शशि पाधा का एक साहित्यिक साक्षात्कार

संस्कृत, और हिंदी की अध्यापिका, डोगरी और हिंदी की कवयित्री, सम्वेदना और देशप्रेम की गीतकार, और इन सबसे आगे, भारत के वीर सैनिकों के जीवन के गौरवपूर्ण पल एक सामान्य पाठक के सामने साक्षात करने वाली प्रभावशाली लेखिका शशि पाधा का नाम हिंदी साहित्य के लिये नया नहीं है। डॉ मृदुल कीर्ति द्वारा शशि जी की ताज़ा पुस्तक शौर्य गाथाएँ की समीक्षा आप सेतु के सितम्बर 2016 के अंक में पढ़ चुके हैं। आइये, पढ़ते हैं सेतु के लिये अनुराग शर्मा के साथ उनका सम्वाद  
शशि पाधा
अनुराग शर्मा: नमस्कार शशि जी, सेतु परिवार की ओर से आपका स्वागत है। सबसे पहले हमारे पाठकों को अपनी जन्मस्थली और बचपन के बारे में कुछ बताइये
शशि पाधा: नमस्कार अनुराग जी। मेरा जन्म पर्वतों की गोद में बसे मंदिरों के शहर जम्मू में हुआ था। माता-पिता दोनों ही शिक्षक थे तथा साहित्य एवं संगीत में विशेष रूचि रखते थे। घर में सुबह संस्कृत के पावन श्लोक तथा शाम आरती वंदन के मधुर स्वर गूंजते थे। मुझे याद है, नगर में कभी भी कोई साँस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता तो हम सपरिवार उसे देखने जाते थे। पिता और माता आल इंडिया रेडियो जम्मू में के कई कार्यक्रमों में अपने विचार देते थे और भाई जम्मू रेडियो के सुप्रसिद्ध गायक थे। अत: मैं भी इस जम्मू रेडियो से बचपन से ही जुड़ गई। घर में भी हर महीने संगीत सभा अथवा काव्य संध्या का आयोजन  होता था और हम हर आयु में उसमें भाग लेते थे। यह सब अब विशेष लगता है क्योंकि जीवन इतना तेजी से भाग रहा है। उन दिनों तो यही हमारी दिनचर्या थी। पुस्तकें, पत्रिकाएँ आसानी से उपलब्ध थीं तो पढ़ने का शौक भी  बचपन से ही हो गया। स्कूल में भी हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया और कई पुरस्कार भी पाए। अब ऑंखें बंद करके जब भी अपने अतीत में लौटती हूँ तो लगता है कितने सुखद दिन थे वो।

अनुराग शर्मा
अनुराग: रेडियो कश्मीर-जम्मू के निक्की और मुंशी अंकल तो मुझे अभी भी याद है। आपकी आरम्भिक शिक्षा दीक्षा क्या जम्मू में ही हुई? पढाई लिखाई में आप कैसी थीं? भाषा और साहित्य में शिक्षा किस स्तर तक हुई?
शशि: मैंने एमए संस्कृत, एमए हिन्दी तथा बीएड की शिक्षा प्राप्त की है। मेरी सारी शिक्षा जम्मू में ही हुई। पढ़ाई में ठीक ही रही हूँगी क्योंकि जब से याद है केवल एक बार ही द्वितीय श्रेणी में पास हुई थी। इसका मुझे कभी कभी खेद होता है। हालाँकि यह बात अब कोई मायने नहीं रखती। हर बार कक्षा में प्रथम आना तो पिता जी ने हँस कर कहना, “यह तो बस छोटी सी श्रेणी थी, अभी तो आपको बहुत पढ़ना है”। अब लगता है कि यह उनका आशीर्वाद था कि सदा अच्छा ही करने के लिए प्रेरणा भरे शब्द थे, पता नहीं। किन्तु उनकी वो हँसी और वो स्नेह भरे शब्द आज भी मेरे मन मस्तिष्क में गूँजते रहते हैं।  मेरे विद्यार्थी जीवन की सब से बड़ी उपलब्धि थी जब मुझे बीए की परीक्षा के बाद कन्वोकेशन में जम्मू –कश्मीर विश्वविद्यालय की ओर से ‘ऑल राउंड बेस्ट वुमेन ग्रेजुएट’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यानी पढ़ाई के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा रखने वाले विद्यार्थी को यह पुरस्कार दिया जाता था। मैं विद्यार्थी जीवन में नाटक करती थी, अपने कॉलेज और विश्वविद्यालय  का मैंने देश के अन्य राज्यों में हुई वाद–विवाद प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व किया था। जम्मू–कश्मीर राज्य द्वारा आयोजित सितार वादन प्रतियोगिता में वर्ष 1967 में प्रथम स्थान पाया था। इसके बाद एमए संस्कृत में भी मैंने फाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। एमए हिन्दी और बीएड की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी में उतीर्ण हुई। तो इस प्रकार मेरी शिक्षा यात्रा का अनुभव बहुत ही सफल एवं आनन्दमय रहा।

