लावण्या शाह कृत 'अधूरे अफ़साने'



पुस्तक समीक्षा: अनुराग शर्मा द्वारा

कथा संग्रह: अधूरे अफ़साने
लेखिका: लावण्या शाह
पृष्ठ संख्या: 184
आईएसबीएन: 978-93-81520-26-0
मुद्रित मूल्य: ₹ 250.00
आवरण: सनी गोस्वामी
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर (मध्य प्रदेश)

कुछ पुस्तकों का आपको इंतज़ार रहता है जबकि कुछ पुस्तकें आपके हाथ अनायास ही लग जाती हैं। मेरे लिये लावण्या जी कृत 'अधूरे अफ़साने' प्रथम श्रेणी की पुस्तक है क्योंकि इसके प्रकाशन से पहले से उन्होंने मेरे साथ इसके बारे में चर्चा की थी। मेरे लिये यह गर्व की बात है कि डॉ मृदुल कीर्ति, तेजेंद्र शर्मा और अमरेंद्र कुमार जैसे ख्यातनामों के साथ उन्होंने मुझे भी इस पुस्तक पर दो शब्द कहने का अवसर प्रदान किया।

हिंदी के प्राख्यात कवि तथा फ़िल्मी गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा की पुत्री लावण्या शाह हिंदी की स्थापित साहित्यकार हैं। हिंदी, गुजराती और अंग्रेज़ी पर समान नियंत्रण रखने वाली बहुभाषी लेखिका लावण्या शाह की अभिव्यक्ति गद्य और पद्य, इन दोनों ही स्वरूपों में अनेक विधाओं में प्रकाशित होती रही है। प्रसिद्ध पौराणिक धारावाहिक 'महाभारत' में उनके लिखे हुए दोहे प्रयुक्त हुए हैं। उनकी कई रचनायें और संस्मरण रेडियो पर प्रसारित हो चुके हैं। 'अधूरे अफ़साने' से पहले उनकी दो अन्य पुस्तकें पाठकों द्वारा सराही गई हैं, जिनमें 'फिर गा उठा प्रवासी' एक काव्य संग्रह है और 'सपनों के साहिल' एक उपन्यास।

लावण्या शाह
'अधूरे अफ़साने' दो खण्डों में बाँटी गई है। कुल ग्यारह रचनाओं में से सात कहानियाँ पहले खण्ड में उपस्थित हैं। द्वितीय खण्ड में एक बाल नाटक और तीन बाल कथाएँ शामिल हैं। लावण्या जी एक बड़े कैनवस की कलाकार हैं। उनके पास अनुभवों का भण्डार है। पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण विनोबा भावे से लेकर लता मंगेशकर, सुमित्रानंदन पंत से लेकर अमृतलाल नागर तक, और पंडित प्रदीप से लेकर अमिताभ बच्चन तक, सब उनके लिये परिजनों जैसे ही रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारत और अमेरिका की दो एकदम अलग संस्कृतियों और पुरातन से अधुनातन तक की विविधता को नज़दीक से देखा है। उनकी कहानियों में इस वैविध्य का झलकियाँ और वैश्विक अनुभव की परिपक्वता सहजता से नज़र आती है। 'ज़िंदगी ख़्वाब है' का सीईओ रोहित हो या 'समदर देवा' का मरजीवा तैराक देवा; टूटा सिपाही का आठ वर्षीय मुन्ना हो या 'स्वयंसिद्धा' की सिद्धेश्वरी, लावण्या जी पात्रों के कुशल चित्रण में सिद्धहस्त हैं।
अनुराग शर्मा
"लावण्या जी जैसे निर्मल हृदय साहित्यकार पाठक को आश्वस्त करते हैं कि सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है, न कभी होगा। लावण्या जी की रचनाएँ भी उनके वात्सल्य भरे सरल व्यक्तित्व जैसी ही हैं। लावण्या जी का स्वर माधुर्य, उनकी सरलता उनकी रचनाओं में महसूस की जा सकती है। उच्च भावनात्मक बुद्धि और साहित्यिक परिपक्वता के साथ संसार का अनुभवी लेखा-जोखा पाठक के सामने यथावत प्रस्तुत कर पाना वर्तमान काल में दुर्लभ है। अपनी लेखनी द्वारा पाठक को पात्रों की मनस्थिति, उनके जीवन की घटनायें, देश-काल और परिस्थितियों का प्रत्यक्षदर्शी बना देना उनके लेखन की विशेषता है।"

