'हम हैं राही प्यार के' नब्बे के दशक के युवा समाज को प्रस्तुत करता एक रोचक उपन्यास

पवन कुमार
समीक्षक: पवन कुमार

‘हम हैं राही प्यार के’ (2016) उपन्यास उ0प्र0 संवर्ग के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पार्थ सारथी सेन शर्मा के अंग्रेजी उपन्यास ‘लव साइड बाई साइड’ का हिन्दी रूपान्तरण  है। इस उपन्यास की कहानी उस वक्त की  है जब  भारत ट्रांसफार्मेशन के दौर से गुजर रहा था। नब्बे के दशक के आरम्भिक वर्षों में विशेषतया जबकि उदारीकरण का दौर शुरू होने के दौरान की यह कहानी है। दुनिया के साथ भारत भी भू-मण्डलीकरण के दौर से गुजर रहा था। आम भारतीय बदली परिस्थितियों में तत्कालीन चुनौतियों के समक्ष स्वयं को स्थापित करने के प्रयास में था। भारतीय, युवा भी इस दौर में अपनी सोच के तौर-तरीकों में बदलाव ला रहे थे। उनकी व्यवसायिक गतिविधियॉं भी बदलती दुनिया के साथ सामंजस्य बैठाने का प्रयास कर रहीं थी। कम्प्यूटर और नई तकनीकों के साथ संतुलन स्थापित करने की ललक में तत्कालीन युवा वर्ग में एक छटपटाहट थी। युवाओं के लिये दुनिया के दरवाजे खुल रहे थे। नये अवसर उन्हें अमेरिका-यूरोप में लालच दे रहे थे। लेकिन इन सब के बीच युवा मन भटकाव की स्थिति में था, जीवन के स्थायित्व के लिये तथा मानसिक सुकून पाने के लिए यह आवश्यक था कि कैरियर के साथ उसे कोई विश्वसनीय जीवनसाथी भी मिले। व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं तथा सटीक हमसफर की तलाश के बीच इसी कश्मकश की कहानी का नाम है ‘हम हैं राही प्यार के’।
दो नितान्त अलग-अलग दुनिया के वाशिन्दों का मिलन इस उपन्यास की महत्वपूर्ण घटना है। यह उपन्यास इस लिए रोचक है कि लेखक ने नब्बे के दशक में बदलती दुनिया विशेषकर भारतीय परिस्थितियों में नायक-नायिका की महत्वाकांक्षाओं के दरम्यिन पनपती एक प्रेम कहानी को बड़े सलीके के साथ गूंथा है। एक के बाद एक बदलती परिस्थितियॉ पाठकों को अपनी ओर खींचती हैं। नायक नायिका के बीच प्यार का होना, उसका परवान चढ़ना और फिर प्यार का जादू खत्म होना इस उपन्यास  का मूल कथानक  है। बहरहाल आइए आते है उपन्यास की मूल कहानी पर।


18 वर्षीय पंकज इस कथा का मुख्य पात्र है जो मैकेनिकल इंजीनियर है, मध्यम वर्ग से तआल्लुक रखता है। उसका मुख्य उद्देश्य इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर नौकरी करके पैसा कमाना है। मेधावी होने के कारण ही उसे दिल्ली के किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में दखिला मिला है। पंकज अपनी पॉकेट मनी के लिए स्कूली बच्चों को पढ़ाता भी है, इसी क्रम में वह एक ऐसे बच्चे को भी ट्यूशन देने लगता है जो इस कहानी की एक मुख्य पात्र ’रिया’ का भाई है। रिया एक आकर्षक लड़़की है। वह धनाढ़्य परिवार से है। व्यवहार में कमोबेश आजाद और बिन्दास खयालात की लड़की है। एनआरआई कोटे से उसको कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश मिला है। सुन्दर तो  है ही, कपड़े वगैरह भी आकर्षक पहनती है, अंग्रेजी फिल्मों की शौकीन है और पाश्चात्य सभ्यता की पोषक भी। रिचर्ड गेयर उसका प्रिय हीरो है, जिसका एक भी सीन अगर छूट जाये तो वह उस फिल्म को देखना-न देखना बराबर समझती है। वह इस हद तक सच्ची और बेफिक्र है कि लोगों की प्रतिक्रियाओं से परेशान नहीं होती है, उसे इस बात की की रत्ती भर भी परवाह नहीं है कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं।


