जैन धर्म में अहिंसा के संकल्प

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

पिछले अंकों में आपने पढा: अहिंसा का अनुबंध और जीवन के आग्रहअहिंसा की अवधारणा; तथा  बौद्ध धर्म में अहिंसा के सोपान 
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अहिंसा का सामर्थ्य इतना सबल रहा है कि इसे प्रायः सभी धर्मों ने अंगीकृत किया, जैन धर्म ने भी। जगत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसकी जरुरत इसलिए रही क्योंकि इसके मूल तत्व मनुष्य के संवेदना में सूक्ष्मरूप से करुणा का बीजारोपण करके मनुष्य को अतिरेक में जीने से बचाते हैं। उसे मनुष्य होने का एहसास देते हैं और उस कोटि का ही आचरण का बरताव करने की प्रेरणा भी देते हैं। जैन धर्म ने इस तत्व को एक संकल्प के रूप में आत्मसात किया। जैन धर्म के अणुव्रत और महाव्रत में अहिंसा बीजरूप में विद्यमान है, निःसंदेह जैन मानते हैं कि समस्त जगत के प्राणियों से हमें प्रेम करना चाहिए। जैन धर्म के आचार-विचार इसके सद्द: प्रमाण हैं। उनका मानना है कि कैवल्य की ओर अगर बढ़ना है तो अहिंसा के पथ पर हमें अग्रसर होना होगा और इस प्रकार जैन यह सिद्ध करता है कि संसार का सबसे बड़ा धर्म अहिंसा है।

जैसा कि यह कहा जाता है कि पार्श्वनाथ का समय उपनिषद के निर्माण का समय है। पार्श्वनाथ ने अहिंसा के सिद्धांत को सुव्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के साथ अहिंसा को जोड़ा और अहिंसा को सामाजिक और व्यवहारिक बनाया। उन्होंने न केवल व्यवहारिक रूप दिया अपितु उसे अपने जीवन में उतारने पर ज्यादा बल दिया। जैन संस्कृति का मूल ही अहिंसा माना गया है। प्राचीन जैन ग्रंथों में अहिंसा की जो व्याख्या की गयी है हम आचार्य अमृतचंद्रसूरि के पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रन्थ को पढ़ें तो यह पायेंगे कि इसमें अध्यात्म का अहिंसक पक्ष किस प्रकार विवेचित है। इसमें तो मनुष्य के झूठ-प्रपंच की जड़ प्रमादयोग माना गया है, संग्रह की प्रवृत्ति कषाययुक्त भावों से उद्भूत होती है जिससे मनुष्य संपत्ति या धन हड़पने के लिए प्रवृत्त होता है। आसक्ति या मैथुन की तरफ लिप्तता रागयुक्त भावनाओं की अतिशयता से होती है, वस्तुतः ये सभी प्रमाद और कषाय भाव हिंसा को जन्म देने वाले कारक हैं। इस प्रकार की हिंसा से बचने के लिए ही जैन धर्म सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह व्रतों का पालन करने पर आग्रह किया क्योंकि ये संकल्प अहिंसा के मूलसूत्र हैं। इन्हीं में रात्रि भोजन-त्याग का संकल्प भी जैन धर्म की एक प्रतिज्ञा है। इसका परिपालन पुरुषार्थसिद्धयुपाय में किया गया है।

महाभारत के कुछ प्रसंग हों या वेद, पुराण व उपनिषद या गीता के, कोई भी सन्दर्भ हम लें उसे उतना ठीक ढंग से जीवन में समझ सकने में अक्षम जरूर होंगे किन्तु जैन धर्म के आचार-विचार जो आज भी हमें देखने को मिलते हैं कि मांसाहार पूर्णतया वर्जित है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। जैन धर्म में-
क्षमा मैं चाहता हूँ सबसे, मैं भी सबको करूं क्षमा, 
मैत्री मेरी सभी से हो; किसी से भी वैर हो नहीं।

