अहिंसा की अवधारणा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

पिछले अंक में आपने पढा: अहिंसा का अनुबंध और जीवन के आग्रह; अब आगे, अहिंसा की अवधारणा

हिंसा और अहिंसा के तीन सोपान हैं - मानसिक, वाचिक  तथा शारीरिक। ये भेद हिंसा के उदभव स्थान के आधार बताए गए हैं | मन में किसी का अनिष्ट चिंतन- मानसिक हिंसा है और किसी के प्रति अनिष्ट की भावना न रखना इस कोटि की अहिंसा है। वचन से अपशब्द आदि निकालना और उससे किसी को कष्ट हो तो वाचिक हिंसा है, दूसरी ओर सत्य, प्रिय तथा हितकर वचन का प्रयोग वाचिक अहिंसा है। शरीर से किसी प्रकार की क्षति पहुँचाना शारीरिक हिंसा है शरीर पर नियंत्रण रखना अहिंसा है।

अहिंसा व हिंसा पर तो हमने चर्चा कर ली लेकिन इसकी व्युत्पत्ति कैसे हुई इसे जानना आवश्यक है। क्योंकि वास्तव में सर्वप्रथम इसकी जानकारी आवश्यक है। वस्तुतः अहिंसा एक निषेधात्मक शब्द है जिसमे संस्कृत व्याकरण के अनुसार नञ्-समस का प्रयोग है- न हिंसा = अहिंसा अर्थात् हिंसा का अभाव। भाषा का दर्शन प्रत्येक निषेध में विधि को मान्यता देता है। जैसे 'अज्ञान' में ज्ञान का भाव निहित है, निरामिष में सामिष की मूल संकल्पना है। उसी प्रकार अहिंसा की धारणा में भी मूलतः इसके विध्यात्मक रूप ‘अहिंसा’ की प्रतिरोधी 'हिंसा' की अवधारणा अवस्थित है। अतः इससे सिद्ध होता है कि 'हिंसा' की व्युत्पत्ति भी अप्रासंगिक नहीं है। यह मानव के मूल स्वभाव की उपज है।

पाणिनी व्याकरण के अनुसार 'हिंसा' में रूधादिग्णीय धातु 'हिसि' (हिंसायाम्) अवस्थित है जिसका रूप हिंसति हिंस्त: हिंसन्ति। इस (रूप) धातु से भाववाचक 'अ' प्रत्यय तथा स्त्रीलिंग बोधक 'टाप्' (आ) प्रत्यय लगने से 'हिंसा' शब्द की व्युत्पत्ति होती है। यह भाव या क्रिया- मारना या पीड़ा देने वाला शब्द होने का बोध कराता है/ इसी से कर्ता के अर्थ में पवुल् (अक्) प्रत्यय लगने से हिंसक तथा 'र' प्रत्यय लगने से 'हिंस्त्र' शब्द बनते हैं। दोनों के नवीन अर्थ हैं- हिंसा करने वाला, पीड़क, हत्या का विचार रखने वाला। क्रूर, निष्ठुर और निर्दय के रूप में इसका परिवर्तित प्रयोग मिलता है क्योंकि हिंसा केवल भौतिक या बाह्य स्तर पर ही नहीं अपितु मानसिक स्तर पर भी उद्भुत होती है और कभी-कभी आतंरिक हिंसा वैचारिक रूप में व्यक्ति को निर्मम या निर्दय बनाती है जिससे मनुष्य तमाम प्रकार का पाप करता है। संस्कृत में 'सिंह' शब्द भी वर्ण-विपर्णय द्वारा उपर्युक्त 'हिसि' (हिंस) धातु से सम्बद्ध माना जाता है, सिंहो वर्णविपर्यात अर्थात् हिंस शब्द ही उल्टा होकर सिंह बन गया। ऐसा मानने का कारण यही दिया गया है कि सिंह हिंसा का प्राणिजगत में सबसे बड़ा प्रतिनिधि है। वह अपने क्रीड़ाक्रम में ही प्राणियों का संहार करके क्रूरता का उदाहरण प्रस्तुत करता है। पंचतंत्र में एक श्लोक आता है जिसमें बड़े-बड़े विद्वानों की अकालमृत्यु का निदर्श है। उसके प्रथम चरण में ही कहा गया है कि व्याकरणाचार्य पाणिनि के प्रिय प्राणों का हरण सिंह ने किया था।

