पुस्तक समीक्षा शौर्य गाथाएँ / शौर्य गीता - कितने सारे अर्जुन

शशि पाधा की पुस्तक शौर्य गाथाएँ की समीक्षा, डॉ. मृदुल कीर्ति द्वारा

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शौर्य गाथाएँ (ISBN 978-93-5186-881-1)
लेखिका: शशि पाधा
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ 151, हार्डकवर
मुद्रित मूल्य: ₹250 ($12.00)
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वस्तुतः सम्पूर्ण भगवद्गीता शौर्य और क्षत्रिय धर्म का प्रतिपादन करते हुए, आध्यात्मिकता, आत्म तत्व और जीवन मीमांसा के सकल पहलुओं का विवेचन है। मन के संवेगों, सुख-दुख के आवेगों और कर्मों के भोगों का दर्शन स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध भूमि में उपदेशित कर रहे हैं क्योंकि -
अर्जुन युद्ध की भयानकता और दुष्परिणामों से भय ग्रस्त है। पांडवों और कौरवों की सेना आमने-सामने है - अर्जुन प्रश्नायित है, उद्वेलित है, विचलित है, आशंकित है, भयभीत है, भ्रमित और मोह ग्रसित है। हे वासुदेव! युद्ध मुझसे नहीं होगा - कहकर रथ के पीछे के भाग में धनुष-बाण रख कर बैठ गया।

अर्जुन! उठ यह कायरता तुझे शोभा नहीं देती, क्षत्रिय धर्म का स्मरण दिलाकर वीर रस का संचार करते हो। जीत गए तो राज्य सुख और वीर गति हुई तो परलोक सुख का लोभ देते हो।

हे वासुदेव! तुम्हारा अर्जुन विषाद-ग्रस्त है। तुम उसे आश्वस्त करते हो - कभी लोभ से, कभी ज्ञान से, कभी लोक-परलोक के सुखों से, कभी यश से किन्तु, हे वासुदेव ! यहाँ तो इतने सारे अर्जुन!

शशि पाधा (लेखिका "शौर्य गाथाएँ)
सीमा पर शत्रुओं से युद्ध करते रण बाँकुरे, शौर्य-धैर्य जिनकी नस-नस में है, साहस लहू की तरह जिनकी देह में संचरित है, त्याग, बलिदान और वीरता के व्यक्तिकरण, अदम्य साहस के प्रतिमान

क्या इनके माता-पिता, पत्नी- बच्चे नहीं हैं? क्या इनको मोह, ममता, आसक्ति नहीं है? क्या इनको मृत्यु का भय नहीं? मृत्यु भय तो हर जीवधारी में अभिनिवेशित मूल भय है। हर जीव जीना चाहता है, किन्तु जिसने जीवन का मोह त्याग दिया हो उससे बड़ा मृत्युञ्जयी कौन? महामृत्युंजय के महामंत्र के 'उर्वारुकमिव' को यथार्थ साकार और आत्मसात करते हुए ये परमवीर, राष्ट्र रक्षा को सर्वोपरि मान कर, मोह, ममता और आसक्ति को कुचल कर, शौर्य की कस्तूरी सुगंध पसार कर जीवन के पार जाते हैं -मृत्युंजयी होकर- क्योंकि जिसका यश जीता है वही जीवित हैं।

ये रण बाँकुरे सीमा पर जाते हैं। वीरांगनाएँ स्वयं तिलक लगाकर भेजती हैं। माता-पिता गर्व करते हैं। एक के बाद दूसरे पुत्र को भी भेजते हैं। पिता कहते हैं शेर की तरह था मेरा बेटा। निडर इतना कि डर भी उसके सामने काँपता था। वियोग का दारुण दुःख सहते हैं, अभाव और गरीबी का जीवन जीते हैं। किन्तु - ये वीर और इनके परिवार किसी से प्रश्नायित नहीं, आशंकित नहीं, सशंकित नहीं, क्योंकि "निर्वाण मोहा, जितसंग दोषा" का मर्म इनको बिना सिखाये ही आ गया, क्योकि माँ के दूध से लेकर वातावरण की हर सांस में ये धरती पुत्र हैं। इन्हें क्षत्रिय धर्म सिखाया नहीं गया, किसी लोभ या आकर्षण से लुभाया नहीं गया, इनका क्षत्रियत्व इन वीर पुत्रों का स्वभाव है, ये सिखाई हुई नहीं साँसों में समाई हुई है। ये इनके परिवेश और संस्कारों में छाई हुई हैं। पति, तीन बेटे और एक बेटी एक ही परिवार के सेना में -क्या शौर्य और ओजस्विता भरा परिवार जो स्वयं में ही -- 'शौर्य गीता' के मन्त्र अपने बलिदानों से लिखता हो। कई पीढ़ियों से शौर्य की ऐसी परम्परा! हे राष्ट्र रक्षक! रण बाँकुरों पृथ्वी पुत्र! तुम शब्द सामर्थ्य के परे-परात्पर हो।
माता भूमि पुत्रोअहं पृथिव्या। (अथर्ववेद)