प्रश्नव्याकरणसूत्र में अहिंसा के अलग-अलग नाम विभिन्न प्रकार की अहिंसा का विवेचन प्रस्तुत करते हैं। अहिंसा केवल जीवों की हिंसा का निषेध मात्र ही नहीं, अपितु पीड़ा में जी रहे प्राणियों की सुरक्षा, उनके ऊपर दया, उनके प्रति मैत्रीभाव आदि का भाव भी अहिंसा का उत्कृष्टरूप प्रकट करता है। सही मायने में कहा जाए तो प्रश्नव्याकरणसूत्र में प्रस्तुत अहिंसा मानव की प्रवृत्तियों के साथ-साथ उसके अंतस को भी छूती है। दरअसल, अहिंसा के सन्दर्भ में प्रश्नव्याकरणसूत्र को पढ़ते हुए यह बोध हो जाता है कि अहिंसा और आत्मा का तादात्म्य बहुत गहरा है। मनुष्य का बाह्य तो एक दिखावा है, आत्मा में ही अहिंसा उद्भूत होती है।

प्रश्नव्याकरणसूत्र (तीर्थंकर महावीर द्वारा उपदिष्ट द्वादशांगी का दसवां अंगग्रंथ है। अर्द्धमागधी आगम साहित्य में इस ग्रंथ का विशिष्ट स्थान है। यह ग्रंथ हिंसा, असत्य, अस्तेय, अब्रह्मचर्य एवं परिग्रह इन पांच आस्रवों तथा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह इन पांच संवरों का सूक्ष्म, व्यापक एवं तलस्पर्शी विवेचन प्रस्तुत करता है।) में अहिंसा महाव्रत की सुरक्षा हेतु पांच भावनाओं का प्रतिपादन किया गया-
1. ईर्यासमिति: गमनागमन में सावधानी रखना
2. मनःसमिति: मन में अप्रशस्त विचारों के प्रभाव का निरोध करना
3. वचनसमिति: हित-मित पथ्य वचनों का प्रयोग करना
4. आहारैषणासमिति: समभावपूर्वक संयत व निर्दोष भिक्षा की गवेषणा करना
5. आदाननिक्षेपणसमिति: साधुचर्या के उपकरणों की यथाविधि प्रतिलेखना करना।
इसीप्रकार प्राणातिपात को भी जैन धर्म में प्रश्नांकित किया गया है। जैन धर्म में केवल आत्महत्या या परहत्या दोनों प्राणातिपात है, ऐसा कहा गया है। प्राणातिपात में प्राणों का विनाश, प्राणों या हम पर्यायों के ही रूप में लें और परिताप (दुःख देना) और क्लेश (कष्ट) तीनों ठीक नहीं है। किसी भी प्राणी-जीव-भूत-सत्त्व के प्राणों को दुःख न देने का व्रत (संकल्प) प्राणातिपात विरमण व्रत है जो अहिंसा महाव्रत और प्राणातिपात विरमण अणुव्रत भेद से क्रमशः साधु एवं गृहस्थजन हेतु प्रतिपादित है। सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय की वृत्ति प्राणिमात्र में एक जैसी होती है। दशवैकालिक में कहा है-अत्तसमे मन्निज्ज छप्पिकाए। अर्थात, छह जीवकाय को अपनी आत्मा के समान समझो। अपनी आत्मा समझने की कोशिश ही हिंसा से विरत होने का सूत्र है। इसीलिए अहिंसा महासंकल्प के रूप में विवेचित है। हाँ, वहींजैन धर्म में आमजन गृहस्थी का प्राणातिपात-विरमण अणुव्रत की श्रेणी में बताया गया है।