अनुराग: आप भारत में किन-किन प्रदेशों में रही हैं?
अनुराग: एक सैनिक अधिकारी से विवाह होने के कारण जम्मू तो मुझसे लगभग छूट ही गया। मैं कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तथा यूपी से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में भी रही हूँ। विशाल  भारत के विभिन्न नगरों में रहते हुए, विभिन्न संस्कृतियों को जीते हुए, विभिन्न भाषा भाषी लोगों से मिलते हुए मुझे इस अनेकता में केवल एकता ही दिखाई दी। अनुराग जी, सैनिक छावनियों का अपना एक विशेष वातावरण होता है, जो बाकी के शहरी जीवन से कुछ कुछ अलग होता है। हम सैनिक परिवार हर धर्म, हर राज्य के त्योहार एक साथ मनाते हैं। हर राज्य का खाना हम सब के घरों में बनता है। हमारे धार्मिक संस्थान का नाम भी ‘सर्वधर्म स्थल’ ही है। हिमाचल प्रदेश के अपार सौन्दर्य को भी बहुत पास से देखा- निरखा और केरल राज्य के मछुयारों के लोक गीत भी सुने। पूर्वोत्तर क्षेत्र की संस्कृति उत्तर के राज्यों से बिलकुल अलग- थलग है। पूर्वोत्तर राज्यों में लोग आराम से प्रकृति के साथ मिल कर  जिन्दगी जीते हैं, कोई भाग दौड़ नहीं। वहां उद्योग की कमी के कारण गरीबी भी है। हाँ, एक बात जो भारत के सभी राज्यों को एक लड़ी में पिरोती है, वो है इन सभी राज्यों के लोक संगीत का माधुर्य। शब्द अलग होते हैं, वाद्य भिन्न होते हैं किन्तु स्वरलहरी की मधुरता में एकरसता है।

अपने सैनिक जीवन में  मैंने बहुत कुछ देखा, सीखा जो एक अनमोल निधि की तरह मेरे साथ जीवन भर रहेगा। कम शब्दों में कहूँ तो मेरे पूरे व्यक्तित्व को तराशने में सैनिक जीवन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मैंने बंजारों वाला जीवन जिया है जिसे कहा जाता है आउट ऑफ़ सूटकेस। मेरा आरम्भिक सैनिक जीवन किसी जंगल में टेंट में रहते हुए आरम्भ हुआ था। वही मेरा घर था कई वर्षों तक। अब बड़े से घर और टेंट में मुझे कोई भी अंतर नहीं लगता।

अनुराग: आप अमेरिका कब आईं?
शशि: मैं अपने पति के सेवा निवृत होने पर वर्ष 2002 में अमेरिका आई थी। दोनों बेटे यहीं पर थे तो उनके साथ रहने का मोह हमें सात समुंदर पार ले आया।

अनुराग: भारत और यहाँ की जीवन शैली में आपने क्या अंतर पाया?
शशि: आपने पूछा है कि दोनों देशों की जीवन शैली में क्या अंतर है? मैं तो यही कहूँगी कि जितना धरती और आसमान में अंतर है। जब प्रकृति ने ही दोनों देशों को इतना भिन्न स्वरूप दिया है  तो भौतिक अंतर होना तो स्वाभाविक ही है। जब भारत में दिन होता है तो यहाँ रात होती है, जब भारत में वसंत की आहट होती है तो यहाँ सर्दी अपने पूरे यौवन पर होती है। किन्तु इतना अंतर होते हुए भी मुझे इस देश की बहुत सी बातों ने प्रभावित किया है जिनमें से कुछ का मैं उल्लेख करना चाहूँगी।

अनुराग: जी बताइये कि यहाँ की किस बात ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया और क्यों?
शशि: सर्वोपरि तो है स्वच्छता के प्रति प्रत्येक नागरिक की प्रतिबद्धता। यहाँ पर ढूँढने पर भी आपको कहीं पर भी कोई कचरा नजर नहीं आएगा जो भारत के आम नगरों से बिलकुल उल्टी स्थिति है। इसके बाद यहाँ कि संस्कृति की मुख्य विशेषता है यहाँ की लोगों के व्यवहार में शिष्टता।  यानी कोई लाइन नहीं तोड़ता, कोई दरवाज़ा आपके मुख पर बंद नहीं करता। हर स्थान पर लोग आपकी सहायता के लिए तैयार हैं। बैंक में जाइए तो सब से पहले पूछते हैं, how can I help you? आते जाते हर अजनबी आपका अभिवादन करेगा या ‘आपका दिन शुभ हो’ कह कर पूरे दिन के लिए आपको शुभकामना दे देगा। यहाँ कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं। आप अपनी योग्यता और मेहनत के बल पर सफलता की सीढियाँ चढ़ते जाओगे। किसी की सिफारिश, अनुशंसा की आवश्यकता नहीं। हाँ कुछ अलग भी लगता है जैसे भारत में संयुक्त परिवार हैं तो यहाँ एकल परिवार ही हैं अधिकतर। एक दूसरे से मिलने के लिए बहुत पहले समय और दिन  तय करना पड़ता है। गलियाँ मोहल्ले वाला जीवन नहीं, बिलकुल एकांत वास का वातावरण ही रहता है। शुरू में आते ही मुझे लगा था कि यहाँ तो जीवन मशीनी है यानी आपका हर पल  घड़ी की सूई देख कर ही गुजरता है। इसी भाव को मैंने एक कविता में लिखा था ‘समय यहाँ यूँ भागा फिरता / हर कोई पीछे भागे।  लगता जैसे यहाँ की सूईयाँ/ समय से चलती आगे।
 है ना सही बात?

