परछाइयों का जंगल - कहानी


-देवी नागरानी

माँ को बड़ी मुश्किल से सहारा देकर बस में चढ़ाया और फिर मैं चढ़ी। बस धक्के के साथ आगे बढ़ी तो माँ गिरते-गिरते बची। मैं भी उसे न संभाल पाई। एक दयावान बुद्ध ने अपने स्थान से उठकर उसे बैठने के लिए कहा और माँ एक आज्ञाकारी बालक की तरह सीट पर बैठ गई। मैंने टिकट ली और उसके साथ सटकर खड़ी हो गई। टैंकबंड बस स्टॉप पर उतरना था। कंडक्टर ने दो बार ज़ोर से पुकारा, 'टैंकबंड, टैंकबंड' पर मैं अतीत की खलाओं में खो गई रही, जब इसी तरह सहारा देकर माँ ने मुझे पहले चढ़ाया था और बाद में खुद चढ़ी थी। बस चलने लगी पर फिर पाया कि कुछ छूट गया था, कुछ नहीं बहुत कुछ छूट गया था। पिताजी जो साथ-साथ आए थे, पीछे रह गए थे। हड़बड़ी में वे चढ़ नहीं पाये या...! माँ का चेहरा ज़र्द, आँखें फटी-फटी, गुमसुम आलम में वह बड़बड़ाते हुए अचानक चिल्लाने लगी, "अरे बस रोको, बस रोको, मुनिया के पिता पीछे रह गए हैं। अरे भाई रोको मुझे उतरने दो, वे पीछे रह गए हैं।" आवाज शोर में लुप्त सी हो गई और हवाओं से बातें करती बस टैंकबंड बस स्टॉप पर आकर ठहरी। 

माँ ने एक तरह से मुझे धक्का मारकर नीचे उतारा और खुद जैसे चलती बस से ही कूद पड़ी। पाँव जमीन पर टिक न पाए इसलिए वह औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़ी, वहीं बस स्टॉप पर लोगों की भीड़ के बीच। जैसे कोई तमाशा हो मदारी का! लोग चलते चलते मुड़ मुड़ कर तिरछे नयनों से उसकी ओर घूरने लगे। सोचते होंगे यह कैसा पागलपन है कि बस अभी रुकी भी न थी कि वह कूद पड़ी। खैर ... मैं  आज पहले से अधिक समझ सकती हूँ। याद है तब मैंने ज़मीन पर पड़ी माँ का हाथ थामा, और खींचते हुए उसे उठाने का लघु प्रयास किया। माँ सच में उठी और बस की विपरीत दिशा में लगभग दौड़ने लगी और उसका हाथ थामे हुए मैं उसी रफ्तार से साथ-साथ खिंची चली जा रही थी। इतना तो मैं समझ ही पाई कि माँ पीछे छूट गए मेरे पिता को खोजना चाहती थी। 'माँ रुको तो, मुझे दर्द हो रहा है।' मेरी रूआंसी सी आवाज़ फिर से शोर के कोलाहल में खो गई।

"अरी चल, जल्दी चल... तेरे पिताजी न जाने कहां चले गए होंगे?"

"कहां जाएंगे माँ, कहीं नहीं जाएंगे, घर लौट जाएंगे।"

"अरी अब चुप भी कर, बस जल्दी चल। तू नहीं जानती...!" इसके आगे माँ कुछ न कह सकी। आज उस चुप्पी का अर्थ मेरी समझ में आ रहा है। जो तब नहीं जानती थी अब जानने लगी हूँ। तब आठ आज 18 की हूँ। दस सालों में अपनों का दर्द, उनकी भावनाएं, उनकी खामोशी में चढ़ते-उतरते लावे के उफ़ान को खूब समझती हूँ, उनकी भावनाओं की हर आहट को दस्तक देते हुए महसूस करती हूँ। बड़ी होते-होते सच में बड़ी हो गई हूँ तभी तो माँ को एक बच्चे की तरह हाथ पकड़ कर पहले बस में चढ़ाया और फिर खुद चढ़ी।

