कन्या वरयते रूपं, पिता श्रुतं... (कहानी)

- सौरभ शर्मा
मैं रोजगार के सिलसिले में कभी-कभी उसके शहर जाता हूँ।
वो नीम तारीक सी गली और उसी के नुक्कड़ में ऊँघता सा पुराना खंभा
उसी के नीचे तमाम शब इंतजार करके मैं छोड़ आया था शहर उसका
बहुत ही खस्ता सी रोशनी की छड़ी को टेके
वो खंभा अब भी वहीं खड़ा है।
फितूर है ये मगर मैं खंभे के पास जाकर नजर बचाकर मोहल्ले वालों की
पूछ लेता हूँ आज भी ये
वो मेरे जाने के बाद भी आई तो नहीं थी।
वो आई थी क्या?
- गुलजार
सौरभ शर्मा
बनारस की उस नीम तारीक गली में अरसे बाद एक बार  फिर उसने दस्तक दी। हिचकिचाते कदमों से गली के आखिरी मकान में उसने कॉलबेल बजाई। दरवाजे पर प्रगट हुए अनजान से शख्स से उसने पूछा, "क्या रामाश्रय बाबू से मुलाकात हो सकती है?"

उसे अदब से बिठाया गया। घर में सब कुछ वैसा ही तो था, केवल एक तस्वीर के अलावा। वह मनु की तस्वीर थी, उसने पीली साड़ी पहनी थी, चेहरे पर मुस्कान थी और हाथों में डिग्री। उसकी मनु से आखरी मुलाकात को 15 साल बीत चुके थे।

बाबू देर तक पूजा करते हैं। शायद घंटे भर इंतजार करना पड़े लेकिन अभी तो सुबह के आठ ही बजे हैं। उसकी मीटिंग 11 बजे से है दो घंटे में उसे फुरसत मिल जाएगी। और घंटे भर का इंतजार भी कोई इंतजार है। मनु की तस्वीर सामने है कितनी पुरानी यादें खुलती जाएंगी।
-----------------............-------------------

मनु का इंतजार करते हुए इस युवक का नाम शुभाशीष है। घरेलू नाम शुभ। शुभ एक खास प्रोजेक्ट के लिए बनारस आया है। दिल्ली में जो नई सरकार आई है वो बनारस को क्योटो की तरह बनाना चाहती है। इसके लिए केंद्र सरकार ने 'एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट' जारी किया है। शुभ की कंपनी 'न्यू होराइजन' ने भी अपना कोटेशन देने का निर्णय लिया है। पिछले हफ्ते कंपनी ने बनारस-क्योटो प्रोजेक्ट के संबंध में एक बैठक बुलाई। बैठक में बड़ा मुद्दा था कि इस प्रोजेक्ट को हैंडल करने की जिम्मेदारी किसे दी जाए। हैरिटेज कन्जर्वेशन में शुभ के व्यापक अनुभव के चलते सीईओ ने तय किया कि शुभ ही इस प्रोजेक्ट को हैंडल करेगा।

शुभ को यह बहुत अजीब लगा क्योंकि बनारस को क्योटो की तरह विकसित करने की कंपनी की संकल्पना उसके विचारों से बिल्कुल अलग थी। उसकी कंपनी ने गुड़गाँव, दिल्ली और बैंगलोर में टाउन प्लानिंग और स्मार्ट सिटी के अनेक कार्य किए थे, अधिकतर अधिकारियों की विशेषज्ञता केवल तकनीकी पक्षों में थी। इनमें से कोई भी नहीं जानता था कि एक शहर की आत्मा भी होती है। क्योटो की तरह बनने में बनारस जिंदा रह सके, यह वैसा ही कार्य होगा, जैसे पुरातत्वविद करते हैं छेनी-छेनी से मिट्टी निकालते हैं जैसे नवजात शावक को शेरनी मुँह में बड़े कायदे से लेती है। और बात जब बनारस की हो तब तो यह मसला और भी गंभीर हो जाता है। मार्क ट्वेन याद आते हैं जिनका प्रसिद्ध वक्तव्य है कि बनारस इतिहास से भी पुरातन है परंपराओं से पुराना है किंवदंतियों से भी प्राचीन है।

कॉर्पोरेट कंपनियाँ अक्सर ऐसे ही विचित्र फैसले लेती हैं और अधीनस्थों पर इसे थोप दिया जाता है। शुभ ने सोचा कि उसके सीईओ अगर फिल्में बनाएँ तो कैसा होगा? वे नवाजुद्दीन सिद्दीकी का रोल इरफान को दे देंगे और इरफान का सिद्दीकी को। फिर फिल्म का क्या हाल होगा? ये तो भगवान ही जाने।
-----------------............-------------------