सिंहो व्याकरणाय कर्तुरहरत् प्राणान् प्रियान् पाणिनै:।

इस विषय में एक दंत कथा (मिथक) प्रचलित है जिसमें अध्यापक की तल्लीनता का संकेत और सन्देश भी मिलता है। कहते हैं कि पाणिनि वन में स्थित अपने आश्रम में अपने शिष्यों के साथ तन्मय होकर कृत प्रत्ययों की शिक्षा दे रहे थे। इसी बीच एक सिंह निकलकर आया। शिष्यों ने तो परिवेश के प्रति अपनी जागरूकता के कारण, गुरू का ध्यान करते हुए चिल्लाना आरम्भ किया- सिंह:, सिंह ,,, । वे सभी भाग खड़े हुए। किन्तु आचार्य ने, अपनी आंखे बंद रहने के कारण इसे शिष्यों की सहज जिज्ञासा-वृत्ति मानकर 'सिंह' शब्द की व्युत्पत्ति बताना आरम्भ किया। उधर सिंह ने शिष्यों को भागते और उन्हीं के बीच एक व्यक्ति को निश्चिन्त बैठे देखकर इसे अपना अपमान समझा। आखिर वह वनराज और पशुओं का राजा ठहरा। बस, उसने आक्रमण करके एक बार में ही पाणिनि के प्राण ले लिए। इस सन्दर्भ में भारतीय उपाधि, राजाओं की उपाधि 'सिंह' के रूप में दिए जाने के पीछे भी यही हिंसा प्रवृत्ति है, ऐसा कुछ प्रसंग आता है।

खैर, जो भी हो, इस हिंसा के निवारण के लिए प्रयास कम नहीं हुए हैं। विचारकों ने अहिंसा की स्थापना के लिए बहुत से श्रेष्ठ विचार दिए हैं और यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि अहिंसा संसार का सर्वोत्तम धर्म है।

अहिंसा परमो धर्मः, जब हम इसकी व्याख्या करते हैं। तब हमारा ध्यान सर्वप्रथम महाभारत के शांतिपर्व की ओर जाता है। क्योंकि विद्वानों का मानना है कि अहिंसा परम धर्म है, इस सन्दर्भ में महाभारत में सबसे प्राचीन वर्णन आया है किन्तु यह ठीक-ठीक सत्य नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि यदि महाभारत में भीष्म भी युधिष्ठर की जिज्ञासा को जिस प्रकार शांत करते हैं, उसका आधार उससे भी प्राच्य कथा में मिलता है तो इसका प्राच्य वर्णन महाभारत में ही है, ऐसा मानना उचित नहीं होगा। खैर, महाभारत में अहिंसा के सन्दर्भ में जो वर्णन आते हैं, उसका अवलोकन करें तो -

महाभारत के द्विसप्तत्याधिक द्विशततमोऽध्याय: में, यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा की गयी है। ज्ञानप्राप्ति के वर्णन क्रम में युधिष्ठर भीष्म का अद्भुत संवाद है। इसमें अहिंसा परम धर्म है, इसकी व्याख्या पढ़ते हुए ये प्रसंग मिलते हैं-

युधिष्ठर ने पूछा- पितामह! यज्ञ और तप तो बहुत हैं और वे सब एक मात्र भगवद्प्रीति के लिए किए जा सकते हैं परन्तु उसमे यज्ञ का प्रयोजन केवल धर्म हो, स्वर्ग सुख अथवा धन की प्राप्ति हो, उसका संपादन कैसे होता है?
बहूनां यज्ञतपसामेकार्थानां पितामह ।
धर्मार्थ न सुखार्थार्थ कथं यज्ञं समाहितः॥

