संभावना जगाते हैं विवेक मिश्र- रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार की रिपोर्ट

विवेक मिश्र को ‘हंस’ में प्रकाशित उनकी कहानी ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ के लिए अठारहवें रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार से सम्मानित करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी, विष्णुचंद शर्मा, संजीव और मैत्रेयी पुष्पा ने उन्हें एक संभावनाशील रचनाकार बताया। 6 दिसंबर को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में रमाकांतस्मृति कहानी पुरस्कार समारोह के अवसर पर राजधानी और बाहर से आए अनेक रचनाकारों के बीच पुरस्कृत रचनाकार को पुरस्कृत करने के साथ ही रमाकांत और विवेक मिश्र के रचनाकर्म पर चर्चा की गई। 

विवेक मिश्र 
रमाकांत ने कथानक रूढ़ियां नहीं बनाईं। वह जानते थे कि जैसे ही पाठक को यह पता चल जाता है कि आप जीवन नहीं, कहानी लिख रहे हैं, वह आपसे कट जाएगा। आलोचना को एक सहयोगी प्रयास कहा जाता है, लेकिन असल में सहयोगी प्रयास तो रचना होती है। रमाकांत को जो मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। अपने लिए कभी उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। यह विचार में वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने व्यक्त किए। रमाकांत को सादतपुर का मार्केज बताते हुए वरिष्ठ कवि-कथाकार विष्णुचंद शर्मा ने कहा कि वह एक विस्थापित थे। रमाकांत ने सादतपुर की कहानी ही नहीं लिखी, वह गली इमला की कहानी को याद करने लगे। वह अपनी स्मृति के खजाने से हमेशा कुछ न कुछ खोज लाते थे।अपने पाठक से वह रचना में संवाद करते थे। उन्होंने स्मारिका ‘कथा पर्व‘ का लोकार्पण भी किया। 

वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ के संदर्भ में कहा कि कहानी को कई बार पढ़ना चाहिए। मेरे लिए इस कहानी में बहुत कुछ अपना सा था। देखने वाली बात ये है कि उसमें स्त्रियों का मौन कितना मुखर है।‘हंस’ के संपादक संजय सहाय का कहना था कि विवेक की भाषा और स्वत: संपादन का तरीका बहुत अच्छा है। उनकी स्मृतियों और विस्मृतियों के बीच झुलाने की तकनीक मुझे अच्छी लगी। मूलत: यह कहानी मां की है। पुरस्कार के लिए इस कहानी का चयन करने वाले रंगकर्मी दिनेश खन्ना का कहना था कि यह कहानी वातावरण में ले जाकर छोड़ देती है। पाठक को लौटने का रास्ता खोजना पड़ता है। कलात्मकता लिए यह कहानी जीवन के अध्याय खोलती है। इस कहानी में एक ऐसा रहस्य है जिसके उत्तर नहीं मिलते। यहां गिलहरियां तक घबराई हुई थीं। इसकी सूक्ष्मता प्रभावित करती है। सुशील सद्धार्थ का कहना था कि लघुता में प्रभुता खोज लेने वाला लेखक बड़ा होता है। उन्होंने विवेक को एक व्यक्ति, पिता, पति, मित्र और नागरिक के रूप में सरल और सहयोगी बताया। ‘और गिलहरियां ...’ को मैंने बच्चों की दृष्ठि से पढ़ने की कोशिश की है। 

वरिष्ठ कथाकार संजीव ने विवेक मिश्र को रमाकांत जी की स्मृति में दिए जाने वाले पुरस्कार से सम्मानित होने पर बधाई दी और कहा- जादुई यथार्थवाद के मुहावरे को पकड़ने के लिए विवेक को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। यह कहानी सौंदर्य के नए प्रतिमान गढ़ती है। गिलहरियां यहां जादू के वश में उठखड़ी हुईं और उसके खत्म होते ही बैठ गईं। विवेक अपने समय की नब्ज को कहानी में जहां तहां टटोल रहे हैं। 

पुरस्कृत विवेक मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस कहानी को पढ़ा जाना मेरे दर्द को पहचान लिया जाना भी है। यह शायद वह कहानी है जो मैं कभी लिखना नहीं चाहता था और जानता था कि इसे लिखे बगैर मैं रह नहीं पाउंगा। मेरा बनना बिगड़ना ही इस कहानी का बनना बिगड़ना भी है। सबने मेरी रचनात्मकता पर जो भरोसा जताया है, मैं उसे आगे बनाए रखने की कोशिश करूंगा। इस समारोह में राजधानी और बाहर से आए अनेक रचनाकार और कथाप्रेमी मौजूद थे। पुरस्कृत लेखक को रमाकांत की चर्चित कहानियां की प्रति भेंट करते हुए संयोजक महेश दर्पण ने बताया कि आगामी वर्ष निर्णायक होंगे वरिष्ठ रंगकर्मी देवेंद्रराज अंकुर। निर्णायक मंडल के नए दो और सदस्य होंगे कहानीकार महेश कटारे और फिल्मकार अनवर जमाल।