अनुराग: जी बिल्कुल सही कहा आपने। क्या आप भारतीय संस्कृति से, अमेरिका को कोई सीख देना चाहेंगी?
शशि: सीख तो कुछ भी नहीं देना चाहूँगी क्योंकि दोनों ही संस्कृतियों का अपना -अलग स्वरूप है, अपनी विशेषताएँ  हैं। अगर दोनों देशों के लोग आपस में अपनी संस्कृति का खुले दिल से आदान प्रदान करें तो दोनों  में बहुत कुछ नया जुड़ेगा। जैसे राजहँस मोती चुन लेता है वैसे ही कुछ यहाँ भी होना चाहिए।  और यह कार्य हमारी नई पीढ़ी बहुत आसानी से कर सकती है। उनके पास भारत की संस्कृति भी है और भारतीय  जीवन मूल्य भी उन्हें धरोहर की तरह मिले हैं। वे  यहाँ की संस्कृति की अच्छी बातें भी अपने जीवन में ढाल  सकते हैं। ऐसी संस्कृति सार्वभौमिक होगी। तभी तो आज कल कहा जा रहा है कि दुनिया एक विश्व गाँव ( Global Village) बनने जा रही है।

अनुराग: साहित्य में आपकी रुचि कैसे उत्पन्न हुई?
शशि: अनुराग जी, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मैं सदा ही भावुक हो जाती हूँ और अतीत के गलियारों में खो जाती हूँ। साहित्य का वातावरण तो घर से ही मिला। नंदन, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि पत्रिकाएँ सदा घर की शोभा बढ़ाती थीं। गर्मियों की छुट्टियों में माता-पिता पुस्तकालय से बहुत सी पुस्तकें ले आते थे। उन्हें पढ़ते देख हमें भी पढ़ने की आदत सी हो गई। बात भी अधिकतर किताबों की ही होती थी। तो स्वाभाविक ही है कि  बाल्यकाल से ही कुछ ना कुछ लिखने की हॉबी हो गई थी।

अनुराग: साहित्य में कौन-कौन सी विधायें आपको पसंद हैं?
शशि: साहित्य की सभी विधाओं में मैं रूचि रखती हूँ। कहानी पढ़ना अधिक पसंद है, क्योंकि कहानी का आकार  छोटा होता है और पात्र, घटनाएँ भी कम। पढ़ते-पढ़ते अंत तक पहुँचने की लालसा रहती है।  जैसे ही कहानी का अंत होता है एक आत्मसंतुष्टि की अनुभूति होती है। कविताएँ पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है। कविता में कल्पना और भाव को शब्दों के ताने-बाने में बुना जाता है। पढ़ते पढ़ते मन उनमें खो ही जाता है। पहले उपन्यास बहुत पढ़े लेकिन अब समयाभाव के कारण छूट से गए। साहित्य रूचि का कोई माप दंड नहीं हो सकता। जो भी अच्छा साहित्य मिला उसे पढ़ने में आनन्द ही आता है।

अनुराग: आप लेखन की किस विधा में सिद्धहस्त हैं?
शशि: लेखन में सिद्धस्त तो कोई भी लेखक जीवन भर नहीं हो सकता क्योंकि रचनात्मकता तो एक अंतहीन यात्रा है। मैं तो अभी इस महा यात्रा के दूसरे- तीसरे पड़ाव तक ही पहुँची हूँ। विद्यार्थी जीवन में कच्ची-पक्की कहानियाँ लिखती रही,जो रेडियो के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचीं। कविता लिखी भी तो संकोचवश डायरी के पन्नों में ही दबी रही। सैनिक जीवन को लेकर कई लघु नाटिकाएँ लिखीं और उनका मंचन भी किया। फिर कई वर्षों तक रचनात्मकता मुझ से रूठी रही। कुछ नहीं लिखा। फिर अचानक कारगिल का भयंकर युद्ध हुआ जो टीवी के माध्यम से प्रत्येक घर में घर कर गया। सैनिक पत्नी थी अत: देश प्रेम, देश भक्ति और सैनिकों के प्रति श्रद्धा के ऐसे भाव मन के समन्दर में लहरों से उमड़े कि लेखनी पुन: जीवित हो गई। अपने मनोभावों  की अभिव्यक्ति के लिए मैं तल्लीन होकर कविता करने लगी। यह सिलसिला वर्ष 1999  से लेकर अब तक चलता ही रहा। इस बीच मैंने सैनिकों के अदम्य शौर्य, बलिदान और संकल्प की भावनाओं को शब्दबद्ध किया अपने एक संस्मरण संग्रह “शौर्य गाथाओं” में। तो आपके प्रश्न का उत्तर यही है कि अभिव्यक्ति माध्यम चाहती है, विधा वो स्वयं चुन लेती है। इसे कभी सोचा नहीं। हाँ काव्य मेरी मुख्य विधा है।  किन्तु आजकल  मैं अधिकतर संस्मरण ही लिख रही  हूँ।

