अहिंसा का अनुबंध और जीवन के आग्रह

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

हम जिस युग में जी रहे हैं हो सकता है वह ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अपना अलग महत्त्व रखता हो, और वैज्ञानिक दृष्टि से अलग। लेकिन कुछ चीजें सार्वभौमिक होती हैं। सत्य एवं अहिंसा इसी सार्वभौमिकता से निकले हुए जीवन आचरण हैं जो कहीं न कहीं जीवन के साथ कुछ मूल्यों का अनुबंध करते हैं। अहिंसा के बारे में गांधी जी ने बहुत महत्त्वपूर्ण बात यह की कि उसे जीवन आचरण में प्रयोग के तौर पर व्यवहृत किया। किन्तु इस अहिंसक सभ्यता का उद्गम स्रोत भारतीय वांगमय में बहुत प्राचीनकाल से मिलता है। इस अहिंसा की चर्चा आमतौर पर जैन और बौद्ध परम्परा में भी खूब हुई है। केवल उसकी चर्चा ही नहीं हुई अपितु जैन (जैन संस्कृति का मूलाधार अहिंसा है। संयम, समानता, स्वानुभूति आदि जो बाते की गयीं, वह वस्तुतः अहिंसा के विस्तार रूप हैं) और बौद्ध (बौध्द धर्म में तो अहिंसा के निष्क्रिय स्वरुप नहीं अपितु सही अर्थों में सक्रिय अहिंसा के स्वरुप हैं जिसमें कल्याण के साथ करुणा को स्थापित किया गया है) दोनों धर्मों में इसे खूब आचरित भी किया गया। इस सभ्यता को ज्यादातर लोग जैन धर्म में अतिरेक में जाकर किये गए विश्वास को लोग नहीं पचा पाते लेकिन बौद्ध धर्म में इसे अलग तरह से मानते हैं। इसी कारण से शायद पूरी एशिया में आज भी बौद्ध धर्मावलम्बियों की कमी नहीं। लेकिन इन सबके बावजूद अहिंसा का स्रोत केवल बौद्ध, जैन धर्म ही भारत में नहीं माने जाते अपितु भारत में अहिंसा का अस्तित्व तो सनातन ही माना गया है। महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म और युद्धिष्ठिर के संवाद का अगर हम पाठ करें तो पता चलता है कि भारत तो प्राचीन समय से ही अहिंसक सभ्यता का पोषक रहा है। इस भारत भूमि पर इसकी कई मिसालें देखने को मिलती हैं। महाभारत के शान्ति पर्व को तो अहिंसा के विशेष व्याख्या के रूप में देखा जाता है। उसी पर्व में यह कहा गया-

अहिंसा परमो धर्म:, अहिंसा परमो तप:।
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
अहिंसा परमो धर्म:, अहिंसा परमो दम:।
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तप:॥
अहिंसा परम यज्ञ: अहिंसा परमो फलम्‌।
अहिंसा परमं मित्र: अहिंसा परमं सुखम्‌॥
(महाभारत/अनुशासन पर्व-115:23/116:28, 29)

ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद, उपनिषद्, महाभारत, मनुस्मृति, पद्म-पुराण, योग-वशिष्ट, भागवत-स्कंध, योग-शास्त्र, बृहस्पति स्मृति, वराह-पुराण, इस्लाम, बाइबिल, बौद्ध साहित्य, जैन साहित्य, गुरुग्रंथ साहिब और अन्य जितने भी धर्म भारत में अपने साहित्य से साथ आज विद्यमान हैं सबमें अहिंसा का सूत्रपात हुआ है किन्तु इस चीज से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘हिंसा’ का भी अस्तित्व हम मिटाने में अभी तक सफल नहीं हो सके। हमने संकल्पना तो की कि पृथ्वी, अग्नि, वायु चहुओर शान्ति हो। सभी साथ साथ चलें लेकिन अभी भी मनुष्य गरिमा के साथ नहीं जी सका इससे लगता है कि मनुष्यता का सही स्वरूप अभी भी समाज नहीं दे सका है।