प्रथम खण्ड की सबसे छोटी कहानी 'कौन सा फूल सर्वश्रेष्ठ है' में एक पारम्परिक ग्रामीण भारतीय परिवार के एक विवाह प्रसंग का रोचक वर्णन है।

'कादंबरी' शोषण का सफलतापूर्वक सामना करने वाली एक कलाकार की संघर्ष गाथा है जो अपने जैसी ही परिस्थितियों से जूझ रही एक लड़की की सहायता करती है।

कादम्बरी आलस्य छोडकर उठ बैठी उसके नन्हे प्यारे हाथ थामकर बोली, "नहीं सो रही ... बता क्या चाहिये?" "दादी चाहिये", कहकर मातंग ताली बजा कर हंँसने लगा और उसके गाल में पड़ते गड्ढों में कादम्बरी सेन भी डूब कर, परमानंद में लीन होकर सुख के सागर में गोते लगाती हुई हंँस पड़ी थी। यह जीवन है तो यही रहे ... यूँ ही चला चले ... उसने कहा और मातंग का हाथ थामे वह उसे बाहर आइसक्रीम खिलाने के लिए ले चली।

'ज़िंदगी ख्वाब है' में पाठक दो पात्रों के वैवाहिक जीवन के सामान्य मतभेदों की पौध को बड़े होकर संघर्षों का दुरूह बीहड़ बनते देखते हैं। लेखिका के अनुसार यह मर्मस्पर्शी कहानी एक सत्यकथा पर आधारित है। देश-काल-पात्र-परिस्थिति के अनुसार इस कहानी में कुछ सम्वाद अंग्रेज़ी भाषा और रोमन लिपि में हैं। अंग्रेज़ी न जानने वाले पाठक के लिये यह एक समस्या हो सकती है।

प्रकाश राजश्री और शालिनी तथा परिवार के सभी सदस्य, दुखी हृदय से रोहित के विछोह का दुःख झेल रहे थे। सभी बेहद हताश थे, दुखी थे। बस यही सच था। इससे अधिक कुछ सूझ न रहा था।


'मन-मीत' एक रहस्यपूर्ण प्रेमकथा है। इसका शिल्प अब लुप्त-प्राय अलंकारिक शैली की याद दिलाता है।

सामने जमीन पर मखमल सी हरी घास बिछी थी और उस हरी घास के दरिया के बीचोंबीच, हल्के बादामी रंग से पुती हुयी एक छोटी सी कुटिया थी। सामने लकड़ी की नक्क्काशी से सजा एक बड़ा प्रवेशद्वार था जिसके सामने, लता मंडप पर एक तरफ सफेद और दूसरी तरफ लाल गुलाब के पौधे फूलों से भरे स्वागत में खिले हुए झूम रहे थे और उन्हीं के पीछे रातरानी और जूही की लताएँ लहराकर गले मिल रहीं थीं।
तुम अपनी पर्स से झुक कर चाबी निकालकर सीधी हुईं और दरवाज़ा खोलने लगीं और मैं सुगंध सागर में अनिमेष वहीं खड़ा हुआ एक आनंद के सागर में गोते लगा रहा था कि दरवाज़ा खुल गया और तुम भीतर दाखिल हो गयीं। मैं दरवाजे के पास पहुंचा। मेरे उस द्वार पर हाथ रखते ही वह भीतर की तरफ खुल गया। तुम उसे खुला ही छोड़कर भीतर चली गई थीं शायद! मन भी काँप रहा था मेरा और तन भी! पर उस वक्त होश किसे था? मैं हिम्मत कर भीतर प्रविष्ट हो गया। बाहर की तेज धूप से अभ्यस्त आँखें भीतर के धुंधलके में कुछ पल के लिए कुछ भी देख न पायीं। कमरे में फ़ैली मद्धम रोशनी में मैं अपनी आँखों को अभ्यस्त कर रहा था। जब कमरा साफ़ दिखने लगा तो मैंने देखा, दो बड़े आरामदेह सोफा सेट और लम्बी खिडकियों पर महीन, सफेद लेस से बने लम्बे जमीन तक लहराते परदे हवा से झूल रहे थे। शोख मरून रंग की कारपेट के इर्द-गिर्द, ग्रे रंग के सोफे, कमरे को भव्यता के साथ, सुन्दरता भी प्रदान कर रहे थे। दीवारों पर वही सौम्य ग्रे रंग, हल्के आसमानी या भूरे रंग जैसा, पुता हुआ था। रेकॉर्ड प्लेयर पर हल्की हल्की संगीत की धुन बज रही थी।