अनुराग: ऐसा क्यों?
शशि: आपके क्यूँ के उत्तर में मैं यही कहूँगी कि मैं अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण भाग से इतनी बंधी हूँ कि मेरी दृष्टि, सोच, साँसें सभी सैनिकों की अमर गाथाओं में ही रची-रमी रहती है। आज भारत की सीमाओं पर कितने शूरवीरों ने अपने प्राणों को उत्सर्ग किया है, कितने जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए हैं। उनके परिवार, बच्चे युद्ध की इस भीष्म अग्नि की लपेट में आ गए हैं। कई बच्चों का भविष्य असुरक्षित हो गया है। किन्तु हमारे राजनेता, आम जनता इन बातों को नहीं जानती। वो बस उतना ही जानती है जो मीडिया उन तक पहुँचाता है।  अब मेरी लेखनी इन्ही वीरों की अमर गाथाओं को शब्दबद्ध करके जन जन तक पहुँचने का संकल्प ले चुकी है। यही मेरी विधा है वर्तमान में और शायद भविष्य में भी यही रहेगी।

अनुराग: क्या आप डोगरी में भी लिखती हैं?
शशि: अनुराग जी, डोगरी तो मेरी मातृभाषा है और यह है भी बहुत मीठी। आरम्भिक लेखन डोगरी में ही हुआ। रेडियो जम्मू के लिए कई कहानियाँ डोगरी में लिखी। किन्तु विवाह के बाद परिवेश बिलकुल बदल गया और मैं अन्य नगरों में ही अधिकतर रही। अत: लेखन ने भी हिन्दी को अपना माध्यम चुन लिया। अब भी डोगरी में कुछ ना कुछ लिख लेती हूँ किन्तु अधिक नहीं।

अनुराग: जी, डोगरी की मिठास के बारे में शब्दशः सहमत हूँ। उसे मैंने अपने बचपन में खूब महसूस किया है, जिया है। सरल लोगों की मीठी भाषा है। आप हमें अपनी पुस्तकों, सम्मान और पुरस्कार के बारे में भी कुछ बताइये न?
शशि: मेरे अभी तक चार काव्य संग्रह और एक संस्मरण संग्रह प्रकाशित हुए हैं इसके साथ ही कई साझे संस्करणों में मेरी रचनाएँ संग्रहित हैं जिनमें मुख्य है, कविता अनवरत, लघुकथा अनवरत, पीर भरा दरिया (माहिया संग्रह), अलसाई चाँदनी (सेदोका संग्रह) एवं यादों के पाखी (हाइकु संग्रह)। इसके साथ ही अनेक वेब पत्रिकाओं में तथा मुद्रित पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

पुरस्कार तो अधिक नहीं मिले। पाठकों का स्नेह ही मेरा सब से बड़ा पुरस्कार है। वर्ष 2016 में  विश्व हिन्दी निदेशालय के माध्यम से मेरे काव्य संग्रह ‘अनंत की ओर’ को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही राष्ट्र भाषा प्रचार समिति (जम्मू शाखा) ने मुझे मेरे लेखन के लिए 2016 में सम्मानित किया।

अनुराग: क्या आपके लेखन पर किसी अन्य साहित्यकार का प्रभाव दिखता है?
शशि: मैंने अभी तक इतना तो नहीं लिखा कि कोई मेरे लेखन को किसी साहित्यकार से प्रभावित कहे। फिर भी  अगर पाठक कहे कि आपकी रचनाओं में अमुक रचनाकार की झलक मिलती है तो यह बात मेरे लिए एक पुरस्कार से कम नहीं। आरम्भ में मुझे भी कहा गया कि आदरणीया महादेवी जी के छायावाद की झलक मेरी रचनाओं में दिखाई देती है। मैंने उन्हें खूब पढ़ा भी है, जय शंकर प्रसाद की रचनाएँ भी बहुत पसंद थी। दोनों प्रकृति और प्रेम के चितेरे थे। अत: मेरे भी भावपक्ष में इन दोनों का प्रभाव रहा होगा। उनके जैसा सौन्दर्य बोध और उसको शब्दों में बाँधना तो मेरे लिए एक साधना ही होगी। किन्तु यह प्रभाव स्वायत: ही है, अनायास ही है।

