आइंस्टीन और मिलेवा: तलाक के समय के पत्र

- मेहेर वान
मेहेर वान

आइंस्टीन और मिलेवा सन 1896 में मिले थे। वे ज़्युरिक पॉलीटेक्निक कॉलेज में डिप्लोमा के कोर्स में सहपाठी थे जो कि हाई स्कूल स्तर की कक्षाओं में पढ़ाने की अर्हता प्राप्त करने के लिये था। मिलेवा विशेष रूप से प्रतिभावान रहीं होंगी क्योंकि उस समय महिलायें विज्ञान की पढ़ाई कम ही करती थीं। आइंस्टीन की कक्षा में मिलेवा अकेली छात्रा थीं। सन 1897-98 में विज्ञान के कुछ विशेष विषयों की पढ़ाई के लिये मिलेवा हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय चली गयीं और सन 1898 में वह पुनः ज़्यूरिक आ गयीं। हालांकि मिलेवा सन 1901 में डिप्लोमा की अंतिम परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गयीं। इसके बाद उनकी पढ़ाई में बाधा आती रही, वह भौतिकी के प्रोफ़ेसर हेनरिक वेबर से निर्देशन में पीएचडी करना चाह रही थीं।

कॉलेज की यह प्रेम कहानी सन 1903 में शादी में तब्दील हो गयी, आइंस्टीन और मेरिक बर्न शहर आ गये, जहाँ आइंस्टीन को पेटेंट क्लर्क की नौकरी मिल गयी। सन 1904 में उन्हें पहला पुत्र हुआ जिसका नाम हैंस अल्बर्ट रखा गया। आइंस्टीन बर्न में 1909 तक रहे, 1911 में उन्हें प्राग के चार्ल्स विश्वविद्यालय में अध्यापन की नौकरी मिल गयी।

एक साल बाद 1912 में आइंस्टीन वहीं पढ़ाने लगे जहाँ से उन्होंने पढ़ाई की थी यानि ज़्यूरिक पॉलीटेक्निक। सन 1913 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैक्स प्लाँक और वाल्टर नर्स्ट के कहने पर आइंस्टीन बर्लिन विश्वविद्यालय आ गये, हालाँकि मिलेवा इस निर्णय के पक्ष में नहीं थीं। मिलेवा धर्म और धार्मिक रीति-रिवाज़ों में विश्वास करती थी और आइंस्टीन नास्तिक थे। आइंस्टीन मिलेवा की विद्वत्ता से प्रभावित थे, वह लोग साथ बैठकर भौतिकी के विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद करते थे, उन्होंने साथ बैठकर भौतिकी की तमाम कठिन किताबों को पढ़ा और उन्हें समझने की कोशिश की। डिप्लोमा में अनुत्तीर्ण होने और शादी के बाद मिलेवा का भौतिकी की तरफ़ रुझान शायद उतना नहीं रहा जितना पढ़ाई के दिनों में था। आइंस्टीन उन्हें हमेशा पढ़ाई ज़ारी रखने के लिये प्रोत्साहित करते रहे। बाद में एक समय ऐसा आया जब आइंस्टीन अपना शोध और अपने वैज्ञानिक गणनाओं वाले कागज मिलेवा को दिखाने से बचने लगे। उन्हें मिलेवा का धार्मिक रीति-रिवाज़ो में शामिल होना भी ठीक नहीं लगता था।

सन 1914 में आइंस्टीन और मिलेवा अलग हो गये और आइंस्टीन ने मिलेवा को 5600 रीचमार्क प्रतिवर्ष देने का कानूनी वादा किया। अलग होने से पहले आइंस्टीन ने मिलेवा के सामने साथ रहने के सम्बन्ध में कुछ कठिन शर्तें रखीं थीं, जिन्हें मिलेवा ने स्वीकार नहीं किया था। कानूनन रूप से अलग होने के पाँच साल बाद, 14 फ़रवरी 1919 को उन्हें तलाक मिल गया। आइंस्टीन ने इसी समय यह भी वादा किया था कि अगर उन्हें भविष्य में नोबेल पुरस्कार मिलता है तो इस पुरस्कार की राशि वह मिलेवा को देंगे, जो कि उन्होंने निभाया भी। आइंस्टीन ने सन 1919 में दूसरी शादी कर ली और अमेरिका चले गये। उन्होंने मिलेवा को दी जाने वाली राशि देना अमेरिका से भी जारी रखी। यह पत्र 1914-15 में आइंस्टीन ने लिखे थे। ये पत्र आइंस्टीन की बेटी ने उनकी मौत के बाद प्रिंसटन विश्वविद्यालय को सौंपे थे।