'जनम जनम के फेरे' का विस्तृत फलक देस-परदेस, के साथ संयुक्त परिवार से एकाकीपन तक की यात्रा का अधूरा अफ़साना है।

"कोल्हू का बैल बनी बडी बहू की बस यही औकात है! आखिर हर बार मिन्नतें करनी होंगी मुझे? बच्चों से जब ये सभी प्यार करते हैं तब उनकी देखभाल, शिक्षा की जिम्मेदारी भी क्या संयुक्त परिवार का जिम्मा नहीं? यह कहाँ का न्याय है? नहीं नहीं, ये सरासर अन्याय है! कब तक इस तरह घुटती रहूँगी मैं?"

वह सोच सोच कर परेशान हो जाती। संयुक्त परिवारों में ऐसे भी होता है, किसी का दम घुट जाता है तो कोई जिसके हाथ मेँ सत्ता की बागडोर है, पैसोँ का व्यवहार जो थामे हुए हों वे मौज करते हैं मनमानी करते हैं और शाँत घरों में, सभ्य रीति से फैलता है - एकाकीपन! ये विडम्बना ही तो है आधुनिक युग की! कबीर जी ने सही कहा था, "दो पाटन के बीच में बाकी बचा न कोई!" यहाँ कोई अदालत या कचहरी नहीँ जो न्याय, व्यवस्था देखे।

'समदर देवा' मुंबई के सागर तट वासी समुदाय पर का सजीव चित्रण करती हुई एक प्रेम कथा है। कथानक के साथ-साथ उस समुदाय की जीवन-शैली का सजीव चित्रण पाठक को बांधकर रखता है। यह कहानी दर्शाती है कि सभ्य समाज से दूर अपने-अपने जनजातीय समाज की अबूझ पहेलियों में उलझे जीवन किस प्रकार तमस से ज्योति की ओर बढ़ने को प्रयासरत हैं।

मंजरी नहीं जानती पर देवा कई बार इसी तरह उसे गुंडों मवालियों से बचाने के लिए लड़ चुका है। सब कहते हैं, "यह तो गुलाब का काँटा है! तभी तो चुभता है ..."
कई बदमाश हँसते और कहते, "आया देख रखवाला! हाँ जो होता है कर ले अभी, वो दिन दूर नहीं जब इसका बाप ही इसे हमारे हवाले करेगा! इसका बाप हमारे पास छोड़ जाएगा तो तू हाथ मलता रह जाएगा ..."

