नीरजा माधव के ‘यमदीप’ में खुला किन्नरों के जीवित यथार्थ का तिलतिल मरता राज़

- किरण ग्रोवर

सारांश

विश्व के सभी समाजों में किन्नरों का भी एक वर्ग है-जिसे थर्ड जेंडर, हिजड़ा, तृतीय लिंगी, उभयलिंगी, यूनक, खोजवा, मौगा, छक्का, पावैया,खुस्त्रा,जनखा, अनरावनी, शिखण्डी, ख्वाजासरा आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। आज हम 21वीं शती के मशीनी युग में जी रहे हंै जहाँ हर काम बटन दबाने से ही चुटकियों में संपन्न हो जाते हैं। मगर मन व मस्तिष्क आज भी दकियानूसी विचारों की संकीर्णता की बेड़ियों में जकडेा हुये हंै। किन्नर समुदाय की स्थिति अत्यन्त दयनीय है,उनकी झोली में असीम पीड़ा है,जिससे हमारा समाज कोसों दूर हैं। संसद में पेश हुए विधेयक के जरिये किन्नरों के अधिकारों के संरक्षण के लिए केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘ट्रांसजेंडर पर्सन’बिल 2016 को मंजूरी दे दी। हिन्दी साहित्य में ‘किन्नर विमर्श’ अभी अपरिपक्व अवस्था में है, समाज की वैचारिकी इन्हें स्वीकारने में हिचकिचा रही है। साहित्य में किन्नर विमर्श से सम्बन्धित पांच उपन्यास हैं-यमदीप, तीसरी ताली, किन्नर कथा, गुलाम मंडी, पोस्ट बाॅक्स नं 203 नाला सोपारा। किन्नरों सम्बन्धी कथानक का चयन करना नीरजा माधव की सामाजिक दृष्टि की सम्पन्नता को रेखांकित करता है क्योंकि उन्होंने किन्नरों के जीवित यथार्थ की राज़ को खोला है। किन्नरों केे मन की अतल गहराइयों में हिल्लोरे लेती भावनाओं रूपी प्रश्नों का जवाब नीरजा माधव जी ने यमदीप उपन्यास में दिया है जिनमें मुख्य हैं- मुख्यधारा के समाज को किन्नर समुदाय का बुनियादी हक देने में कटौती नहीं करनी चाहिए। समाज को किन्नरों के अधिकारों की असरदार पैरवी करनी चाहिए। मीडिया इस समाज को मुख्यधारा से जोड़ने में सहायक हो सकता है। शिक्षा और संवेदनशीलता इन दो औजारों से किन्नर समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी। सत्ता के सामाजिक चरित्र को उभारा है। किन्नरों को सामाजिक, शारीरिक,मानसिक भेद शोषण के दौर में से गुज़रना पड़ता है। किन्नर समाज को स्वयं अपने प्रति संवेदनशील होने की भी आवश्यकता है। किन्नर समाज के बच्चों को सामान्य बच्चों के समान वातावरण प्रदान करना समाज की जिम्मेदारी है ताकि किन्नर समाज का आर्थिक,राजनीतिक व सामाजिक दृष्टि से उत्थान संभव हो सके।

बीज शब्द: जीवित यथार्थ, शैक्षिक सशक्तीकरण, शारीरिक भेद, यमदीप, बुनियादी हक, असरदार पैरवी, नीरजा माधव, संवेदनशीलता।

मूल प्रतिपादनः विश्व के सभी समाजों में सृष्टि के आधार स्तम्भ स्त्री और पुरुष के अतिरिक्त किन्नरों का भी एक वर्ग है-जिसे थर्ड जेंडर, हिजड़ा, तृतीय लिंगी, उभयलिंगी, यूनक, खोजवा, मौगा, छक्का, पावैया,खुस्त्रा,जनखा, अनरावनी, शिखण्डी, ख्वाजासरा आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। किन्नरों को चार वर्गो में विभाजित किया जाता है-बुचरा, नीलिमा, मनसा और हंसा।1 सम्पूर्ण किन्नर समुदाय को सामाजिक संरचना की दृष्टि से सात घरानों में बांटा जाता है,हर घराने के मुखिया को नायक कहते हैं, ये नायक ही अपने डेरे के लिए गुरु का चयन करते हैं। जब किसी परिवार में किन्नर का जन्म होता है तो परिवार का पिता पुरुषत्व पर सन्देह होने के भय से तृतीय लिंगी बच्चे को अपने से विलग कर देता है जोकि किन्नर समाज का सच है।

