धरोहर: संत कबीर

संत कबीर दास
क्या तन मांझता रे
इक दिन माटी में मिल जाना
पवन चले उड जाना रे पगले
समय चूक पछताना

चार जना मिल गाड़ी बनाई
चढा काठ की डोली
चारों तरफ़ से आग लगा दी
फूंक दई रे जैसे होली
क्या तन मांझता रे ...

हाड़ जले जैसे बन की लकड़िया
केस जले जैसे भूसा
कंचन जैसी काया जल गई
कोई न आये पास
क्या तन मांझता रे ...

तीन दिना तेरी तिरिया रोये
तेरह दिन तेरा भाई
जनम जनम तेरी माता रोये
करके आस पराई
क्या तन मांझता रे ...

माटी ओढ़ना माटी बिछौना
माटी का सिरहाना
कहत कबीर सुनो भई साधो
ये जग आना जाना
क्या तन मांझता रे ...