विरेंदर ‘वीर’ मेहता की लघुकथाएं

विरेंदर ‘वीर’ मेहता

पिता का घर 

आखिरकार अंतिम बस भी निकल गयी लेकिन राज नही आया। जाने कितनी देर से वह उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। आज वह उसके लिये अपने पिता का घर भी छोड़ आई थी। उसने राज को सब कुछ बताने के बाद, शाम को यहीं मिलने को कहा था लेकिन अब न तो राज फोन 'रिसीव' कर रहा था और न ही वह कहीं नजर आ रहा था। समय बढ़ने के साथ साथ उसका इंतजार भी अविश्वास में बदलने लगा था। वह समझ नही पा रही थी कि अब वह क्या करे और कहाँ जाये? आसपास आवाजाही भी बहुत कम हो चुकी थी और रात गहराती जा रही थी।

अचानक सामने से राज के 'बॉस' को आते देख कर वह कुछ असमंजस से भर गयी।

"बेटी, तुम यहाँ राज का इंतजार कर रही हो न!" बॉस ने उसके पास आकर उससे सीधे ही प्रश्न कर दिया।

"हाँ सर... लेकिन आप... राज नहीं आया, क्या वह किसी काम में फंस गया?" वह अचकचा गयी और एक साँस में बहुत कह गयी।

"देखो बेटी! जो मैं कह रहा हूँ वो ध्यान से सुनो।" उन्होंने अपनी गहरी नजरें उस पर टिका दी। "राज नही आयेगा, शायद कभी नहीं क्योंकि वह आज दोपहर ही 'रिजाईन' कर अपने परिवार..."  एक क्षण रुककर उन्होंने अपनी बात पूरी की, "... 'आई मीन' अपनी पत्नी के पास चला गया है।" 

"ओह नो ! उसने मुझे धोखा दिया।" एकाएक वह परेशान हो गयी।

"बेटी मैंने कई बार कहना भी चाहा पर शायद तुम दोनों में ये सिर्फ मित्रता का ही संबंध हो, ऐसा सोचकर कुछ नहीं कहा। लेकिन आज ऑफिस में आये तुम्हारे फ़ोन, और तुम्हारी बातें सुनने के बाद कहने के लिए कुछ शेष नही रहा था।"

"सर, मैं ही पागल थी जो सब जानते हुए भी उसके साथ घर बनाने के सुहाने सपने देखती रही।" उसकी आँखों में आंसू आ गए।

"बेटी, इस उम्र में देखे गए सपने, रेगीस्तान में चमकते पानी की तरह अक्सर मृगमरीचिका ही साबित होते है और वैसे भी जो घर तुम बसाने जा रही थी वह घर नही एक  'लिव-इन-रिलेशनशिप' की क़ैद ही होती।" 

"लेकिन मैं तो ऐसे रास्ते पर आ गयी, सर! जहां मेरे लिए अपना घर भी पराया हो गया है।" वह सुबकने लगी।

"नहीं बेटी, बच्चों के लिये पिता का घर कभी पराया नही होता। आओ मैं तुम्हे घर छोड़ दूँ, रात बहुत हो चुकी है।" कहते हुए उन्होंने उसका हाथ थाम लिया।


जाग्रत इच्छाएं 

"मैं अभी आई।" कहकर वह 'पगली' एक ओर को भाग गयी और वह हाथ में आई चोट पर ध्यान देने लगा।

... आवारागर्द लोगों की दोस्ती ही उसे इस बस्ती में ले आई थी जहां उसने इस पगली को पहली बार देखा था। पगली थी नहीं वह, बस बदहाल हालत और ऊलजूलुल बातें करने से ही पगली नाम पड़ गया था। अधिकतर रेलवे फाटक के पास ही नजर आती थी, नशेड़ी लोगों के इर्दगिर्द कूड़े के ढेर टटोलते हुए। औरों की तरह ही अक्सर उसकी नजरें भी पगली के अस्त-व्यस्त कपड़ो से झांकते अंगो को देखने का प्रयास करती पर कभी कभी उसे अपनी ओर देखता पाकर वह कुछ झेंप जाता लेकिन तब अक्सर वह हँस दिया करती। पता नही कुछ समझकर या यूं ही नासमझी में। और ऐसे ही आज भी, वह फाटक के पास खड़ा उसे देख अपनी भावनाओं की संतुष्टि में था जब उसने पगली को दो 'नशेड़ियों के साथ उलझते देखा। वे उसे जबर्दस्ती करने के इरादे से एक ओर खींचने की कोशिश कर रहे थे जब एकाएक वह उसकी ओर देख मदद के लिए चिल्लायी थी।

"सोच मत, यही मौका है पगली को अपनी तरफ 'अट्रैक्ट' करने का...!" उसके दिमाग ने कहा था और बस वह अकेला ही उन दोनों से जा भिड़ा था। उसने लड़ने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी और वैसे भी नशे की अधिकता से खोखले हुए वे दोनों उसके सामने अधिक नही रुक सके और भाग खड़े हुए थे।....

"ऐ ! लाओ पट्टी बांध दूँ।" पगली कपडे के कई पट्टीनुमा टुकड़े लिए वापिस उसके सामने आ खड़ी हुयी थी।
उसने सहज ही हाथ आगे बढ़ा दिया और उसकी आखें पगली के चेहरे पर अपने लिए प्रेम-भाव तलाश करने लगी। अक्सर जागने वाली इच्छाएं फिर जाग्रत होने लगी थी।

"अब ठीक है न।" एक कुशल नर्स की तरह चोट पर पट्टियां बांधने के बाद वह कह रही थी। "और हाँ, एक ये बची है, ये भी तेरे लिए।" बात पूरी करते हुए उसने, उसका हाथ थाम लिया था।

और क्षण भर में उन टुकड़ो में से बचा आखिरी रेशमी टुकड़ा उसकी कलाई पर बंधकर चमकने लगा था...

उसकी आखें अभी भी पगली के चेहरे पर थी लेकिन जाग्रत इच्छाएं अनायास ही उसके इस पवित्र टुकड़े में जलने लगी थी।