किन्नरों के उद्भव व अतीत के सम्बन्ध में अनेक अन्तर्कथाएं प्रचलित हैं,रामायण की प्रचलित कथा से किन्नरों की निश्छल और निस्वार्थ भावना से आविर्भूत हुई-
         नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे, सब सनमानि कृपानिधि फेरेे।।2

महाभारत के समय में भी किन्नर समुदाय की उपस्थिति रही है। शिखण्डी पात्र को ‘थर्ड जेंडर’ का प्रतिरुप स्वीकारा जाता है। अर्जुन ने भी अज्ञातवास का समय ‘वृहन्नला’ के नाम से व्यतीत किया। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार हिन्दू व मुस्लिम राजाओं द्वारा अन्तःपुर में रानियों की पहरेदारी के लिए किन्नरों का इस्तेमाल किया जाता था। अलाउद्दीन खिलजी के समय में किन्नर वरिष्ठ सैनिक अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। जहांगीर ने भी ख्वाजासरा हिलाल को प्रशासनिक अधिकारी व इफ्तिखार खान को जागीर का फौजदार बना दिया था। सुलतान मुजफ्फर के शासनकाल में मुमित-उल-मुल्क कोतवाल की पदवी पर आसन्न था। संस्कृत नाटकों व कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी कहा गया है कि राजा को भी हिजड़ों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए। किन्न्र समुदाय को धर्म ने, पुराणों ने स्वीकारा जिनका इतिहास 4000 साल पुराना रहा है, परन्तु आज भी किन्नर समुदाय समाज की व्यथा से पीड़ित क्यों।3 किन्नरों की दुनिया एक विशेष दुनिया है, जो मनुष्य के रूप में जन्म लेने के बावजूद भी अभिशप्त जीवन जीने को विवश हैं। गर्भावस्था की गड़बड़ी के कारण उनके साथ होने वाला सामाजिक भेदभाव उनमें हीन भावना को जन्म देता है जिससे उनका मनोबल टूटता है परिणामस्वरूप वे उग्र व्यवहार करने लगते हैं। किन्नर समाज की झोली में असीम पीड़ा है, जिससे हमारा समाज कोसों दूर हैं। हम आज़ाद देश के नागरिक हैं पर आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी किन्नर समाज अधिकारों से वंचित क्यों।4आज किन्नर शादी, विवाह या खुशियों के अवसर पर थिरकते नजर नहीं आते बल्कि आज स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि ये ट्रेनों, बसों, गलियों या किसी चैराहे पर भी तालियाँ पीट-पीटकर भीख माँगते नजर आ ही जाते हैं। समय की करवट ने किन्नरों को भी झकझोर दिया है।5

वसुधैव कुटुम्बकम् का छल रचने वाले समाज की बुनियाद ही गैर बराबरी के विचार पर टिकी है। समाज में किसी भी स्तर पर समतामूलक समाज की स्थापना का सपना देखने वालों का संघर्ष जारी है जिनमें किन्नर समाज भी शामिल हैं। आज हम 21वीं शती के मशीनी युग में जी रहे हंै जहाँ हर काम बटन दबाने से ही चुटकियों में संपन्न हो जाते हैं। मगर मन.मस्तिष्क आज भी उन्हीं पुरानी और दकियानूसी विचारों की संकीर्णता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। शायद यही एक वर्ग है जिसे परिवार से लेकर बाज़ार तक भी कहीं कोई कार्य नहीं दिया जाता। शादी और जन्मोत्सव के अवसर पर किन्नरों का मौजूदगी को शुभ मानकर दान दक्षिणा देना मुख्यधारा के समाज का षड़यन्त्र है ताकि यह समाज पारम्परिक पेशे से बाहर न निकल सके व आरक्षित क्षेत्रों में सहभागिता की दावेदारी न कर सके। समाज में किन्नर समुदाय की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। इसका स्पष्ट कारण है कि समाज व सरकार द्वारा किन्नरों के साथ उपेक्षित व्यवहार किया जाता है। सरकार ने तो बरसों तक इन्हें नागरिक अधिकार से वंचित रखा। भारत सरकार द्वारा दिये गये आंकड़ों के अनुसार देश में किन्नरों की संख्या चार लाख नब्बे हजार के लगभग है। आधुनिक समय में किन्नर समाज आर्थिक सामाजिक स्थिति के कारण भीख मांगने व वेश्यावृत्ति करने के लिए अभिशप्त है। जिस्मफरोशी की दलदल में गिर जाने से एड्स पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। कोई भी किन्नरों केे दर्द को सुनना,समझना व महसूस करना नहीं चाहता-
              कंगन है मेरे हाथ में,पर कलाई में ताकत है पुरुषों से अधिक
           आवाज़ है मेरी पुरुषों सीे, पर मन मेरा कोमल है  पुरुषों से अधिक
                        पर पूछता अस्तित्व मेरा, तू कौन है ?6

