पूरन सिंह की लघुकथाएं

पूरन सिंह
बदलने लगी हैं परिभाषाएँ

 शर्माजी ने जो भी खरीदा सब अपने नाम।  अपनी पत्नी के नाम से कुछ भी नहीं।  घर, मकान, फ्रिज, कूलर, गहने, भले ही गहने शर्मियाइन के लिए ही लिए गए हों  लेकिन रसीद शर्माजी के नाम ही रही।
 शर्मियाइन ने कभी उफ् तक नहीं की।  जो शर्माजी कर रहे हैं वही, ईश्वर की मर्जी है।  यही मानकर जीवन गुजारती है।
 शर्माजी ने शर्मियाइन का मन रखने के लिए बैंक में ज्वाइंट अकाउंट खुलवाया है और उन्हें पहले तथा स्वयं को दूसरे नम्बर पर रखा है।  वैसे पैसे जब भी निकालने हों तो शर्माजी ही जाते हैं।
 उस दिन अकाउंट क्लोज कराना था जिसके लिए एक आवेदन पत्र पर दोनों के हस्ताक्षर होने थे।  शर्माजी को जल्दी थी ऑफिस जाने की  सो, तुम एक काम करो मालती, इस कागज पर साइन कर दो।  ब्लैंक कागज देते हुए शर्माजी बोले थे।
 ये तो ब्लैंक कागज है.... इस पर साइन कैसे कर दूं।  कहते हुए शर्मियाइन ने कागज लौटा दिया था। शर्माजी मुँह फाडे़ शर्मियाइन को देखे चले जा रहे थे।

आशीष

सुनितिया का पति पिछली डेढ़ साल से बीमार है लेकिन एक महीने से तो उसकी यह हालत हो गई है कि उसका उठना बैठना भी दूभर हो गया। सुनितिया ने क्या-क्या नहीं किया-कौन सा मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा होगा जहां वह अपने पति के ठीक हो जाने के लिए दुआ मांगने, शीश झुकाने न गई हो लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। परसों तो उसके पति की हालत इतनी खराब हो गई कि अब गया कि तब गया। तभी एैसी ही स्थिति में पड़ौस की कटोरी चाची से सुनितिया का दर्द देख नहीं गया सो उन्होंने उसे सलाह दे दी थीं, “ए सुनीता मेरी बात सुन आजकल कांवडिया मां गंगा से अमृत ला रहे हैं , बडे़ धर्म-कर्म का काम है तू भी अपने पति की खातिर कुछ धर्म-कमा ले।”
“मैं क्या करूं चाची।” पति की व्यथा में व्यथित सुनितिया सिसक पड़ी थी।
“ए पगली सुन, मैं बताती हूं जो कांवड़िए मां गंगा से अमृत ला रहे हैं वे बेचारे बहुत थक जाते हैं। इतनी दूर का सफर, नंगे पांव, तू एक काम कर जब वे पास ही में बने तम्बू में आराम करने को रूकते हैं तब उनके पांव दबा आना। उन्हें आराम मिलेगा। वे तुझे आशीष देंगे और उनकी आशीष भगवान शिव से होती हुई तेरे आदमी तक आएगी। देखना तेरा आदमी ठीक हो जाएगा।” कटोरी चाची को बहुत ज्ञान है और आज उन्होंने अपना ज्ञान सुनितिया के समक्ष साक्षात कर दिया था।
 फिर क्या था सुनितिया चल पड़ी थी कांवडियों के पैर दबाने के लिए। रोका भी था उसके पति ने, “सुनीता, आज तुम कहीं मत जाओ। मेरा मन परेशान हो रहा हैं। मैं चाहता हूं तुम मेरे ही पास रहो ... बस मैं तुम्हे देखते ही रहना चाहता हूं।
“आ जाऊँगी ...... मैं जल्दी ही आ जाऊंगी, भगवान करे चाची की बताई बात सच हो जाए। तुम ठीक हो जाओ। मैं जल्दी आ आऊंगी ... तुम चिंता मत करना।” पति को सांत्वना बंधाती सुनितिया चल दी थी।
 सड़क के किनारे बने विश्राम स्थलों पर नवयुवक, जवान और लगभग अधेड़ कांवड़िया विश्राम कर रहे थे वहीं पास ही में उनकी कावडे़ मां गंगा के पवित्र अमृत से भरी थीं। कोई भांग चख रहा था तो कोई देसी में ही खुश था।
 सुनितिया एक जवान कांवड़िए के पैर दबाने के लिए बैठ गई थी। अपने पति के ठीक हो जाने की आस में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से वह उस थके हुए जवान कांवड़िए के पैर दबाए जा रही थी और कांवड़िया उसकी छाती की गहराई को नाप रहा था। सुबह से शाम हो गई थी। शाम को देर से वह घर लौट थी। घर में घुसी ही थी कि ... कि ... चीख पड़ी थी। उसका पति अपनी चारपाई से नीचे लुढ़का पड़ा था। आंखे दरवाजे की ओर थी जिनमें अपनी पत्नी सुनीता के आने की राह दिखाई दे रही थी। शायद इंतजार करके दरवाजे की ओर जाने की कोशिश की थी उसने। जा नहीं पाया था। सुनीता चीखे चली जा रही थी, “आ गई.. आ गई मैं, तुम्हें कुछ नहीं होगा। मैं भगवान शिव के भक्तों की सेवा से प्राप्त आशीर्वाद ले आई हूँ। तुम ठीक  हो जाओगे, तुम्हें ... तुम्हें  कुछ ... न ... हीं ... हो ... गा।”
सुनितिया की चीखों में अब शक्ति नहीं रह गई थी। उसके पति की खुली आंखें अब भी खुली की खुली ही थीं।


