Na Kisi Ki Aankh ka Noor Hoon - Bahadur Shah Zafar

 Ghazal by Bahadur Shah Zafar – A Translation by Padmaja Iyengar-Paddy
Padmaja Iyengar 'Paddy'
न किसी की आँख का नूर हूँ
न किसी के दिल का करार हूँ
जो किसी के काम न आ सका
मैं वो एक मुश्त-ए-गुबार हूँ

Neither am I the light of anyone’s eyes
Nor am I the peace for any heart’s sighs
I am just that fistful of mud
Of no use to anyone, a dud

न तो मैं किसी का हबीब हूँ
न तो मैं किसी का रकीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ
जो उजड गया वो दयार हूँ

Neither am I anyone’s pal
Nor am I anyone’s rival
I am a destiny gone haywire
I am a place deserted entire

मेरा रंग रूप बिगड़ गया
मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन  खिज़ा में उजड गया
मैं उसी की  फसले-बहार हूँ

Disfigured is my appearance
Separated am I from friends
I am that garden’s spring-bloom
That’s ruined by autumn’s gloom

पए फातिहा कोई आये क्यूँ
कोई चार फूल चड़ाए क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ
में वो बेकसी का मज़ार हूँ

Why should anyone at my grave pray
Why should anyone on it flowers spray
Why should anyone on it a lamp light
For I am a tomb of such a blight