बजे सितार: पूनम चावला - आनंदकृष्ण

अनुवाद
न्यू जर्सी, अमेरिका निवासी भारतीय मूल की लेखिका पूनम ए चावला के अंग्रेज़ी उपन्यास “MUMBAI MORNINGS” का श्री आनंदकृष्ण ने “चुटकी भर नमक” शीर्षक से अनुवाद किया है। इस का एक अंश प्रस्तुत है।
बजे सितार “संगीत मेरे लिए अनिवार्य है। संगीत के सुरों में मुझे साक्षात ईश्वर दिखाई देता है।” -जया
दीना मौसी के घर हम दो दिन रुके। वो और रुकने के लिए ज़िद कर रही थीं पर बहुत से अधूरे कामों का हवाला दे कर हम वापस चल दिए। हालांकि मौसी थोड़ी नाराज़ भी हुईं कि ये क्या बात हुई कि लड़की परदेस से आई है और रुक भी नहीं रही है। मैंने उनसे वादा किया कि अगली बार जब आऊँगी तो ज़्यादा दिन रुकूँगी। भारी मन से हम रवाना हुए। मौसी कि आँखें गीली हो आईं थीं। वो दरवाजे पर खड़ी-खड़ी बहुत दूर तक हमारी टैक्सी को जाते देखती रहीं।

पूनम चावला
घर वापसी के समय विमान में मैंने देखा मेरी माँ अपनी सीट पर अधलेटी-सी हो गई थीं- शांत और ऐसे बच्चे के समान जो अपनी रुचि का भोजन करके और पसंदीदा कहानी सुनकर चुपचाप तृप्त भाव से आँखें बंद करके लेटा हो लेकिन यह ज़्यादा देर नहीं चला। विमान के भीतर निरंतर चलने वाली कर्कश उद्घोषणाओं से वे जाग गईं। उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और मेरे ओर ऐसी अबूझ गहरी दृष्टि से देखा जो सिर्फ बेटियों को ही नसीब होती है। मैं चेचक के हल्के पड़ गए उन निशानों को सहलाती रही जो वे अपने बचपन से ढोती आ रही थीं। मैंने धीरे से कहा, “कोई कह नहीं सकता कि आपको कभी चेचक हुई थी। ये सारे निशान लगभग पूरी तरह से खत्म हो गए हैं।”

माँ ने सूनी आँखों से देखा और अपने सिर को विषाद से झुका लिया, “ये चेचक के निशान समय के साथ हल्के ज़रूर पड़ गए हैं लेकिन इनकी यादें आज भी उतनी ही डरावनी हैं।”

मुझे ऐसे बदमज़ा विषय को छेड़ देने का अफसोस हुआ। मैं विषयांतर करने के बारे में सोच ही रही थी की उन्होंने कहना शुरू कर दिया -
क्या तुम विश्वास करोगी कि जब मैं आठ साल की थी तब मैं बहुत खूबसूरत थी। मुझे रिश्तेदारों और दोस्तों में बहुत दुलार मिलता। मेरे लिए बहुत कीमती कपड़े बनवाए जाते। मैं सोने के तारों के कढ़ाई वाली मखमली चप्पलें, एक से बढ़ कर एक डिजाइन के स्कार्फ और हेयरबैंड पहनती थी। मेरी आया हर रात मेरे बालों में तेल लगाती और अगली सुबह खुशबूदार साबुन से उन्हें बड़े जतन से धोती।

मेरी माँ की प्रसव के दौरान बहुत पहले मौत हो चुकी थी और मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। जिनको तुम नानी कहती थीं वो मेरी सौतेली माँ थीं। वे बहुत गरीब परिवार से आई थीं। वे जवान थीं और बहुत सुंदर थीं। उनकी भी माँ की मृत्यु हो चुकी थी। उन्होंने हम बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं होने दी हालांकि जब उनके भी बच्चे हो गए तब उनके लिए सभी बच्चों को बराबरी से प्यार दे पाना और उनकी देखभाल कर पाना मुश्किल होता गया।