भीष्म जी इस प्रश्न का उत्तर देतें हैं- पूर्वकाल में उत्छलवृत्ति से जीवन यापन करने वाले एक ब्राह्मण का यज्ञ के सम्बन्ध में जैसा वृत्तान्त है और जैसा नारद जी ने मुझे बताया था, वही प्राच्य इतिहास मैं तुम्हें बताना चाहूंगा। भीष्म ने कहा कि नारद जी इस सम्बन्ध में कहते हैं- राष्ट्र विदर्भ जहाँ धर्म की प्रधानता थी, में एक ब्राह्मण ऋषि रहता था। वह बहुत ही गरीब था। वह कटे हुए खेत, खलिहान से बिखरे हुए अन्न के दानों को चिड़ियों की भांति चुनता था और उसी से जीवन निर्वाह करता था। एक बार ऋषि के मन में यज्ञ करने की सद्इच्छा जागृत हुई। कहते है कि जहाँ वह रहता था, वहां अन्न के नाम पर सांवा, दल बनाने के लिए जंगली उड़द और शाक-भाजी के लिए ब्रह्मीलता और इसके अलावा भी अगर कुछ उपलब्ध था तो वह स्वादहीन खाद्य पदार्थ थे किन्तु ब्राह्मण की तपस्या ने सबको सुस्वादु बना दिया था। उस ब्राह्मण ने वन में तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त कर समस्त प्राणियों में से किसी को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाले यज्ञ का अनुष्ठान किया।

ब्राह्मण की पत्नी का नाम पुष्कर धारिणी था। आचार-विचार से परमधार्मिक थी। ब्राह्मण ऋषि का नाम सत्य था। यद्यपि वह ब्राह्मणी अपने पति सत्य के हिंसायुक्त यज्ञ की इच्छा प्रकट करने पर उसके अनुकूल नहीं होती थी किन्तु तब भी सत्य उसे आग्रह पूर्वक बुला ही लाता था। ब्राह्मणी शाप से भयभीत थी जिससे वह पति की इच्छा, स्वाभाव को कभी टाल नहीं पाती थी। होता के आदेश से इच्छा न होने पर भी ब्राह्मण पत्नी ने उस यज्ञ का कार्य संपन्न कराया (यहाँ बता दें कि होता का कार्य पर्णाद नाम से प्रसिध्द एक धर्मज्ञ ऋषि करते थे जो शुक्राचार्य के वंशज थे)।

उसी वन में एक मृग रहता था। एक दृश्य ऐसा बदलता है, सत्य के जीवन में जब सहवासी हिरन मनुष्य की बोली में सत्य से कहा –हे ब्राह्मण! तुमने यज्ञ के नाम पर यह दुष्कर्म किया है। क्या तुम जानते हो कि किया हुआ यज्ञ मंत्र और अंगहीन हो तो वह यजमान के लिए दुष्कर्म होता है। हिरन ने कहा- ब्राह्मण! तुम मुझे होता को सुपुर्द कर दो और स्वयं निन्दाराहित होकर स्वर्गलोक की और गमन करो इसी में तुम्हारी भलाई है। उसके बाद यज्ञ में सावित्री प्रकट होती है और वह सत्य को मृग की आहुति देने की सलाह देती है किन्तु सत्य ने स्पष्ट कहा- मैं अपने सहवासी मृग का वध नहीं कर सकता।

नारद जी ने आगे बताया कि ब्राह्मण से सीधा ज़वाब मिलने पर सावित्री अंतर्ध्यान हो गई। सत्य, सावित्री की ओर हाथ जोड़कर खड़ा था। इतने में मृग ने पुनः अपनी आहुति देने की याचना की। सत्य ने मृग को गले से लगा लिया और सप्रेम विनम्रतापूर्वक कहा- तुम यहाँ से चले जाओ। तब उस हिरन ने आठ कदम पीछे प्रस्थान किया और लौट पड़ा और कहा- ब्राह्मण! तुम विधिपूर्वक मेरी हिंसा करो। मैं यज्ञ में वध को प्राप्त होकर उत्तम गति पा लूँगा। हिरन ने सत्य से कहा- मैंने तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान की है, उससे देखो, आकाश में दिव्य अपसराएँ खड़ी हैं। महात्मा गन्धर्वों के विचित्र विमान भी शोभा पा रहे हैं।