"टैंकबंड, टैंकबंड", कंडक्टर ने दो बार आवाज दी। मैं हड़बड़ाकर माँ का हाथ पकड़कर उसे उतारने के पश्चात खुद उतरी, और उसका हाथ थामे हुए ही बस में चढ़ने और उतरने वाले लोगों की भीड़ से स्थगित हुई। हाथ छोड़ने का ख़तरा मैं नहीं ले सकती थी, बिलकुल भी नहीं। जिंदगी के उतार चढ़ाव भी ऊंट सी करवट बदलते, हिचकोले खाते हुए जीवन नौका को आगे तक धकेलते रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे 10 साल पहले माँ मुझे लगभग धकेलते हुए अपने साथ घसीटते हुए, एक पागलपन की हद तक पिताजी को खोज रही थी। यह सच है जब मां ने कहा था 'तू नहीं जानती' सच मैं सचमुच नहीं जानती थी कि पिताजी घर न जाकर कहीं और चले जाएंगे। इंसान का ठिकाना तो उसका घर होता है। क्या भूला-भटका, थका-हारा, भूखा-प्यासा इंसान किसी राह पर गुमराह हो जाता है तो इस तरह भी खो जाता है जैसे मेरे पिताजी खो गए थे उस दिन? घर के पास आकर माँ ने कुंडी खोली, भीतर झाँका, पिताजी वहां नहीं थे। होते भी कैसे? कुंडी बाहर से बंद थी, मां ने खोली थी! 

"हे भगवान कहां गए होंगे? अब मैं कहां जाऊं किससे पूछूं? उन्हें तो अपनी खबर नहीं, होती तो घर न लौट आते।" और मां बिलख बिलख कर अपना माथा पीटने लगी। मेरी मासूमियत शायद इस दर्द को, उसके अर्थ को न जानते हुए खुद भी सुबक-सुबक कर रोने लगी। आज जानती हूँ माँ ने वह सफर किस तरह अकेले काटा होगा, किस तरह तन्हा-तन्हा उस दर्द के आघात को सहा होगा, जिसने कतरा कतरा उसे रुलाया। मैंने बस साथ दिया। आज भी वह घर के किसी कोने में चुपचाप बैठे बैठे न जाने बेरहम जिंदगी के कई किस्सों का गणित करती रहती है। देखकर मेरा रोम रोम सिहर उठता है। 

क्या बेबस आदमी कुछ भी न कर पाने की स्थिति में ऐसा कुछ भी कर बैठता है या ऐसा हो जाता है अपने आप। बदन कांप गया... फ़क़त याद मात्र से। सिहरन तो तब भी हुई थी, जब मां ने मेरा हाथ झटक कर खुद को छुड़ाया और एक क्रंदन के साथ भीड़ को चीरती हुई पिताजी की लाश पर जा कर झुकी, झुकी क्या, उनपर गिर पड़ी। उनके पीछे-पीछे जाते मैंने आंखों के सामने देखा वह नज़ारा, खून से सने हुए फर्श पर पड़े पिताजी को। तब नहीं जाना अब जानती हूँ। किसी मोटरकार ने उन्हें टक्कर मारी जिससे वे खुद को न संभाल पाये और गिर पड़े। बस क्षण भर में जिंदगी की हद पार करके मौत की हद में जा पहुँचे। कितनी महीन रेखा विभाजन करती है ज़िंदगी और मौत को! 

जो होना था वो हुआ। पर बाद में जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था। माँ जब भी मुझे अपने सामने पाती, पिता की याद में तिल-तिल जीते तिल-तिल मरते, उनकी कही बातों को दोहराती जो दर्द बन कर उनके हृदय में समा गई थीं। पिताजी को मानसिक रोग ने ग्रस्त कर लिया था, और वे धीरे-धीरे बहुत कुछ भूलते जा रहे थे... अपने होने की अवस्था को भी। तब मैं 2 साल की थी, ऐसा माँ ने बताया। और उस हालत में वह न मुझे अकेला छोड़ सकती थी न पिताजी को। सदा घर की कुंडी भीतर से बंद कर लेती ताकि वे कभी भूल से भी दरवाजा खोलकर बाहर न निकल जायें। कभी पिताजी को लेकर डॉक्टर के पास जाना होता तो मुझे भी साथ ले लेती, क्योंकि मैं छोटी थी। आफताब मेरा बड़ा भाई था, आज होता तो 22 साल का नौजवान होता। मुझे 4 साल बड़ा था। "वह होता तो यह सब कुछ न होता, खुदा की उसकी ज़्यादा ज़रूरत रही होगी, तभी तो!" ऐसा माँ बार-बार कहती रहती है। आजकल वह हर बात बार-बार दोहराती है और पुरानी यादों की पोटलियों से भूली बिसरी बातें उधेड़ कर मुझे सुनाती रहती है। अब तो लगता है जब मैं उसके पास नहीं भी होती हूँ तब भी वह बस बतियाती रहती है, फिर चाहे कोई सुन रहा हो या न सुन रहा हो। ...मेरे पास भी कोई चारा नहीं। उसका भ्रम बनाए रखने की खातिर शायद उसके दर्द भरे फफोलों को तोड़ कर उन्हें कतरा कतरा बहने पर मजबूर करते हुए पूछ लेती हूँ, "माँ पिताजी उस दिन तुमसे क्यों खफा हो गए और नाराज होकर बरस पड़े? क्यों क्यों...?"

