रामेश्वर सिंह का काव्य

रामेश्वर सिंह
क्षिप्रा का तट!

हल्का सा मुस्कुरायीं तुम
उस रोज़,
नरम उंगलियों से
कुछ लिखने लगी तुम
पानी की धारा में,
क्षिप्रा के तट पर!

ज्यों ज्यों तुम लिखती रहीं
त्यों त्यों सब बहता रहा,
धारा के साथ
डायरी के पन्नो की तरह,
पन्ने पलटते रहे,
तुम लिखती रही,
क्षिप्रा बहती रही!

मैं एकटक ताकता रहा,
तुम्हे लिखते देखता रहा!

पढ़ कुछ नहीं पाया मैं
जो तुमने लिखा,
फिर भी सब पढ़ लिया मैंने
भाव पंछियों को,
तुम्हारी आँखो के पानी
में तैर रहें थे .
तुम्हारे लबों पर सुबह के सूरज से
लाल लाल थिरक रहें थे,
तुम्हारे गालों पर
गुलाबी रंग से
अठखेलियाँ कर रहें थे!
तुम में मैं
हर कहीं!

आज तट पर
मैं अकेला हूँ,
तुम नहीं हो,
बस बहता पानी है
क्षिप्रा का!

पानी में डायरी के लिखे
तुम्हारे पन्ने
आज मैं पढ़ रहा हूँ,
बस आँसुओं की स्याही है
मेरे पास!
आज मैं डायरी लिख रहा हूँ
पानी पर,
पन्ने फिर पलटते जाते हैं
क्षिप्रा बहती जाती है,
पन्ना पन्ना बदलता है,
मुझमे तुम
हर कहीं!
बस मैं हूँ अकेला
क्षिप्रा के तट पर!

अब तुम पढ़ना एक दिन,
आँसुओं की स्याही से
पानी पर लिखे
मेरे डायरी के पन्नो को,
अब कभी जब
तुम आओगी अकेली
क्षिप्रा के तट पर!

नदी हूँ मैं तुम्हारी!

हल्का सा झुकीं
तुम्हारे बाल लहराये
लब पास आए,
मिले और भीग गए।

मेरी कमी महसूस की तुमने।
प्यार करती हो आज भी मुझसे
कहोगी फिर अलविदा मुझे।

बरसों पहले
कहा था अलविदा
दोनो के दिलो ने एक दूसरे को।
जब एक ही डोर पकड़े
पतंग उड़ा रहे थे
हम।

पतंग काले बादलों में
कलाबाजी कर रही थी
ऊपर आती नीचे जाती।

अचानक तेज तूफान आया
तुम्हारे हाथ कांपे
मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ना चाहा

पतंग छूट गई !

दूर तक देखते रहे
दोनों
दूर क्षितिज में ओझल होते
हमारे अरमानो और सपनो की पतंग!

पतंग हिचकोले खाती
दूर चली जा रही थी।

बूंदा बंदी शुरू हो गयी
पतंग भी नम हुई और
हमारी आँखे झरना।

पतंग को कहा हमने अलविदा
और फिर
एक दूसरे को।

आज तुम लौट आयी हो
मेरी बाँहों में हो।

हल्का सा झुकीं
तुम्हारे बाल लहराये
लब पास आए,
मिले और भीग गए।

मेरी कमी महसूस की तुमने।
प्यार करती हो आज भी मुझसे
कहोगी फिर अलविदा मुझे।

अपने आँचल को
उँगलियों में लपेटती
तुम्हारी उँगलियों में कंपन हुआ
सहमी सी रहती हो हमेशा,
आँखे पोखर बन गई तुम्हारी,
पानी बह निकला
तुम्हारे गालों पर
जहाँ मेरे होठों ने
प्रेम वितान सजाये है।
तुम्हारी आँखों का पानी
उन वितानों को झर झर भिगोने लगा।

तुम कहने लगी
नदी हूँ मैं तुम्हारी!
तुम्हारे दिल के पर्वत और घाटियों में बहती हूँ।
तुम्हारे अंदर मेरा अस्तित्व सदा निहित है।

नहीं, तुम्हारी कमी महसूस नहीं की मैंने
क्योंकि मैं गई ही कब थी।
मैं तो दूर जंगलो से
पतंग ढूंढ़ लायी हूँ अपनी
देखो।

प्यार करती हो अब भी,
पूछा तुमने
अब भी।
अब भी क्यूँ पूछा,
सदा ही जो
अब भी तो हुआ ही।

अलविदा तो मैंने तब भी नहीं कहा था
तुमने मैं शाश्वत हूँ।

तुम मौन हुई
देखने लगी मेरी आँखों में
अपना प्यार।

मैंने बाँहों में लिया तुम्हे।
हल्का सा मैं झुका
होंठो से तुम्हारी प्रेम सिक्त बिंदी को चूमा,
लब पास आए
और भीग गए!

हम
एकाकार हुए और
परमसुख में लीन हुए!

झमाझम पानी बरसने लगा!

तुम उड़ती खिलखिलाती चिड़िया हो, मैं उदास सागर!

मेरे ह्रदय की
भाव लहरों में
तुम
दिखाई तो देती हो,
एहसास भी होता है तुम्हारा
मगर मैं कब तुम्हे छू पाया!

सागर की उठती गिरती
नीली लहरों में
उड़ती खिलखिलाती चिड़िया का
अनूठा प्रतिबिम्ब हिलोरे लेता है।
सागर देख सकता है उसे
मगर मन में विशाल उदासी लिए
उसे छू नहीं सकता!

मेरी ही तरह
इक एहसास है
उसके पास।
सिर्फ एहसास!

तुम उड़ती खिलखिलाती चिड़िया हो,
मैं उदास सागर!