उन्हीं दिनों मैं बीमार पड़ गई। और शीतला या गलसुआ या ऐसी ही कोई साधारण बीमारी से नहीं जिसे बाद में सहजता से कहा जाता है कि याद है जब तुम बीमार पड़ी थीं! ... मैं बीमार हुई थी इस खतरनाक रोग चेचक से| मुझे लगता है कि उस समय मेरे माँ इस डर से पागल हुई जा रही थीं कि कहीं यह छूत की बीमारी घर में न फैल जाये और उनके नन्हें बच्चे इसकी चपेट में न आ जाएँ! खैर; मैं स्वस्थ हुई। इसके पीछे उनकी देखभाल और मुझे छत पर एकांत कमरे में रखने की सावधानी भी काम कर गई जिससे दूसरे बच्चे भी सुरक्षित रहे। एकांत का वह समय मुझ जैसी छोटी बच्ची के लिए पहाड़ सा गुज़रा था। अकेलापन तभी अच्छा लगता है जब आप थके हुए हों, या किसी से प्रेम करते हों, या प्रार्थना कर रहे हों; अन्यथा साया! अकेलापन अप्राकृतिक है।

आनंदकृष्ण
जब मैं पूरी तरह ठीक हो गई तब मैंने पहली बार अपने आपको आईने में देखा। मैं बहुत मुश्किल से अपने आप को पहचान सकी। मेरे चेहरे पर तकलीफदेह, अमानुषिक, जहरीले और स्थायी निशान थे। मुझे मेरा ही चेहरा डरावना लगा। मुझे याद नहीं कि उस दिन जैसा डर और पीड़ा मुझे फिर कब हुई? लेकिन मैं गलत थी। मेरे दोस्तों, रिशतेदारों और सबसे बढ़कर तुम्हारी नानी का व्यवहार मेरे प्रति व्यवहार रातोंरात बदल चुका था। अब मैं श्री रामदास जी की प्यारी, लाड़ली बेटी नहीं रही थी बल्कि परिया (दक्षिण भारत की एक पिछड़ी और जंगल में रहने वाली जनजाति) हो गई थी; एक ऐसी फर्द जिससे सब नफरत करते थे और जिसे थोड़े से प्यार की दरकार थी। मुझे याद है कि अपनी माँ के चेहरे पर मुस्कान की एक हल्की सी चमक लाने के लिए मैं क्या-क्या जतन करती थी! उनसे अपनी तारीफ का एक शब्द सुनने के लिए मैं रात-रात भर काम करती थी।

मैं समझदार थी और हर तरफ मेरी चौकस नज़र रहती थी इसलिए जल्दी ही मैंने ताड़ लिया था कि मेरी धाराप्रवाह बोलने की क्षमता, कविता पाठ का मेरा प्रभावशाली तरीका या मेरी सुरीली आवाज़ की वो कोई परवाह नहीं करती थीं; लेकिन कभी-कभी जब मैं अपने छोटे भाई-बहनों को कपड़े पहनाने या उनके स्कूल के काम में मदद करती थी, या अच्छे पके फल उनके टिफ़िन में रखती, फलों की चटनी बनाती और स्कूल जाने के पहले बिस्तर साफ कर देती तो वे एक स्नेहिल मुस्कान मेरी ओर उछाल देती थीं। मेरी तारीफ मुझसे सीधे नहीं बल्कि मुझे सुनाते हुए नौकर से की जाती थी, “देखा तुमने ! उसने कितने अच्छे से सारा काम किया है। उस आठ साल की बच्ची से कुछ सीखो।” मैं ऐसे क्षणों का बेताबी से इंतज़ार करती थी और जब वे क्षण मेरे सामने होते तो मैं जैसे उन कहे हुए एक एक शब्द में अपनत्व की मिठास को तलाश करती और उसे अपने भीतर सहेजने की कोशिश करती। फिर भी वे मुझसे नाराज़ होने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं।