ऐसे में माँ एक लंबी सांस लेकर मुझे शुरु से आखिर तक वह किस्सा सुनाते हुए कहती, "अरे मुन्नी तुझे पता है उस दिन तेरे पिता नहाने के लिए गुसलखाने गए, हाथ में अंगोछा और पैजामा लिए, जिसका नाड़ा लटक रहा था। कुछ देर बाद बाथरुम से गुस्से भरी आवाजें आने पर मैं दौड़ती हुई वहाँ पहुँची। वे आईने में अपनी परछाई से लड़ रहे थे और लटकते हुए नाड़े को अपनी ओर खींच रहे थे। वही क्रिया परछाई भी कर रही थी।"

"ऐसा क्या हुआ था माँ? मैंने माँ के दिल को फिर टटोला।

"मुन्नी, पता है उन्हें गुस्सा किस बात पर आ रहा था?"

"नहीं माँ!" मैं बस इतना ही कह पाई। दर्द को निगलना इतना मुश्किल है तो पचा पाना कितना असहनीय होगा यही सोचती रही।

"अरी पगली पागलपन की भी हद होती है। वे सोच रहे थे कि घर में कोई चोर घुस आया है और उनका अंगोछा और पाजामा छीनकर ले जाना चाहता है। वे उन्हें अपने ओर खींच रहे थे और परछाई अपनी ओर..."

"फिर क्या हुआ माँ?" मैंने अपनी रुलाई रोकते हुए ऐसे पूछा जैसे किसी कहानी का अंत जाने के लिए उत्तेजित थी। 

"मैंने यह देखकर तुरंत गुसलखाने की लाइट बंद कर दी और उनका हाथ थाम कर कमरे तक ले आई, और सांत्वना देते हुए उनसे कहा कि अब चोर भाग गया है, वह फिर कभी नहीं आएगा।" माँ ने अपनी आँखें दुपट्टे के छोर से पोंछते हुए उस किस्से के अंजाम तक सब कुछ सुनाया।

"कभी नहीं आएगा, मुझे तंग भी नहीं करेगा?" ये पिताजी के शब्द थे या उनका डर था, यह न आज तक माँ समझ पाई न मुझे समझा पाई है।

"नहीं कभी नहीं! अब आप लेटें और सोने की कोशिश करें।"

ऐसी हालत में माँ का तन्हा संघर्ष मेरे जीवन का हिस्सा बनता गया। ऐसे कई और वारदात जिनको आज याद करते हुए मेरे रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं। क्या आदमी इस कदर अपनी याद्दाश्त के साथ अपनी पहचान खो देता है कि आभास होने लगता है कि 'हम क्या किसी कागज की नाव में सवार है? क्या उसमें भी छेद है जहाँ से दर्द रिसता हुआ मन के भीतर घुस जाता है? क्या कोई साधन या तंत्र नहीं, या कोई ऐसा बांध बांधा जाय ताकि दर्द कतरा कतरा बहकर मन कलश को खाली कर दे। यह कैसी विडंबना है कि आदमी जिंदा हो पर जीता न हो, मरने वाले की याद में खुद को बेखबरी के आलम तक ले आए। ऐसी जिंदगी पिता के बाद मैंने माँ को जीते हुए देखी और साथ रहते-रहते खुद भोगी। 

