रास्ता मिला - कहानी

- डॉ. हरिमोहन गुप्त  
डॉ. हरिमोहन गुप्त
रात में इन्टरसिटी एक्सप्रेस से जैसे ही प्रदीप एट स्टेशन पर उतरा तो यह जानकर सन्तोष हुआ कि कोंच जाने वाली ट्रेन अभी खड़ी है और इन्टरसिटी एक्सप्रेस की सवारियों का इन्तजार कर रही है, एक्सप्रेस जाने के बाद प्रदीप रेलवे की पटरियों को पार कर कोंच जाने वाली ट्रेन में बैठ गया। पाँच मिनट बाद ही ट्रेन चल दी उसे अधिक इन्तजार नहीं करना पड़ा। ट्रेन जैसे ही चली प्रदीप अतीत में गोते लगाने लगा। अब से करीब 35 वर्ष पूर्व जब मैं लगभग 10 वर्ष का ही था तभी कोंच आया था उस समय तो दिन की यात्रा थी। ट्रेन ने धीमी गति से कुल 13.5 किलोमीटर की यात्रा आधे घन्टे में पूरी की थी। चारों तरफ खेतों में हरयाली उस क्षेत्र की सम्पन्नता बता रही थी कितनी बड़ी मंडी रही होगी तभी तो किसी कम्पनी ने इतनी छोटी दूरी के लिए रेल की पटरियाँ बिछाई होगी आज भी इसे हिन्दुस्तान की सबसे कम दूरी की ट्रेन की संज्ञा दी जाती है आज तो यह बिजली के इंजन से चलती है तभी इंजन की सीटी के साथ गाड़ी रुकी और उसकी विचार श्रंखला टूटी, अरे यह तो स्टेशन आ गया|

        रात में 11 बज रहे थे लोग उतर कर टेम्पो की ओर दौड़ रहे थे, क्योंकि वे लोग जानते थे कि रात के समय स्टेशन पर टेम्पो कम ही आते हैं 10, 12  टेम्पो सवारियों को आवाज लगा रहे थे। प्रदीप धीमी गति से ट्रेन से उतरा तब तक सभी टेम्पो वाले चलने के लिए तैयार थे। कोंच नगर बहुत बदल चुका था। तांगे, साइकिल रिक्शे की जगह टेम्पो वालों ने ले ली थी। वह जब तक किसी टेम्पो वाले से कहता कि मुझे नाला पार कर धनुताल के रास्ते में गोखले नगर जाना है तब तक सभी टेम्पो वाले वहाँ से चल दिये थे। एक साइकिल रिक्शा वाला अवश्य वहाँ खड़ा था प्रदीप ने उससे पूछा क्या खाली हो? उसने कहा बाबूजी कहाँ जाना है। प्रदीप बोला धनु ताल वाले रास्ते में नाला पार करके गोखले नगर जाना है, जहाँ तक तुम चल सको, मुझे ले चलो नाले का और आगे का रास्ता मैं पैदल चल कर पूरा कर लूँगा।

रिक्शे वाला बोला नहीं बाबूजी आपको जहाँ तक जाना है वहीं तक पहुचाऊँगा।
प्रदीप ने पूँछा “कितने रुपया लोगे”, वह बोला “आप जो उचित समझें दे दीजियेगा।”
प्रदीप ने कहा “नहीं पहिले बता दो बाद में रिक्शेवाले अक्सर झगड़ने लगते हैं”
वह बोला “बाबूजी ऐसा नहीं है, फिर भी आप पूंछते हैं तो आप तीस रुपया दे देना।”
रिक्सा प्रदीप को ले कर चला, वह जब बचपन में यहाँ आया था रिक्सा वाला जाने किस किस
गली में हो कर नाले के पास पहुंचा था, वहीं कहने लगा था कि नाले में पानी है और आगे सड़क पर दल दल है, रिक्सा यहीं तक आता है। प्रदीप अपनी माँ के साथ सामान ले कर नाले को पार कर दल दल में ही पैदल नाना जी के घर पहुँचा था, पर आज तो यह रिक्सा वाला किसी चौड़ी सड़क पर चल रहा है, आगे नाले पर पुल था और उसके आगे पक्की सड़क।

वह सोचने लगा नगर में बहुत अन्तर आ गया है, मैं तो वही पुराना नक्शा मस्तिष्क में लिए हुये था, तभी रिक्से बाला बोला बाबूजी आपको कहाँ रुकना है, आप नाला पार करके गोखले नगर में आ गये है।

         प्रदीप बोला रात का समय है, मुझे तो अंदाज भी नहीं है कि नाना जी का मकान कहाँ है? आप मुझे यहीं उतार दीजिये, मैं किसी से पूँछ कर उनके घर पहुँच जाऊंगा।