अनुराग: विश्व की अन्य भाषाओं की अपेक्षा हिंदी साहित्य क्यों पिछड़ रहा है? हिंदी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ बिकती क्यों नहीं हैं?
शशि: अनुराग जी, इन दोनों प्रश्नों का उत्तर एक ही है। हिन्दी साहित्य के लिए पाठकों का अभाव। आज मनोरंजन के लिए द्रश्य–श्रव्य आदि इतने माध्यम हो गए हैं कि कोई भी एक स्थान पर बैठ कर पुस्तक पढ़ने को तैयार नही। हमारे समय में जो समय पुस्तक पत्रिका पढ़ने में बीतता था वो अब टेलीविजन के सामने बीतता है। फिर अंतर्जाल पर ही इतना साहित्य उपलब्ध हो गया है कि कोई मुद्रित साहित्य खरीदता ही नहीं। लोगों की रूचि भी बदल गई है। आज सिनेमा और टेलीविजन पुस्तकों पर हावी हो गए हैं।

ऐसा नहीं है कि हिन्दी साहित्य पिछड़ रहा है। हिन्दी में भी बहुत लिखा जा रहा है और अच्छा लिखा जा रहा है किन्तु आज के साहित्य को प्रोमोट करने के साधन कम हैं। मैंने देखा है कि अंग्रेजी भाषा की कोई किताब आती है तो उसे बाज़ार में लाने के लिए प्रतिनिधि ( एजेंट) या कोई संस्था काम करती है। उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने का उपक्रम आरम्भ हो जाता है। हिन्दी के लेखकों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। एक लेखक की किताब आई, वो स्वयं उसे अपने मित्रों को भेंट करेगा, कोई मित्र समीक्षा भी लिख देगा और किताब रह जाएगी अलमारी में बंद। शायद यह एक मन;स्थिति ही है कि कोई भी खरीदकर किताब पढ़ने को राजी नहीं। आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती हिन्दी की किताबें। क्या आपकी या मेरी किताबें किसी बुक स्टॉल पर बिकती हैं? नहीं ना? तो पाठक को इनके विषय में कैसे जानकारी होगी?

साहित्य पिछड़ नहीं रहा है, हाँ विचारधाराओं में परिवर्तन आ रहा है, वातावरण में परिवर्तन है, राजनैतिक–सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन हो रहा है तो लेखन में आन्दोलन तो होगा ही। ऐसी स्थिति में संपादकों का भी योगदान होना चाहिए। अगर किताब अच्छी है तो उन्हें भी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचाई जाए। मगर ऐसा कुछ भी तो नहीं हो रहा। शायद यही कुछ मुख्य कारण हैं।

अनुराग: वर्तमान हिंदी साहित्य सामान्य जन-जीवन के कितना निकट या कितना दूर है?
शशि: साहित्य कभी जनजीवन से दूर नहीं हुआ। लेखक समाज में रह कर जी देखता है, अनुभव करता है, वही शब्दों में ढालता है। हर लेखक को रचनात्मकता का बीज, खाद, पानी अपने आस–पास के वातावरण से ही मिलता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास पर दृष्टि डालें तो यही देखा है कि उस समय में जैसी सामाजिक- राजनैतिक परिस्थिति थी, वही साहिय में उभर कर आई। लेखक राजनेता या समाज सुधारक तो नहीं होता किन्तु अपने लेखन के माध्यम से लोगों से जुड़ना चाहता है।  आज का साहित्य भी जन जीवन का ही प्रतिबिम्ब है।

अनुराग: आपके साहित्यिक जीवन की सफलता में आपके परिवार की क्या भूमिका रही है? क्या आपके परिजन आपकी रचनाएँ पढ़ते हैं?
शशि: मेरे साहित्यक जीवन में मेरे परिवार का बहुत बड़ा योगदान है। मेरे साहित्य प्रेमी माता-पिता, गायक भाई मेरी कच्ची-पक्की रचनाएँ पढ़ कर बहुत प्रसन्न होते थे। विवाह के बाद मेरे पति ही मेरे पहले श्रोता, पहले आलोचक रहे हैं। सैनिक अधिकारी होने के नाते इन्हें पुस्तकें पढ़ने का इतना समय तो नहीं मिलता था किन्तु जब से यह सेवानिवृत हुए हैं और मैं लिखन में अधिक सक्रिय हुई हूँ, मेरे पति मेरी हर रचना सुनते हैं और अपनी बेबाक टिप्पणी भी देते हैं। भारत में तो मेरे परिवार के लोग बड़े चाव से मेरी पुस्तकें पढ़ते हैं लेकिन यहाँ नहीं। बस इसे generation Gap कहें या रूचि की कमी। हो सकता है समयाभाव भी हो। फिर इसमें कोई दो राय नहीं कि आज के जीवन में अंग्रेज़ी का वर्चस्व तो है ही।