पितृसत्ता आज भी कायम है
भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में अहिंसक वातावरण आ ही नहीं सकता क्योंकि पितृसत्ता कभी भी अपने वजूद को ख़त्म करके आधी दुनिया को बराबरी का दर्ज़ा देने को तैयार नहीं है। आज भी आधी आबादी अपने होने और अपने गौरव के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यदि हम काफी प्राचीन सवालों के साथ न भी खड़े हों, और उन्नीसवीं सदी में फ्रेडरिक एंगेल्स, मार्क्स को पढ़ें तो उनके जो सवाल उभरकर आये हैं वो वास्तव में अभी तक मिटे नहीं हैं। मार्क्स ने पुरुष द्वारा निजी संपत्ति तथा अधिशेष पर नियंत्रण का विरोध किया और कहा कि इससे पितृसत्ता को बढ़ावा मिला है। उन्होंने वर्ग संघर्ष के जरिये यह भी कहने की कोशिश की कि राज्य ने इस तरीके से पितृसत्ता कायम की है। उसके अलावा ग्राम्सी और अन्य विचारकों ने पितृसतात्मक व्यवस्था को अपने-अपने तरीके से रेखांकित किया लेकिन यह कहते हुए आज भी बहुत चिंता होती है कि स्त्रीवादी आन्दोलन और स्त्रीवादी लेखन के लगभग समान्तर आन्दोलनों ने भी पितृसत्ता की चूलें नहीं हिला पायीं।

गरिमा का अर्थ ही नहीं रहा 
   गरिमा के सवाल भी उतने ही प्रश्नांकित होते रहे। दुनिया के तमाम कोने में गरिमा को कुचल दिया गया। बड़ी बात यह है कि गरिमा का दमन मनुष्य बिरादरी ने ही किया। राज्य ने किया। मशीन ने किया। आधुनिकता और भूमंडलीकरण से गरिमा कुचली गयी। ये सभी कहीं न कहीं उस हिंसक सभ्यता के संवर्धक और उत्प्रेरक रहे जिससे मनुष्य के जीवन को बचना था। वैसे तो यह सर्वमान्य मान्यता कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं इसलिए वे सभी सामान हैं।, सामान गरिमा रखते हैं लेकिन यह केवल एक भ्रम साबित हुआ। असमानता, असहिष्णुता, ईर्ष्या और विकास के कारण मनुष्य, मनुष्य के साथ प्रेम नहीं कर सका। ये ऐसे घटक हैं जो बराबरी को समाप्त करते हैं और इससे गरिमा पर अतिक्रमण होता है। दुनिया में हो रहे युद्ध, आतंकवाद, उग्रवाद, क्षेत्रीय, जातीय और वर्गीय हिंसा ने जीवन और गरिमा को ज्यादा अतिक्रमित किया। विकास के नाम पर बड़े बांधों के बनने/बनाने के इतिहास से सभी परिचित हैं। क्या इन बड़े बांधों से जल, जंगल, जमीन और मनुष्यता सभी प्रभावित हुए कि नहीं? क्या बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन जिसमें कि गरीब, आदिवासी और दलित लोग ही ज्यादा प्रभावित हुए कि नहीं? उनकी अपने जीवन के साथ घटे पीड़ादायी अनुभव अगर आज कोई जाकर सुने तो वे रो पड़ते हैं अपनी पीड़ा कहते-कहते। वे अपने पेड़, अपने रहने-खाने और जीने की संस्कृत से कट गए। वे अब वे नहीं रहे जो वे थे। ये उनके जीवन के अपने संस्कृति के साथ जो आग्रह थे, अपनी सभ्यता के साथ जो आग्रह थे, उनसे उनका अलग होना, पीड़ादाई है आज भी।

