लता अग्रवाल की लघुकथाएँ

लता अग्रवाल
मैं ही कृष्ण हूँ

कॉलेज के गेट पर पहुँचते ही कुछ मनचलों ने प्रतिभा का दुपट्टा खींच लिया।

"तुम आ गई द्रोपदी!", कहते हुए उनमें से एक ने प्रतिभा के दुपट्टे को अपनी कलाई पर लपेट लिया।

"वाह भई ! कलयुग में द्रोपदी का चीर हरण।"

"हा! हा! हा! " सभी कुटिलता से अट्टाहस करने लगे।"

"तुम दुःशासन हो या नहीं मैं नहीं जानती। मगर द्रोपदी के चीरहरण के बारे में तो जानते ही होंगे ।" प्रतिभा ने पलटकर जवाब दिया

"अरे यार! ये द्रोपदी तो बोलना भी जानती है।"

"स्वागत है द्रोपदी ! इस द्युत क्रीडा में तुम्हारा।"

"तुम भूल गये शायद जब द्रोपदी का आँचल दुशासन के हाथ आया तो कैसा महाभारत मच गया था।"

"अच्छा! तो आप महाभारत मचाना भी जानती हैं पांचाली!"

"अरे! नहीं ये नहीं इनके सखा कृष्ण मचाएंगे महाभारत।"

"ओहो! कहाँ हैं सखा कृष्ण , बुलाओ भाई हम भी देखें" कहते हुए वे प्रतिभा के और नजदीक आने लगे।

अगले ही पल सारे युवक धराशाई पड़े थे, तमाशबीन प्रतिभा की मार्शल आर्ट में दक्षता की प्रशंसा कर रहे थे | ।

कही अनकही

"भैय्या जी! का आप भी सीमा पर लड़ने जा रहे हैं?"

"हाँ भौजी! हमें भी सरकारी बुलावा आया है सीमा पर काफी तनाव है और भी सिपाही की जरूरत आन पड़ी है।"

"अच्छा! तो का वहाँ हमार मुन्नू के बापू भी मिलेंगे? "

"हाँ भौजी! भैय्या भी होंगे वहाँ, का कोई सन्देसा भिजवाए का है। "

"सही समझे हैं भैयाजी, का तुम हमार सँदेसा मुन्नू के बापू के दे देंगे?"

"क्यों नहीं भौजी कहो क्या सँदेसा भेजवाए का है?"

"भैय्या जी! उनसे कहिये कि जब से उ गये हैं बप्पा की तबियत और भी बिगड़ गई है।अम्मा के घुटने का दर्द इतना बढ़ गया है कि अब हम ही सहारा देकर उन्हें नहलाने-धुलाने ले जाते है। भैय्या जी उनसे कहिये ... जब से आप गये हैं हम रात को सो नहीं पाते बहुत चिंता रहती है आपकी। अउर ना मुन्नू को पीलिया हो गया है | हमारी गौ माता भी परलोक सिधार गई, दूध की बहुतइ तकलीफ हो गई है। बारिश अधिक होने से खेतन में पानी भर गया सो फसल भी नुकसान पा गई।"

"जी भौजी, कह देंगे।

"इ ... मैय्या! हम का कह गये ! सुनो भैया जी! उनसे इ कछु मत कहिये, का है ना उ सीमा पर गये हैं देश की खातिर ... बाधा होगी।"

"कहना सब कुशल है, आपका इंतजार है।"