमतर शब्दों का प्रयोग। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का मौन भी बोलता है और अर्थपूर्ण होता है, इसी प्रकार लघुकथा में कुछ अनकहा भी महत्वपूर्ण होता है। कम शब्द खर्च करने की कला भी अभ्यास से आती है। विख्यात कथाकार काफ़्का का कथन है - ‘शोर रचना की प्रभावोत्पादकता में सबसे बड़ी बाधा है।’ शोर यानी कम बात के लिए ज्यादा शब्दों का प्रयोग। लघुकथा में तो वैसे भी में विस्तृत ब्यौरे देने के लिए कोई स्थान नहीं है। नागेन्द्र प्रसाद सिंह के अनुसार- “किसी अतिरंजना, विवरणात्मक विस्तार, दोहराव या दुविधा उत्पन्न करने वाले शब्द-समूह के प्रयोग से लघुकथाकार परहेज़ करता है।”

अब बात आती है लघुकथा में शब्द-समूहों और वाक्यों के प्रयोग पर। यहाँ लेखक को एक द्वन्द्व से गुजरना होता है। साधारण भाषा के स्थान पर ऐसी रचनात्मक भाषा का प्रयोग, जो रचना को उसके उद्देश्य तक ले जाए, पर उसकी स्वाभाविकता भी बनी रहे। लघुकथा आम पाठकों की लोकप्रिय विधा है। अतः लघुकथा में छोटे आकार के वाक्यों का प्रयोग रचना के प्रति पाठक के आकर्षण को बढ़ाएगा। वाक्यों का गठन व्याकरण के अनुरूप होना जरूरी है। पात्रों के संवादों को प्रस्तुत करने का ढंग भी प्रभावशाली होना चाहिए। संवादों में वाक्यों का आकार और शब्द-प्रयोग पात्र के वर्ग, उसके व्यवसाय और उसकी मनस्थिति पर निर्भर करते हैं। रचना में अनकहा भी बड़ा महत्वपूर्ण होता है। भाषा को उस बारे भी सावधानी रखनी होती है।

भाषा में सूक्ष्मता भी अभ्यास से आती है। हरिशंकर परसाई ने ‘बात’ लघुकथा में एक व्यक्ति को पांच लोगों से एक ही बात कहलवाने में भिन्न शब्दावली का प्रयोग किया है। वर्मा जी लंबी छुट्टी पर गए हैं, इसलिए वह उनकी जगह के लिए अर्जी दे दें - इस बात को पांच व्यक्ति अलग-अलग स्थान पर इस प्रकार कहते हैं-
तुम उनकी जगह के लिए दरखास्त दे दो।
तुम उस जगह के लिए फौरन अर्जी दे दो।
तुम फौरन उस जगह के लिए कोशिश करो।
वर्मा वाली जगह के लिए कोशिश क्यों नहीं करते?
वर्मा वाली जगह के लिए दरखास्त दी कि नहीं?
कई बार लेखक साधारण-सी बात को भी अपने भाषा-कौशल से रोचक, प्रभावशाली और आकर्षक बना देता है।
अमर गोस्वामी की लघुकथा ‘हाय मालिक’ की कुछ पंक्तियाँ देखिए-
“उसने दूसरों की राह में कांटे बोए और खुद आगे बढ़ा। उसने दूसरों की गर्दन काटकर अपनी गर्दन ऊँची की। उसने सफेदपोशों के साथ कालाबाजारी की और काले धन से काले बादलों को छूने वाले भवन बनाए। हर देश की करेंसी उनसे अठखेलियाँ करती थी।”

भाषा के अनेक कलात्मक आयाम होते हैं। ग्रामीण अंचल पर लिखी लघुकथा में आंचलिक/स्थानीय शब्दावली का प्रयोग रचना को विश्वसनीय बनाता है। भगीरथ की लघुकथा ‘फूली’ में फूली के संवाद राजस्थानी पुट् लिए हुए हैं-
“हें वीरजी ! मैं थारा हाथ जोडूँ, क्यों म्हारे पीछे लागों हो।” इसी प्रकार ज़रूरत के अनुसार बम्बइया, भोजपुरी, हरियाणवी आदि का प्रयोग किया जा सकता है। भाषा में कविता के तत्वों का यथावश्यक प्रयोग रचना की अर्थवत्ता को बढ़ाता है। उपमाओं, दृष्टांतों और प्रतीकों का उचित प्रयोग लघुकथा के लघु आकार को अधिक अर्थगर्भी बनाने का काम करते हैं। दो उदाहरण देखिए-
वह (स्त्री) जैसे खजाने से लदा एक समुद्री जहाज थी, जिसकी चाहत में समुद्री डाकू पागल हो जाते थे। 
(सुशांत सुप्रिय, सबके लिए)
उज्ज्वल बंडल-से पसरते हवा में डॉलरों के सफे़द बंडल।     (जसबीर चावला, अ हमाम द हमाम)