आइंस्टीन द्वारा मिलेवा मेरिक को दिया गया ज्ञापन
बर्लिन, 18 जुलाई, 1914
शर्तें
अ) तुम्हें सुनिश्चित करना है-
1) कि मेरे कपड़े और धुलाईघर सुव्यवस्थित और सलामत रहें
2) कि मुझे नियमित रूप से तीन समय का खाना अपने कमरे में मिले
3) कि मेरे सोने वाले कमरे और ऑफ़िस हमेशा साफ़-सुथरे रहें, विशेषकर मेज सिर्फ़ मेरे लिये ही उपलब्ध हो
आ) तुम्हें मेरे साथ सभी व्यक्तिगत रिश्तों को त्यागना होगा, जब तक कि उन्हें सामाजिक कारणों से निभाना बहुत ही ज़रूरी न हो। विशेष रूप से तुम्हें इस सब से बचना होगा-
1) घर पर मेरे साथ बैठने से
2) घर से बाहर या तुम्हारे साथ यात्रा के दौरान
इ) मेरे साथ तुम्हारे सम्बन्धों के बारे में तुम खुद से यह वादा करोगी कि तुम निम्नलिखित बिन्दुओं का विशेषरूप से खयाल रखोगी-
1) तुम न तो मुझसे अंतरंगता की उम्मीद करोगी न ही मुझे उलाहने दोगी
2) जब भी मैं तुमसे गुज़ारिश करूँगा तुम मुझे संबोधित करना फ़ौरन बंद कर दोगी
3) यदि मैं तुमसे अनुरोध करूँ तो तुम्हें मेरे सोने वाले कमरे या ऑफ़िस से तुरंत बाहर चले जाना होगा
ई) तुम्हें खुद से यह वादा करना होगा कि तुम बच्चों के सामने मुझे न तो बात-चीत में न ही क्रियाकलापों के ज़रिये अपमानित करोगी
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मैं तुम्हारे लिये शर्मिंदा हूँ क्योंकि तुमने खुद बर्लिन के प्रति इतना अनुराग पैदा कर लिया है। छोटे बच्चे! मेरे पास तुम्हें कहने के लिए सिर्फ़ इतना ही है कि उन्होंने ठीक ही किया है। तुम अपने हिसाब से काम करो, खुद को धोखे खाने दो। मुझे सच में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इसे आराम से पढ़ो। यह तुम्हारे लिये अच्छा होगा। इसे अपने परिवार के लिये भी पढ़ो, उनके पास भी इसके अलावा करने के लिये कुछ नहीं है।
अनुलेख: जब से तुम बर्लिन आई हो, तुम काफ़ी आलसी हो गयी हो।

मिलेवा, तुम्हें वह बात श्रीमती हैबर को भी जरूर लिखनी चाहिये। उन्हें भी जानना चाहिये कि अन्य लोग भी इस बात को जानने के इच्छुक हैं कि एक विख्यात आदमी कैसे व्यवहार करता है। ओछे मजाक।

आइंस्टीन का मिलेवा मेरिक को पत्र
18 जुलाई, 1914, बर्लिन

प्रिय मीज़ा,
कल श्री हैबर ने मेरे पास एक पत्र भेजा और सलाह दी कि मैं तुम्हें लिखे गये पत्र में एक और टिप्पणी जोड़ दूँ, क्योंकि मैंने उसमें कहा था कि मुझमें तुम्हारे ऊपर एक पेशेवर साझेदारी के जितना ही आत्मविश्वास बचा है। इसकी संभावना बची हुयी है कि तुम्हारे अच्छे व्यवहार के ज़रिये मैं तुममें बेहतर स्तर का आत्मविश्वास हासिल कर लूँगा।

इसे उनकी इच्छा की तरह ही होने दो। भविष्य कोई नहीं जानता। मैं किसी भी मामले में इस मुद्दे पर बहस करना लाभकारी नहीं समझता। इसीलिये मैं तुम्हें कहता हूँ कि निर्दिष्ट परिस्थितियों में क्या तुम मेरे साथ रहना चाहती हो। इस पर विचार करो और मुझे बिना किसी लेकिन-परन्तु के साफ़ उत्तर दो ताकि मैं जान सकूँ कि मेरी स्थिति क्या है।
मेरे प्यारे बच्चों को चुम्बन,
अल्बर्ट आइंस्टीन