सत्य ने आकाश की ओर देखा। उसने बहुत देर तक रमणीय दृश्य देखा। कुछ समय मृग की तरफ देखा और विचार करने लगा। सहसा 'हिंसा' करने पर ही मुझे स्वर्गवास का सुख मिल सकता है, यह मन ही मन निश्चय किया। वास्तव में, मृग रूप में साक्षात् धर्म थे जो मृग का शरीर धारण करके बहुत वर्षों से वन में निवास करते थे। पशु हिंसा यज्ञ के विधि के प्रतिकूल कर्म है। भगवन धर्म ने सत्य (ब्राह्मण) का उद्धार करें ऐसा विचार किया। ब्राह्मण के मन में आए कुविचार ने उसके समस्त तपस्चर्या को कुछ ही समय में समाप्त (नष्ट) कर दिया। इसलिए यज्ञ के बारे में विचार अच्छे होते हैं युधिष्ठर, किन्तु हिंसा यज्ञ के लिए हितकर नहीं है।

इस भ्रम में ब्राह्मण ने अपनी समस्त तपस्या को समाप्त हो जाने पर धर्म के समक्ष घुटने टेके और धर्म ने उसका यज्ञ स्वयं कराया। फिर सत्य ने तपस्या करके अपनी पत्नी पुष्करधारिणी के मन जैसी स्थिति थी, उसी तरह का उत्तम समाधान प्राप्त किया। उस समाधान का सार यही था युधिष्ठर, जैसा कि ब्रह्मा जी के पुत्र ने बताया कि उसे ज्ञान हो गया था तथा उसे दृढ़ निश्चय हो गया की हिंसा से बड़ी हानि होती है, अहिंसा परम कल्याण का साधन है।

और भीष्म ने नारद को यह कथा सुनाते हुए यह बताया-
'अहिंसा सकलो धर्मो हिन्साधर्मरतथाहितः।
सत्यं तह्मं प्रवक्ष्यामि यो धर्मः सत्यावदिनाम ॥
(द्रष्टव्य: महाभारत मोक्षधर्म पर्व, पृष्ट ५१३१)

अर्थात् अहिंसा ही सम्पूर्ण धर्म है। हिंसा अधर्म है और अधर्म अहितकर होता है (प्रथम पंक्ति)। महाभारत कृति का अगर हम अवलोकन करें तो शांति पर्व के अंतर्गत तुलाधार-जलालि-संवाद का अध्यन करते हुए भीष्म ने ही एक कथा को सुनते हुए कुछ और भी बातें स्पष्ट करने का प्रयास किया है बहुत ही  सुन्दर ढंग से। यह प्राचीन काल के महातपस्वी ब्राह्मण जलालि और वणिकधर्म, धारण करने वाले महायशस्वी, काशीवासी तुलाधार के बीच संवाद में कथा उभरकर आती है जिसमें तुलाधार ने धर्म के पथ पर जाने वाले मानव और अधर्म पर चलने वाले अधर्मी मानव की पथगमन में अंतर बताने का प्रयास किया है।

सर्वप्रथम कथा अंश- तुलाधार ने कहा- ब्राह्मण (जलालि)! मैंने धर्म के जिस मार्ग का दर्शन कराया है, उस पर सज्जन पुरुष चलते हैं या दुर्जन? इस बात को अच्छी तरह जांचकर प्रत्यक्ष कर लो। तुम्हें इसकी यथार्थता का भान हो जाएगा।