बहरहाल पंकज और रिया में नजदीकियां बढ़ती हैं। पॉचवे सेमेस्टर तक  आते आते पंकज और रिया का प्यार परवान चढ़ने लगता है, यह अलग बात है कि पंकज को हमेशा इस बात का भ्रम रहता है कि रिया उसे क्यों पसंद करती है। छठे सेमेस्टर तक आते आते पंकज न केवल अपने माता-पिता बल्कि रिया के माता-पिता को भी अपने और रिया के संबंधों के विषय में अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करता है और जीवन साथ बिताने का दावा करता है। रोचक बात यह है कि दोनों के माता-पिता इस विषय में बहुत ही ठंडी प्रतिक्रिया देते हैं। वक्त आगे बढ़ता है, रिया अपने प्रोफेशनल भविष्य में लेकर गंभीर होती जाती है। वह मानती है कि सिर्फ डिग्री से कुछ नहीं  हो सकेगा, पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री लेना आवश्यक है। पंकज की महत्वाकांक्षाएॅ काफी सीमित हैं वह डिग्री लेकर कोई नौकरी पाकर कमाने में जुट जाना चाहता  है। रिया अमेरिका से पी0जी0 करना चाहती है। वह पंकज को भी उच्च शिक्षा के लिये अमेरिका के किसी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए प्रोत्साहित भी करती है, लेकिन पंकज इसके लिए तैयार नहीं होता है। प्यार पर महत्वाकांक्षायें हावी होती हैं, रिया अमेरिका चली जाती है, पंकज भारत में रह जाता है। हालांकि दोनों के बीच में यह समझदारी बनती है कि फिलहाल पंकज भारत में ही नौकरी करेगा, रिया की वापसी तक इंतजार करेगा और उसके बाद ही आगामी जीवन के विषय में सोचेगा।


रिया अमेरिका चली जाती है, पंकज इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने के बाद टेल्को जमशेदपुर में नौकरी करने लगता है। इस कहानी का यह एक रोचक एवं महत्वपूर्ण मोड़ है। दोनों के बीच पत्र व्यवहार होने के बावजूद सम्बन्धों में शीतलता आने लगती है। पत्र व्यवहार धीरे-धीरे औपचारिक होने लगता है, सम्बन्धों की मधुरता गायब होने लगती है। पंकज जमशेदपुर में नौकरी के दौरान एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा होता है। रिया के बाद उसकी दुनिया काफी कुछ अकेलेपन का शिकार है। इसी बीच उसका झुकाव अपने बॉस मि0 कुलकर्णी की बेटी काजल की तरफ होता है। रिया का अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका चला जाना और भारत वापस आने के विषय में कोई निश्चितता न होना पंकज को काजल की तरफ सोचने की ओर विवश करता है। काजल एक ऐसी लड़की है जो कि शादी के कुछ ही महीनों बाद विधवा हो चुकी है, उसके पति का एक रेल दुर्घटना में देहान्त हो चुका है। काजल विचारों के मामले में काफी स्थायित्व लिये हुए एक दृढ़ लड़की है। दुखद जीवन जीने के बावजूद वह न तो संताप का शिकार है और न ही सहानुभूति पाने के लिये कोई प्रयास करती है। अपने अकेलेपन को भी उसने रचनात्मक गतिविधियों में लगा दिया है।