समाज यह नहीं जानता कि किन्नरों की शारीरिक संरचना क्या है,इस समुदाय के नियम क्या है, इनकी आजीविका के साधन क्या हैं,इनकी बिरादरी का ताना बाना क्या है, इनके जीवन का दर्द, इनकी मृत्यु के बाद होने वाली रस्मों से झलकता है। इनका अन्तिम संस्कार आधी रात को होता है,उससे पहले शव को जूतों से पीट-पीट कर दुआ मांगी जाती है कि ऐसा जन्म फिर न मिले। राज्य सभा चैनल के लिए बनाये गये वृतचित्र में ‘किन्नर लोक का सच’ में इस समुदाय की अनु कहती है कि किसी को स्वास्थ्यगत समस्या होने पर डाॅक्टर के पास जाते हैं तो डाॅक्टर हमें छूता नहीं है। हमारे देश में  बाल रोग,स्त्री रोग, नाक ,कान,गला, रोग विशेषज्ञ हैं,लेकिन हमारा देश हिजड़ों के रोगों को देखने के लिए विशेषज्ञ तैयार नहीं कर पाया,दरअसल यह किन्न्र समाज सरकार और नीति नियंताओं की सोच परिधि में नहीं आता।7 राजनीति के धरातल पर भी इनका प्रतिशत नगण्य है। संसद में किन्नर समुदाय के किसी व्यक्ति ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई। विश्व में किन्नर समुदाय को ट्रेांसजैन्डर के रूप में मान्यता मिली है। किन्नर समुदाय की प्राचीनतम उपस्थिति दक्षिण अफ्रीका व वर्तमान में अमेरिका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया, यूरोप आदि देशों में मिलती है। किन्नर वर्ग की प्रास्थिति व अधिकारों के लिए 2006 में इंडोनेशिया में विश्व सम्मेलन के अन्तर्गत लिंगीय पहचान को मान्यता देते हुए सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया। इसके बाद अनेक देशों में कानून बनाये गये जिनमें ब्रिटेन कस समानता अधिनियम 2010, आॅस्ट्रेलिया का लिंग विभेद अधिनियम 1984 व संशोधन अधिनियम 2013,यूरोपियन यूनियन कानून 2006,27 देशों में लागू हेट क्राइम प्रिवेंशन एक्ट 2009 अमेरिका आदि मुख्य हैं।8 15 अप्रैल 2014 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और ए के सीकरी ने तीसरे जैण्डर को मान्यता देते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया है-  
“Seldom, our society realizes or cares to realize the trauma, agony and pain which the members of Transgender community undergo, nor appreciates the innate feelings of the members of the Transgender community, especially of those whose mind and body disown their biological sex. Our society often ridicules and abuses the Transgender community and in public places like railway stations, bus stands, schools, workplaces, malls, theatres, hospitals, they are sidelined and treated as untouchables, forgetting the fact that the moral failure lies in the society's unwillingness to contain or embrace different gender identities and expressions, a mindset which we have to change.”9