खैर, मीटिंग 11 बजे थी, सामने मनु की तस्वीर थी। पंद्रह साल पहले ऐसी ही एक सुबह मनु से उसकी पहली मुलाकात हुई थी। शुभ ने भारतीय इतिहास में नगर नियोजन विषय पर पीएचडी के लिए बीएचयू में दाखिला लिया था। जाते वक्त उसके पिता ने रामाश्रय बाबू के नाम एक चिट्ठी दी थी और एडमिशन लेते ही उनसे मिल लेने को कहा था। इसी सिलसिले में पहली बार वो गौदोलिया स्थित उनके घर पहुँचा। उनका मकान श्रीमंत पेशवा घाट के पास था। रामाश्रय बाबू ने उससे ढेर सी बातें पूछीं। उसका प्रोफाइल जानकर उन्हें थोड़ा दुख हुआ। उन्होंने बड़ी तीखी टिप्पणी की थी।  तुम्हारे पिता मैथ्स में बड़े ब्रिलिएंट थे। हम लोग उन्हें विश्वैशवरैया कहते थे। उन्हें अच्छा नहीं लगा होगा कि जब तुमने इतिहास की गलियों में भटकना अपने करियर के रूप में चुना होगा। शुभ ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि बाबू से उनकी यह अंतिम मुलाकात होगी लेकिन इसी बीच चाय बन चुकी थी। चाय मनु लेकर आई थी। बाबू ने उसका परिचय कराया। ये मनु है मेरी बेटी, बीएचयू से बी.आर्क कर रही है। मनु को अपना प्रोफाइल शुभ ने बताया। जो अंतिम शब्द शुभ ने मनु से कहे, वो चाय की तारीफ थी। आपकी तुलसी की चाय बहुत अच्छी लगी। शुक्रिया।

फिर एक दिन मनु ने उसके हॉस्टल में फोन किया। उसे एक प्रेजेंटेशन के लिए दिल्ली जाना था। बी.आर्क में केवल उसे ही प्रेजेंटेशन के लिए चयनित किया गया था। उसका टॉपिक था प्राचीन और मध्यकालीन भारत में नगर नियोजन की वर्तमान से प्रासंगिकता। इस विषय पर उसकी जानकारी काफी कम थी। शुभ उपयोगी हो सकता था। शुभ एक बार फिर गौदोलिया पहुँचा। इस बार रामाश्रय बाबू घर पर नहीं थे। वे काम के सिलसिले से दिल्ली गए थे। शुभ को इत्मीनान हुआ, अब वह आधे घंटे फुर्सत से बैठ सकेगा और तुलसी वाली चाय का आनंद ले सकेगा।

मनु आई और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

आपका नाम मनु किसने रखा?

मेरे दादा जी ने, जब मैं छोटी थी तो दादा मुझे सुबह की धूप दिखाने श्रीमंत पेशवा घाट ले जाते थे। दादा जी की रौबदार मूँछे थीं। उन्हें देखकर लोग कहते, तुम तो बिल्कुल श्रीमंत लग रहे हो और बिटिया ऐसे लग रही है जैसे झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को श्रीमंत ने अपनी गोद में ले लिया हो। मेरे दादा भावविह्वल हो जाते। उन्हें लगता कि ये संयोग से कहीं बढ़कर है कि वे उसी जगह में अपनी पोती को लेकर घूम रहे हैं जहाँ पहली बार मोरोपंत ने रानी लक्ष्मी बाई को श्रीमंत पेशवा से मिलाया था। फिर क्या था। उन्होंने मेरा नाम मणिकर्णिका रखने का निश्चय किया। जब पापा ने मम्मी को दादा जी का निश्चय बताया तो मम्मी ने विरोध किया। नहीं, छोटी सी बच्ची मणिकर्णिका घाट की याद दिलाती रहेगी। इसका नाम मनु रख दीजिए। लक्ष्मी बाई के प्यार का नाम। दादा जी भी तैयार हो गए।

ओह तो मेरे सामने लक्ष्मी बाई बैठी हैं। शुभ ने प्रगट रूप में कहा। मन ही मन उसने सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ याद की। अभी उम्र कुल 23 की थी, मनुज नहीं अवतारी थी। मनु तो 23 से कम होगी, लेकिन यह भी कम अवतारी नहीं।

पता नहीं क्यों? इसके बाद शुभ से मनु को आप नहीं बोला गया? उसने कहा, "मनु क्या तुम भी अपने को लक्ष्मी बाई समझती हो?"