एक गैर सरकारी संगठन ‘ग्राम स्वराज समिति’ के माध्यम से वह स्थानीय आदिवासी समुदाय के जीवन स्तर को सुधारने के लिये चलाये जा रहे कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में लगी है। पंकज का झुकाव काजल के प्रति धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, हालांकि यह झुकाव विशुद्ध ‘प्रेमात्मक’ नहीं है। अकेलेपन के शिकार पंकज के लिए काजल एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसके सामने वह अपनी बात कहने में हिचकिचाता नहीं है। उसे अपने एकाकीपन को दूर रखने में एक ही व्यक्ति समझ में आता है, वह है काजल। काजल के साथ पंकज का वार्तालाप विविध विषयों पर होता रहता है, जाहिर है यह वार्तालाप बौद्धिक ज्यादा, भावनात्मक कम। लेखक ने काजल के चरित्र को प्रस्तुत करने में काफी मेहनत की है। बतौर बानगी- जब वह कहती है ‘‘मुझे लगता है कि एक व्यक्ति को शादी तब करनी चाहिए, जब वह दूसरे के साथ अपना जीवन बिताने के बारे में पूरी शिद्दत के साथ सोचता हो। सिर्फ शादी  करने के लिए या शादी शुदा कहलाने  के लिए किसी से शादी करना मेरे विचार से उचित नहीं है। हमें वर्तमान में रहकर अपना जीवन पूरी तरह जीना चाहिए और अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए भविष्य अपना ख्याल खुद रख लेगा। और फिर भविष्य के बारे  में सोचने, बात करने या चिंता करने से भी कोई विशेष फायदा तो होता नहीं’’, तो यह स्पष्ट होता है कि जीवन के तमाम जटिल एवं गुथे हुए प्रश्नों पर भी वह कितनी संयत व सुलझी हुई है। 

पंकज का झुकाव काजल की तरफ होने लगता है। रिया के साथ दरकते संबधों और निभाई जा रही औचारिकताओं के बीच पंकज बिना किसी प्रतिबद्धता के काजल को पसंद करने लगता है। वह यह भी महसूस करता है कि वह काजल से बातें करना चाहता है। वह एक स्वीकार करता है कि रिया ऐसी अकेली लड़की है जिसके साथ वह मन की बातें खुल के कर सकता है।

रिया-पंकज के संबधों में शीतलता का एक पड़ाव वह भी आता है जब पंकज यह सोचने लगता है कि क्या अब भी वह रिया से प्यार करता है कि नहीं। एक अनिश्चितता और संदेह उनके रिश्तों पर छाने लगते हैं। यद्यपि जब भी ऐसा कोई संदेह पंकज के मन के किसी अनपेक्षित कोने से अपना सिर उठाता, पंकज उस पर तर्क, सामान्य ज्ञान और निश्चय का भारी ढक्कन डालकर बंद कर देता है।

कुछ दुनिया से दूर रहने की कवायद और कुछ काजल के साथ रहने की कोशिश में पंकज को जी.एस.एस. का काम पसंद आने लगता है। जाहिर है कि पंकज और काजल जी.एस.एस. की वजह से लालडीह आदिवासी ग्राम के भ्रमण पर जाने लगते हैं। इन यात्राओं के दौरान बस के लंबे, धूल भरे, भीड़-भाड़ वाले सफर में वे एक दूसरे के साथ समय बिताते हैं। वे इन यात्राओं के दौरान लगभग हर विषय पर बात करते जिनमें भावनात्मक विचारों, घटनाओं, झारखंड आंदोलन, आदिवासी संस्कृति से लेकर फिलस्तीन मुददे तक शामिल रहते। इतना होने के बावजूद दो विषय ऐसे थे जिनके बारे में बात करने से वे एक अनकहे आपसी समझौते के तहत बचते हैं, काजल की पिछली शादीशुदा जिंदगी और पंकज-रिया के साथ भविष्य। इसी बीच एक पत्र के माध्यम से रिया अस्पष्ट रूप से बताती है कि वह अमेरिका में ही आगे की पढ़ाई करना चाहती है, पी0एच0डी0 थीसिस पूरी करने के क्रम में। पत्र में यह भी बड़ा अस्पष्ट था कि वह भविष्य में भारत लौटेगी भी या नहीं। इधर काजल के पुनर्विवाह की एक सम्भावना बनती है। पंकज इस संभावना से इतना चौंक जाता है कि वह कुछ न बोल पाता है और न अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाता है। बाद में वह स्वीकार करता है की काजल का दूसरी शादी करना वांछित भी है और पूर्णतः स्वाभाविक भी, कुछ भी तो आपत्तिजनक नहीं है। पंकज इसे उपयुक्त भी मानता है लेकिन इस उपयुक्तता पर उसे जलन भी होती है।

