संध्या तिवारी की लघुकथा

संध्या तिवारी
जन्म-जन्मांतर

यज्ञ वेदी पर बैठी गार्गी ने अपने फैमिली पंडित जी से कहा ;
"यज्ञ आरम्भ कीजिये पंडित जी।"
"आज भइया जी नहीं बैठेंगे हवन पर क्या?" पंडित जी ने पूछा
"जी नहीं पंडित जी आज उन्हे काम से बाहर जाना है इसलिये मै ही अकेली हवन करूंगी।"
"जी, जी अरे! क्यों नही, अपने यहाँ तो शास्त्रों में महिलाओं को पति के बिना पूजा अर्चना का विशेष अधिकार प्राप्त है लेकिन पुरुष का अकेले यज्ञ कर्म पूर्ण नहीं माना जाता है।"
बहूजी पंडित जी खीसें निपोरते हुये बोले।
गार्गी संक्षिप्त सा 'जी' कहकर शान्त भाव से पंडित जी का नवग्रह स्थापन देख रही थी।
पंडित जी अपनी ही रौ में आगे बोले ;
"आपको याद है न, वह कथा जब श्री रामचन्द्र भगवान जी को यज्ञ करना था और सीताजी उनके पास नहीं थीं, तो उन्होने स्वर्ण की 'सीता प्रतिमा' बना कर अपने समीप स्थापित की तब जाकर उनका यज्ञ कर्म पूरा हुआ।"

कहकर पंडित जी गार्गी की और देखा उस समय उनका मुखमण्डल अपनी विद्वता के दर्प से दपदपा रहा था।

"जी, पंडित जी। आप तो ज्ञान के सागर है, लेकिन मेरी कुछ शंकायें है क्या आप निवारण करेंगे?" गार्गी ने विनयावत स्वर में पूछा।

"अरे! हाँ, हाँ क्यों नहीं ... बहूजी हम तो हैं ही यजमान की शंका निवारण हेतु। पूछिये क्या पूछना है?"

"पंडित जी दुर्गा शप्तशती के अर्गला पाठ में एक स्तोत्र है: 
'पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।'
अगर इस मंत्र का पाठ, पत्नी को करना हो तो, क्या जोड़-घटाना होगा?"

गार्गी प्रश्न कर निवारण के निमित्त पंडित जी को देखने लगी।

एक सन्नाटा सा खिंच गया पंडित जी के चेहरे पर, परन्तु पलांश में स्वयं को सम्भालते हुये बोले, "हें हें हें! बहूजी आप तो ... अरे ! यह कोई पूछने वाली बात है, मंत्र वही पढ़िये, बस मन के भाव बदल लीजिये। अच्छा चलिये अब हवन प्रारम्भ करें। देर हो रही है।"

गार्गी के हाथ में फूल अक्षत सिक्का आदि रखकर पंडित जी मंत्रोच्चारण करते हुये बोले, "मैं आगे-आगे संकल्प मंत्र पढ़ता हूं पीछे पीछे आप दोहराना, "ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु --- गोत्रोत्पन्न, अपने गोत्र का नाम लीजिये"

गार्गी ने अपने जन्मगोत्र का नाम लिया। पंडित जी की मंत्र स्पीड को अचानक जैसे ब्रेक लग गया हो।

"ऊँहूँ अरे! बहूजी आप क्या करती हो आपको अपना याद नहीं?" पंडित जी की आवाज में झल्लाहट और आश्चर्य दोनों थे।

"क्यों नहीं, पंडित जी, मैने बिल्कुल ठीक अपने जन्मगोत्र का उच्चारण किया है।" गार्गी ने धीमें किन्तु दृढ़ स्वर में कहा।

"अरे! बहूजी, आपको भइया जी के गोत्र का नाम लेना है। विवाह पश्चात पति का गोत्र ही पत्नी का गोत्र होता है।" पंडित जी मुस्कुराते हुये बोले

"क्या मेरा जन्म नहीं? क्या मेरा गोत्र नहीं? क्या मेरे जन्मदात्री तात-मात नही? क्या मेरा जन्म स्थान नहीं? क्या मेरा जन्म समय नहीं? क्या मै नहीं चाहती मेरा पति मेरे अनुकूल हो?"

"बस बस... बहूजी, बहुत हुआ, या तो आप शास्त्रों के अनुसार चलो, या अपनी चलाओ। कितने प्रश्न है आपके?"

रुष्ट पंडित जी आसन छोड़ उठ खड़े हुये थे। उसी क्षण गार्गी को ऐसा लगा जैसे वह अपने किसी पूर्वजन्म में पहुँच गयी हो, जहां विद्वतजन की भरी सभा में 'गार्गी' के प्रश्न-प्रतिप्रश्न के उत्तर में भड़के हुये याज्ञवल्क्य कह रहे थे,अति प्रश्न न कर गार्गी, अन्यथा तेरे सिर के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे।