चमगादड़

- सुनीलकान्त  


सुनीलकान्त 
भूमिहीन बुधुआ को पट्टे पे मिला वो दो बीघे का टुकड़ा, जिसकी जोत-बही चमकते कैमरों के बीच खुद कलेक्टर सा'ब ने उसके हाथों मे दी थी .... वह टुकड़ा कागजों पर तो था मगर कभी कागजों से नीचे नहीं उतरा, जिससे कि बुधुआ उसकी माटी सूंघ सके।  
सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, अमीन-पटवारी की जेबें गर्म कीं तब पता लगा कि उसकी ज़मीन तो दाऊसाब के खेत मे घुली-मिली है। अब दाऊ से हाथ जोड़कर तो ज़मीन मिलनें से रही और दाऊ से कोई आँख चढ़ा कर बात कर सके इतनी गाँव मे किसी की औकात न थी। 
ऐसे में उसके पास बस एक ही सहारा था, कानून। सो आज से सोलह बरस पहले उसने पहली बार 'कानून की चौखट' पे पाँव धर ही दिए। वकील साहब की कृपा से उसने अपने बरतन-भाण्डे बेच-बाचकर दस साल लड़ाई लड़ी तब जाकर निचली अदालत से जीत हासिल की। 
अगले छह बरस उसने घरवाली के नाक-कान और गले को सूना करने में बिताए तब जाकर जिला अदालत ने उसे ही सही ठहराया और तभी उसे पता चला कि इससे भी बड़ी एक अदालत और है जिसे हाईकोर्ट कहते है। अपनी आखिरी शक्ति का संचय कर वह जैसे-तैसे इलाहाबाद भी आ पहुँचा। 
वकील से मिला, अपनी बात सुनाई, वकील ने भी उसके मन में जीत की उम्मीद जगाई। सब तय हो गया तो बुधुआ ने वकील साहब से उनकी फीस पूछी 
- कितने पइसा लग जेहें साहब?
- पैसा!! रुपया कहो रुपया। जीत तुम्हारी तय है, पर कम से कम पाँच लाख का इंतज़ाम कर के रखना, जाने कितनी सुनवाई के बाद फैसला आए।  
बुधुआ को लगा जैसे काले लबादा ओढ़े हज़ारों चमगादड़ों ने उसे ढँक लिया हो।
                                                                                                                       अनुक्रमणिका, दिसम्बर 2016