अनुराग: आपकी कुछ प्रिय पुस्तकें? प्रिय साहित्यकार? ऐसी किताब जिसने आपके जीवन की दिशा बदली हो?
शशि: प्रिय पुस्तकें तो बहुत हैं। जो भी अच्छी पुस्तक पढ़ी, कुछ दिन उसी के पात्र, सौन्दर्य मन मस्तिष्क में छाया रहा। हर अच्छी पुस्तक प्रिय हो जाती है। महादेवी वर्मा, जय शंकर प्रसाद का प्रकृति सौन्दर्य चित्रण, कबीर के दोहे, जायसी का विरह वर्णन, मीरा, सूर आदि महाकवियों के शब्द एवं भाव बोध ने बहुत प्रभावित किया। जब मैथिलीशरण शरण गुप्त का लघु काव्य ‘उर्मिला’ पढ़ा तो लक्ष्मण पत्नी उर्मिला के साथ हर सैनिक पत्नी की विरह को जोड़ दिया। उन दिनों मैंने भी ‘उर्मिला की विरह’ नाम से एक लघु काव्य लिखा। शरत चन्द्र के उपन्यासों के नारी पात्रों का सूक्ष्म चरित्र चित्रण, शिवानी की कहानियों एवं उपन्यासों में नारी मन की असीम गहराई के तल तक डूबना, अमृता प्रीतम के रूहानी प्रेम की अभिव्यक्ति। यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। लगभग सभी अच्छे  लेखकों को पढ़ा है और उनसे सीखा ही है।

अंग्रेजी साहित्य की बात करें तो डी. एच लॉरेंस, थॉमस हार्डी, पर्ल एस बक, लियो तोल्स्तोय, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, विलियम वर्ड्सवर्थ, - सभी की पुस्तकें पढ़ी हैं। कह नहीं सकती, किस से अधिक प्रभावित हूँ। सभी पुस्तकों के अंश मन मस्तिष्क के किसी कोने में सदैव समाये रहते हैं और प्रेरित भी करते हैं।

अनुराग: आपकी दृष्टि में एक अच्छे लेखक, सम्पादक, पत्रकार, साहित्यकार में क्या गुण होने चाहिये?
शशि: अनुराग जी, सम्पादक-पत्रकार के गुण मैं नहीं जानती क्योंकि इस क्षेत्र में कोई काम नहीं किया है। आप अधिक बता सकते हैं क्योंकि आप लेखक भी हैं, सम्पादक भी। हाँ अपने निजी अनुभवों से यह कह सकती हूँ कि सम्पादक का लेखक के साथ सीधा संवाद हो तो लेखक में भी रूचि, उत्साह और ऊर्जा रहती है। यह आवश्यक नहीं कि सम्पादक किसी लेखक की हर रचना प्रकाशित करे लेकिन कुछ तो कहे की लिखने वाला अगले अंक के लिए भी लिखे या अपने लेखन में पत्रिका की आवश्यकता के अनुसार कुछ नया लिखने का प्रयत्न करे। यहाँ मैं अपने कुछ अनुभव आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। लगभग 8 -10 साल पुरानी बात है, अभिव्यक्ति-अनुभूति ई-पत्रिका की सम्पादक पूर्णिमा वर्मन ने स्वयं ईमेल लिख कर मुझे उनकी पत्रिका में कुछ रचनाएँ भेजने के लिए आमंत्रित किया। तब से लेकर अब तक मैं उनके हर विशेषांक के लिए लिखती हूँ। समय का अभाव होते हुए भी लिखती हूँ। उनकी पत्रिका मुझे अपनी पत्रिका लगती है। उनके कहने पर ही मैंने नवगीत विधा में लिखना आरम्भ किया। ‘हिन्दी चेतना’ और अब ‘विभोम स्वर’ की सम्पादक डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने मुझे संस्मरण लिखने लिए प्रेरित किया। जब कुछ नहीं लिखती तो फोन करके कहती हैं, “नया लिखा है तो भेजो, नहीं लिखा तो लिखो।” इसी तरह श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी की प्रेरणा से मैंने जापानी विधा में हाइकु, सेदोका, चोका आदि लिखना शुरू किया। सम्पादक लेखक की रचनात्मकता को तराशता है, उसे गति देता है।

अनुराग: रचनात्मकता के पैमाने पर आप खुद को कहाँ पाती हैं?
शशि: रचनात्मकता के सोपान में मैं अपने आप को दूसरी या तीसरी सीढ़ी पर खड़ा पाती हूँ। एक तो परदेस में पुस्तकों की समस्या, मुख्य धारा से कटे हुए रहना तथा साहित्य जगत के बहुत कम लोगों से मिलना–जुलना। यह सब ऐसी समस्याएँ कि कभी कभी अकेलापन हो जाता है। अंतर्जाल ही एक ऐसा माध्यम है जो हमें पूरे विश्व के लेखन से जोड़ रहा है वो और वही हम प्रवासियों  का  सब से बड़ा सहारा भी है। अब अंतर्जाल पर प्रचुर मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। ई पुस्तकें भी आ गई हैं।