एक दिन तुम्हारी नानी मुझ पर हमेशा की अपेक्षा अधिक क्रोधित थीं। इसका कारण सिर्फ इतना था कि मैंने नहाने में अपने हिस्से से अधिक गरम पानी का इस्तेमाल कर लिया था। नतीजन नौकर को और पानी फिर से गरम करना पड़ा था। इसके कारण छोटे बच्चों को स्कूल जाने में देरी हो गई थी। तुम्हारे नाना को सुनाते हुए वे मुझ पर गरजी, “पूरी दुनिया का गरम पानी भी तुमको सुंदर नहीं बना सकता। समझी?” और जैसे इतना ही काफी नहीं था; सो उन्होंने भुनभुनाते हुए जोड़ा , “हे भगवान! क्या किस्मत पाई है मैंने? एक बदसूरत भूतनी मेरी छाती पर मूंग दल रही है।”

साया! जिस समय मैं तुमको ये सब बता रही हूँ तब मैं बहुत मुश्किल से अपने आँसू रोक पा रही हूँ। माँ की जली-कटी बातें सुनकर तुम्हारे नाना अपने आप को रोक नहीं सके और उठकर हमारे पास आए। वे एक लंबे चौड़े, लगभग छह फीट ऊंचाई के पुरुष थे। उनकी आँखें हमेशा लाल रहती थीं और उनकी सांस लेने की आवाज़ ज़ोर ज़ोर से आती थी। एक बार के लिए तो उनका गुस्सा तुम्हारी नानी पर फूटा। उनके शब्द मुझे आज भी ऐसे याद हैं जैसे कल की ही बात हो। उन्होंने कड़क कर कहा था, “तारा! ये मत भूलो कि ये मेरी बिटिया है जिसका नाम धन की देवी लक्ष्मी के नाम पर है। इसका अपमान करके तुम देवी लक्ष्मी का भी अपमान कर रही हो।” फिर जैसे वे मुझसे नज़रें मिलाने ताब न ला सके और गुस्से में पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चले गए।

मैं नहीं जानती कि अपने पति के अनियंत्रित क्रोध के डर से या किस अज्ञात कारण से तुम्हारी नानी ने अपनी आवाज़ नीची कर ली किन्तु धीमी आवाज़ में ही उन्होंने तीखे शब्द कहना जारी रखा और उपेक्षा से अपना सिर ऐसी मुद्रा में झटके से घुमा लिया जिसमें वे मेरे चेहरे पर आते-जाते भावों को देखती रह सकें और मुझ पर नज़रों से ही जहर बुझे भाले-बर्छियाँ बरसाती रह सकें।

गर्मी की छुट्टियाँ आईं तब तुम्हारे नाना ने मुझे कश्मीर की तराई में बसे सियालकोट शहर में रह रही एक आंटी के पास जा कर छुट्टी बिताने की व्यवस्था कर दी। ये आंटी बहुत ममतामयी थीं। उनके कोई बच्चे नहीं थे और वे हमेशा हम लोगों से आने के लिए कहती रहती थीं।

साया! मैंने बचपन से माँ के प्यार को नहीं जाना था फिर मैं कैसे बताऊँ कि मैंने अपने सिर पर कोई ममतालु हाथ फिर से महसूस किया तो मुझे कैसा लगा? मेरी आंटी ने मुझे किसी परीकथा की राजकुमारी जैसा हाथों-हाथ लिया। वे मेरे कहने के पहले ही मेरी ज़रूरत जान जाती थीं। वे मुझे अपने हाथों से खाना खिलाती थीं और मेरा बहुत खयाल रखती थीं कि कहीं मुझे कोई चोट न लग जाये। मेरी सारी गलतियों को उन्होंने दरियादिली से माफ किया, मुझे स्नेह से गले लगाया और मुझे थपकियाँ दे कर सुलाया; ये कहने में मुझे कोई हिचक नहीं-। उनके इस असीम स्नेह में मैं अपने कर्तव्य भूलने लगी थी। पर जैसे ही मेरी समझ में आया कि उनके घर में नौकर नहीं है और इसलिए उनको घर का सारा काम करना पड़ता है, मैं अपनी मर्ज़ी से उनकी सहायता करने लगी। मैं पोर्च में सफाई करती और सब्जियाँ छील देती। मैं कपड़े तह कर के रखती, फर्नीचर की धूल झाड़ती, पौधों को पानी देती और अपने और अंकल के जूतों पर पॉलिश भी करती। बदले में मुझे शाबासी और प्रेम भरा आलिंगन मिलता। मैं बिना अतिशयोक्ति के कह सकती हूँ कि वो सब एहसास मेरे लिए बेशकीमती थे।”