"नहीं मेरे पापा मोरोपंत की तरह सीधे नहीं हैं। वे बहुत स्ट्रिक्ट हैं।" मनु ने हँसते हुए कहा कि बचपन में जब मारकाट की विद्या की प्रैक्टिस कर ही रही थी तभी उन्होंने मेरा विद्रोह दबा दिया। शस्त्र विद्या की जगह केवल शास्त्र विद्या की सीख दी और अंजाम आप देख ही रहे हैं मुझे इतना मोटा चश्मा लग गया है।

"मुझे अपने प्रेजेंटेशन से जुड़े प्रश्नों की जानकारी दे दें, मैं इस पर अपनी सोच बता दूँगा लेकिन अंकल की उपस्थिति में मुझे थोड़ा अजीब लगता है, मैं घर में भी पापा के सामने ज्यादा कुछ नहीं बोल पाता" शुभ ने कहा।
मनु ने कहा कि ठीक है थोड़ी सी इवनिंग वॉक भी हो जाएगी, हम लोग छह बजे गंगा जी के किनारे राजा घाट में बैठ जाया करेंगे।

अगले दिन वे राजा घाट में थे। वो शाम बहुत अच्छी थी।

 ढेर सारे बादल आसमान में छाए थे, गंगा जी अगर धीमी बहतीं तो शायद इनका अक्स उनमें नजर आता। बादलों ने ढेरों आकृतियाँ बनाई थीं, इन बादलों की आवाजाही और आपसी बातों ने शाम में इतने रंग भर दिए कि दोनों को समय का पता ही नहीं चला। सात बज चुके थे और दोनों ने वापसी का निर्णय लिया।  उस शाम की अब ज्यादा स्मृतियाँ शुभ के दिमाग में नहीं रह गई हैं, जैसे बादलों को आसमान ने बुहार दिया, वैसे ही वे स्मृतियाँ भी लोप हो गईं।

कितना अच्छा होता, यदि कंप्यूटर की तरह हमारे दिमाग में अपना अतिरिक्त ड्राइव होता, इसमें अपनी सबसे मीठी यादें हम सुरक्षित रख पाते। शायद ऐसा ड्राइव हमारे दिमाग में है भी, लेकिन सर्च टूल के लिए कीवर्ड शुभ भूल चुका है।

 घर लौटने पर अंकल ने दरवाजा खोला। शुभ ने दिल्ली यात्रा का प्रयोजन पूछा, उत्तर निराशाजनक था उसे लगा अंकल ने कुछ छिपा लिया है। अंकल यात्रा वृत्तांत बताने लगे, कि दिल्ली की सरकार इसे चमकाने में बड़ी मेहनत कर रही है। इतने सारे फ्लाइओवर, बगीचे और भव्य इमारतें। यह शहर सचमुच रहने लायक लगता है और बनारस आने के बाद, देखो तो वही तंग गलियाँ और इनमें घूमते नंदी के संतान। जैसे देश भर के सारे साँड खदेड़ दिए गए हों और इन्होंने बनारस में अपना त्रिशूल गाड़ लिया हो। शुभ अपने को जज्ब नहीं कर सका और खिलखिलाकर हँस दिया।

शायद आप पुरानी दिल्ली नहीं गए। बल्ली मारान में इनके वंशज अब भी देखे जा सकते हैं। उसने शरारत की।
पुरानी दिल्ली क्यों जाऊँ, साउथ एवेन्यू काम से गया था, वहाँ खास दिल्ली वालों से मुलाकात हुई, कितनी प्रोग्रेसिव है उनकी सोच, बातें करते हैं वाय टू के क्राइसिस से डील करने की, सीटीबीटी पर बिल क्लिंटन के दाँव की। और हम यहाँ बनारस में कुँए के मेंढक की तरह सुबह से ही निंदा रस में लीन हो जाते हैं।

रामाश्रय बाबू बड़े दिलचस्प आदमी हैं। शुभ ने मन में सोचा। मनु तो शायद लड़की है इसलिए उसके साथ अच्छा लगता है लेकिन 60 साल का पिछली पीढ़ी का व्यक्ति आपको अपनी बातों में बाँध दे तो उसका व्यक्तित्व जरूर विशिष्ट होगा।

अगले दिन छह बजकर पंद्रह मिनट पर शुभ मनु के घर पहुँच गया। घर से निकलने में उसने जानबूझकर पंद्रह मिनट का विलंब किया जिससे मनु को यह न लगे कि वो आने के लिए बेसब्र था। इससे भी बढ़कर उसे रामाश्रय बाबू की ओर से आशंका थी कि वो इस अनुशासन को दूसरी तरह से न ले लें।