रिक्से बाला बोला “इस समय रात के 11.15 बज रहे हैं, सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा, आप बाहर के आदमी किससे पूंछते फिरेगें, आप अपने नाना का नाम बताइए, मैं आपको वहीं पहुंचा दूंगा।” प्रदीप ने कहा “विक्रम बाल्मीक के घर जाना है, क्या आप उन्हें जानते हैं”? वह बोला “जानता क्यों नहीं, कल ही तो उनकी नातिन की शादी है, मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ, मैं आपको उन्हीं के घर छोड़ दूँगा।”

          विक्रम के घर अभी सभी लोग जाग रहे थे, प्रदीप रिक्शे से उतरा तो उसे पचास का नोट दिया। रिक्से वाला उन्हें बीस रुपए लौटने लगा तो प्रदीप बोले “रात के समय वैसे भी किराया दूना हो जाता है। और फिर तुमने तो मुझे ठिकाने तक पहुंचा दिया।”

         प्रदीप ने उससे पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा और कहाँ रहते हो?” वह बोला “मेरा नाम प्रभाकर तिवारी है। यहीं आगे धनुताल के पास काली देवी के मन्दिर के पास ही रहता हूँ।” प्रदीप ने आग्रह किया कि बीस रुपए आप लिए जाईये, कल सुबह आप के दर्शन मन्दिर में करूँगा।
   
         प्रदीप ने घर में आकर जैसे ही नाना जी के पैर छुए तो वे बोले “बेटा आ गए” यहाँ आने में बहुत तकलीफ हुई होगी, टेलीफोन कर देते तो किसी को मोटर साईकिल से बुलवा लेते। प्रदीप बोला “नहीं नाना जी, तकलीफ काहे की, अपने ही मोहल्ले का, प्रभाकर, स्टेशन पर मिल गया था वही यहाँ तक ले आया।”

    नाना बोले “बड़ा भला लड़का है, सेवा भाव तो कूट–कूट कर भरा है, बड़ी मेहनत करके पढ़ पाया है, ऊँच – नीच का भेद भाव तो उसके मस्तिष्क में है ही नहीं।” भीतर पहुँच कर प्रदीप ने नानी के चरण स्पर्श किए और सभी को यथा योग्य सम्मान दे कर वहीँ बैठकर चाय नाश्ता और फिर भोजन करके लेट गया।

    सुबह उठकर प्रदीप नहा धो कर तैयार हुआ तो अपनी मम्मी से बोला “मैं काली देवी के मन्दिर में दर्शन करने जा रहा हूँ, वहीँ से लौटकर नाश्ता करूँगा।” वह सड़क पर आ कर धनुताल की ओर बढ़ गया रास्ता बिलकुल बढ़िया, पक्की सड़क दोनों ओर फुटपाथ एवं नाली, दोनों किनारों पर लगे पेड़ सड़क की शोभा बढ़ा रहे थे। बड़ा शांत वातावरण और मनोरम दृश्यों ने उसे बहुत प्रभावित किया, पिछली बार जब वह आया था तो इस सड़क पर चलना मुश्किल था, बरसात की तो बात ही अलग गर्मियों में भी चलना कठिन था। धनुताल के पास पहुँच कर उसे एक ऊँची सी दीवाल नुमा तीन मंजिल की एक इमारत दिखाई दी जिसे नगर पालिका परिषद ने उसे लंका की “अशोक वाटिका” का रूप दिया है। चारों तरफ अशोक के वृक्ष इस इमारत की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसी के निकट काली जी का मन्दिर है। उसने वहाँ जाकर दर्शन किए और प्रभाकर के बारे में जानकारी ली, यहाँ लोगों ने बताया मन्दिर में आरती प्रभाकर के पिता जी ही कर रहे हैं, वे मन्दिर के पिछवाड़े ही रहते हैं, आरती के उपरान्त प्रदीप, मन्दिर के पिछवाड़े की ओर गए तो प्रभाकर से भेंट हो गई।