प्रतीक रचना में सूक्ष्म अर्थ को व्यक्त करने का काम करते हैं। कई बार जहाँ अनेक शब्द और वाक्य भी एक अर्थ को नहीं कह पाते, वहां एक प्रतीक का प्रयोग भाषा को चार चांद लगा देता है। अरबी के महान कथाकार-दार्शनिक खलील जिब्रान की अधिकतर लघुकथाएं प्रतीकात्मक हैं। रमेश बतरा की ‘सूअर’ लघुकथा में ‘सूअर’ राजनीतिक संकीर्णता, घृणा और स्वार्थ का प्रतीक है। इसलिए रचना का अंतिम वाक्य -’तो जाकर सूअर को मारो न।’ इन मानव-विरोधी वृत्तियों को मारने का ही प्रतीक है। शिवनारायण की लघुकथा ‘ज़हर के खिलाफ’ में ‘ज़हर’ दरअसल जीवन-विरोधी नकारात्मक और निराशाजनक सोच का प्रतीक है। 

लघुकथा लिखने में कई तरीकों का इस्तेमाल हो सकता है। इन्हें शैलियां कहा जाता है। आप लघुकथा की बुनावट में व्यंग्य का प्रयोग करेंगे, तो वह व्यंग्यात्मक शैली की लघुकथा होगी। हरिशंकर परसाई, विष्णु नागर की लघुकथाएं इसी शैली की हैं। यदि आप लघुकथा को लय के साथ लिखते हैं या उसमें एक या अधिक प्रतीकों का प्रयोग करते हैं तो वह काव्यात्मक शैली होगी। प्रतीक यानी संकेत। एक प्रतीक पूरी लघुकथा को नया अर्थ, नयी ऊँचाई दे सकता है। बस, उसका प्रयोग करना आना चाहिए। इसी तरह नाटकीयता का प्रयोग लघुकथा में स्वाभाविकता और रोचकता लाता है। नाटकीयता दरअसल घटनाओं में नये मोड़ उपस्थित करती है और पाठक की सोच में बदलाव भी लाती है। इनके अलावा भी कई शैलियों का प्रयोग लघुकथा में आप कर सकते हैं। कथा में बीते समय की घटना ले आना ‘फ्लैश बैक’ (पूर्व दीप्ति) कहलाता है। इस पद्धति का प्रयोग अतीत और वर्तमान की या संभावित भविष्य और वर्तमान की दो स्थितियों का आपस में तारतम्य बिठाने के लिए होता है। डायरी के अंशों के जरिए कथा कहना डायरी शैली कही जाएगी। इनमें से एक से अधिक शैलियों का भी एक लघुकथा में, जरूरत के अनुसार, प्रयोग किया जा सकता है। 

आइए, हिंदी की कुछ लघुकथाओं की शैली पर चर्चा करें। विष्णु प्रभाकर की प्रसिद्ध लघुकथा ‘पानी की जाति’ एक संस्मरण पर आधारित है। किन्तु संस्मरण में प्रारंभ होकर वह कब जीवन-मूल्यों की श्रेष्ठ लघुकथा में बदल जाती है, पाठक को पता भी नहीं चलता।

हरिशंकर परसाई की ‘अनुशासन’ लघुकथा दो भिन्न स्थितियों को लेकर सहयोग का सन्देश दे जाती है। एक अध्यापक किसी मुसीबत में पड़ने पर बड़े अफसर से मिलता है। वे नाराज़ होकर कहते हैं - ‘तुम्हें आवेदन करना चाहिए ‘थ्रू प्रॉपर चैनल।’ अध्यापक लौट आता है।