वैभव की अपनी परिभाषा है, वे जंगल ही उनके वैभव थे। उनके पेड़ ही उनकी आस्था थी। उनके अनुराग को हमने विकास के नाम पर मिटा दिया किन्तु उनकी उसी के साथ गरिमा थी क्योंकि गरिमा की परिभाषा मनुष्य के निजता से भी जुड़ी होती है। निजता किसी भी तरह से खंडित हो तो वह गरिमा के खिलाफ होती है।
आजकल तो बाज़ार ने समस्त चीजों को वस्तु के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। मनुष्य की निजता से उसका कोई लेना-देना नहीं है। बाज़ार तो प्रत्येक की गरिमा मुनाफे में नीलाम करती है। विज्ञापन और आधुनिकता ने एक हिंसक बाज़ारू संस्कृति को जन्म दिया है जिससे राज्य अपने नागरिकों की गरिमा की सुरक्षा करने में असमर्थ हो चुके हैं। बाज़ार ही किसी राज्य की संप्रभुता को रेखांकित करने लगा है। हालाँकि, यह फंडा ईस्ट-इंडिया कंपनी ने उपनिवेश कायम करते हुए अपनाया था। उपनिवेशवाद के बाद नव-उपनिवेशवाद ने कुछ नए तरीके से लोगों के ज़िन्दगी को तबाह किया। बाज़ार प्रायः स्वघोषित सभ्य समाज को यह बताती है रही है कि किसे अपना निवाला बनाना है। इसके लिए वह कोई भी उपक्रम अपनाता है। आज कॉर्पोरेट इस बाज़ार के जरिये दुनिया के तमाम कोने में, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, ब्राज़ील और तीसरी दुनिया के देशों में अपनी संप्रभुता बना रहे हैं। इनके जरिये जिस प्रकार किसी व्यक्ति की वैयक्तिकता समाप्त की जा रही है वह सोचनीय और चुनौतीपूर्ण है। राज्य इसे चाहकर भी रोकने में अक्षम हैं। इससे ज्यादा प्रभावित देसज लोग हुए हैं। उनका जल, जमीन, जंगल सब छीना गया। उनके आस्था और प्रतीक ध्वस्त किये गए। उनकी निजता छीनी गयी। उनके निर्णय छीने गए। ये हिंसा के भयावह रूप हैं।

जीवन जीने पर रोक
तब और भयावह होता है, जब यह कह दिया जाए कि आपको जीने का हक नहीं है। जीवन जीने से तात्पर्य यह नहीं होता कि किसी को मार दिया गया हो। बल्कि जीवन तो तभी जिया जा सकता है न जब जीवन जीने की बुनियादी चीजें एक व्यक्ति-मनुष्य के पास उपलब्ध हो। नहीं तो जीवन जीने का मतलब क्या? 29 जनवरी 2007 को दिल्ली में सत्याग्रह को केंद्र में रखकर एक बड़ा सम्मलेन दिल्ली में आयोजित हुआ था। उस सम्मलेन में गांधी द्वारा सत्याग्रह छेड़े जाने के सौ वर्ष का जश्न मनाने के लिए विभिन्न देशों के गांधीवादी और राजनेता सम्मिलित हुए थे। वहां एक बात उभरकर आई थी कि 21वीं सदी में गांधीजी की प्रासंगिकता का इससे अधिक और क्‍या प्रमाण हो सकता है कि सत्‍याग्रह शताब्‍दी के आयोजन और गांधीजी पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए 88 देशों के नेता यहां एकत्र हुए हैं। जब गांधीजी के महान मस्‍तिष्‍क ने सत्‍य, अहिंसा और आत्‍मवेदना की शक्‍ति पर आधारित सत्‍याग्रह का यंत्र गढ़ा था वह पूरे 100 साल पहले की बात थी। इससे भारत को उपनिवेशवाद से छुटकारा पाने में मदद मिली और स्‍वतंत्रता की ओर आगे बढ़ने के लिए उपनिवेशी दमनकारी शासन के तले दबे अन्‍य देशों को मार्ग दिखाया। उस सम्मलेन में यह बात भी दुहराई गयी कि समय के साथ गांधीजी आगे बढ़े और उनके विचार बदले किंतु उनके जीवन में तीन बातें सदैव अटल रहीं, वे थीं - सत्‍य, अहिंसा और आत्‍मबल। उनके विचार और उनकी जीवन शैली, भारत के संपूर्ण अंत:करण में व्‍याप्‍त थी और इसे सभी लोकतांत्रिक संस्‍थाओं में अभिव्‍यक्‍ति मिली जो हमने इन वर्षों में तैयार की हैं। दुनिया में यह प्रचारित करने के लिए ठीक है लेकिन भारत की सच्चाई हरसूद, टिहरी के बांधों से विस्थापित लोगों से कोई पूछे। भारत में नक्सलवाद के विस्तार के पीछे एक तर्क यह भी सामने आया है कि यदि राज्य सही तरीके से रोजगार के साधन उपलब्ध कराता, यदि राज्य आदिवासियों के हितों और उनके संसाधनों को उनकी मर्जी के मुताबिक़ देश हित में लगाता तो नक्सलवाद की समस्या नहीं आती। सच जो भी हो, लेकिन भारत में हिंसा के शिकार हुए नक्सली और राज्य के सुरक्षा कर्मी और पत्रकार जो अपने जान से हाथ धो बैठे और जो अपने लोगों को असमय जान गंवाने से अब इस दुनिया में नहीं हैं, उसका कोई  न कोई जिम्मेदार तो है। अहिंसा का उनसे जो प्राकृतिक अनुबंध था वह समाप्त हुआ। उनके जीवन जीने के जो आग्रह थे वे समाप्त हुए। इसके पीछे बहुत से हमारे अपने बनाये वे रास्ते हैं जिससे केवल हिंसा को बल मिला, इसका कारण यही है। अनुबंध कैसे था, यह सवाल लाजमी है। चूंकि भारत अपने चिरकाल से अहिंसक है। मनुष्य जन्म से अहिंसक है। मनुष्य हिंसक नहीं है। हो सकता है कि कभी रहा हो लेकिन सभ्यता के विकास क्रम में वह अहिंसक अधिक रहा है हिंसक कम। हिंसक होने के पीछे तो उसकी लालच, उसकी अस्मिता और स्व इस प्रकार बदलते गए जिससे वह हिंसा की राह चल पड़ा, नहीं तो वह अहिंसक ही है। इसलिए उन टूल्स को समझने की जरुरत है कि अहिंसा को किस प्रकार विस्तारित किया जा सकता है। द किंगडम ऑफ़ गॉड इज विदिन यू में टालस्टॉय ने यह बताने की कोशिश की कि किस प्रकार शक्ति के नियम के बरक्स प्रेम के नियम की हम स्थापित कर सकते हैं। गाँधी ने इसे आत्मसात किया था। सबसे बड़ी बात यही है की आत्मसातीकरण की प्रक्रिया काफी समय बाद मनुष्य में जगह बना पाती है। थोड़े समय में बहुत कुछ प्राप्त कर लेने की चाहत ने मनुष्य को छोटा बना दिया है। सामूहिक पहल न होने पर गुरुदेव रबीन्‍द्र नाथ द्वारा बंगाली में लिखित कविता हमेशा याद रखने योग्य है-