अनुराग: सो तो है। वैसे, आपकी अगली पुस्तक कब आ रही है?
शशि: अनुराग जी, जब तक यह साक्षात्कार आपकी पत्रिका ‘सेतु’ में प्रकाशित होगा, मेरा अगला संग्रह तैयार हो चुका होगा। यह एक काव्य संग्रह है जो अयन प्रकाशन से आ रहा है।

अनुराग: अरे वाह! आपको हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ! अगले वर्षों में आपकी खुद से क्या अपेक्षायें हैं?
शशि: बहुत कुछ लिखना चाहूँगी, मन में एक उमंग रहती है लिखने की। लघु कथा लिखने का प्रयत्न करती हूँ तो कहीं कुछ छूट जाता है। इस विधा में भी काम करना चाहूँगी। दोहे और माहिया लिखने में भी आनन्द आता है। क्या लिखूँगी, नहीं जानती किन्तु लेखन अभिव्यक्ति मेरे जीवन का सब से बड़ा भाग बन गया है।

अनुराग: हिंदी साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे में आपका क्या विचार है?
शशि: वर्तमान साहित्य की उचित समीक्षा एवं मूल्यांकन का अभाव साहित्य अध्ययन में व्यवधान उत्पन्न करता है। समर्थ समीक्षक यदि नये साहित्य को गंभीरतापूर्वक लें तो हिन्दी साहित्य का बहुत भला हो सकता है। एक महत्वपूर्ण समस्या है अनुवाद की। हमारे यहां जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं के साहित्य की तरह समय-समय पर लिखे जाने वाले नवीनतम हिन्दी पुस्तकों को अन्य भारतीय भाषाओं में तथा विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद की कोई व्यवस्था नहीं है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक भाषा के ज्ञाता जब दूसरी भाषा की पुस्तकें पढ़ेंगे और साहित्य ही नहीं अन्य दूसरी विधाओं की रचनाओं को पढेंगे  तो दोनों भाषाओं के लोगों का ज्ञानवर्धन होगा, दोनो भाषाएं समृद्ध होंगी। अनुवाद के माध्यम से साहित्य समृद्ध होता है। साहित्य में नए-नए शब्द मिलते हैं और हमारी भाषा के शब्द भी दूसरी भाषा में, उसके साहित्य में स्थान बना लेते हैं।

अनुराग: क्या आप, एक भाषा के रूप में, हिंदी की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं?
शशि: वर्तमान काल में, मैं कह सकती हूँ कि हिन्दी की स्थिति बहुत ही उत्साहवर्धक है और हिन्दी भाषा दिन प्रति दिन प्रगति कर रही है। इसको पढ़ने वालों, लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है और इसका क्षेत्र विस्तार हो रहा  है। हिन्दी भाषा की अनेक विधाओं, हिन्दी भाषा से सम्बन्धित अनेक क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है और खुलकर हो रही है। विज्ञान में हिन्दी, विधि में हिन्दी, तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दी, व्यवसाय में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी आदि इस प्रकार जो हिन्दी के विविध क्षेत्र हैं, जहाँ हिन्दी का प्रयोग लाभकारी हो सकता है, उत्साहवर्धक हो सकता है, उन क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है, काम हो रहा है। इस प्रकार केवल साहित्य तक सीमित न करके हिन्दी को विस्तार देने का प्रयास और विस्तार देने के लिए क्या-क्या माध्यम हो सकते हैं, इन विषयों पर भी काम हो रहा है। फिर भी हिन्दी केवल कवियों, साहित्यकारों या सिनेमा की भाषा ही बन कर रह गई है। हिन्दी भाषा की स्थिति दो रूपों में सामने आ रही हैं। व्यापार, विज्ञापन, पत्रकारिता एवं मनोरंजन के क्षेत्र में हिन्दी एक ओर अपना परचम लहरा रही है, दूसरी ओर विज्ञान, तकनीक, वैद्यकीय एवं सरकारी कामकाज में वह कदम-कदम पर अपना स्थान ढूंढ रही है। पिछले 65 वर्षों में हिन्दी के प्रति लगाव, आस्था, विश्वास और उसे अपनाने पर गौरवान्वित होने की अनुभूति न जग पाना आज हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है। हिन्दी का रोजी-रोटी से प्रत्यक्ष जुड़ाव न होना इसका कारण भी है और समस्या भी। नौकरी, परिणामस्वरूप हिन्दी दिन-प्रतिदिन हाशिए पर चली जा रही है।