यही सच है

 स्त्री-पुरुष संबंधों, उनमें आपसी समझ, समानता और पुरुष दंभ पर इतना सुन्दर लेख मैंने आज तक नहीं पढा़ था।  मुझसे रहा नहीं गया सो मैंने फोन उठाया और कुछ नम्बर मिला दिए थे उस पत्रिका के संपादक के नाम।
 हैलो
 हैलो
 मैं प्रशांत बोल रहा हूँ।  संभवतः आप भुवन वर्मा बोल रहे हैं।
 जी हाँ मैं वर्मा बोल रहा हूँ।
 राइट, अभी आपकी पत्रिका पढ़ रहा था कि उसमें आरती जी का लेख पढ़ा।  बहुत खुशी हुई। स्त्री-पुरुष समानता पर इतना सुन्दर लेख पहले नहीं पढा था।  यार आपके पास उनका मोबाईल नम्बर हो तो प्लीज दे दीजिए मैं उन्हें बधाई देना चाहता था।  एक सांस में ही तो बोलता चला गया था मैं।
 क्यों नहीं। अवश्य। स्योर।  आरती जी मेरी पत्नी हैं।  अभी बात कराए देते हैं।  इतना कहने के पश्चात उस पत्रिका के संपादक भुवन वर्मा जी ने अपनी पत्नी अर्थात आरती जी को फोन दे दिया था।
 हैलो
 हैलो हाँ आरती जी। आपका लेख पढा़ बेहद खुशी हुई। बहुत सुन्दर, यूनिक, द बेस्ट बहुत अच्छा लिखा आपने।  पुरुषों की खूब खिंचाई की आपने ... मान गया।  गुड बहुत सुन्दर।  और न जाने क्या-क्या बोलता चला गया था मैं।  चुप तो मैं तब हुआ जब उन्होंने कहा था, हैलो, सर सुनिये तो मेरी ज्यादा तारीफ मत कीजिए मेरे पति पास में ही बैठे हैं और उन्होंने जब फोन मुझे दिया था तब स्पीकर ऑन करके दिया था।  वे बुरा मान जाएंगे। आप तो जानते ही हैं पुरुष के बिना स्त्री का क्या अस्तित्व। और उन्होंने फोन काट दिया था।  मैं पत्रिका के पन्ने खोले मोबाईल कान से लगाए ही रह गया था।