सुभद्रा खुराना की कविता

- सुभद्रा खुराना

सुभद्रा खुराना
सुधि स्वर्ण वेणु, तट पर
कोई पुकारता है,
भटके हुए स्वरों को,
रह-रह सँवारता है!

वह रेख एक धुँधली
मझधार नाव मचली,
हर लहर का सँवरना,
सुधियाँ उभारता है!

उनका समीप आना,
झिलमिल सुपथ दिखाना,
नव लक्ष्य का सहारा,
जीवन गुजारता है!

उन्माद राग के क्षण,
बहता विसुध समीरण,
मकरंद वीथियों में,
सपने दुलारता है!

दृग-सीप स्नवित मोती,
क्या कुछ चुभन न होती,
जगमग सुदीप उनका,
राहें उजारता है!

बन स्वप्न गीत छलना,
फिर रूठना-मचलना,
वह चित्र, मन अकेले
अक्सर उतारता है!