उधर रिया अमेरिका से छुट्टी बिताने के लिये दिल्ली आती है। दिल्ली में रिया से मिलने के लिए पंकज भी पंहुचता है। इस मुलाकात के लिए पंकज, रिया से मिलने के लिए काफी उत्सुक है। हालांकि इस उत्सुकता का कारण बिल्कुल अलग है, वो रिया से बातें करने को उत्सुक नहीं है, वो दरअसल दोनों के बीच छाई धुंध को साफ करने में ज्यादा उत्सुक है। यह मुलाकात पंकज के लिए काफी आजीबोगरीब साबित हुई। मुलाकात के निश्चित दिन रिया बजाय पंकज से मिलने के सीधे सूरजकुण्ड चली गयी जहां कोई वार्षिक शिल्पोत्सव चल रहा था। पंकज को यह भी पता चलता है कि रिया अपने एकेडमिक सुपरवाइजर के साथ भारत आई है। 

रिया से जब अगले दिन पंकज मिलता है तो रिया स्पष्ट करती है ‘‘तुम तो जानते हो कि मैंने तुम्हें अमेरिका आने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं और सिर्फ तुम ही जानते हो कि तुमने किन कारणों से मना कर दिया। मुझे गलत मत समझना, प्लीज। इस सच के बावजूद कि हम एक-दूसरे से प्यार करते थे और एक तरह से अभी भी करते हैं। मैं तुम्हें या खुद को इस निराधार विश्वास के साथ धोखा नहीं दे सकती कि मैं भविष्य की किसी अनिश्चित तारीख को भारत लौट आऊंॅगी। मुझे लगता है कि मेरा काम और मेरा जीवन वहॉ स्थापित हो चुके हैं और कम-से-कम इस समय मैं उसे भारत द्वारा प्रस्तावित किसी भी चीज से बदलने के लिए तैयार नहीं हूॅ। इसलिए हमें अपरिहार्य को स्वीकार कर लेना चाहिए और उस चीज को पकड़कर नहीं बैठना चाहिए, जिसका कोई भविष्य नहीं है।‘‘ रिया के मुँह से निकले ये शब्द स्थिति स्पष्ट करते हैं कि पंकज और रिया का रिश्ता समाप्त हो चुका है। यह संयोग ही था कि रिया ने उस मुश्किल विषय की शुरूआत कर दी थी, जिसके बारे में पंकज बात करने की सोच रहा था। मगर फिर भी पंकज यह सोचता है कि रिया से उसकी वह अंतिम मुलाकात थी। पंकज का आशावाद यह मानता है कि जब तक वे दोनों जीवित हैं, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है, किसी दिन, किसी एयरपोर्ट टर्मिनल पर वह उससे टकरा जाये। पंकज और रिया की प्रेम कहानी का अंत पाठकों को पहले से ही अंदाजा हो जाता है। यही अंत पंकज और काजल की आगामी जिन्दगी की महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होता है। इस उपन्यास का सर्वाधिक खूबसूरत अध्याय इसका अंतिम अध्याय है जिसमें पंकज और काजल के बीच का प्यार को कलात्मक और सांकेतिक रूप में व्यक्त करते हुए एक सुखद भविष्य के साथ बांध दिया गया है।

इस प्रकार इस कहानी का अंत एक प्रेम के खत्म होने के साथ एक नये प्रेम की शुरूआत के साथ होता है। लेखक ने उपन्यास में प्रेम के बीच उपजती अन्य परिस्थितियों का वर्णन बहुत ही सहज भाव से किया है। लेखक ने मूल कहानी के साथ-साथ छोटी आनुषांगिक घटनाओं का वर्णन व विश्लेषण बड़़ी बारीकी से किया है। इस उपन्यास में बदलते भारत की तस्वीर का वर्णन यत्र-तत्र बहुत ही सलीके से किया गया है। लेखक ने बड़ी  कुशलता के साथ यात्रा प्रसंगों का वर्णन अत्यंत जीवन्त तरीके से किया है। यदा-कदा यह  भी अनुभव  होता है कि यह यात्रा संस्मरणों के साथ प्रेम कहानी की प्रस्तुति है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि लेखक की यात्राओं में रूचि रहती है और उसी रूचि का प्रस्तुतिकरण उन्होंने बड़ी सहजता के साथ इस उपन्यास में किया है।