जोदी तोर दाक सुने केउ ना असे तोबे एकला चलो रे

      वैसे, अहिंसा का प्रयोग हृदय परिवर्तन करने का साधन है। गांधी के अहिंसात्मक प्रयोग सामाजिक शांति,  आत्मिक उन्नयन,  धार्मिक समन्वय और सांस्कृतिक निर्माण का भी साधन है। शायद यह भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि गांधी इसीलिए पूरी दुनिया में तमाम लोगों के हृदय में अपना स्थान बना सके। आंग सांग सू ची, स्टीव जॉब्स, अल्बर्ट आइनस्टाइन, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और दलाई लामा आदि का नाम इस कड़ी में लिया जा सकता है जिन्होंने गाँधी पर न केवल विश्वास किया बल्कि उन्हीं के सिद्धांतों पर अपनी-अपनी लड़ाई लड़ी भी और जीती भी।

अहिंसा का सम्बन्ध सीधा आत्मा से होता है। अहिंसा आत्म के विस्तार से प्रेम और ईश्वर का कहीं न कहीं स्वरूप है जिसे गाँधी जी ने अपने कई बार लेखन में व्यक्त करने की कोशिश की। शायद इस बात को लोग भूल गए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वे सहिष्णु होते, करुणामय होते, एक दूसरे गरिमा को आहात नहीं करते। इस अभाव के कारण ही हम जिस राज्य में रहते हैं वहां का लोकतंत्र प्रभावित हुआ है। लोकतंत्र होते हुए भी राज्य अहिंसक और कल्याणकारी नहीं हो पाते इसकी वजह उस राज्य का प्रत्येक व्यक्ति है। इसीलिए जीवन जीने का आग्रह अहिंसक होते हुए भी हम हिंसक संस्कृति के शिकार हो रहे हैं। यह एक विडंबना ही है कि जहाँ सर्वे भवन्तु सुखिनः की संकल्पना थी वहां भी प्रत्येक वैयक्तिक की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है। संस्कृति और सभ्यता की इस क्षरण को रोकने की आवश्यकता मनुष्य बिरादरी, राज्य और वैश्विक समुदाय कब समझ सकेगा? यदि इस सन्दर्भ को नहीं समझा गया तो संभव है कि हम उसी ओर बढ़ जाएँ जिससे मानवता को भय है।

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
सागर-470003 (मध्य प्रदेश) भारत
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