भगवान हैं - कविता

डॉ. हरिमोहन गुप्त
सभी मूर्तियाँ मिट्टी निर्मित या केवल पाषाण हैं,
मात्र भावना है यह मन की, इसीलिए भगवान हैं।

           आदि काल से ही मानव ने किया सृजन है,
           छैनी और हथौड़ी का ही किया चयन है।

           जाने कितनी प्रतिमाएं गढ़-गढ़ कर छोड़ी,
           लेकिन कुछ में श्रद्धा मान किया अर्पण है।

प्राण प्रतिष्ठा हुई तभी तो, वे जग में पहचान हैं ,
मात्र भावना है यह मन की, इसीलिए भगवान हैं।

           दृष्टि हमारी समुचित हो बस यही मानना,
           मन पवित्र हो, बस वैसी ही बने भावना।

           शीश झुकाया हर पत्थर शिव शंकर जैसा.
           मन में ही विश्वास जगा, तब बनी धारणा।

घन्टे, घड़ियालें जब बजते, पाते तब सम्मान हैं,
मात्र भावना है यह मन की, इसीलिए भगवान हैं।

           मन्त्र जगाया हमने ही तो जन मानस में,
           श्रद्धा औ विश्वास जगाया है साहस में।

           निष्ठा और लगन ने ही जब साथ दे दिया,
           उन्हें बनाना सचमुच में अपने ही वश में।

ऊँचे आसन पर बैठाया, तब वे हुए महान हैं,
मात्र भावना है यह मन की, इसीलिए भगवान हैं।

           जिनको हमने पूजा वह आराध्य हो गया,
           साधन से जो मिला, वही तो साध्य हो गया।

           रोली,चन्दन, अक्षत या नैवेद्य चढ़ाया,
           मिली भावना, वर देने को बाध्य हो गया।

हमने पूजा, सबने पूजा, अब देते वरदान हैं,
मात्र भावना है यह मन की, इसीलिए भगवान हैं।