अदालत ने लम्बे समय से किन्नर समाज की चली आ रही मांग को स्वीकार करके पहल की है। अब इस पहल को आगे ले जाने की जिम्मेदारी समाज की होगी। इा समुदाय में जन्म लेने वाले बच्चों के साथ भेदभाव न किया जाये। समाज सुधारकों को किन्नरों की यथास्थिति का संज्ञान लेना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि जब तक समाज जागृत नहीं होगा तब तक कोई भी कानून व सरकार इनको मुख्य धारा में नहीं ला सकती। संसद में पेश हुए विधेयक के जरिये किन्नरों को भेदभाव से बचाने और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘ट्रांसजेंडर पर्सन’बिल 2016 को मंजूरी दे दी।10 इस विधेयक के जरिये सरकार किन्नरों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिणक सशक्तीकरण के लिए तंत्र विकसित करेगी। किन्नर समाज हमारे शिक्षा दर्शन, शिक्षा विमर्श से एक सिरे से गायब है। अस्पष्ट लैंगिक पहचान वाला यह वर्ग संसार के सभी समाजों में कहीं कम तो कहीं ज्यादा के अनुपात में शोषण का शिकार बन रहा है।

आधुनिक दौर में उपजे विमर्श और अस्मिताओं के आन्दोलन का प्रभाव किन्नरों की स्थिति पर भी पड़ा है। मुख्य चुनाव आयुक्त टी॰एन॰ शेषन ने 1994 में किन्नरों को मताधिकार दे दिया था, इसके बाद 15 अप्रैल 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने किन्नरों को तीसरे लिंग के रुप में कानूनी पहचान दी।11 अगली कड़ी के रुप में सर्वोच्च न्यायालय का एक और फैंसला आया कि उन्हें शिक्षा व रोजगार के अवसर मुहैया करवाये जाने चाहिए। लिंगानुगत समस्याओं का निराकरण करते हुए चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध की जानी चाहिए, इन्हें बच्चा गोद लेने का भी अधिकार होगा। सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। चिकित्सा द्वारा स्त्री पुरुष किसी भी लिंग के रूप में स्वयं को परिवर्तित करवा सकते हंै। इन सब समाजों में किन्नरों को सुविधाओं को देने के उपरान्त क्या समाज का नजरिया इनके प्रति बदला है।

गर्भावस्था की गड़बड़ी के कारण लैंगिक स्थिति लाखों किन्नरों के प्रति समाज की नकारात्मक धारणा लैंगिक वर्चस्व का नमूना है। किन्नरों की मानसिक पीड़ा को साहित्य के द्वारा सामने रखा जा सकता है। हिन्दी साहित्य में ‘किन्नर विमर्श’ अभी अपनी आंखें खोल रहा है। किन्नरों को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर स्वतंत्र विमर्श की। विगत दो दशकों में किन्नरों ने भी सामाजिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने की पहल की है। साहित्य में किन्नर विमर्श से सम्बन्धित पांच उपन्यास हैं-यमदीप,तीसरी ताली, किन्नर कथा,गुलाम मंडी, पोस्ट बाॅक्स नं 203 नाला सोपारा।12 इन उपन्यासों की कथावस्तु किन्नर समुदाय के मनुष्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है और समाज में उनकी निर्धारित भूमिकाओं की आलोचना करती है।

उतर प्रदेश के जौनपुर जिले की निवासी नीरजा माधव जी ने अंग्रेज़ी साहित्य में पारंगत होते हुए भी हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। साहित्यिक उपलब्धियों से नीरजा माधव जी ने मध्य प्रदेश अकादमी पुरस्कार, शंकराचार्य पुरस्कार, सर्जना पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, शैलेश मटियानी पुरस्कार,राष्टीय कथा पुरस्कार अर्जित किया। नीरजा जी ने औपन्यासिक कृतियों यथा यमदीप, तेभ्यः स्वधा,ईहामृग, अवर्ण महिला कांस्टेबल की डायरी,अनुपमेय शंकर,गेशे चम्पा, मृगदाय के अहेरी, धन्यवाद सिवनी आदि से हिन्दी साहित्य में ओजिस्वता का स्वर मुखरित किया। किन्नरों सम्बन्धी कथानक का चयन करना नीरजा माधव की सामाजिक दृष्टि की सम्पन्नता व जागरूकता को रेखांकित करता है क्योंकि उन्होंने किन्नरों के जीवित यथार्थ की  पर्तों को खोला है।13 आम आदमी ने  कभी यह जानने की यह कोशिश नहीं की कि किन्नरों के अन्दर धड़कने वाले दिल में क्या हलचल होती है। उनके मन की अतल गहराइयों में भावनाएं हिल्लोरे लेती हैं। इन सभी प्रश्नों का जवाब नीरजा माधव जी ने यमदीप उपन्यास में दिया है। Dr. NeerjaMadhav is very much famous for her untouched themes of novels and stories, as her one of the novels entitled `Yamdeep' is first Hindi novel that deals with internal problems and mental agony of eunuchs.14