माँ ने एक गहरी सांस ली और अपने जूस के गिलास से एक घूंट भरा।

“आपके अंकल के बारे में बताइये? कैसे थे वे?” मैंने पूछा।

वो! वो तो संत थे। मैं तुमको उनके बारे में बताती हूँ।” माँ बोलीं, “मेरे रईस पिता से ठीक उलट मेरे अंकल एक सरकारी दफ्तर में बाबू थे। उनकी तनख्वाह बहुत कम थी लेकिन वे दरियादिल थे। एक दिन वे मुझे शहर के बाज़ार ले गए। वहाँ वे हर थोड़ी देर में मुझसे पूछते रहे, “बेटी! आइसक्रीम लेगी? या टॉफी?” उनकी माली हालत को जानते हुए मैंने उस तपती गर्मी में आइसक्रीम जैसे अमृत के लिए भी मना कर दिया। मेरे अंकल; तेरे चाचानाना वहाँ के लोगों में बहुत मशहूर थे। वे उस बाज़ार की हर दूकान के बाहर रुक जाते और दूकानदार से बतियाते। एक दूकानदार ने बड़े उत्तेजित स्वर में उनको बताया कि बीते दिन किस तरह पूरी सड़क गाड़ियों से भर गई थी और कुछ व्यापारी बड़ी बड़ी केतलियों में तेज़ गंध वाली कोई चीज़ उबाल रहे थे जिसे वे “काफी” कह रहे थे। वे लोगों को उसे पीने के लिए भी इसरार कर रहे थे। साफ था कि यह सब फिरंगी साहबों के इशारे पर होने वाला पागलपन था।

“उसका स्वाद कैसा था?” अंकल ने पूछा।

दूकानदार मुँह बना कर बोला, “कड़वा। बेहद कड़वा। ऊपर से उसकी रंगत बिलकुल कीचड़ जैसी। उसमें दूध और शक्कर मिलाये बिना आप पी नहीं सकते। उसकी बिक्री कभी नहीं हो सकती।”

सोचो साया! उस समय कौन जानता था कि एक दिन वही कॉफी सुबह की आम ज़रूरत बनेगी!

खैर, मैं चुपचाप खड़े रह कर बेचैनी से पहलू बदलते हुए उनकी कहानी खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी। तभी सुबह की ताज़ा हवाओं के साथ सितार की मधुर आवाज़ ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं अपने अंकल का कुर्ता खींचते हुए बोली, “वहाँ चलिये न ... वहाँ।”

“कहाँ?” उन्होंने पूछा।

“वहाँ जहाँ से ये आवाज़ आ रही है।“ मैं ठुनकते हुए बोली।

उन्होंने मुझे आश्चर्य से देखा और फिर न जाने क्या सोच कर वे मेरे साथ चल पड़े। हम इस गली से उस गली में भटकते रहे और अंत में वे उकता कर बोले, “ये रहवासी सड़क है। ये संगीत की आवाज़ किसी के घर से आ रही है। अब हम वहाँ कैसे जाएँ?”

पर मैंने उनकी एक न सुनी। मैं उस कलाकार को देखना चाहती थी जो बेजान तारों में ईश्वरीय चेतना जाग्रत कर रहा था। हमने आखिरकार वो घर ढूंढ निकाला जहां से संगीत की स्वर लहरियाँ फूट रही थीं। हम उस साधारण से घर के नीले रंग से पुते अधखुले दरवाजे के पास खड़े हो गए। मेरे अंकल ने किसी तरह भीतर जाने की जुगत भिड़ाई। उस दयालु संगीतज्ञ ने हमें बैठाया और लगभग एक घंटे तक हमें विभिन्न राग सुनाये।