भगवान् पार्श्वनाथ से लेकर महावीर (भगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर, भगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकरभगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकरजिस प्रकार हाथियों मे ऐरावत सर्वोच्च है, पशुओं में सिंह, नदियों में गंगा, पक्षियों में गरुड़, उसी प्रकार ज्ञातृपुत्र महावीर मोक्षमार्ग का रास्ता दिखाने वाले पथ-प्रदर्शकों में सर्वोच्च थे। -जैन शास्त्र सूत्र कृतांग) तक की जैन धर्म की लम्बी परम्परा जैन महाब्रतों, संकल्पों की परम्परा है। इसमें जितने भी अग्रगण्य हुए सभी ने हिंसा, हिंसक स्वभाव, हिंसक संस्कृति का खुलकर विरोध किया। सभी ने प्राणी-मात्र के रक्षा के लिए सन्देश दिए। महावीर तो आरंभजा हिंसा, विरोधजा हिंसा और संकल्पजा हिंसा ये तीन प्रकार की हिंसा बताते हैं। तीनों कोटि की हिंसा में देह धारण की अनिवार्यता हेतु होने वाली हिंसा आरंभजा हिंसा है और जीवन की सुरक्षा के लिए होने वाली हिंसा विरोधजा है। ये दोनों हिंसा तो अणुव्रती के भी हो सकती हैं, किंतु संकल्पजा हिंसा आक्रामक मनोवृत्ति वाली हिंसा है।
महावीर स्वामी ने संकल्पजा हिंसा को त्यागने का सन्देश दिया, परस्पर युद्ध को अनावश्यक कहा और अहिंसक समाज के लिए अनावश्यक हिंसा से बचने का मार्ग प्रशस्त किया।महावीर की शिक्षाओं को यदि देखा जाए तो उनका आग्रह है कि प्राणातिपात-विरमण-व्रत आवश्यक है। और जो जिन इन व्रतों का पालन करते हैं उसके तीन प्रमुख निहितार्थ हैं-
1. हम कैसा व्यवहार करें कि हम दुःखी न हो तथा
2. दूसरे सभी प्राणी दुःखी न हो (जैन धर्म में जियो व जीने दो के सिद्धांत को धर्म का आधार माना है)
3. परस्पर मैत्री हो (तत्त्वार्थ-सूत्र में सभी प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव)।

ये निहितार्थ मनुष्य के भीतर प्रेम की लौ प्रज्ज्वलित करते हैं। मैत्री प्रेम के बगैर संभव ही नहीं। महावीर इसके जरिये मनुष्य में, जैन मत में विश्वास रखने वालों में एक नए संकल्प का प्रकाश फैलाना चाहते हैं। दरअसल, अहिंसा व प्राणीमात्र के प्रति करुणा की भावना को एक नया धरातल जैन धर्म में दिया है।

प्रवृत्तियां किसी भी धर्म की संकल्पना को प्रभावित करती हैं। जैन धर्म में भी ऐसा ही रहा। अहिंसा की आधारभूमि संविभाग में होती है। “लोभ” हिंसा का उदहारण है तो “दान” अहिंसा का जनक। “पुरुषार्थ सिद्धयुपाय” ग्रंथ जैन धर्म की अहिंसा का प्रतिनिधि ग्रंथ है। इसमें सभी धर्मों की अहिंसक वृत्ति का समावेश हो गया है, जिसका सूत्र है कि जहां अहिंसा हैं वहां धर्म हैं, जहां हिंसा है, वहां धर्म नहीं है। इस सीधे से स्थापना के सहारे हम जैन धर्म की अहिंसा-सभ्यता और उसकी प्रवृत्तियों का आंकलन कर सकते हैं। मूलतः देखा जाय तो अहिंसा की यह मीमांसा उसके समस्त दार्शनिकता का बोध है। इससे यह साफ़ झलकता है, बल्कि हम यूं भी कह सकते हैं कि इसका एक सीधा सन्देश है यह कि धर्म की सततता ही जैन धर्म में अहिंसा की सातत्यता से परिभाषित होती है।

लिच्छवी गणराज्य के सम्राट चेतक, कुंडग्राम के राजा सिद्धार्थ, मगध के राजा श्रेणिक बिंबिसार, सिंधु-सबीर के राजा उदयन, वत्स के राजा शातनिक, हेमाकुंड़ के राजा जीवनधर, पोलाशपुर के राजा विजयसेन, चंपा के राजा अजातशत्रु, काशी के राजा जीतशत्रु आदि जैन धर्म के प्रति आकृष्ट हुए। महावीर के समय आठ राजाओं ने मुनि दीक्षा स्वीकार की।