मंजरी ने एक बार ये ताने सुन लिए थे और वह काँप कर वहीं रूक गयी थी! देवा का गुस्सा और उन बदमाश लडको पर बरसते देवा के घूँसे भी उस दिन मंजरी ने देख लिए तो उसे 'बाबा' की याद आयी।

छपाई की ग़लतियाँ
प्रतीकों के सहारे चल रही कथा 'स्वयंसिद्धा' की कथा किशनगढ़ नामक एक समृद्ध काल्पनिक राज्य के विद्वान दामोदर शास्त्री के परिवार में घट रही एक घटना का चित्रण है। 'स्वयंसिद्धा' पाठकों को वर्तमान से उठाकर किसी कालयान के द्वारा मानो मीरा, अंडाल और राधा के काल में ले जाती है। वही समय, वही लोक और वही लोग।

आज श्रीकृष्ण के प्रसाद सा 'गोपाल ', दूल्हा बना है तो ब्राह्मण दंपत्ति के आनंद का सागर हिलोर ले कर सर्वत्र बह चला है। कितना सज रहा है गोपाल आज! तीन सौ कोस दूर के गाँव बेलापुर से आज ही नवविवाहित बहूरानी को लिए बारात शास्त्री जी के घर लौटी है। बहूरानी का नाम 'सिद्धेश्वरी है। वह उच्च कुल की कन्या है। बहू का गाँव दूर भले ही था, यात्रा थकावट भरी अवश्य थी, परंतु किसी यजमान के घर थोड़े ही न गये थे दामोदर पण्डित जो थक जाते!

'सोने का अनार' मिनी नाम था की शैतान और चुलबुली बच्ची की कहानी है जिसे एक सुखद शिक्षा एक अनपेक्षित स्रोत से मिलती है।

सभी बच्चे तालियाँ पीटने लगे और खुश हुए बस एक मिनी को छोड़कर! मिनी उदास हो गयी, क्यूंकि वह दातुन नहीं करती थी। वह बोलने लगी, "मैं अब रोज दातुन मंजन करूँगी ..."

'टूटा हुआ सिपाही' में डॉ बैनर्जी मुन्ना के साथ-साथ उसके सिपाही के पाँव भी ठीक करके उसे आश्चर्य में डाल देते हैं।

अरे भई मुन्ना देखिये, क्या ये सिपाही आपका है? आज सुबह हमारी क्लीनिक की मेज पर जनाब खड़े थे। शायद अपनी जाँच पड़ताल करवाने आये हों! मैं यहीं आ रहा था तो इन्हें भी साथ ले आया। संभालो अपने सिपाही को! यह कहते हुए डाक्टर चाचा ने सिपाही मुन्ना के हाथों में थमा दिया! मुन्ना आश्चर्य से दो टांगों पे खड़े अपने सिपाही को देखता ही रह गया!

नन्हे-मुन्ने पाठकों के लिये इस संग्रह में दो बाल नाटक 'खिलती कलियाँ' तथा 'एक पल सर्वनाश से पहले' भी हैं। लावण्याजी के शब्दों में -
किताबें अक्सर बड़ों के हाथ में ही पहुँचती हैं। तो यही सोचकर कि परिवार के शिशुओं के लिये भी इस किताब में कुछ कहानियाँ हों, ऐसा सोचकर ये बालकथाएँ और नाटक आप तक पहुँचा रही हूँ।


एक अनाथ प्रश्नवाचक चिह्न
अधूरे अफ़साने का आवरण आकर्षक है और आवरण कला इसकी साहित्यिक सामग्री के अनुरूप ही सुंदर है। कड़े आवरण की पुस्तक में यत्र-तत्र दिखने वाली कम्पोज़िंग और टाइपसैटिंग की ग़लतियाँ रसभंग करती हैं। खासकर पिछली पंक्ति से अनाथ किये गये व्याकरण चिह्न अगली पंक्तियों के पहले खड़े होकर प्रकाशकीय लापरवाही के प्रति सचेत करते से लगते हैं। उत्कृष्ट पठन-सामग्री से भरपूर इस संग्रह को पढ़ने के लिये छपाई की इन त्रुटियों की उपेक्षा की जा सकती है।

कुल मिलाकर यह एक अलग तरह का अच्छा और वैविध्यपूर्ण संग्रह है, जिसमें हर वय के पाठक के लिये सुरुचिपूर्ण सामग्री उपस्थित है।