ममता - लघुकथा

संयोगिता शर्मा

संयोगिता शर्मा
नवीन बोस्टन में कंपनी के प्रोजेक्ट को लेकर नीता के साथ शिफ्ट हआ था, बाहर पेडों पर नई कोपलों को फूटते देख नीता को भी अपने अंदर जीवन पलने का अहसास हुआ, बताया तो नवीन तैयार नहीं हुआ, क्योंकि दोनों ने इंडिया लौट परिवार बढाने का सोचा था, पर अब? तो दोनों डाक्टर से परामर्श लेने पहुंच गए।

डॉक्टर से सलाह लेकर चैम्बर से निकल ही रहे थे, कि नवीन को बाॅस मि. प्रभाकर पत्नी सुगंधा के साथ दिखे, डॉक्टर का नाम देख बाॅस को समझते देर न लगी, नवीन और नीता को घर आने का कह चले गये।

दोनों घर पहुँचे तो सुगंधा हाथ जोड रोते हुए बोली, "तुम दोनों ने अजन्मे बच्चे के साथ करने का जो फैसला लिया है, कुछ ऐसा ही फैसला नादानी में बरसों पहले, हमने लिया और उसका खामियाजा आज तक भुगत रहे हैं, भगवान ने आज तक हमें इस खुशी से वंचित रखा है।"

बच्चे की तरह फूट फूट कर आँखों से उनका दर्द बह निकला। सुगंधा की बात सुनकर, दोनों ने भविष्य के डर से बच्चे को दुनिया में लाने का निर्णय लिया।

प्रकृति द्वारा पेडों के पत्तों को लाल रंग से रंगते ही, नीता ने जुडवाॅ बेटों को जन्म दिया, मंदिर में बच्चों के नामकरण के दिन मि. प्रभाकर पत्नी सुगंधा सहित आये, पंडितजी द्वारा बच्चे की माँ को बुलाने पर, नवीन ने अपना एक बेटा सुगंधा की गोद में दिया तभी नीता ने मुस्कराते हुए कहा, "पंडितजी, बच्चों की दो दो माँ है, आज देवकी स्वयं, यशोदा को कन्हैया सौंप रही है।"