पाँच अणुव्रत नियम को ही देखें-
1. अहिंसाणुव्रत: जो मन, वचन, काया से सजीवों का घात नहीं करता है, वह अहिंसाणुव्रत है।
2. सत्याणुव्रत: जो स्थूल असत्य स्वयं नहीं बोलता है और ऐसा सत्य भी नहीं बोलता जो कि धर्म की हानि या पर की विपत्ति (हिंसादि) के लिए कारण हो, वह एकदेश सत्यव्रत है।
3. अचौर्याणुव्रत: जो रखी हुर्इ, भूली हुर्इ या गिरी हुर्इ दूसरे की सम्पत्ति को बिना दिये हुए ग्रहण नहीं करता है वह अचौर्य अणुव्रत है।
4. ब्रह्राचर्याणुव्रत: जो पाप के भय से परस्त्री का त्याग कर देता है, चतुर्थ ब्रह्मचर्याणुव्रती है।
5. परिग्रह परिमाण अणुव्रत: धन, धान्य आदि परिग्रह का प्रमाण करके उससे अधिक में इच्छा रहित होना पाँचवां परिग्रह परिमाणव्रत है।

ये अणुव्रत ऐसे कोई कठिन कर्म नहीं हैं जिसका पालन न किया जा सके। जैन धर्म में इसी प्रकार छह कर्मों को आचारित करने की अपेक्षा होती है-प्रदोष, निहव, मात्सर्य, अंतराय, असादन और उपघात।

फ्रांसीसी विद्वान रोम्या रोलाँ का यह कथन कितना उपयुक्त है ‘जिन ऋषियों ने हिंसा के मध्य में अहिंसा के सिद्धांत की खोज की है, वे न्यूटन से अधिक विद्वान और वेलिंगटन से बड़े योद्धा थे। जैन धर्म आचार में अहिंसा और विचार में स्याद्वाद प्रधान है। अहिंसा का सिद्धांत वैसे सभी मत स्वीकार करते हैं लेकिन उनमें कहीं-कहीं हिंसा का पोषण भी दृष्टिगत होता है और यही वजह है कि जैनियों के अलावा अन्य जातियों में मांसाहार का प्रचलन है। जैन धर्म की पूरी संस्कृति की समीक्षा की जाए तो इसकी गहनता किसी स्वच्छ जल की भाँति दिखेगा जिसमें सदैव प्रेम के आस्वाद की गुंजाइश है। प्रेम के प्रतीक ही अहिंसक होते हैं।

अहिंसा की इस वैभवशाली परम्परा का उत्स जैन धर्म में यदि आज देखा जाय तो जैन धर्म मानने वालों में आज निराशा है। समय के बदलाव से कोई भी प्रभावित हुआ है। आज बाजार और वैभव से आगे बढती पीढ़ी जैन परम्परा में जन्म लेकर मांसाहार के शिकार हो रहे हैं। झूठ और अन्य भौतिकवादी लिप्सा से उनमें अवसाद भी घर करने लगे हैं। जैन परम्परा में संथारा एक अलग बहस है। इस सबके बीच जैन धर्म की मूल चेतना अहिंसा से परिपूर्ण है। ऐसे में किसी भी धर्म की खूबसूरती को अगर देखा जाए तो जैन धर्म का वह सन्देश, चिंतन-मनन और जीवन शैली आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं। उसमें वह शक्ति है जिससे आज की विकट समस्याएं भी निपटाई जा सकती हैं लेकिन यदि संकल्प के स्रोत और संकल्पकर्ता दोनों का सामंजस्य सही हो जाए। वस्तुतः जैन धर्म के ज्ञानानुशासन को यदि आत्मसात कर लिया जाय तो जैन धर्म आज भी अहिंसक वातावरण देने में समर्थ है।
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
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