“मैं इसको बजाना सीखना चाहती हूँ, बिलकुल आपके जैसा। मेहरबानी करके मुझे सिखाइए।” जब वे बजा चुके तो मैं बोली। वे संगीतज्ञ मेरी बात सुन कर चकित रह गए। फिर बोले, “इसके लिए तुमको एक सितार लेना होगा और यदि वाकई अच्छा बजाना चाहती हो तो जीवन भर दिन में दो बार रियाज़ करना होगा। उनकी बात सुनकर मैं मुड़ी और दरवाजे के बाहर आ गई। किसी चीज़ के प्रति ध्यान आकर्षित होने के बाद उसको पाने के लिए ललक  बढ़ती है। सितार के सुरों ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा और उन सुरों को अपना बनाने की ख़्वाहिश मेरे भीतर करवटें लेने लगी।

“आप तो बहुत अच्छा सितार बजाती हैं। मैंने कई फोटो देखी हैं।” मैंने कहा।
“हाँ।” वे बोलीं। कुछ रुक कर उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाया :
कुछ दिनों बाद मेरा अपने घर लौटने का समय आ गया। विदा के वक़्त मेरी आंटी ने मेरा चेहरा अपने हाथों में ले लिया और इतना रोईं कि मेरे चेहरे का एक एक निशान उनके आंसुओं से भीग गया।

मैं सोचती हूँ साया, कि मैं कितनी खुशकिस्मत थी जो मुझे इतना प्यार मिला ! कैसा रहस्यात्मक! आखिर क्या था इस चेचक से खराब हुए चेहरे में, जिसने एक औरत को बाहें फैला कर अपना असीमित स्नेह देने के लिए विवश किया तो दूसरी औरत ने दुत्कार कर बाहर कर दिया था!

घर पर सब कुछ पूर्ववत था। जब मैं घर पहुँची, उस वक़्त तुम्हारी नानी मंदिर गई हुई थीं। एक नौकर ने मुझे भोजन परोसा।

साया! मुझसे वादा करो मेरे बच्ची! जब तक तुम जियोगी तब तक तुम अपने बच्चों को मुस्कुरा कर और गले लगा कर खुले दिल से आशीर्वाद दिया करोगी। उन्हें बताओगी कि उनके बिना तुम्हारा घर कितना सूना है और उनके आने से तुम्हारा दिल कितने उछाह से भर जाता है!

बहरहाल ... घर आने के लगभग दो हफ्ते बाद एक दिन मैं अपने कमरे में बैठी थी। नौकर ने आकर बताया कि मुझे नीचे, बैठकखाने में बुलाया जा रहा है। मैं किसी आशंका में डूबी, भारी कदमों से नीचे उतरी। वहाँ सभी थे और एक लंबी सी पेटी को कौतूहल से देख रहे थे। तुम्हारे नाना ने मुस्कुरा कर बड़े प्यार से मुझे अपने पास बुलाया और मुझे एक एक कागज का पर्चा दिया। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैंने उलझन भरी नज़रों से माँ की ओर देखा और डरते डरते पूछ लिया, “क्या है माँ ये?”

“पढ़ो इसे। फिर ये पेटी खोल कर देखो।” तुम्हारे नाना की रोबदार आवाज़ गूंजी।

मैंने वैसा ही किया। वो पर्चा एक छोटा सा खत था जिसमें लिखा था, “प्यारी बिटिया के लिए एक साधारण से आदमी का छोटा सा तोहफा। इसे ज़रूर कबूल कर लेना बेटी। अपने दिल के खालीपन को सुरों से भर डालो।”

मैंने वो तीन सतरे कई बार पढ़े फिर कांपते हाथों से उस पेटी को खोला। उस पेटी में बेहतरीन मलमल के कपड़े में लिपटी हुई मेरे सबसे बड़ी ख़्वाहिश रखी हुई थी- एक खूबसूरत सितार; एक राजकुमारी के बजाने लायक सितार! वो उतना कीमती सितार मेरे उन्हीं अंकल ने भेजा था जो जेब से नहीं, दिल से रईस थे।

“मैंने तुम्हारे लिए संगीत सीखने का इंतजाम कर दिया है। तुम कल से शुरू कर सकती हो।” मेरे पिता की आवाज़ फिर से गूंजी थी। उनकी आवाज़ में हल्का सा पश्चाताप झलक रहा था।