हमारे समाज में जेंडर की समाजीकरण की प्रक्रिया के तहत स्त्री पुरुष व्यवहार व स्वभाव को ही स्वीकृति दी जाती है। इस दृष्टिकोण से किन्नर समुदाय का व्यवहार समाज में स्वतः ही अव्यावहारिक मान लिया जाता है। जेंडर निर्मिति में यौन व्यवहार की शिक्षा नहीं दी जाती अपितु उनके यौन व्यवहार को कानूनी अपराध माना जाता है जोकि उन्हें स्व से नफरत और आत्महत्या के लिए मजबूर करता है-
                     लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी
                   अंधा, बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मै।
                   सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज,
                    मैं ही बस ममतामय गोद से बिछड़ा हूं।15

परिवार के जो सदस्य इन्हें अपने पास रखना चाहते हैं,परन्तु समाज उन्हें विवश कर देता है कि वह बच्चे को किन्नर समाज को सौंप दें। यदि परिवार ऐसे बच्चों को पालना चाहता है तो समाज रूकावट क्यों बनता है। यही सवाल यमराज उपन्यास में उठाया गया है कि नन्दरानी के माता पिता उसे अपने पास रखना चाहते हैं। नन्दरानी की माता उसे पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थी। नन्दरानी की मां के सामने महताब गुरु एक सवाल उठाते हैं कि ‘माता जी किसी स्कूल में आज तक हिजड़े को पढ़ते-लिखते देखा है। किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है। पुलिस में, मास्टरी में, कलेक्टरी में--किसी में भी। अरे! इसकी दुनिया यही है, माता जी--कोई आगे नहीं आयेगा कि हिजड़ों को पढ़ाओ, लिखाओ नौकरी दो --जैसे कुछ जातियों के लिए सरकार कर रही है।’16 किन्नरों को सामाजिक, शारीरिक,मानसिक भेद शोषण के दौर में से गुज़रना पड़ता है। महताब गुरु का संवाद किन्नरों के जीवित यथार्थ का सत्य है।

उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न इस उपन्यास का केन्द्र -बिन्दु है,जहां जैविक भिन्नता समाज में इनके अस्तित्व को अस्वीकार्य बना देती है।17 किन्नर समाज न केवल जैविक असमानता को झेलता है अपितु लिंग आधारित असमानता का भी सामना करता है। इस उपन्यास की नन्दरानी अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान आए शारीरिक बदलाव को महसूस करने लगी-‘क्या नन्द रानी ,तुम कैसे चलती हो, हम लोगों की तरह चलो--कहीं हिजड़े देख लेंगे तो तुम्हें भी वही समझ बैठेगे।’18 यहां समझ का मसला सामाजिक संरचना में उनकी स्थिति से है जिसे समाज द्वारा अपमानजनक बताया जाता है क्या यही किन्नर समाज का सच है। यदि किन्नर समाज को शिक्षा का औजार मिल जाये तो इस समाज को रोशनी में नहाने से कोई नहीं रोक सकता।

किन्नरों की सामाजिक भूमिका की ओर नीरजा माधव ने यमदीप उपन्यास में हमारा ध्यान केन्द्रित किया है। मुम्बई की एक कम्पनी में बकाया धन की वसूली हेतु किन्नरों की नियुक्ति हुई और परिणामतः जिस ऋण की वसूली वर्षों से नहीं हो पा रही थी,उसे चुटकी बजाकर वसूल कर लिया जाता है। आर्थिक स्तर पर रोजगार उपलब्ध की बात नीरजा जी ने की है कि किन्नर समाज अपनी पारम्परिक भूमिका से बाहर निकल सके। इस उपन्यास में नाजबीबी का कहना है कि  ‘अगर सरकार हमें भी हथियार दे। मैं तो लड़ूंगी। लड़ते-लड़ते हिन्दुस्तान के पीछे अपनी जान दे दूंगी।’19लोकतान्त्रिक देश में किन्नरों के अधिकारों की असरदार पैरवी के लिए हमारा राजनीतिक संगठन मौन है। यही किन्नरों के जीवित यथार्थ का राज़ है।