उस शाम को बादल नहीं छाए थे। शांत गंगा अविरल प्रवाहित हो रही थी, वे एक-दूसरे से काफी परिचित हो चुके थे तो इस बार प्रेजेंटेशन की तैयारी को टाला नहीं जा सकता था। शुभ ने इसकी तैयारी की थी, ताकि बोरियत से भरे इस विषय में भी मनु ऊबे नहीं।

मनु आज मैंने ओल्ड इंडियन फोटोग्राफी में बनारस की फोटो देखीं। 1840 का बनारस, 1880 का बनारस और 1910 का बनारस। सारी तस्वीरें एक जैसी थीं, जैसे बनारस कुछ बदला ही नहीं। जहाँ हम बैठे हैं राजा घाट में, मैंने फोटो में देखा, एक बुजुर्ग महिला और एक छोटा सा बच्चा नहा रहे हैं।

"शायद वो मेरे दादा जी हों" मनु ने शरारत की।

"हाँ हो सकता है मनु" खिलखिलाते हुए शुभ ने कहा, "और जानती हो मैंने इन फोटोग्राफ में क्या-क्या देखा? मैंने देखा साधुओं का समूह। नावों में बैठकर घाटों में घूमते लोग। बनारस कुछ भी नहीं बदला, मनु इन फोटोग्राफ्स को देखकर दुख नहीं होता, एक अजीब सा सुख मिलता है बनारस कभी नष्ट नहीं होगा, वो जिंदा रहेगा घाटों में। यहाँ तक कि मणिकर्णिका घाट भी मुझे भयभीत नहीं करता अपितु मृत्यु को मैं यहाँ सहज सच्चाई के रूप में ले लेता हूँ। अगली बार फिर आ जाऊँगा, एक नया चोला धारण कर। यही भारतीय शहरों का चरित्र है एक अजीब सी पवित्रता और अमरता का भान इनसे मिलता है।"

"आपके विचार पापा से बिल्कुल अलग हैं" मनु ने कहा, "पापा ने हमारा इतना ब्रेन वॉश किया है कि हम लोगों को बनारस में बहुत सी खराबी नजर आने लगी। हम लोग तो पापा को यह भी कहने लगे कि गंगा पार बस रही नई कॉलोनी में मकान ले लें।"

"मनु क्या सचमुच तुम्हें राजा घाट के पास अच्छा नहीं लगता?"

"अच्छा लगता है, बहुत अच्छा लगता है वो तो भाइयों के साथ सुर में सुर मिलाने मैं भी कह देती थी लेकिन मुझे यहीं अच्छा लगता है।"

"मनु! मैं पीएचडी के रिसर्च के लिए भारत के कई शहरों में घूमा हूँ। मैं दो शहरों के अनुभव तुमसे शेयर करना चाहूँगा। पहला शहर है राजस्थान का शेखावटी, यह शहर सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में बसा। मारवाड़ियों ने यहाँ कई हवेलियाँ बनाईं। फिर ब्रिटिश राज आया और ये सभी कोलकाता में बस गए। बिरला, डालमिया और भी कितने नाम। तुम इनकी हवेलियाँ देखोगी तो खुश हो जाओगी। इनकी दीवारों में पेंटिंग बनी हैं कहीं राधा-कृष्ण की रासलीला है कहीं मोरों का नाच और कहीं राजा का जुलूस, इसमें हौदे पर सवार राजा हैं और झरोखों से उन्हें देखती रानियाँ। इन हवेलियों में अब कोई नहीं रहता और न ही इनके नये कॉर्पोरेट मालिक कभी इनमें लौटेंगे। फिर भी इन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे इनके मालिक अभी व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर गए हों और कल ही लौट आएंगे। इसके विपरीत तुम यूरोप के पुराने शहरों की इमारतों को देखों, वहाँ लंदन, पेरिस, स्टाकहोम जैसे शहरों में सत्रहवीं सदी की इमारतों और गलियों को वैसे ही संरक्षित रख दिया गया है। प्रायः यूरोप के हर शहर में एक गली ऐसी है जहाँ रईस लोग रहा करते थे और अब उनकी पूरी चीजें संरक्षित रख दी गई है। मैंने वीडियो में इन गलियों को देखा है इट विल हांट यू मनु। ये गलियाँ आपको डराती हैं इनके घरों की दरोंदीवारें आपमें मृत्युबोध पैदा करती हैं लेकिन शेखावटी की गलियाँ जिंदगी से भरी हैं उत्साह से भरी हैं।"

"..."