मिलेवा आइंस्टीन-मेरिक को पत्र
बर्लिन, 18 जुलाई, 1914
 प्रिय मीज़ा,
कल हैबर ने मुझे तुम्हारा पत्र दिया, जिससे मैं यह समझ पाया हूँ कि तुम मेरी शर्तें स्वीकार करना चाहती हो। और मुझे अब भी तुम्हें फिर से लिखना है ताकि तुम परिस्थिति के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट रहो। मैं अपने अपार्टमेंट में वापस आने को तैयार हूँ, और इसका केवल एक ही कारण है, क्योंकि मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहता, और नहीं चाहता कि वो मुझे खोयें। आखिरकार यह हो ही गया कि तुम्हारे साथ अब गहरे दोस्ताना रिश्ते का कोई सवाल नहीं बनता। इसे एक वफ़ादार पेशेवर रिश्ता बन जाना चाहिये; व्यक्तिगत पहलुओं को छोटे अवशेषों की तरह सिमट जाने चाहिये। तथापि, इसके बदले में मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मेरी तरफ़ से तुम्हारे प्रति वही आचरण रहेगा, जैसे कि मेरा आचरण किसी अजनबी महिला के प्रति होता है। इतने के लिये तुम ऊपर मेरा विश्वास काफ़ी है, पर केवल इतना ही। यदि तुम्हारे लिये इस आधार पर साथ रह पाना असंभव हो तो मैं सम्बन्ध-विच्छेद की ज़रूरत के लिये खुद को सौंप दूँगा।
इस पर साफ़ उत्तर पाने के लिये प्रार्थना करते हुये,
अल्बर्ट

मिलेवा आइंस्टाइन-मेरिक के नाम पत्र
15 सितम्बर, 1914, बर्लिन
प्रिय एम (मिलेवा),
7 सितम्बर वाला तुम्हारा पत्र मेरी समझ से बाहर है, जिसमें तुमने पैसों की कमी की शिकायत की है: मैंने चाचाजी के ज़रिये 150 फ़्रेंक भेजे हैं और एक टेलीग्राम के ज़रिये दिशानिर्देश भेजा है कि तुम कैन्टोनल बैंक में बचत खाते वाली पासबुक से पैसे निकालना। साथ ही, मैंने कुछ दिन पहले ही तुम्हारे लिये 100M अगस्टिनरहॉफ़ होटल को भेजे है। इसके अलावा मैंने तुम्हारे विस्थापन के लिये पैसे उपलब्ध कराये हैं और बहुत ही थोड़ा सामान अपने लिये बचाया है, जैसे कि नीला सोफ़ा, जीर्णशीर्ण मेज, दो बिस्तर (जो कि मेरी माँ की अमानत हैं), डेस्क, मेरे दादा जी के घर वाली छोटी सी दराज़ और बदकिस्मती से यह इलैक्ट्रिक लैंप, जिसके बारे में मुझे यह पता नहीं था कि तुम्हें इससे लगाव है। अन्यथा मैंने ऐसा कुछ भी नहीं बचाया है जो महत्वपूर्ण हो। फ़र्नीचर इसलिये नहीं भेजा जा सकता क्योंकि रेलवे स्विटज़रलेंड ले जाने के लिये कुछ भी स्वीकार नहीं करता। जितने भी जल्दी संभव होगा मैं तुम्हें टेलीग्राफ़ भेजूँगा, तब तुम आवास ले पाओगी और बिना किसी कीमत के सबकुछ तुम्हारे पास पहुँचा दिया जायेगा।

मैंने तुम्हें कुछ और पैसे भेजे होते पर मेरे पास इस समय खुद मेरे लिये इतने भी पैसे नहीं हैं कि मैं दूसरों की मदद के बिना बिल्कुल भी संभाल सकूँ। मैंने तुम्हें 600 भेजे हैं, 200 तुम्हारे टिकट में खर्च हुये, जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है। फिर मुझे भी यहाँ से निकलना है और माँ का ऑपेरेशन है इत्यादि। और इस तरह, मेरे पास अपने लिये कुछ भी नहीं बचा है। पहली अक्टूबर को मेरी तनख़्वाह आयेगी, तन्ख़्वाह आते ही मैं तुम्हें 400 फ़्रेंक भेज दुँगा और इतने ही पैसे हर महीने की शुरुआत में भेज दिया करुँगा। हो सकता है कि मैं तुम्हें थोड़े और पैसे भेजने की स्थिति में होऊँ लेकिन मुझे लगता है कि जितना भी हो संभव हो मुझे पैसे बचाने को प्राथमिकता देनी चाहिये। मैं ख़ुद भी कल्पना की सीमा तक लगभग तुच्छ अस्तित्व वाला और अत्यन्त साधारण जीवन जी रहा हूँ। इस तरह हम अपने बच्चों के लिये अच्छा ख़ासा पैसा बचा सकते हैं।