 ... माँ चुप हो गई थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वे अपनी यादों को चुन चुन कर इकट्ठा कर रही हों। मैं भी एक गुलाब जैसे तरो-ताज़ा चेहरे वाले बच्चे की गहरी आँखों में तैरते मन के गोपन रहस्यों को काल के प्रवाह से बेखबर हो कर धमाचौकड़ी मचाते और एक जोड़ी समझदार आँखों को खामोशी से शुक्रिया अदा करते देख रही थी।

मैंने उनके हाथों को देखा। उनकी तर्जनी अनजाने में ही लयबद्ध तरीके से हिल रही थी जैसे हवा में किसी अमूर्त सितार पर सुर साध रही हों। उनका सिर स्मृतियों की मधुर तान पर हौले हौले झूम रहा था। उनकी आँखें बंद थीं। मैं सामने दीवार पर टंगे उस रहस्यमयी राजकुमारी मीराबाई के चित्र को देखते हुए उनके बारे में सोच रही थी जिन्होने अपना पूरा जीवन कविता और गीतों के साथ भगवान कृष्ण को समर्पित कर दिया था। तभी हवा में उड़ कर आते पत्ते की तरह कांपती माँ की आवाज़ ने मेरी कल्पनाओं को यथार्थ के धरातल पर उतार दिया। माँ कह रही थीं, “वो सन 1936 का गर्मी का मौसम था जब मुझे पता चला कि मैं भी किसी की स्नेहपात्र हूँ। साया! आज भी मैं अपने उन अंकल की संवेदनशीलता को याद करती हूँ तो मेरा दिल भर आता है। साथ ही तुम्हारे नाना को याद कर के भी मेरा सिर सम्मान से झुक जाता है जिन्होने उनकी भावनाओं का मान रखा। तुम शायद सोच भी नहीं सकोगी कि इन सब बातों का मेरी ज़िंदगी में कितना ऊँचा स्थान है।”

माँ कहे जा रही थीं और मैं खामोश बैठी उस अमूर्त सितार के सुरों में डूबती चली जा रही थी।
पूनम ए चावला : एक परिचय
पूनम भारत में जन्मी और मुंबई विश्वविद्यालय तथा स्टेट यूनिवर्सिटी, न्यू यॉर्क में शिक्षा प्राप्त की। एडवरटाइज़िंग कॉपीराइटर के रूप में काम शुरू किया और जल्दी ही इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। वे वर्तमान में न्यू जर्सी (अमेरिका) में अपने पति और दो पुत्रों के साथ रहती हैं और भारतीय परिवेश को ही केंद्र बना कर अपनी तीसरी पुस्तक लिख रही हैं
अपनी भारतीयता से पूनम गौरवान्वित हैं। उनके पिता श्री जगदीश चन्द्र अरोरा संस्कृत और वेदान्त के प्रकांड विद्वान थे। उनका असर पूनम पर रहा है। वे सांस्कृतिक जागरूकता के माध्यम से अनेकता में एकता और “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना की प्रबल पक्षधर हैं और साहित्य के उदात्त मूल्यों की ज़बरदस्त पैरवी करती हैं।
अप्रैल 2013 में उनकी पहली पुस्तक “The Shenanigans of Time” प्रकाशित हुई थी जिसने पूरे अमेरिका के साहित्य जगत में तहलका मचा दिया था। उस पुस्तक का स्पेनिश और फ्रेंच भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
“Mumbai Mornings” (हिन्दी में “चुटकी भर नमक”) उनकी दूसरी पुस्तक है जो अंग्रेज़ी और हिन्दी, दोनों भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हो रही है।
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आनंदकृष्ण का परिचय
पूनम ए चावला के अंग्रेज़ी उपन्यास “Mumbai Mornings” का हिन्दी में “चुटकी भर नमक” शीर्षक से अनुवाद करने वाले आनंदकृष्ण एक अनुवादक, बहुभाषाविद, संपादक, भाषा प्रशिक्षक, प्रखर वक्ता और साहित्य व रंगमंच के अध्येता-समीक्षक व आदिवासी तथा लोक कला-साहित्य के मर्मज्ञ हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने उन्हें “राष्ट्रभाषा रत्न” अलंकरण से सम्मानित किया है।  
आनंदकृष्ण पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और भोपाल में रहते हैं।
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