इस उपन्यास के पात्र विशेष रूप से महताब गुरु, नाज़बीबी, छलै बिहारी,मानवी आदि घुंघरू की आवाज़ पर हमारे मन मस्तिष्क से सवाल करते हैं। नाज़बीबी के माता-पिता से महताब गुरू का संवाद हमारे अंतस को दो फांक कर देता है-‘‘आप इस बस्ती में रह नहीं सकते बाबूजी और अपनी बेटी को अपने साथ रख भी नहीं सकते....दुनिया में बदनाम और हंसी हंसारत के डर से। हिजड़ी के बात कहलाना न आप बर्दाश्त कर पाएंगे और न आपके परिवार के लोग। लूली लंगड़ी होती यह, कानी कोतर होती, तो भी आप इसे अपने साथ रख सकते थे, इसीलिए इसे अब इसके हाल पर छोड़ दीजिए। यही उसका भाग्य था, यही बदा था..सोच लीजिए, मर गई, सब्र कर लिया।.’20 यही जीवित यथार्थ है किन्नरों के समाज का -जिसका पर्दाफ़ाश नीरजा माधव जी ने किया है।

महताब गुरु के माध्यम से नीरजा जी ने समाज में किन्नरों के प्रति अपनाएं गये सत्ता के सामाजिक चरित्र को उभारा है। किन्नर समुदाय को न केवल मुख्यधारा से बाहर रखा गया अपितु इनके प्रति डर व अफवाहों को भी जनता में भरा जाता है।21 किन्नर समाज अलगाव की ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर हो जाता है। इस बात का विवेचन उपन्यास की पत्रकार मानवी करती है ‘ऐसा सुना जाता है कि आप लोग युवकों को बहला-फुसलाकर जबरन उनका ऑपरेशन करके हिजड़ा बना देते हैं’। महताब गुरु इन अफवाहों को नकारते हैं और कहते हैं ‘हमारी बस्ती में जल्दी कोई इंसान का पूत घुसता है ..कि किसी के आते ही हम उसे तुरंत आपरेशन कर देंगे पकड़कर ? डाक्टरी खोले बैठे हैं इसी कोठरिया में क्या ? यह देखो हमारा अंग, कोई काटा है कि अल्ला-रसूले वैसे भेजा है ?’22 मानवी का यह प्रश्न मुख्य धारा के समाज का प्रश्न था । यही कारण है कि समाज ने इन्हें इंसान की जगह शैतान समझा और उसी के अनुरूप निजी और सार्वजनिक जगहों में व्यवहार किया गया । सार्वजनिक जगहों पर लोग इनसे बात करना इनके साथ खड़े होने तक में अपमान समझते हैं। समाज की मानवता इनकी यौनिक पहचान के सामने अदृश्य हो जाती है ।

किन्नर समाज के अपने कुछ नियम-कायदे होते हैं। पहला इसे समाज में पूर्ण स्त्री और पुरुष के साथ संबंध रखना व उन्हें अपने समाज में शामिल करना।दूसरा समलैंगिक संबंधों को विषमलिंगी विवाह की मान्यताओं से बाहर स्थापित करना। तीसरा इस समुदाय के लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगना और चैथा वेश्यावृत्ति में सक्रिय होना। पांचवा हिंसा और चोरी करना। इसी कारण किन्न्र समुदाय किसी का दिल दुखाने व जीव हत्या को पाप मानता है। विवेच्य उपन्यास में महताब गुरु कहते हैं ‘अरे, हम तो खुद ही डरते हैं कि कहीं हमसे किसी का दिल न दुःख जाए । एक चींटी भी पैर के नीचे पड़ जाती तो सोचते हैं कि इसके अंडे होंगे...।’23यहाँ धर्म का आशय मुख्य धारा के धार्मिक संदर्भों से नहीं है यहाँ धर्म किन्नर समुदाय की वास्तविक धारणा है।