मुझे लिखकर बताना कि अब तक तुम कैन्टोनल बैंक से कुछ पैसा निकाल पाई या नहीं। मैंने तुम्हारी धमकी को विधिवत समझ लिया है “अन्य लोगों से सहायता लेने की कोशिश करूँगी”; ख़ैर, मैं तुम्हारे पुराने व्यवहार से यह बात बहुत अच्छी तरह जानता हूँ, कि मुझे तुमसे कितने की उम्मीद है। मुझे कुछ भी चकित नहीं करेगा, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करती हो। तुमने मेरे बच्चों को मुझसे बहुत दूर कर दिया और यह सुनिश्चित कर रही हो कि उनका अपने पिता के प्रति रवैया भ्रष्ट हो जाये। तुम मुझसे उन अन्य लोगों को भी दूर कर दोगी जो मेरे नज़दीक हैं और मेरे जीवन में जो भी खुशी बची है उसे बरबाद करने का हर प्रयास करोगी। यह मेरी उन कमज़ोरियों के लिये सटीक दंड है जिनके कारण मैंने तुम्हें अपने जीवन में बेड़ियाँ डाल पाने की अनुमति प्रदान की थी। लेकिन मैं फिर कहता हूँ कि तुम कुछ भी करो, तुम मुझे चकित नहीं करोगी।
मैं जल्दी ही तुम्हें चाभियाँ सौंप दूँगा।
वोल्ह्वैंड्स के प्रति सम्मान के साथ, बच्चों को चुम्बन,
अल्बर्ट।
अगले महीने मैं तुम्हें अलग से 500 फ़्रेंक भेज रहा हूँ ताकि तुम सब आराम से रहो।
मुझे आशा है कि अपने नये पते के बारे में अगस्तिनरहॉफ़ को जानकारी दे दी होगी, मैंने वहाँ बहुत सारे टेलीग्राम और पैसे भेजे हैं।

मिलेवा मेरिक के नाम पत्र
बर्लिन; 12 जनवरी, 1915
प्रिय एम (मिलेवा),
सरकारी तौर पर तुम मेरी पत्नी हो, जैसे कि पहले थी, और ठीक वैसे ही मेरी अर्थिक सम्पत्ति पर बच्चों के साथ तुम्हारा भी अधिकार है। लेकिन यह 10,000 फ़्रेंक्स तुम्हें देने की मेरी कोई इच्छा नहीं है जो मेरी व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिये मुझे मिले पैसों का एक हिस्सा हैं। यह दावा मुझे विचार-विमर्श से परे महसूस होता है। यदि तुम्हारी पैतृक विरासत का हिस्सा तुम्हारे माँ-पिता के हाथ में ही रहता, तो यह तुम्हारे लिये उतना ही परेशानीपूर्ण होता जितना ही युद्धों से हमें परेशानी हुयी। जब तक कि मैं जीवित हूँ, तब तक मेरे पास रखा धन तुम्हारे और बच्चों के लिये विशेष रूप से सुरक्षित रहेगा। मेरे पास जो भी है उसपर कब्ज़ा जमाने के तुम्हारे सतत प्रयास शर्मनाक हैं। अगर मैं तुम्हें ऐसा 12 वर्ष पहले पहचान पाता, जैसा कि मैं तुम्हें आज जानता हूँ, तो तुम्हारे ओर अपनी जिम्मेदारियों के बारे में बहुत अलग तरह से सोचता।  

वापस भेजा गया सामान, जिसे पाने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी, पर तुमने उसे मेरे पास भेज दिया है, तुम्हें जल्दी ही मिल जायेगा।

मैं (अपने बेटे) अल्बर्ट के साथ केवल तभी नियमित रूप से पत्राचार करूंगा, जबकि मुझे यह उम्मीद हो कि यह लड़के के लिये यह लाभकरी और खुशी का कारण है। इसका एक हिस्सा यह भी है कि बच्चे पर मेरी विकृत छवि बनाने के उद्देश्य से कोई दबाव न डाला जाये। यदि यह तुम बाप-बेटों के रिश्ते को बरबाद न करने के लिये ईमानदारी से इच्छुक हो, तुम आगे लिखी सलाह ज़रूर मानोगी। जो भी मैं बच्चों को पत्रों में लिखता हूँ उसे पढ़ो पर उसके बारे में बच्चों से विचार-विमर्श मत करो, इस सब के ऊपर छोटे से अल्बर्ट को ख़ुद मुझे पत्र लिखने दो, उसके पत्र मत पढ़ो और उसे मुझे लिखने के सम्बन्ध में झिड़को मत, और उससे यह मत बताओ कि उसे मुझे क्या लिखना चाहिये और क्या नहीं। इस प्रकार तुम आश्वश्त हो जाओ कि मैं बच्चों को तुमसे दूर ले जाने के प्रयास नहीं कर रहा हूँ, और मैं बच्चों के लिये रोटी कमाने वाले से भी अधिक साबित हो सकूँगा। यदि मैं देखता हूँ कि अल्बर्ट के पत्रों में तुम्हारा प्रभाव है तो मैं बच्चों को विचार के विपिरीत नियमित पत्र लिखने से बचूँगा।
1915 के लिये शुभकामनायें
अल्बर्ट आइंस्टीन
मैं जल्दी ही अल्बर्ट को अलग से पत्र लिखूँगा।