श्रद्धांजलि - डॉ. सतीश दुबे

‘‘जब किसी कथ्य को आधार बनाकर मैं लिखना प्रारंभ करता हूँ, तब कथ्य मेरी नहीं पात्र की इच्छा से जुड़ जाता है।...और पात्र अपने तानाशाही प्रभाव के तहत मुझे अर्जीनवीस के अलावा कुछ नहीं समझते।’’
- (स्वर्गीय) डॉ. सतीश दुबे
डॉ. सतीश दुबे (12 नवम्बर 1940 :: 25 दिसम्बर 2016)
पिता की मौत हुए चार दिन हो चुके थे। वह घुटनों पर चेहरा नीचे किए बैठा था। तभी छोटा भाई कान में बुदबुदाया, ‘‘पिताजी के दफ्तर से एकाउण्टेण्ट आए हैं।’’

उसने सिर उठाकर, सामने बिछे जूट के बोरे पर गमगीन मुद्रा बनाए आलथी–पालथी मारकर बैठे व्यक्ति की ओर देखा। पाँचेक मिनट बाद वह बोरे सहित उसकी ओर खिसका, ‘‘मौत के तीसरे दिन बाद मिलनेवाला एक्सग्रेशिया पेमेन्ट ले आया हूँ... सरकार की जीसी पर यही बड़ी मेहरबानी है। लो, एआर पर दस्तखत कर दो।’’

उसने दस्तखत कर दिए, उन्होंने नोटों की गड्डियाँ उसकी ओर खिसका दीं,‘‘गिन लो! तुम्हें क्या बताएँ, पटेल बाबू बड़े अच्छे आदमी थे। सज्जन इतने कि बेजा लफ्ज कभी जबान पर नहीं लाए। किफायत-पसंद बहुत थे; कहते थे– एक पैसा भी इधर-उधर खर्च करना संतान का पेट काटना है।’’

उसकी निगाहें उनकी ओर उठ गईं।

‘‘हाँ-हाँ, ऐसा ही सुझाव था उनका।’’

‘‘शायद तुम्हें नहीं मालूम, वे पीने के शौकीन थे, पर पीना नहीं चाहते थे इसलिए कि ...’’

‘‘यह आप गलत बोल रहे हैं, उन्होंने ताज़िन्दगी ...’’

‘‘तुम बच्चे हो, क्या जानो! वे तो इसलिए नहीं पीते थे कि पैसा खर्च होगा। अच्छा, मैं चलता हूँ ...’’

‘‘जी, अच्छा!’’

‘‘सुनो! ऐसा करो, इसमें से सौ दो सौ रुपए दे दो ... हम एक–दो लोग कहीं बैठ लेंगे ... इससे उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।’’

‘‘आप लोगों के शराब पीने से उनकी आत्मा को शांति मिलेगी?’’

‘‘हाँ, तनख्वाह के अलावा जो भी पेमेन्ट मिलता था, उसमें से वे हमें जरूर कुछ न कुछ देते थे, और कहते थे– इसकी दारू पी लेना। अपने पैसे से हमें पीते देख वे बहुत खुश होते थे।’’

उसने उनकी ओर घृणा की दृष्टि से देखते हुए नोट उनके सामने रख दिए, ‘‘ले लीजिए।’’

उन्होंने सौ के दो नोट उठा लिए तथा ‘अच्छा, मैं चलता हूँ’ की मुद्रा में उठ खड़े हुए।