राम निवास बाँयला की कविताएँ

1. फ़रमान

वन-ग्वालों का

वर्चस्व-अहं

हुंकार!

फ़रमान

यहाँ वर्जित हैं - शांति प्रयास।

अन्यथा
गाढ़ दी जाएंगी कील।
सुन वर्जना
बुद्ध मुस्कराए
शांति हेतु
सहज बोले - मंजूर!
समवेत अनुगूंज हुई -
आमीन! आमीन! आमीन! 


2. किसान 

शीत, ताप

बरखा आघात

जोत हड्‍डियां

निचोड़ आँत 

बो कर सपने

खुशी उगाता
नि:शेष उदर
निरीह अन्नदाता
सृष्टि का जीवट
आदर्श, वरदान
निराय, निरापद 
कृश किसान।


3. सूरज का बोझ 

उतार फेंको 

कांधों से सूरज का बोझ 

जटाओं से 

गंगा का भार 

माथे से 

चांद की बेगार 

जब 
अगुआ ही 
हों आल्हादित तुष्ट  
जुगनुओं की छाया में 
कीचड़ में लथपथ 
और 
गफलत में 
जब 
खड़े ऊंघते हों 
हमारे राजपथ।


 4. टेरने आज़ादी 

टेरने आज़ादी 

कीर कंकालों को 

पिंजरों से निकाल 

टांग दिया 

खुली हवा में 

बिजुकों  की जगह 

हाथ में 
थमा दी मशालें 
कि 
बने रहो मशालची 
दिखाते रहो रास्ता 
गिद्धों को / सियारों को
और 
बचा कर फसल
अपने से / अपनों से 
सौंपते रहो 
सयानों को 
आज़ादी के नाम 
लोकशाही के नाम।


5. अनुभव 

देखो जननी!

जीत लाया 

मैं जीत लाया 

एक सलौना 

मीत लाया 

गाण्डीव प्रत्यंचा से 

मत्स्य चक्षु खींच लाया।

बधाई! पुत्र बधाई!
उन्मन कुंती हर्षाई 
शिकार या पुरस्कार 
बने पञ्च-प्रसाद 
निर्भेद, एकसार ।
झट गांडीव छूट गया 
धनुर्धर धैर्य टूट गया।

दुहाई! माते दुहाई!
द्रुपद-सुता चिल्लाई 
क्या ना शील भंग होगा 
पाँच का जब संग होगा 
और! कौन? कहाँ?  कब?
कैसे होगा सब?

धैर्य धरो! धैर्य धरो!
निज मंतव्य 
ना गगन करो 
हे नवोढ़ा! मत चीखो 
कुंती अनुभव  
तुम भी सीखो।
मैं पारंगत 
हर तरकीब सिखा दूंगी 
कब? कहाँ? कैसे? 
सब समझा दूंगी।
और हाँ ...
जग से  ...
जग से क्या डरना 
जो 
नर-भावों का झरना 
जहाँ -
अपुरुष भी 
यदि ठान ले 
तो 
मुकुट-मद में 
कई पत्नियाँ  टांग ले 
जहाँ 
पुरुष-लम्पटता 
महिमा आख्यान हो 
और 
नारी अस्मिता 
पैर की जूती 
जुए का सामान हो।
  
कुर्सी  
चोपायों पर टिकी 
अंधी–बहरी  कुर्सी 
कहाँ सुन पाती है –
चीत्कार!
कहाँ देख पाती है –
आँसू !
उसे तो 
बावजूद टिके रहने 
चलना होता है 
पर-पायों पर। 
और 
पाये ..... 
सिर्फ 
साधते हैं - कुर्सी 
अपने लिए 
अपनों के लिए।