"मनु, एक और स्मृति सांची की है। सांची के स्तूप के चारों ओर रेलिंग बनी है इस रेलिंग में बहुत सी दृश्यावली है जिसमें नागरिक जीवन का अंकन है। इसे हाथी दाँत के शिल्पियों ने बनाया था। इन्हें देखकर बहुत सुखद अनुभूति होती है। प्रसन्न स्त्री-पुरुषों के चेहरे, चारों ओर उत्सव का वातावरण। इसे मैं बौद्ध धर्म की दुख पर जीत के प्रतीक के रूप में देखता हूँ। संभवतः सांची के स्तूप में जिस शहर के नागरिकों का जीवन दिखाया गया है वो विदिशा है उस समय का बेसनगर, अथवा वो मंदसौर हो सकता है जिसे उस समय दशपुर कहते थे। वत्सभट्टि ने एक बहुत खूबसूरत कविता दशपुर पर लिखी है। राजा का जुलूस निकल रहा है चारों ओर फूलों की खुशबू फैली है महिलाएँ घरों के झरोखे से यह दृश्य देख रही हैं चारों ओर उत्सव का माहौल है। ... और विदिशा शहर जिसे कालिदास के यक्ष ने मेघ को खासतौर पर देखने को कहा था और उज्जायनी का भी कितना सुंदर वर्णन किया है कालिदास ने। मनु, क्या तुम्हें भी नहीं लगता कि इन कवियों के वर्णनों में इतनी जीवंतता इसलिए आ पाई कि हमारे प्राचीन भारतीय नगरों में सुख की एक उत्कट चाह थी?"

"मैंने संस्कृत साहित्य नहीं पढ़ा है लेकिन बनारस को हमेशा महसूस करती हूँ। भाइयों के बीच मैंने कभी अकेलापन महसूस नहीं किया, आपने घरों के झरोखे से जुलूस देखने वाली महिलाओं के बारे में बताया। मैं भी बिल्कुल ऐसी हूँ। मुझे सबसे अच्छा देव दीपावली के मौके पर लगता है। गंगा जी में इतने दीप तिरते रहते हैं कि लगता है आसमान के सारे तारे गंगा जी में उतर आए हों।"

"मनु! यही तो है नगर नियोजन में नदियों के किनारे घाटों की कल्पना। घाट हमारे सार्वजनिक और धार्मिक जीवन का कितना अभिन्न अंग बन जाते हैं और सबको जोड़े रखने वाली कड़ी भी।"

 और इस तरह न जाने कितनी खूबसूरत शामें गंगा जी के किनारे गुजरीं। उनका शायद ही कोई स्मृतिचिह्न अब शुभ के पास है। जो शुभ को याद रह गया है अपने प्रफुल्लित क्षणों में उन्हीं स्मृतियों के पास लौट जाता है।
शुभ को वो दिन अच्छे से याद है। साढ़े आठ बज चुके थे। शुभ और मनु चहकते हुए घर पहुँचे, दरवाजा बाबू ने खोला। उन्हें खुश देखकर वे अपसेट लगे। शुभ को लगा कि बाबू शायद महसूस कर चुके हैं कि मामला अब केवल प्रेजेंटेशन तक नहीं रह गया है।

अगले दिन वे फिर घाट पर थे। मनु की माता जी ने शुभ को शाम के खाने के लिए बुलाया भी था। उन्होंने प्रेजेंटेशन की बातें जल्दी खत्म की क्योंकि मनु को मम्मी का हाथ बंटाना था।

फिर टेबल पर शुभ और बाबू आमने-सामने थे। उन्होंने शुभ से मनोवैज्ञानिक युद्ध की पूरी तैयारी कर ली थी। वे नहीं चाहते थे कि मनु कोई ऐसा फैसला कर ले जिसके चलते उसे जीवन भर पछताना पड़े।

उन्होंने पहला दाँव खेला, "शुभ! अब मनु की शादी करनी है उसका करियर आर्किटेक्ट में है और यूपी में तो मुझे दूर-दूर तक कुछ गुंजाइश नहीं दिखती। तुम मेरे सबसे प्यारे दोस्त के बेटे हो। मनु का भार तुम पर भी है उसके लिए कोई अच्छा लड़का मेट्रो सिटी में खोजो, मनु का अच्छा करियर मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है तुम जानते हो।"

शुभ इस अप्रत्याशित दाँव के लिए तैयार नहीं था, उसने हड़बड़ाते हुए केवल इतना कहा, "जी जरूर।"