     प्रदीप ने प्रभाकर से कहा “कल तो रात बहुत हो गई थी इस कारण तुम्हारे बारे में अधिक न जान सका, यह बताओ तुम्हारे घर में और कौन – कौन है तुम कहाँ तक पढ़े हो, रिक्सा चलाने के अतिरिक्त भी कोई काम करते हो”? प्रभाकर बोला “घर में, मैं और पिता जी हैं वे इसी मन्दिर में पुजारी हैं और दोनों समय सेवा पूजा करते हैं शेष समय में यहीं पास में बैठकर साइकिल पंचर और मरम्मत का काम करते हैं”, अभी आठ महीने हुए मेरी माँ को टीवी हो जाने से अर्थाभाव के कारण ठीक से इलाज नहीं हो सका और वे असमय ही चल बसी। मैंने पिछली साल यहीं के महाविद्द्यालय से B.C.A. की परीक्षा पास की है पूरे एक वर्ष मैं काम की तलाश में भटकता रहा पर सब जगह निराश ही रहा सब प्रारब्ध मानकर सन्तोष कर लेता हूँ। उच्च वर्ग में जन्म लेने के कारण सरकारी नौकरी तो मिलने से रही यदि कहीं जुगाड़ लगा भी लूँ तो अर्थाभाव सामने खड़ा हो जाता है। अभी चार महीने ही हुए हैं एक कम्प्यूटर की दुकान में काम करने लगा हूँ। वह मुझे पाँच सौ रुपए मासिक देता है। सुबह नौ बजे से सायंकाल पाँच बजे तक उसकी दुकान पर बैठकर काम करता हूँ। फिर पाँच बजे से रात 11 बजे तक रिक्सा चलाता हूँ। मंहगाई का दौर है मुश्किल से गुजारा हो पाता है। फिर भी प्रसन्न हूँ यह सब ईश्वर की इच्छा है। अरे मैं तो भूल ही गया आप बैठिए तो सही आप भी अपना परिचय देने की कृपा करें, यह भी बताएं कि आप को मुझमें इतनी दिलचस्पी क्यूँ और कैसे हो गई।

    प्रदीप ने कहा “मैं भी अर्थाभाव में पला हूँ, क्या बताऊँ मेरे पिता जी स्वदेशी कॉटन मिल कानपुर में स्वीपर की पोस्ट पर थे, पर मिल की बंदी के कारण बेरोजगार हो गए तो वहीँ  गोविन्दपुरी स्टेशन के पास झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहने लगे और सड़क पर साइकिल ठीक करने का काम करने लगे। जैसे तैसे गुजारा होता रहा, पर जब दुर्भाग्य साथ में होता है तो कठिनाइयाँ ही बढ़ाता है, कभी माँ बीमार, कभी वे स्वयम बीमार, बड़ी मुश्किलें थीं पर उनकी एक ही साध थी कि मैं किसी तरह पढ़ जाऊँ और इंजीनियर बन जाऊँ साइकिल ठीक करने में, मैं भी उनका सहयोग करता। उसी से जो भी बचता मेरी पढाई में खर्च हो जाता, स्वप्न और संकल्प तो बड़ा था पर वे कभी परिश्रम से नहीं हारे, मैं पढाई में ठीक था इण्टर करने के बाद ही मैं कम्टीशन में बैठा और मुझे आई. आई. टी. कानपुर में कम्प्यूटर ब्रांच मिल गई। सरकारी वजीफा मिलने के कारण ही पढाई पूरी कर सका, पहले तो मैं सरकारी नौकरी की तलाश में रहा पर दलित होते हुए भी सब जगह रुपयों की माँग हो जाती जिसे देने में,मैं असमर्थ था। भाग्यवश एक अन्तर्राष्ट्रीय सोफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी मिल गई। लगन परिश्रम के कारण ही तरक्की करता गया आजकल नोएडा में इसी कम्पनी में C.E.O. हूँ। अभी पाँच वर्ष अमेरिका में रहकर इसी वर्ष लौटा हूँ। मेरा बेटा आई. आई. टी. रुड़की में कम्प्यूटर साइंस से अंतिम वर्ष में है। यहाँ विक्रम बाल्मीकि के यहाँ मेरी ननिहाल है माँ तो 15 दिन पहले ही आ गईं थीं। पर बेटे को छुट्टी नहीं मिली नाना जी के यहाँ,यह आखिरी काम है इसीलिए सोचा जाना आवश्यक है,पत्नी वहीँ नोएडा में है।

    प्रभाकर तुम्हारी बेबाक बातों को सुनकर मैं अत्याधिक प्रभावित हुआ हूँ। तुम में कुछ करने का हौसला है, आगे बढ़ने की लगन है, तुम अगर मेरी बात मानो तो यह हमारा कार्ड है इसी पते पर नोएडा आ जाओ। तुम्हें बीस हजार मासिक वेतन और प्रतिवर्ष बढ़ोत्तरी मिलेगी, पिता जी को भी साथ ले आना उन्हें भी किसी मन्दिर में पुजारी बनवा दूँगा। यहाँ तुम्हारा कोई मकान है या नहीं वह बोला “मन्दिर वालों की कृपा है जो एक कमरा दे दिया है। आपने यह कार्ड देकर मेरा उद्धार कर दिया। यहाँ से मैं आपके साथ ही नोएडा चलूँगा।”