देवी नागरानी - दर्द को चुनौती

डॉ. मृदुल कीर्ति 
देवी नागरानी
'देवी नागरानी' दर्द को चुनौती देने वाली एक ऐसी शख्शियत का नाम है जिसने दर्द को उंगली थाम कर घुमाया। दर्द से दोस्ती करके अकेलेपन का सांझा किया। दर्द को राह का रोड़ा न समझ कर उन पर चढना सीखा और आगे बढ़ना सीखा। दर्द से ही  सृजन की ऊर्जा लेकर ज्ञान और लेखन में समाज को जो दिया वह उनकी पुस्तकों के रूप आज सबके सामने है। इसी अद्भुत सामर्थ्य का प्रमाण है 'गम में भीगी खुशी'। सिन्धी भाषा में लेखन के आज बहुत ही कम लेखक मिलते है। 'देवी' जी की  मातृभाषा सिन्धी है और प्रारम्भिक दौर में आपने सिन्धी में ही दो गजल संग्रह लिखे।

जिन्दगी अस्ल में तेरे ग़म का है नाम
सारी खुशियाँ हैं बेकार अगर ग़म नहीं।
                             देवी नागरानी (चराग़े दिल )

केवल यही एक शेर देवी जी के पूरे व्यक्तित्व और अंतर्मन के परिचय के लिए पर्याप्त है। जिसने गम से सांझा कर लिया उसे कौन भला दुखी कर सकता है?  जिसने एकांत में रहना सीख लिया उसे कौन अकेला कर सकता है? जिसने ग़म की गहराईयों को जान लिया हो उसे कौन ग़मगीन कर सकता है?  करीबी से गम से  जो रूबरू हुआ हो वही गम के इस दर्शन को जान सकता है। जिन्दगी जब कुछ सिखाती है तो उसकी बड़ी कीमत लेती है। बड़ी परीक्षाओं से गुजरना होता है। ये सब जलजले देवी जी पी चुकी हैं, तब ही वे लिख सकी हैं।

डॉ. मृदुल कीर्ति
जिसे लोग कहते हैं जिन्दगी,
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं।
और

जिन्दगी से जूझना मुश्किल हुआ इस दौर में,
खुदकुशी से खुद को, लेकिन मैं बचा कर आई हूँ।
और

इम्तहाँ जीस्त ने कितने ही लिए हैं 'देवी',
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है।

दर्द की गहराई को सलीब की पीड़ा के समानांतर ले जाना ग़जब का काव्य सौंदर्य है। सलीब दर्द की इंतहा है,  तो जवानी ने बहुत ढोया है- उम्र के उस पड़ाव पर मिली कसक से इत्तिफाक कराते है। केवल एक यही लाइन जैसे दर्द को सीने में उतार देती है- गजब की  शायरी वही है जो सीधे दिल पर ही लगे।  देवी जी के अलफ़ाज सीधे सीने में उतरते हैं, कारण कि वे जिए हुए और भोगे हुये यथार्थ हैं। अतः वे किसी प्रयास से  बनी हुई न होकर अनुभूतियों, जज्बातों और अहसासों से बनी हैं।  शीशे के मानिंद, अहसासों को तब ही तो उतार पाती हैं।
केवल पीड़ा और संवेदना की ही बात नहीं जीवन के सभी पक्षों, यथा: नारी, समाज, देश, राजनीति, रिश्ते, नैतिकता उसूलों आदि  को देवी ने उकेरा है। देखिये क्या खूब लिखा है--
उसूलों पे चलना जो आसान होता
जमीरों के सौदे यकीनन न होते।
कसौटी पे पूरा यहाँ कौन 'देवी'
जो होते तो क्यों आईने आज रोते।

वहीं है शिवाला, वहीं एक मस्जिद
कहीं सर झुका है कहीं दिल झुका है।

सामाजिक, साम्प्रदायिक, राजनैतिक, देश की दुर्दशा के प्रति आक्रोश है। धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके उद्गार नमन योग्य हैं। न्यायिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है।
तिजारत गवाहों की जब तक सलामत, क्या इन्साफ कर पायेगी ये अदालत।

राष्ट्र के लिए समर्पित जोश और भाव जिसे पढ़ते ही रोमांच होने लगता है।
दहशतें रक्शौं हैं, रोजो शब् यहाँ ,  कब सुकून पायेंगें मेरे हम वतन
जान देते जो तिरंगे के लिए ,उन शहीदों का तिरंगा है कफ़न।