अभी तो खेल शुरू ही हुआ था और रामाश्रय बाबू ने सीधे शह दे दी। बातें चल ही रही थीं कि मनु चाय लेकर आ गई। मनु ने पापा को बताया कि शुभ जी ने प्रेजेंटेशन की सारी टेंशन दूर कर दी। पापा, इससे पहले बनारस को लेकर भी मेरी समझ कितनी कम थी। जब ये पुराने भारतीय शहरों के बारे में बताते हैं तो लगता है कि भारत एक खोज देख रही हूँ। जवाहरलाल नेहरू बने रौशन सेठ गंगा जी के घाट में बैठ गए हैं और भारतीय इतिहास की दिलचस्प गाथा सुना रहे हैं।

"बेटे, वह कहानी 1947 में खत्म हो जाती है। भारत की असली तकदीर तो आजादी के बाद बदली है। श्याम बेनेगल अगर उसकी कहानी सुनाते तो अर्थपूर्ण होती। दूसरी पंचवर्षीय योजना का समय, बड़े स्टील प्लांट्स की स्थापना। आईआईटी और आईआईएम जैसी विश्व विख्यात संस्थाओं की स्थापना। बरसों पुराना राग छेड़ने से क्या फायदा?"

फिर मनु अंदर लौट आई और एक बार फिर वे निशाना शुभ की ओर साधने लगे। बनारस की बदहाली पर एक लंबा लेक्चर बाबू ने दिया, "मुझे ड्राइविंग का शौक था लेकिन इस घर ने मेरे हाथ बाँध दिए। गली में गाड़ी कैसे पार्क करें। बच्चों की बेहतर स्कूलिंग का प्लान था, बेटों से तो इतनी उम्मीद नहीं थी लेकिन मनु से मेरी बड़ी आशाएँ थीं। मैं इसे ऋषि वैली जैसे स्कूल में पढ़ाना चाहता था, पर क्या हुआ। इस इलाके में एक भी अच्छा स्कूल नहीं। ट्रैफिक की वजह से बच्चों को आउटर के अच्छे स्कूलों में भेजने में डर लगता था।"

इस लंबे लेक्चर के बाद अच्छा खाना खाकर शुभ ने बहुत संतोष का अनुभव किया। आज हुए मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए वह तैयार नहीं था, उसने अपने औजारों को धार नहीं दी थी। उसे मालूम था कि कल रामाश्रय बाबू एक बार फिर उस पर ताबड़तोड़ आक्रमण करेंगे, अब मनु का प्रेजेंटेशन उसके लिए प्राथमिकता नहीं है अब रामाश्रय बाबू के तर्कों की काट खोजना उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। शायद सुख की उत्कट चाह का रास्ता इन्हीं तर्कों से निकल पाएगा।

एक शाम फिर राजा घाट पर गुजरी। इस बार शुभ की ज्यादा दिलचस्पी रामाश्रय बाबू से होने वाली मुलाकात पर थी। उसने बहुत सारे तर्कों के तीर अपने तरकश में तैयार कर लिए थे।

मनु खाना बनाने में मम्मी की मदद करने अंदर चली गई। बाबू ने कल का राग पुनः छेड़ा। शुभ क्या कोई लड़का तुम्हारे नजर में है जिसकी एजूकेशन मनु जैसी हो और जो मेट्रो सिटी में अच्छी नौकरी कर रहा है। शुभ ने कहा, "अंकल! नहीं, पर मैं लगातार यह सोच रहा हूँ कि मनु के लिए बेहतर जीवनसाथी कौन हो सकता है।"

"पिछली बार मैं दिल्ली गया था, तुमने पूछा था क्यों? अब बता देता हूँ, एक लड़का है नेशनल इंस्टीट्यूट आफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर दिल्ली से पढ़ाई करके अपना बिजनेस कर रहा है। उससे मिला, घर वाले भी अच्छे लगे। मुझे यह प्रस्ताव अच्छा लग रहा है तुम क्या सोचते हो।"

अब प्रखर विरोध का समय आ गया था। शुभ ने कहा, "मुझे लगता है कि आपको मनु की राय जाननी चाहिए। मनु बहुत विलक्षण लड़की है उसे केवल एक खास फील्ड से संबंधित कर देना उसके विकास को रोक देना होगा। उसे अपने जीवनसाथी के चुनाव का अधिकार होना चाहिए।"

रामाश्रय बाबू शांत थे। उन्होंने एक सुभाषित श्लोक कहा, "कन्या वरयते रूपं, माता वित्तं, पिता श्रुतं, बान्धवाः कुलमिच्छन्ति, मिष्ठान्नमितरेजनाः। विवाह के समय कन्या सुंदर वर चाहती है माता वरपक्ष की संपत्ति देखती है। पिता वर का ज्ञान देखते हैं और बंधुबांधव कुल लेकिन अन्य लोग तो केवल अच्छा खाना चाहते हैं।"