एक दिन माँ ने कुछ रेज़गी अपनी छोटी सी थैली से निकाल कर खटिया पर फैला दी और उन्हें गिन-गिन कर एक एक उन्हें वापस उसी थैली में डालते हुए कहने लगी 'ये पैसे मेरे हैं, मैंने घर के खर्चे से पाई-पाई करके बचाए हैं, दुख सुख के वक्त के लिए। मैंने चोरी नहीं की, मैं चोर नहीं हूँ, मैं चोर नहीं हूँ।‘ मैं निशब्दता में गुम... क्या कहूँ यह सुनने के बाद ...! इतना सब कुछ घट जाता है इंसान की ज़िंदगी में कि उसको भूलने की कोशिश में जीवन टुकड़ों में बंट जाता है। काश! ऐसा कोई यंत्र होता जो अतीत की यादों को फिर से यादों में आने से रोक लेता ताकि अतीत का वह हिस्सा परछाई बनकर आज को इस तरह ग्रहण न लगाता। 

एक रविवार को मैंने बड़े प्यार से माँ का मनपसंद खाना बनया। कुछ ग्रास उसे अपने हाथ से खिलाये और फिर उसके हाथ दाल भात लेने के लिए जैसे ही बड़े, मैंने अपना हाथ खिसका लिया। कुछ समय वह बेहोशी की हालत में ग्रास दर ग्रास खाती रही और आखिर उठते हुए थाली, चम्मच लेकर रसोईघर की बजाय स्नानघर की हौदी में रख आई. मैं देखकर हैरान हुई कि इस हद तक माँ अपना आपा भूल चुकी है। फिर आवाज़ देते हुए अपने जवाबदार होने का ऐलान करते हुए कहा, "मुन्नी मैं खाना खा लिया है और बर्तन रसोईघर में रख दिए हैं। बहुत नींद आ रही है... सोती हूँ..." 

जो अपना आप खो बैठे, उसे क्या पता पड़ेगा कि कौन सी हौदी किस काम के लिए है. यह यादों का कैसा जंगल है, जिसकी भूल भुलैया में माँ पिताजी का पीछा करते करते अपना आपा खो बैठी, खुद को खो बैठी, पर उन्हें खोज न पाई। 

कभी वह पिताजी की एक टोपी, जो उनके पास अब भी बची थी, सर पर ओढ़ लेती और अपने दोनों हाथ उसपर मजबूती से धर लेती और कहती, "नहीं यह उन्होंने मुझे दी थी, मैं अपने साथ ले जाऊँगी। तुम्हारी नहीं है, मेरी अपनी है।"

अपने और पराए के बीच की दीवार इतनी गहन हो सकती है, सोच में, शब्दों में ... इस गुत्थी को मैं आज तक सुलझा नहीं पायी हूँ। मैं उनकी अपनी, पराई कैसे हो सकती हूँ, और वह जो साथ छोड़ गया वह अब भी अपना है...! बस आज इसी एक चक्रव्यूह में जी रही हूँ। भेदने की कोशिश करूँ इतनी हिम्मत नहीं मुझमें। बस इस दौर के हर एक क्षण की साक्षी होकर मैं अपने आने वाले कल से आज ही जुड़ रही हूँ। माँ अपनी व्यथा-गाथा सुनाते सुनाते मेरे भीतर की न जाने किन सन्नाटों की खलाओं को भर दिया कि आज तक मैं उस कोहरे से बाहर नहीं निकल पाई हूँ। इस कदर कि अब अपना वजूद भी अपना नहीं लगता। जैसे मैं जी रही हूँ परछाइयों के बीच, भाग रही हूँ उन यादों की परछाइयों के जंगल में! 

अजीब विडंबना है....! 

माँ पिताजी का सहारा बनना चाहती थी, बीच सफर में साथ छूट गया कुछ यूँ जैसे वजूद का कोई हिस्सा काट कर फैंका गया हो। बस घर का एक कोना खली हो गया. मैं माँ का सहारा बनकर भी न बन पाई, यह मेरी बेकसी है। माँ का सहारा बनते बनते लग रहा है... माँ नहीं, मैं बेसहारा व असहाय हो गई हूँ !
देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, (एक अंग्रेज़ी) 2 भजन-संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुस्कृत।

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