कुछ कह रहा संपादक भी

प्रिय साथियों,

दीपक मशाल 
साल 2017 का सेतु का पहला अंक आपके सामने लाते हुए मन खुशी और उत्साह से भरा हुआ है। हमें निरंतर आपका जो स्नेह रूपी प्रतिक्रियाएं और रचनाएं मिल रही हैं वह हिंदी के विकास हेतु कोशिश करते रहने के लिए हमारा मनोबल बढ़ाती हैं। प्रयास रहेगा कि जिन उद्देश्यों को लेकर सेतु ने एक नई शुरुआत की थी उनकी प्राप्ति के लिए हमारी ऊर्जा बनी रहे, बढ़ती रहे। 
आज के समय में यदि आपसे कोई कहे कि 'वह, उसका परिवार या उसका समूचा समुदाय ही कार, मोटरसाइकिल इत्यादि मोटर वाहन रखना या चलाना पसंद नहीं करते। न तो वह कम्प्यूटर या अन्य कोई बिजली से चलने वाले उपकरण इस्तेमाल में लाता है और ना ही घरों में बल्ब या ट्यूबलाइट वगैरह से रौशनी करता है बल्कि उसने अपने घर में बिजली ही नहीं जोड़ रखी, आज के समय में भी रात का अँधेरा लैम्प की रौशनी से ही दूर होता है।'
तो आप यह पढ़-सुनकर हैरान हो सकते हैं या शायद यह भी सोचने लगें कि किसी गरीब देश के पिछड़े  इलाके में ऐसा संभव हो सकता है लेकिन सच यह है कि ऐसा करने वाले कई लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक हैं और यह सिर्फ़ कुछ सैकड़ा लोग नहीं बल्कि इनका हज़ारों का अपना पूरा एक समुदाय है जो आमीश के नाम से जाना जाता है।   
आमीश, जैकब अम्मान द्वारा स्थापित पारम्परिक ईसाई चर्च का अनुसरण करने वाले लोगों का समुदाय है जो अम्मान के समर्थक होने के कारण आमीश कहलाता है। स्विट्ज़रलैण्ड में अपनी जड़ें रखने वाला ये समुदाय अट्ठारहवीं सदी के आरम्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना से पूर्व ही यहाँ आ बसा और अब प्रमुख रूप से पेन्सिल्वेनिया, ओहायो एवं इण्डियाना और कैनेडा के ओंटारियो राज्यों का रहबासी है। 
आमीश समुदाय इस बात से लगातार डरता है कि उनकी अगली पीढ़ियों को ज़माने की हवा न लग जाए, वह भी बाकी दुनिया की देखा-देखी भ्रष्ट न हो जाए, झूठ न बोलने लगे, छल न करने लगे, चोरी-डकैती एवं अन्य अपराधों में लिप्त न हो जाए। इनका यह डर भी इन्हें बाहरी लोगों से काटे रखने की एक वज़ह है। क्योंकि 'भ्रष्ट' हो जाने पर समुदाय से बाहर कर दिए जाने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। आमीश झगड़े-फसादों से तो खुद को दूर रखते ही हैं, सैनिक सेवाओं में भी अपने बच्चों को नहीं भेजते। बाहरियों से मेलजोल भी महज़ आवश्यकता भर ही रखते हैं। संयुक्त राज्य में पिछले पन्द्रह वर्षों में इनकी जनसंख्या डेढ़ लाख से बढ़कर तीन लाख के क़रीब हो गई है। 
शिक्षा की बात करें तो ये अपने विशेष एक कमरे वाले विद्यालय चलाते हैं जिसमें समुदाय की किशोरियाँ अध्यापकीय दायित्व सम्हालती हैं। शिक्षा सिर्फ तेरह-चौदह वर्ष की उम्र और आठवीं कक्षा तक दी जाती है, जिसके पश्चात ये सभी शारीरिक श्रम को महत्व देते हुए सादगी भरे ग्रामीण जीवनशैली को अपना लेते हैं। आमीश न तो सामाजिक सुरक्षा कानूनों के लाभ लेते हैं और ना ही जीवन रक्षा बीमा में इनका विश्वास है। आम जनता को मिलने वाली सुविधाओं का भी प्रयोग नहीं करते इसीलिए कई सरकारी करों से भी मुक्त रखा जाता है, जब सरकारी सुविधाऐं प्रयोग नहीं करना तो कर लेना भी कहाँ उचित होगा। 
हालांकि इनका नकारात्मक पहलू यह है कि सीमित संख्या वाले इस समुदाय में रक्तसम्बन्धियों के बीच विवाह होने से उनमें कुछ आनुवंशिक बीमारियाँ बहुतायत में होती हैं। कई दुर्लभ और अनूठी बीमारियों के होने पर भी ये विवाह से पूर्व या संतान होने से पूर्व बचाव और रोकथाम से जुड़े परीक्षणों में दिलचस्पी नहीं लेते और बाद में कमियाँ होने पर भी ईश्वर की इच्छा मानकर स्वयं में संतुष्ट हो लेते हैं। लेकिन अल्ज़ाइमर या पार्किंसन जैसी बीमारियों के आनुवंशिक अध्ययनों में ये स्वेच्छा से शामिल होते हैं। 
वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ जीवनशैली और खान-पान के कारण इनमे कैंसर जैसी बीमारियों की दर राष्ट्रीय और प्रान्तीय दरों से काफी कम होती है। 
दृढ़तापूर्वक अपने नियम-कायदों का अनुसरण करने का ही नतीजा है कि कई बार इन्हें अन्य अमेरिकियों द्वारा नफरत और भेदभाव का शिकार बनना पड़ता है, इनकी घोड़ागाड़ियों पर पत्थर फेंके जाते हैं और फ़िक़रे कैसे जाते हैं। ऐसे में भी इनका शान्त बने रहना और प्रतिक्रिया न देना इनके अहिंसक गुण को दर्शाता है। पर ऐसा भी नहीं कि सभी इनसे दुर्व्यवहार ही करते हों, अधिकतर जगहों पर इनकी ईमानदारी पर भरोसा किया जाता है और इसीलिए बाज़ार में उपलब्ध इनके द्वारा उगाई गई सब्जियों-फलों पर या मुर्गे इत्यादि को एक विशेष दर्ज़ा प्राप्त होता है। केमिकल इत्यादि का प्रयोग न करने के कारण ये सभी उत्पाद अपने आप ही जैविक खाद्यों की श्रेणी के होते हैं। निश्चित रूप से अपने भारत में भी ऐसे जीवन जीती जनजातियाँ हैं लेकिन फ़र्क़ यह है कि उनकी सादगी मजबूरियों से जन्मी है और आमीश की सिद्धांतों से। 
आप सोचेंगे कि इन सब बातों का एक साहित्यिक सम्पादकीय से क्या लेना-देना! दरअसल विज्ञानियों ने हाल ही में यह सम्भावना व्यक्त की है छठवाँ सामूहिक विलोपन बहुत क़रीब है, ठीक उसी तरह का जिस तरह के एक विलोपन में डायनोसोर जैसी शक्तिशाली प्रजाति का नामोनिशान मिटा दिया था। संभव है कि इसी तरह के विलोपनों को आम जनता को आसानी से समझाने के लिए पूर्व में 'क़यामत' या 'प्रलय' जैसे शब्दों का सहारा लिया गया हो। विश्लेषण बताता है कि इस बार के विलोपन के लिए मानव प्रजाति ही जिम्मेवार है, जिसने अपने लालच या प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र दोहन के चलते इस सतत प्रक्रिया की गति को ११४% तक बढ़ा दिया है अर्थात जितनी जीव-जातियों को हज़ारों सालों में गायब होना था वह कुछ सैकड़ा सालों में ही गायब हो चुकी हैं। अब जिस गति से ये प्रजातियाँ गायब हो रही हैं सम्भावना है कि अगली चंद शताब्दियों में ही अधिकांश सरीसृप, उभयचर, पक्षी, जलचर और स्तनधारी इस गृह से मिट जाऐं। स्तनधारियों में भी बंदरों की विभिन्न प्रजातियों और स्वयं मनुष्यों के मिट जाने का भी खतरा अधिक है। इसके बावज़ूद हम हैं कि अपने लोभ को नहीं रोक पा रहे, हर कुछ समय बाद हमें मोबाइल, कम्प्युटर या कार आदि के नए संस्करण चाहिए होते हैं। इनके अनावश्यक निर्माण से हर पल हमारे नज़दीक खिसकते चले आ रहे विनाश से जैसे हमें कुछ लेना-देना ही नहीं। गुफाओं और कंदराओं में मुश्क़िल समय बिताने वाला मानव अब इतना सुविधाभोगी हो गया है कि औरों की तो छोड़ ही दें उसे अपनी अगली पीढ़ियों की भी फ़िक्र नहीं। 
ऐसे कठिन समय में आमीश की सादा जीवनशैली के सकारात्मक पहलुओं और उनकी तरह के अन्य समुदायों से कुछ सबक लिया जा सकता है, ताकि मनुष्य कुछ और समय तक इस ग्रह पर ठहर सकें। बाकी तो हमें जिस डाल पर बैठेंगे उसी को काटने की आदत पुरानी है, फिर भी समय रहते चेत जाएँ तो बेहतर। 

शेष फिर.... 

आपका ही-
दीपक मशाल 
                                                                                                             अनुक्रमणिका, जनवरी 2017