कन्या का झुकाव शुभ की ओर था लेकिन पिता ज्ञानी वर चाह रहे थे। शतरंज के इस खेल में कन्या की भूमिका केवल प्यादे की तरह थी और पिता शक्तिशाली वजीर की तरह। शुभ घोड़े की तरह ढाई घर चलकर वजीर का खेल बिगाड़ने की पूरी कोशिश में था लेकिन यही ढाई घर उसकी सीमा भी थे।

उस दिन बहस देर तक नहीं चल पाई क्योंकि मनु की तुलसी वाली चाय एक बार बन गई थी। मनु की आँखों में शुभ के लिए चमक रहा चंद्रमा रामाश्रय बाबू को और परेशान कर रहा था। शुभ ने जल्दी-जल्दी से चाय पी और शुभ तथा बाबू दोनों इस असहज स्थिति से कुछ समय के लिए मुक्त हो गए।

सुबह हॉस्टल में चाय पी लेकिन मन अशांत रहा। मनु से उसकी और अपनी जिंदगी के बारे में बहुत सी बातें तय करनी थीं लेकिन इतनी जल्दी जो एक छोटे सा नाजुक सा रिश्ता बना था, हिचक हो रही थी कि मनु से इन्हें कैसे शेयर करे। मन में मनु के साथ आगे की जिंदगी बिताने की मासूम सी इच्छा पैदा हो रही थी। वो इस रिश्ते को परिपक्व होने देना चाहता था लेकिन रामाश्रय बाबू ने जो शह दे दी थी, उसे टालने के लिए देर नहीं की जा सकती थी।

उस दिन घाट अशांत नजर आ रहा था। खूब भीड़भाड़ लग रही थी, शुभ ने सोचा, "जीवन के जिस सबसे सुंदर क्षण की प्रतीक्षा हम बरसों से करते हैं वो अनपेक्षित रूप से कितने आपाधापी के बीच हमारे सामने आ जाता है।" उसने मनु से पूछा, "मनु, पढ़ाई के बाद क्या करोगी?"

मनु ने कहा, "पापा ने मेरी जिंदगी की एक लाइन खींच दी है उस पर ही चलना है तो व्यर्थ सोचकर क्या करूँ।"

" ... और जो पापा तुम्हारी शादी तय कर दें तो?"

"मैं क्या कर सकती हूँ? मुझे पेंटिंग में रुचि थी लेकिन पापा ने कहा कि इसमें क्या खाक करियर बनाओगी। तुम आर्किटेक्ट बन जाओ। बस अब क्या है वही करूँगी। पापा जिससे बाँध दें, चली जाऊँगी।"

"तुम सचमुच बनारस की लड़की हो" शुभ ने गुस्से से कहा, "जो पापा कहें वो हमेशा सच नहीं होता, जो दिल को अच्छा लगता है वही सच्चा रास्ता होता है।"

मनु ने अपने दोनों हाथों से मुँह ढँक लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। जब आँसू बंद हुए तो सिसकियाँ शुरू हो गईं। इन सिसकियों के आगे शुभ ने हथियार डाल दिए और उन्होंने घर की ओर कदम बढ़ा लिए।

रामाश्रय बाबू ने शह दी थी, शुभ के पास आखरी मौका था जो मनु के आँसुओं ने धो दिया। घर पहुँचने पर रामाश्रय बाबू ने शुभ को बताया कि लड़का मनु को देखने 25 सितंबर को आएगा, यह मनु का जन्मदिन भी है इसलिए मैंने उन्हें यही डेट दी है।

"तुम उस दिन रहोगे तो तैयारियों में काफी सुविधा होगी" इस आखरी चाल के साथ उन्होंने शुभ का पूरा राजपाठ खत्म कर दिया था।
--------------

25 सितंबर को मनु का जन्मदिन था, सुबह फोन पर उसने विश किया। फिर कुछ नहीं बोला। उस दिन लड़के वाले मनु को देखने समय पर पहुँच गए। मनु 23 साल की हो चुकी थी। ह्यूरोज नियत दिन पहुँच चुका था शहादत लेने तैयार। मनु को देखकर ही लड़के ने हामी भर दी। एक खूबसूरत सा अध्याय समाप्त हो गया।
------------------

और अब 15 साल बाद फिर रामाश्रय बाबू के सामने जाना शुभ को अजीब लग रहा है। बाबू ने पूजा खत्म कर ली है। वे बहुत बूढ़े लग रहे हैं। शुभ को देखकर बहुत खुश हुए, "शुभ! तुम्हें इतने सालों में एक बार भी मेरी याद नहीं आई?"