देखो ! आकाश में ये जो बहुत से श्येन एवं दूसरी जाति के पक्षी चारों ओर विचरण कर रहे हैं, इनमें तुम्हारे सिर पर उत्पन्न हुए पक्षी भी हैं। तुलाधार ने कहा- ब्राह्मण! ये यत्र-तत्र घोंसलों में घुस रहें हैं। देखो! इन सबके हाथ-पैर सिकुड़कर शरीरों से सट गए हैं। इन सबको बुलाकर पूछो। ये पक्षी तुम्हारे पालित-समादृत हुए हैं। अतः तुम्हारा पिता के समान सम्मान करते हैं। जलालि! इसमें संदेह नहीं है कि तुम इनके पिता ही हो; इन पुत्रों को बुलाकर प्रश्न करो। कहते हैं कि जलालि बहुत ध्यान से सुने और उसके बाद (युधिष्ठर को संबोधित करते हुए भीष्म ने कहा)-

जलालि ने उन पक्षियों को बुलाया। उनका वचन सुनकर वे पक्षी वहां आए और उनसे मनुष्य वाणी में बोलने लगे-
अहिन्सादिकृतम कर्म इह चैव परत्र च।
श्रद्धा निहन्ति वैब्राह्मन सा हता हन्तितंनरम्॥

अर्थात्, अहिंसा और दया आदि भावों से प्रेरित होकर किया हुआ कर्म इहलोक, और परलोक में भी उत्तम फल देने वाला है। ब्राह्मण! यदि मन ने हिंसा की भावना हो तो वह श्रद्धा का नाश कर देती है। फिर नष्ट हुई श्रद्धा करने वाले इस हिंसक मनुष्य का ही सर्वनाश कर डालती है।

अहिंसा की व्याख्या भीष्म ने जलालि और तुलाधार संवाद के जरिए उन पक्षियों के माध्यम से इतने स्पष्ट ढंग से की है। मूलतः यही आधार है अहिंसा के परमधर्म को जानने के लिए। विचार करें, यदि पक्षी इतने यशस्वी वाक्यों से मानव में अहिंसा की अवधारणा को विकसित होने के लिए स्पष्ट अपने अलौकिक शब्दों से अहिंसा का भाव संचारित कर देना चाहते हैं, जिससे मनुष्य धर्म और धर्म के अहिंसक भावों को आत्मसात करे। धर्म के निकट पहुंच सके। पक्षी साफ शब्दों में कहते हैं कि समस्त योनियों में विचरण करते हुए मोक्ष का मार्ग अहिंसा से प्राप्त किया जा सकता है, क्या आपको ऐसा नहीं लगता? महाभारत में अहिंसा की प्रशंसा करते हुए राजा विच्खुन द्वारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा का जिक्र भीष्म करते हैं। अहिंसा धर्म आत्मसात करने योग्य है अथवा अहिंसा धर्म की महत्वपूर्ण कड़ी है या अहिंसा ही परमधर्म है, कैसे है? भीष्म ने कहा है, प्राचीन काल में राजा विच्खुन ने समस्त प्राणियों पर दया करने के लिए जो उद्धरण प्रस्तुत किया है, इतिहासकार इसकी प्रायः व्याख्या अपने ग्रंथों में करते हैं। महाभारत में विच्खुन राजा का गौओं के प्रति मंगलकामनाएँ और अहिंसा धर्म की, उनके द्वारा अदभुत प्रशंसा का वर्णन है। महाभारत में सत्यवान की कथा के माध्यम से राज्य में अहिंसा का पालन करते हुए हिंसा से बचने की तरकीब भी सुझायी गई है। चिरकारी नामक गौतम ऋषि पुत्र के माध्यम से अहिंसा के एक और स्वरुप की स्थापना का सजीव वर्णन महाभारत में मिलता है।

इस प्रकार हम निष्कर्ष प्राप्त कर चुके हैं कि वास्तव में महाभारत से अहिंसा और धर्म के संबंधों को स्पष्ट तौर से समझा जा सकता है। यद्यपि इस विमर्श को यहीं विराम देते हैं। चिरकारी और गौतम ऋषि के दृष्टान्त भी बहुत रुचिकर है।
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
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