कुछ दिनों में उन साहब के घर आग लग जाती है। अगले दिन साहब अध्यापक से शिकवा करते हैं कि वे खड़े देखते रहे, आग बुझाने नहीं आए। अध्यापक ने नम्रता से कहा - ‘सर, मैं मजबूर था। हैडमास्टर साहब बाहर गए हैं। उनकी लिखित अनुमति के बिना कैसे आता? आपकी आग बुझाने के लिए ‘थ्रू प्रॉपर चैनल’ आना चाहिए न!”
इस रचना की बुनावट में व्यंग्य शैली का प्रयोग इसे नई शक्ति प्रदान करता है।

रमेश बतरा की ‘बीच बाजार’ लघुकथा में मोहल्ले की स्त्रियों की सोच का कथात्मक रूपांतरण मनोविश्लेषण की पद्धति को लेकर चलता है। विद्या की बेटी लक्ष्मी कैबरे डांसर हो गई है। औरतें आपस में मां-बेटी पर तीखी टिप्पणियाँ कर रही हैं। विद्या के सामने आने पर पहले वे तीखी होती हैं, लेकिन फिर विद्या के बदल गए सुखी जीवन के प्रति आकर्षित होकर अपनी सोच बदलने लगती हैं। लक्ष्मी और कैबरे के बारे पूछते-पूछते उनके तर्क उलट जाते हैं। अब उनकी सोच देखिए-

“खुद अच्छे तो भगवान भी अच्छा .......तेरे तो ठाठ हो रहे होंगे आजकल। ज़रा हमें भी तो बता न?..... और हां, तेरी लाडली सरोज कह रही थी, मौसी से कहो न, मुझे भी सिखवा दे न कैबरे......।”

पृथ्वीराज अरोड़ा की विकार लघुकथा भारतीय संस्कृति  में उल्लिखित काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार नामक विकारों को लेकर बुनी गई है। पाँच दोस्त मिलकर घर से कुछ कर गुज़रने के लिए निकलते हैं और एक-एक विकार में पड़कर लक्ष्य से भटकते जाते हैं। पाँचवाँ साथी अकेला रह गया, तो बोला-“सब भाग गए साले। मंजिल तक पहुँचने के लिए हिम्मत चाहिए। हुँह।” वह गर्दन अकड़ाकर चलने लगता है, तभी उसे साँप डँस लेता है। वह भय और आतंक से वहीं ढेर हो जाता है। इस प्रकार ‘विकार’ एक सिद्धांत को लेकर कल्पना के सहारे एक श्रेष्ठ लघुकथा में परिणत होती है। इसे ही यथार्थ का पुननिर्माण कहते हैं।

विष्णु नागर की ‘झूठी औरत’ लघुकथा रोचक शैली में भारतीय स्त्री के त्याग की मानो महागाथा लिख देती है। इस रचना में अलग-अलग समय के तीन दृश्य हैं। आप एक दृश्य देखिए-

“तुमने दस की फिजूलखर्ची की, मैं बीस की करूँगी। मैं अब चौदह रूपए की साड़ी चप्पलें नहीं लाने वाली। चालीस-पचास की लाऊँगी।”

यही औरत सुबह-सुबह कह रही थी, “मुझसे नहीं होती तुम्हारे जैसे फिजूलखर्ची। मैं नई चप्पल कतई नहीं लाने वाली। दो कीलें लगवा लूँगी तो यह चप्पल महीने-दो महीने तो और चल जाएगी।”

इस प्रकार रचना की आवश्यकता, लेखक की कल्पना और सामर्थ्य मिलकर उस रचना की संरचना और कला-सौन्दर्य का निर्धारण कर देते है। हिंदी लघुकथा में शैलीगत प्रयोग अधिक नहीं हुए, जबकि उपन्यास और काव्य क्षेत्र में बहुत हुए हैं। आकार छोटा होने के कारण लघुकथा में प्रयोग अधिक किए जाने की जरूरत है, लेकिन उतनी ही सावधानी भी अपेक्षित है।