"आई थी अंकल, लेकिन पीएचडी के तीन साल बड़ी मुश्किल से गुजरे थे। वो कष्ट का दौर याद नहीं करना चाहता था। इस बार कंपनी का प्रोजेक्ट मिल गया है तो फिर आना हुआ। होटल में चेक इन करने के बाद सबसे पहले आप ही के पास आया हूँ।"

हर बार की तरह इस बार भी रामाश्रय बाबू ही बोलते रहे लेकिन उनके सुर बिल्कुल बदले नजर आ रहे थे, "नई सरकार बनारस को क्योटो सा बनाना चाहती है। शहर तो पहले ही क्योटो सा बन रहा है। मान सिंह की पुरानी हवेली के जगह हैरीटेज होटल बन गया है। घाटों के किनारे पुरानी धूसर इमारतों की जगह नये होटलों ने ले ली हैं बनारस अब वैनिस ज्यादा नजर आने लगा है। जब चौड़ी सड़क बनेगी तब हमारी गली भी इसकी चपेट में आ जाएगी। सब कुछ बदल जाएगा। बनारस खत्म हो जाएगा। हम क्योटो के निवासी बन जाएंगे।" बाबू के चेहरे पर वितृष्णा के भाव थे।

"लेकिन तब शायद आपकी कार पार्क करने की जगह मिल जाए और ड्राइविंग का आपका शौक पूरा हो पाए। शुभ ने कहा।"

"नहीं, ड्राइविंग तो मैंने खूब कर ली। मनु और उसके मिस्टर चंडीगढ़ में शिफ्ट हो गए हैं। चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर खूब ड्राइव की और मन भर गया। अब तो बनारस के घाटों में ही सुकून मिलता है।"

"मनु कैसी है?" जिस प्रश्न को पंद्रह साल तक रोज शुभ ने जेहन में रखा, वो आज पहली बार बाहर आ पाया था।

"मनु अच्छी है। उनका अच्छा बिजनेस है और दोनों का पूरा समय इसी में लगता है। वे लोग चंडीगढ़ के जाने-माने सोशलाइट भी हैं तो बचा-खुचा समय इसमें निकल जाता है। वो अपने बेटियों के साथ साल में सात दिन के लिए बनारस आती थी लेकिन पता नहीं क्यों यहाँ बहुत बुझा-बुझा महसूस करती थी सो मैंने ही कह दिया कि बनारस आने की जरूरत नहीं, फिर भी दो-तीन महीनों में एक-दो दिन के लिए तो आ ही जाती है।"

"..."

"शुभ, जब मैं पूजा करने बैठा था तो किशन ने मुझे बताया कि तुम आए हो। तब से मैं पूजा के बीच भी उसी दौर की बातें याद कर रहा हूँ जब हमें मनु की शादी करनी थी तुमसे कितनी लंबी बातचीत होती थी। इस दौरान एक बार मैंने एक सुभाषित श्लोक तुम्हें सुनाया था। कन्या वरयते रूपं, पिता श्रुतं। आज सोचता हूँ कि मैं सही नहीं था मुझे तुम जैसे विद्वान लड़के की ही खोज करनी थी। मनु के पास वहाँ खुशी के सारे साधन मौजूद है लेकिन उसकी आत्मा को संतोष देने वाला ज्ञान का सुख उसके पास नहीं है। उसे बनारस सी पुरातनता चाहिए थी, चंडीगढ़ सी आधुनिकता नहीं। वैसे तुम्हारे पिता से तुम्हारे बारे में बात हुई थी। उन्होंने मुझे बताया कि सुमन बहुत अच्छी लड़की है और तुम दोनों साथ मिलकर एक कल्चरल प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हो।"

"जी अंकल सब आपका आशीर्वाद है।" शुभ ने कहा।

रामाश्रय बाबू से मुलाकात के बाद शुभ के भीतर बहुत कुछ टूट गया। शतरंज की बाजी में रामाश्रय बाबू और शुभ दोनों एक-एक बार जीत चुके थे। केवल मनु जैसे प्यादे ही पिटे थे। क्योंकि बनारस को क्योटो सा बनना था इसलिए मनु की भी शहादत तो तय ही थी।

शुभ ने आखरी बार उस खंभे से पूछा कि क्या वो मेरे जाने के बाद आई थी, वो आई थी क्या। फिर बनारस को क्योटो बनाने की राह पर आगे बढ़ गया।