अमित कुमार मल्ल की कविता

छोटे छोटे खेतों की
मेड़ों पर
चलते हुए
हथेलियों से
गेहूँ की बालियों को
छूता हूँ
सहलाता हूँ
न जाने क्यों
मिट्टी की महक
मेरी साँसों में भर जाती है
कीचड़ वाली मिट्टी में
चिक्के का खेल याद आता है
बचपन में
माँ के हाथों का
स्पन्दन याद आता है।