नागरानी एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व है, बुद्ध का अर्थ बोध गम्यता। इस मोड़ पर जब चिंतन वृत्ति आ जाती है तो सब कुछ आडम्बर हीन हो जाता है, भावों को सहजता से व्यक्त करना एक स्वभाव बन जाता है। कितनी सहजता है, 'यूँ तो पड़ाव आये गए लाख राह में, खेमे कभी भी  हमने लगाए नहीं कहीं'। वे मानती हैं कि अभिमान ठीक नहीं पर स्वाभिमान की पक्षधर हैं,
नफरत से अगर बख्शे कोई, अमृत भी निगलना मुश्किल है,
देवी शतरंज है ये दुनिया,  शह उससे पाना मुश्किल है

'लौ दर्दे दिल की' भावनाओं का गहरा समंदर है, अहसासों की लहरें हैं, निश्छल से संवेदित भाव हैं, कागज़ की नाव है और स्नेहिल मन की पतवार है। सतहों को हटा कर मन की तहों तक जाती एक यात्रा है । सादगी से अनुभूतियों को अंतस में उतारने की कला का अद्भुत प्रयास है।
न हिला सके इसे जलजले , न वो बारिशों में ही बह सके।
उसे क्या बुझा सके आधियाँ , ये ' चरागे दिल' है दिया नहीं।

भावनाओं और परिस्थितियों के अंधड़ व्यक्ति को बनाते, संवारते और बिगाड़ते हैं लेकिन कुछ मौलिक स्वभाव और वृत्तियाँ भी है जिन पर किसी का प्रभाव नहीं होता।  'देवी' जी का वह मूल स्वभाव है। रब में, ईश्वर में, अथाह विश्वास--उसकी रज़ा में मज़ा ही उनकी जिन्दगी का सबब है। चिंता नहीं है कि -
वक्ते आख़िर आके ठाहरे हैं फ़रिश्ते मौत के,
जो चुराके जिस्म से ले जायेंगें जाने कहाँ?

और बस एक ही आरजू है-
एक आरजू है दिल में फ़क़त उसके दीद की,
मेरा हबीब क्यों नहीं आता है बेहिजाब?

उनकी अपनी मातृभाषा सिन्धी में भी भजन संग्रह है। साहित्य सफ़र सिंधी से शुरू हुआ और पगडंडियाँ हिन्दी की परिधि में ले आईं। मातृभाषा से राष्ट्रभाषा तक आते-आते कितनी ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने 'देवी' जी को सम्मानित किया। कितनी ही पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हुई है। अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया। एक और महत्वपूर्ण बात की आपने न्यूयार्क में इंग्लिश शिक्षण किया साथ ही इंग्लिश में 'द जर्नी ' नाम से काव्य संग्रह भी लिखा।  हिंदी, इंग्लिश,सिन्धी,गीत गजल भजन, अनुवाद, समीक्षाएं किसी भी भी विधा और किसी भी भाषा में उद्गारों को पूरा उतार पाने की क्षमता और कला की स्वामिनी हैं। परेशानियों को धूल  सा उड़ा देने में माहिर, अत्यंत हंसमुख स्वभाव, सबको प्यार देने को आतुर, निरपेक्ष, अलमस्त, उदार - ऐसा है 'देवी नागरानी' का व्यक्तित्व।  आपको एक बात कहूं, मैं अभी तक उनसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली हूँ, उनको उनके कृतित्व से ही जाना है।  है न आश्चर्य की बात। उनकी रचनाएँ इतनी जीवंत है जो रचनाकार का मर्म स्वयं उजागर कर देती हैं। उनके लिए यही भाव व्यक्त करती हूँ:
शब्द सादे भाव गहरे,  काव्य की गरिमा मही, 'लौ दर्दे दिल की' संकलित, गजलों में 'देवी' ने कही
न कोई आडम्बर कहीं, बस बात कह दी सार की, है पीर अंतस की कहीं,  पीड़ा कहीं संसार की।

आघात संघातों की पीड़ा, मर्म में उतरीं घनी, उसी आहत पीर से 'लौ दर्दे दिल' गजलें बनीं ।

जीवन-दर्शन को इतनी सहजता और सरलता  से कहा जा सकता है, यह 'देवी' जी की लेखन शैली से ही जाना। जैसे किसी बच्चे ने कागज़ की नाव इस किनारे डाली हो और वह लहरों को अपनी बात सुनाती हुई उस पार चली गयी हो। कहीं कोई पांडित्य पूर्ण भाषा नहीं पर भाव में पांडित्य पूर्ण संदेश हैं। क्लिष्ट भावों की क्लिष्टता नहीं तो लगता है, मेरी अपने ही पीर की बात हो रही है और मैं इन पंक्तियों में जीवंत हो जाती हूँ । जब पाठक स्वयं को उस भाव व्यंजना में समाहित कर लेता है, तब ही रचना में प्राण प्रतिष्ठा होती है।