लेखक ने मध्यम वर्ग से आये तत्कालीन युवा वर्ग की जानकारी को बड़े सलीके से प्रस्तुत किया है। कहानी के नायक पंकज के माध्यम से वह बताता है कि तत्कालीन युवाओं की महत्वाकांक्षाएं व बाहरी दुनिया के प्रति जानकारी कितनी सीमित थी। पंकज एस्प्रेसो कॉफी के विषय में तब जानता है जब रिया एक रेस्तरॉ में कैपेचीनो का ऑर्डर देती है। इसी प्रकार के उदाहरणों में बकलावा, मंहगी कालीन, निरूलाज इत्यादि भी रखे जा सकते हैं।

लेखक ने जगह-बे जगह छोटी छोटी घटनाओं जैसे ट्रेकिंग यात्रा, 6 दिसम्बर 1992 की घटना इत्यादि को भी कहानी को गति प्रदान करने के लिए जोड़ा है। ये घटनाएॅं पाठकों को कहानी से जोड़ती हुईं तत्कालीन भारतीय मनोदशा का संकेत करती हैं। मुख्य पात्रां के अलावा कुछ और पात्र भी हैं जो अल्पावधि के लिए उपन्यास में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं मगर लेखक ने उन पात्रों को भी अच्छा फुटेज दिया है। ऐसे पात्रों में निर्मला दी वन्दना, रहमान मियॉं, गौतम, कलकत्ता निवासी अपनी दादी, राजेश, मल्होत्रा दम्पति, मॉं-पिता आदि शामिल हैं। अवसर मिलने पर लेखक ने बड़ी कुशलता से स्त्री पात्रों का सौन्दर्य वर्णन भी बहुत सलीके से किया है। रिया का पोल्का डॉट परिधान, सर्दियों में मोतियॉं सफेद ऊनी स्वेटर और नीला डेनिम का स्कर्ट पहनने की बात हो या उनके बालों का रग काला और गीले होने का वर्णन हो लेखक ने नायिकाओं के सौन्दर्य को बताने में अच्छे संकेतों का प्रयोग किया है।

नायक-नायिकाओं के प्रेम के अलावा दोस्ती, पिता-पुत्री, एनजीओ के कार्यकर्ताओं के अन्तर्सम्बन्धों पर भी लेखक ने फोकस किया है। उपन्यास में पिता-पुत्री के रिश्तों का दुर्लभ उदाहरण काजल और मि. कुलकर्णी के बीच देखने में मिलता है। यह बंधन उनके जीवन में काजल की माँ की अनुपस्थिति के कारण बनी है। इसके पीछे एक वजह काजल की अल्पकालिक शादी की हाल त्रासदी भी है। इसी प्रकार लेखक ने पंकज और उसके दोस्तों के साथ आपसी संबंधों को बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढ़ंग से प्रस्तुत किया है। लेखक की रचनात्मक कुशलता यह है कि उन्होंने घटनाओं के दौरान अवसर मिलते ही इतिहास और भौगोलिक जानकारियों को खूबसूरती से साझा किया है। लेखक ने दिल्ली, कांगड़ा यात्रा, मूरी एक्सप्रेस, कलकत्ता यात्रा, डालमा, जमशेदपुर, आदिवासी इलाकों का यात्रा वर्णन बहुत ही मनोहारी तरीके से किया है।

आई.ए.एस. अधिकारी पार्थ सारथी सेन शर्मा का यह उपन्यास नब्बे की दशक में बदलते हुए भारत की तस्वीर को प्रभावी तौर से प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सामान्यतया प्रशासनिक अधिकारियों को साहित्यिक रूप से शुष्क ही माना जाता है। मानवीय संवेदनाओं के प्रति भी उनके व्यवहार को कभी पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता है। इन मिथकों को तोड़ने में यह उपन्यास निश्चित ही महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध होगा। लेखक को एक प्रेम कहानी को तत्कालीन समाज से जोड़ते हुए प्रस्तुत करने के लिए निश्चित रूप से कोटिशः बधाई।

पवन कुमार
(लेखक उ0प्र0 संवर्ग के अन्तर्गत आई.ए.एस. अधिकारी हैं)