हिंदी लघुकथा के इतिहास की झलक
भारत और विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में लघुकथाएं लिखी जाती रही हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। अरबी भाषा में खलील जिब्रान की लघुकथाएं विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। चीनी में लू शून, उर्दू में मंटो, रूसी में इवान तुर्गनेव और जर्मन में बर्तोल्त ब्रेख्त की लघुकथाएं प्रसिद्ध हैं। भारतीय भाषाओं में हिंदी में लघुकथा सबसे अधिक फैलाव लिए हैं।

हिंदी में लघुकथा की शुरूआत 1901 ई. में माधवराव सप्रे की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से मानी जाती है। हिंदी लघुकथा को बड़े-बडे़ लेखकों का साथ मिला। सन 1930 तक माखनलाल चतुर्वेदी, शिवपूजन सहाय, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद आदि की कुछ लघुकथाएं आ चुकी थीं। लेकिन इन्हें ‘लघुकथा’ नाम अभी नहीं मिला था।

सन 1948 से 1962 तक कई प्रमुख लेखकों की लघुकथा-पुस्तकें भी प्रकाषित हुई, जिनमें सुदर्शन, आनंद मोहन अवस्थी, विष्णु प्रभाकर, अयोध्याप्रसाद गोयलीय, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रावी, श्यामनंदन शास्त्री, जगदीश चंद्र मिश्र आदि आते हैं। लेकिन इनकी लघुकथाएं आमतौर पर बोधकथा, नीतिकथा और उपदेश के तत्वों से बनी थीं। 

लघुकथा का जो वर्तमान रूप है, वह 1970 के बाद ही उभरकर आया। इस समय युवा वर्ग में बेचैनी और कुछ सीमा तक विद्रोह की सुगबुगाहट थी। तब उसे लघुकथा के रूप में अपनी बात कहने का अवसर मिल गया। सन 1972 में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेष, मध्यप्रदेश और राजस्थान से कुछ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने लघुकथाएं छापना शुरू कर दिया था। लेकिन लघुकथा को सबसे बड़ा मंच तब की प्रमुख कहानी-पत्रिका ‘सारिका’ ने अक्तूबर 1973 में लघुकथा विशेषांक निकाल कर प्रदान किया। इसके सम्पादक कमलेश्वर थे। जुलाई 1975 में ‘सारिका’ ने फिर ‘लघुकथा बहुल अंक’ निकाला। इन विशेषांकों में व्यंग्य का स्वर था और इनके मुख्य विषय थे -भूख, गरीबी, स्वार्थी नेता, पुलिस और कमरतोड़ महंगाई। इन विशेषांकों से लघुकथा-लेखन में आंधी-सी आ गई।

सन 1973 से आज तक सैकड़ों पत्रिकाओं ने लघुकथा विशेषांक प्रकाशित किए हैं। इसी प्रकार 1974 में भगीरथ द्वारा संपादित ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ से लेकर आज तक सैकड़ों लघुकथा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 1978 में ‘समग्र’ पत्रिका के लघुकथा विशेषांक ने लघुकथा की गंभीर रचनात्मक धारा को खासतौर से मजबूत किया।

सन् 1981 में विक्रम सोनी ने लगभग दस वर्ष तक लघुकथा की केंद्रीय पत्रिका ‘आघात’ (बाद में ‘लघु आघात’) संपादित कर इसे और मजबूती देने का काम किया। 

अब हिंदी लघुकथा इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर भी मौजूद है। वो चाहे हिंदी की पहली और एकमात्र वेब पत्रिका ‘लघुकथा डॉट कॉम’ (मासिक) हो या ‘जनगाथा’, ‘लघुकथा वार्ता,’ ‘मेहमान मिन्नी कहानियां’ आदि ब्लॉग हों या कि फेसबुक पर हिंदी में ‘लघुकथा साहित्य’ हो।

हिंदी के प्रतिनिधि लघुकथा लेखक 

विष्णु प्रभाकर : सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। इनके तीन लघुकथा संग्रह हैं, जिन्हें मिलाकर इनकी ‘संपूर्ण लघुकथाएं’ पुस्तक मिलती है। विष्णु जी की लघुकथाएं मानवीय पक्ष को उभारने का काम करती हैं। ‘फर्क’, ‘ईश्वर का चेहरा’, ‘दोस्ती’, ‘पानी की जाति’, ‘क्षमा’, ‘तर्क का बोझ’, ‘सहानुभूति’ इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