समाज ने इंसानियत के जिस तकाज़े पर किन्नर समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया। वही मनुष्यता किन्नर समुदाय में मुख्य धारा से अधिक प्रतिबिम्बित होती है।  सड़क पर पड़ी गर्भवती पगली के जन्मजात शिशु को मुख्य समाज द्वारा उपेक्षित किए जाने पर यमदीप उपन्यास की पात्रा नाजबीबी द्वारा पालन पोषण हो या महिला से बलात्कार के प्रयास को असफल कर उसकी रक्षा करना हो,नाज़बीबी का यह व्यवहार किन्नर समाज का सत्य रेखांकित करता है।24 विवेच्य उपन्यास में मानवी द्वारा नारी सुधार गृह के सफेदपोश चेहरे को बेनकाब करने के प्रयास में नेताओं का चरित्र भी सामने आने लगता है और यही जनता के रक्षक अपनी भक्षक भूमिका में दृष्टिगोचर होते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है जिस मनुष्यता व मानवता की बात मुख्यधारा का समाज करता है क्या वह यही मानवता है कि अपने से कमजोर का शोषण करे ? नाजबीबी कहती हैं ‘सोच रही हूँ, मेम साहब, कि भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया । अगर यह न बनाता तो जरूर मुझे औरत बनाता और तब ये सारे अत्याचार मुझे भी झेलने पड़ते’25 नाजबीबी के कथन में जीवित यथार्थ का राज़ निहित हैै। मुख्यधारा के लोगों को भी सोचने के लिए विवश कर देता है कि उनकी मानवता कितनी स्वार्थी है ?

समाज के साथ-साथ राज्य भी किन्नर समाज के प्रति अपने उतरदायित्व को नहीं स्वीकारता। महताब गुरु कहते हैं कि ‘कोई कुछ नहीं करता। समाज भी नहीं,सरकार तो अपना वोट मांगने के लिए उन्हीं के सामने चारा फैंकेगी, न तो रोज़ मुर्गियों की तरह अंडे देकर आबादी बढ़ाएगी । हम कौन से अंडे देने वाले हैं। अल्ला मियां ने तो हमें ये नेमत दी ही नहीं।’26 किन्नर समुदाय का यही जैविक यथार्थ है। इसी आधार पर समाज ने मुख्यधारा से इन्हें बाहर किया है। यहां मानव की उपयोगिता को समाज उनकी लैंगिक असमानता से क्यों सुनिश्चित करना चाहता है। यही किन्नर समाज के जीवित जैविक यथार्थ का विचारणीय प्रश्न है।

उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न इस उपन्यास का केन्द्र -बिन्दु है। उपन्यास के अंत में नाजबीबी का संकल्प चुनाव में खड़े होने की भूमिका तय करता है और वह कहती हैं,‘जरूरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाऊँगी। हर गंदगी को जड़ से साफ कर दूंगी। दुनिया में शांति रहे, और क्या चाहिए किसी को?’27 नाजबीबी का यह कथन शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर और रायगढ़ की मेयर मधु किन्नर की याद दिलाता है जिसका कहना था कि वह ताली नहीं बजाना चाहती वह कुछ करना चाहती हैं। यमराज उपन्यास में नीरजा माधव जी ने किन्नर समुदाय के लिए राजनीति को विकल्प के तौर पर उभारा है क्योंकि सत्ता ही सत्ता की आवाज़ को सुनती है। यह सत्य है कि किन्नरों को भी अपने हक में संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