अनुराग: हिंदी के विकास में बाधा क्या है? इसे सुधारा कैसे जा सकता है?
शशि: हिंदी के विकास में सबसे बड़ी बाधा हिंदी भाषियों का अपनी भाषा से प्रेम की कमी है। भारत एक लोकतंत्र है और अगर हम सब चाहें तो हिंदी के विकास में स्वयं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं लेकिन हम ऐसा करते नहीं... क्योंकि हम सिर्फ सरकार से उम्मीद करते हैं। हम सिर्फ हाथ पर हाथ रखे हुए सुविधाएँ चाहते हैं आगे बढ़कर स्वयं उनका निर्माण नहीं करते। इसको दूर करने के लिये हम सबको अपने अपने स्तर पर हिंदी के विकास का काम करना होगा। और एक दूसरे के साथ मिलकर इसको इतना समृद्ध बनाना होगा कि व्यापार, चिकित्सा और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में इसका पूर्ण विकास हो सके।

कुछ सही दिशा और निर्देशन की भी कमी है वह भी सबके मिलकर काम करने से दूर हो सकती है।

अनुराग: अमेरिका में हिंदी का क्या भविष्य है?
शशि: अनुराग जी, अमेरिका में हिन्दी का भविष्य बहुत उज्जवल है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार हिन्दी भाषा भारत की अन्य भाषाओं में से सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। प्रसन्नता की बात यह है कि अब तो यह यू एस के 100 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। बहुत से स्कूलों में भी इस भाषा का अध्ययन हो रहा है। और इस उन्नति का श्रेय मैं यहाँ के भारतीय निवासियों और कई स्वयं सेवी संस्थाओं को देना चाहूँगी जो हिन्दी के प्रचार –प्रसार के लिए दिन रात जुटे रहते हैं और  बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़े रखने में सफल रहे है।  हिंदी की कई कार्यशालाओं का आयोजन, मंदिरों में हिंदी बाल-विहार, घरों में, सार्वजनिक स्थानों में साप्ताहिक तौर पर हो रहा है। जहाँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ तीज-त्योहार भी मनाए जाते हैं। हिन्दी भाषा में बहुत सी पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं जिनमें से मुख्य हैं ‘विभोम स्वर’, ‘हिन्दी जगत’, ‘विश्वा’, और अब आपके सम्पादन में नई पत्रिका आई है ‘सेतु’। हिन्दी फिल्मों के गानों ने और फिल्मों ने भी इस भाषा को नई पीढ़ी में बहुत लोक प्रिय बनाया है। कई शहरों में समय-समय पर काव्य गोष्ठियों सफल आयोजन होता रहता है। कुल मिला कर स्थिति अच्छी ही है। शर्त यही है कि हम सब हिन्दी भाषी यह निरंतर प्रयास करते रहें कि हमें घर में अपने बच्चों के साथ हिन्दी में ही बातचीत करनी है। इस तरह भावी पीढ़ी इस विदेशी भूमि पर अपनी भाषा से जुड़ी रहेगी।

अनुराग: हिंदी से इतर, डोगरी जैसी भारतीय भाषाओं का आप क्या भविष्य देखती हैं?
शशि: डोगरी मेरी मातृभाषा है। इस भाषा का बहुत समृद्ध साहित्य है। इसमें हर विधा में बहुत कुछ लिखा जा रहा है। जम्मू में स्थित ‘डोगरी संस्था’ इस के विकास और उन्नति में सदैव प्रयत्न रत है। इस भाषा में लिखी पुस्तकों का अन्य भाषाओँ में अनुवाद भी रहा है। भाषा मीठी है और भविष्य सुनहरा है। मैं भी तो लिखती हिन्दी में हूँ, सोचती डोगरी में हूँ। हिन्दी से इतर भाषाएँ और उन्नति कर सकती हैं अगर इस इन भाषाओं में लिखे साहित्य का अधिक से अधिक अनुवाद हो सके। तभी तो यह जन–जन तक पहुँचेगी। डोगरी की लिपि भी देवनागरी है यह भी एक साधन है अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने का।

अनुराग: हमारे पाठकों के लिये आपकी ओर से क्या संदेश है?
शशि: प्रिय पाठको! खूब पढ़ो, पुस्तकें पढ़ने से केवल मनोरंजन नहीं होता, व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास भी होता है। समाज में रहते हुए, प्रतिस्पर्धा के किसी भी क्षेत्र में या निजी जीवन की ऊहापोह में किसी पुस्तक में कुछ पढ़ा आपका मार्ग दर्शन करेगा। ये सन्देश भी देना चाहूँगी  कि हिन्दी को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ें। हिन्दी के विकास के लिए संकल्पित हों और हिन्दी को समृद्ध करने के लिए जो उपयुक्त साधन हैं, सबका उपयोग करें। हिन्दी सर्वव्यापी हो जाएगी। सभी क्षेत्रों में हिन्दी का प्रभाव हो जाएगा।