हरिशंकर परसाई : शीर्षस्थ व्यंग्यकार हैं। इनकी लगभग अस्सी लघुकथाएं ‘परसाई रचनावली : भाग 2‘ में मिलती हैं। इनकी लघुकथाएं अपनी व्यंग्य की शक्ति द्वारा हमें वर्तमान भारतीय समाज में क्रांतिकारी बदलाव के लिए संस्कारित करती हैं। ‘संस्कृति’, ‘जाति’, ‘खेती’, ‘सूअर’, ‘यस सर’, ‘बाप बदल’ इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

सतीश दुबे : वरिष्ठ कथाकार हैं। अब तक इनके नौ लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। लघुकथा की समीक्षा पर भी डा. दुबे ने निरंतर कार्य किया है। ‘भीड़ में खोया आदमी’, ‘चौखट’, ‘देश का महत्व’, ‘बर्थ डे गिफ्ट’, ‘संस्कार’, ‘पासा’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएं हैं।

भगीरथ : श्रम शक्तियों के सुख-दुख और संघर्ष को वाणी देने वाले भगीरथ प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं। ‘पेट सबके हैं (1996)’ इनकी लघुकथा पुस्तक है और ‘आग’, ‘युद्ध’, ‘दोजख’, ‘दुपहरिया’, ‘बैसाखियों के पैर’, ‘शंहशाह और चिड़ियां’ इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

रमेश बतरा : प्रमुख कथाकार हैं। इन्होंने लघुकथा को रचना, संपादन और आलोचना हर तरह से समृद्ध किया है। इनकी लघुकथाएं संवेदना, मानवीयता और कलात्मक सौंदर्य की त्रिवेणी हैं। ‘सूअर’, ‘बीच बाजार’, ‘नागरिक’, ‘नौकरी’, इनकी चर्चित लघुकथाएं हैं। 

पृथ्वीराज अरोड़ा : हिंदी लघुकथा में नौकरीपेशा लोगों की जिंदगी पर कलम चलाने वाले प्रमुख लेखक हैं। ‘तीन न तेरह’ (1997) और आओ इंसान बनाएं’ (2007) इनकी लघुकथा पुस्तकें हैं। ‘दया’, ‘दुःख’, ‘कील’, ‘पल’, ‘विकार’, ‘कथा नहीं’ इनकी चर्चित लघुकथाएं हैं।

बलराम अग्रवाल : ग्रामीण समाज के चितेरे कथाकार हैं। इन्होंने लघुकथा को कई तरह से संवारा है। ‘सरसों के फूल (1994)’ और जुबेदा (2004) इनके लघुकथा-संग्रह हैं। ‘गोभोजन कथा’, ‘गरीब का गाल’, ‘प्रतिपक्ष’, ‘जुबेदा’, ‘मन अनंत में’, ‘ओस’, इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

जगदीश कश्यप : लघुकथा के इतिहास पर सबसे पहले काम करने वाले कथाकार हैं। ‘कोहरे से गुजरते हुए’ और ‘कदम-कदम पर हादसे’ इनके लघुकथा-संग्रह हैं। ‘ब्लैक हॉर्स’, ‘सरस्वती पुत्र’, ‘दूसरा सुदामा’, ‘चादर’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएं हैं। 

कमल चोपड़ा : मध्यवर्गीय सोच की लघुकथाएं लिखने वाले कथाकार हैं। इनके अब तक ‘अन्यथा’ (2001), ‘अनर्थ’ (2016) आदि चार लघुकथा संग्रह छप चुके हैं। इनकी प्रमुख लघुकथाएं ‘छोनू’, ‘खेलने के दिन’, ‘मलबे के ऊपर’, ‘है कोई’, ‘कैद बा मशक्कत’ आदि हैं।

असग़र वज़ाहत : हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। ‘मुश्किल काम’ इनका लघुकथा संग्रह है। ‘चार हाथ’, ‘वीरता’, ‘शाह आलम कैम्प की रूहें’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएं हैं।

विक्रम सोनी : इनकी लघुकथाएं व्यवस्था में फैले अन्याय और तंगदिली पर चोट करती हैं। इनकी चुनिंदा लघुकथाएं ‘उदाहरण’ (1989) पुस्तक के रूप में मिलती हैं। ‘जूते की जात’, ‘मुआवजा’, ‘बनैले सूअर’, ‘लावा’ इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं। 