राजनीतिक दृष्टि से किन्नर समुदाय में सशक्तिकरण का तंत्र विकसित करने की अनिवार्यता है। समाज की दृष्टि से सामाजिकों को जिम्मेदारी के प्रति सचेत किया जा रहा है ताकि वे अपने दायरे से बाहर निकल कर किन्नर समाज के अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रयास करें-
1 पासपोर्ट, राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाता, क्रैडिट कार्ड, विल लिखने का अधिकार।
2 कानूनी तौर पर स्त्री प्रभाग में यात्रा करने का अधिकार।
3 विवाह का अधिकार,बच्चा गोद लेने का अधिकार।
4 तलाक लेने का अधिकार।
5 60 वर्ष से उपर हिजड़ों के लिए पैंशन की सुविधा।
6 घर बनाने की सुविधा।
7 व्यापार करने हेतु बैंक लोन की सुविधा।
8 स्कूल में भर्ती अपितु फीस में कटौती तथा छात्रवृत्ति की सुविधा।
9 न्यायिक सुविधा में अनुदान।
10 अपना लिंग बदलवाने सम्बन्धी मैडिकल सुविधा मुफ्त।28
हिन्दी साहित्य में किन्नर विमर्श अभी अपरिपक्व अवस्था में है, समाज की वैचारिकी इन्हें स्वीकारने में हिचक रही है। आम आदमी ने कभी यह जानने की यह कोशिश नहीं की कि किन्नरों के अन्दर धड़कने वाले दिल में क्या हलचल होती है। उनके मन की अतल गहराइयों में भावनाएं हिल्लोरे लेती हैं। इन सभी प्रश्नों का जवाब नीरजा माधव जी ने ‘यमदीप’ उपन्यास में दिया है। किन्नरों सम्बन्धी कथानक का चयन करना नीरजा माधव की सामाजिक सचेतता को रेखांकित करता है क्योंकि उन्होंने किन्नरों के जीवित यथार्थ की पर्तों को खोला है जिसमें मुख्य हैं-मुख्यधारा के समाज को किन्नर समुदाय का बुनियादी हक देने में कटौती नहीं करनी चाहिए। समाज को किन्नरों के अधिकारों की असरदार पैरवी करनी चाहिए। मीडिया इस समाज को मुख्यधारा से जोड़ने में सहायक हो सकता है। शिक्षा और संवेदनशीलता इन दो औजारों से किन्नर समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी। सत्ता के सामाजिक चरित्र को उभारा है। किन्नरों को सामाजिक, शारीरिक,मानसिक भेद शोषण के दौर में से गुज़रना पड़ता है। किन्नर समाज को स्वयं अपने प्रति संवेदनशील होने की भी आवश्यकता है। किन्नर समाज के बच्चों को सामान्य बच्चों के समान वातावरण प्रदान करना समाज की जिम्मेदारी है ताकि किन्नर समाज का आर्थिक,राजनीतिक व सामाजिक दृष्टि से उत्थान संभव हो सके।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1 http _puneetbisaria.wordpress.com_.htm
2 हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर _ स्त्री काल.htm
3  NewsRace-B&w _ न्यूजरेस   हिजड़ा होना अभिशाप क्यूँ.htm
4  हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर _ स्त्री काल.htm
5  http://www.streekaal.com/2014/04/blog-post_20.html
6 पारू मदननाईक, मैं क्यों नहीं, पृ॰ – 165
7 पंजाब स्क्रीन  INDIAमानवाधिकार विमर्श में कहाँ खो जाती है तीसरे लिंग की आवाज़.htm
8 ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के लिए लोकसभा में विधेयक पेश _ खबर लहरिया - Khabar Lahariya.htm
9 पंजाब स्क्रीन  INDIAमानवाधिकार विमर्श में कहाँ खो जाती है तीसरे लिंग की आवाज़.htm
10 sathsath...  संविधान की नजर में इंसान हैं किन्नर.htm
11 किन्नरों को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करें पहले फिर श्रेणीकरण, आरक्षण की बात करें _ रायटोक्रेट कुमारेन्द्र.htm
12 हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर _ स्त्री काल.htm
13 नीरजा माधव.htm
14 https://www.facebook.com/neerja.madhav
15 http://shabdmitra-blogspot-in/2011/06/blog&post&4197-html
16 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।
17 .हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर _ स्त्री काल.htm
18 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।
19 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002। 
20 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।                                                                                                                                                                                          
21 http://www.streekaal.com/2014/04/blog-post_17.html
22 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।                                                                
23 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।                                                                 
24 NewsRace-B&w _ न्यूजरेस हिजड़ा होना अभिशाप क्यूँ.htm
26 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।                                                                
27 नीरजा माधव, यमदीप,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली,2002।                                                                
28 A. Chettiar, “The status of hijras in civil society: a study of the hijrasingreater Mumbai,” Ph.D. Dissertation, College of Social Work NirmalaNiketan, Mumbai, 2009.

डाॅ॰ किरण ग्रोवर
एसो॰प्रो॰,स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डी॰ए॰वी॰ काॅलेज,अबोहर।
चलभाष-94783-20028
                                                                        kirangrover@davcollegeabohar.com                                                   groverkirank@gmail.com