हे संत सिपाही, तुम ही साँचे पृथापुत्र हो।
हे मृत्युञ्जयी! तुम्हारी स्तुति को कोई शब्द पर्याप्त नहीं।

डॉ. मृदुल कीर्ति, समीक्षक
'शौर्य गाथाएँ' में 'शशि पाधा' ने अदम्य शौर्य के उन वीरों के साथ जिए क्षणों को हमसे साझा किया है। एक अति वरिष्ठ सेनाधिकारी की पत्नी होने के नाते शशि जी ने, वीर सैनिकों की पत्नियों, माताओं और बहनों के दुखों को उनके साथ मिलकर देखा, जिया और भोगा है। ऐसी-ऐसी मर्मान्तक पीड़ाएँ, जिनकी कसक कई जन्मों तक पीछा करे, जो अस्तित्व को हिला दे, उनको साक्षात शशि जी ने देखा है।

ओजस्विता, अदम्य साहस, पराक्रम और शौर्य के वे प्रतिमान, जिनके साथ शशि जी का उच्च सैनिक अधिकारी की पत्नी होने के नाते बहुत सम्मान जनक और अनुशासन पूर्ण संपर्क और सानिध्य रहा। 'शौर्य गाथाएँ' में वर्णित उनके संस्मरण पाठक का परिचय अनेकों सैनिक परिवारों में पीढ़ियों से चल रही त्याग की परम्परा से कराते हैं। पाठक को पीढ़ियों से सांसारिक क्षुद्रताओं की चिंता किये बिना, त्याग, शौर्य, और वीरता की महान परम्परा को जारी रखने वाले सैनिक परिवारों से साक्षात बात करने का अनुभव होता है, "मेम साब यह मेरा पोता भी सेना में ही जाएगा, अपने पिता की फौजी वर्दी और टोपी लटका कर स्वयं को शीशे में देखता है।" इन शौर्यगाथाओं ने कितने ही ऐसे सजीव वीरों से भी परिचय कराया जो युद्ध में अंगहीन हुए, अथाह पीड़ा भोगी, अनेकों आपरेशन हुए, परंतु और ठीक होते ही सब कष्ट भूलकर कमांडो अफसर से विशेष आग्रह करते हैं कि अमुक बटालियन में सीमा पर कृपया मुझे भेजें, इस समय मुझे अपने साथियों के साथ होना चाहिए।

ये परम वीर समय की शिला पर लिख गए, किन्तु सोचती हूँ जब शशि जी ने इन्हें शब्दों में लिखा तो इन वीरों के साथ जिए क्षणों को, अंतस में फिर से जिया, जो कलश में आ गए उन्हें फिर से सजीव किया और वैसे का वैसा ही पारे सा पारदर्शी शब्दों में उतार दिया। 'शौर्य गाथाएँ' में सैनिकों के परिवार की अथाह पीड़ा का मर्मान्तक सत्य इतना गहरा है कि, अगली गाथा पढ़ने का साहस ही नहीं होता। पीड़ा से मन सिहर-सिहर जाता हैं किन्तु शशि जी की लेखनी भी पीड़ा की सतह को छूकर आगे बढ़ जाती है, क्योंकि पीड़ा की तह में जाने का साहस तो केवल और केवल इन पराक्रमी वीरों के ही वश में है। 'मोती' कुत्ते का दृष्टान्त मौन सिपाही का है जो सीधा हृदय में ही उतरता है। शशि जी ने इन वीरों के परिवारों के आँसू पोंछे हैं, माताओं की तड़प देखी है, वीरांगनाओं को गले लगाया है। बड़े ही सटीक और सजग शब्दों में लिखे ये दृष्टान्त पढ़ते-पढ़ते ये वीर सजीव से हो जाते हैं और काम करते हुए या आँख बंद करो तो पिक्चर की तरह प्रतीत होते हैं। यह मेरी अपनी अनुभूति है।

जन सामान्य को देश की कठिन सीमाओं की जटिल परिस्थितियों में सैनिकों के साथ घटित घटनाओं की बारीकी का विशेष पता नहीं होता है। जब नागरिक दो-दो रजाई ओढ़ कर हीटर चला कर सोते हैं तो सैनिक कैसे अपलक जागते है? सियाचीन की बर्फ पर आज और अभी भी जो हमारी रक्षा कर रहे हैं, वे भी किसी के बेटे, किसी के सुहाग, किसी के भाई और पिता हैं। हमें ध्यान रहे कि हमारी रक्षा के पुनीत कर्तव्य में अपना जीवन न्योछावर करते ये सैनिक भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी एवं अन्य तापों को सहते हुए गुमनामी के अंधेरों में न खोयें। ये व्यतिगत नहीं राष्ट्रगत अस्तित्व हैं। हमें याद रहे ये हैं तो हम हैं। एक युधिष्ठिर प्रश्न - क्या हमारा इनके परिवार के प्रति कुछ भी कर्तव्य नहीं?