सुकेश साहनी : मानवीय संवेदना के कथाकार हैं। ‘डरे हुए लोग’ (1991), और ‘ठंडी रजाई’ (1998) इनकी लघुकथा-पुस्तकें हैं। ‘गोश्त की गंध’, ‘आइसबर्ग’, ‘ठंडी रजाई’, ‘मास्टर’, ‘कसौटी’, ‘कस्तूरी मृग’ आदि इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

माधव नागदा : सहज-सजग शिल्प के कथाकार हैं। ‘आग’ और ‘अपना-अपना आकाश’ इनके लघुकथा-संग्रह हैं। ‘अपना-अपना आकाश’, ‘परिवार की लाडली’, ‘मेरी बारी’, ‘जली हुई रस्सी’ और ‘कौन-सी जात बताऊँ’ इनकी प्रमुख लघुकथाएँ हैं।

रामकुमार आत्रेय : सहज लेखन के धनी, कवि-कथाकार हैं। अब तक इनके ‘छोटी सी बात’, ‘बिन शीषों का चश्मा’ (2012) आदि चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘आंखों वाले अंधे’, ‘बिन शीषों का चश्मा’, ‘यक्ष प्रश्न’, ‘कानूनी अपराध’, ‘टूटी चूड़ियाँ’ इनकी प्रमुख लघुकथाएं हैं।

चैतन्य त्रिवेदी : कवि-कथाकार हैं। ‘उल्लास’ इनका लघुकथा-संग्रह है और ‘खुलता बंद घर’, ‘जूते और कालीन’, ‘धर्म-पुस्तक’, ‘जंगल और जंगल’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएं हैं।

दीपक मशाल : कवि और संभावनाशील गंभीर रचनाकार हैं। ‘साँचा’, ‘खबर’, ‘निमंत्रण’, ‘सोने की नसेनी’, ‘दूध’, ‘पानी’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएं हैं। 

इनके अतिरिक्त आपको चित्रा मुद्गल, युगल, सिमर , विष्णु नागर, रवीन्द्र वर्मा, मुकेश वर्मा, मधुदीप, जसबीर चावला, सुभाष नीरव, सूर्यकांत नागर, मोहन राजेश, सतीशराज पुष्करणा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ज्ञानदेव मु्केश आदि की लघुकथाएं भी पढ़नी चाहिएं। 

आप चुनी हुई लघुकथाएं पढ़ने के लिए निम्नलिखित पुस्तकें देख सकते हैं-
हिंदी लघुकथा कोष (संपादक : बलराम)
बीसवीं सदी की चर्चित लघुकथाएं (संपादक : जगदीश कश्यप)
निर्वाचित लघुकथाएं (संपादक : अशोक भाटिया)
बीसवीं सदी : प्रतिनिधि लघुकथाएं (संपादक : सुकेश साहनी)
पड़ाव और पड़ताल (25 खंड, संपादक : मधुदीप व अन्य)
शोध-ग्रन्थ : हिन्दी लघुकथा (शकुन्तला किरण)
आलोचना पुस्तक : समकालीन हिन्दी लघुकथा (अशोक भाटिया)

मित्रो! ऊपर हमने लघुकथा के रचना-विधान से जुड़े कुछ जरूरी पक्षों की चर्चा की है। रचना-विधान रचना के अनुशासन के लिए बनाए जाते हैं और रचनाओं में से ही उनकी जरूरत के मुताबिक पैदा होते हैं। यह समय के अनुसार बदलते भी रहते हैं। रचनाशास्त्र रचना के लिए शास्त्र यानी विधान (नियम) बनाता है, लेकिन रचनाकार जरूरत पड़ने पर उन्हें तोड़कर नया शास्त्र गढ़ते हैं। विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘वार एण्ड पीस’ में लियो तोलस्तोय ने, अपने नाटकों में शेक्सपियर ने और ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने परंपरागत रचनशास्त्र को तोड़ा। यह विषय वस्तु के दबाव और आवश्यकता के कारण किया गया। रचनाशीलता अपनी राहें खुद ही तलाश लेती है। 
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